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प्रतिक्रमण यानी क्या?

प्रतिक्रमण यानी वापस लौटना। जैसे हम किसी गलत रास्ते पर आगे बढ़ गए हों, तो फिर यू-टर्न लेकर सही रास्ते पर वापस आते हैं। इसी तरह जब अतिक्रमण होता है, तब प्रतिक्रमण करना ज़रूरी होता है। सामान्य भाषा में अतिक्रमण का अर्थ है, सीमा का उल्लंघन करके आगे बढ़ना। जबकि, अध्यात्म की भाषा में अतिक्रमण यानी हमारी ऐसी भूल, जिससे पाप कर्म बंधतें हैं। जैसे, क्रोध करना और लोगों को दुःख हो ऐसे विचार-वाणी-वर्तन का होना वह अतिक्रमण है और उसके लिए पछतावा करना उसे ही प्रतिक्रमण कहते हैं। संक्षेप में, अतिक्रमण अर्थात् विपरीत दिशा में आगे बढ़ना। अब जितना उल्टा चले, वहाँ से वापस लौटने का नाम ही प्रतिक्रमण है।

प्रतिक्रमण से जो भूल हुई हो, वो मिट जाती है। प्रतिक्रमण अर्थात् पाप कर्म के बीज को सेंक देना, ताकि वो फिर से न उग सके।

हम दिन भर में जो भी नॉर्मल व्यवहार करते हैं, जैसे खाना, पीना, सोना, उठना, बोलना, चलना वह सब क्रमण कहलाता है। जल्दी उठना या देर से उठना वह भी क्रमण है। व्यवहार में दूसरों को दुःख न हो इस तरह से काम करना, वह सब क्रमण कहलाता है।

लेकिन यदि नॉर्मल व्यवहार में किसी के साथ कुछ गलत हो जाए, तो उसे अतिक्रमण कहते हैं। जैसे कि, किसी से कुछ कठोर शब्द बोल दिए हों, किसी को बुरा लग जाए ऐसा बोल दिया हो, किसी को दुःख हो जाए ऐसे शब्द निकल जाएँ या किसी को चोट लगे ऐसा धक्का लग जाए, तो ये सब अतिक्रमण कहलाता है।

व्यवहार में सामने वाले को हमसे दुःख हो जाए, तो उसे अतिक्रमण कहते है और यदि दुःख नहीं हुआ, तो उसे अतिक्रमण नहीं कहा जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि हमें किसी काम की जल्दी हो और काम करने वाला व्यक्ति थोड़ी देर के लिए चाय पीने गया हो, तो जब वह वापस आता है, तब हम चिल्लानें लगें कि "कहाँ गए थे? काम बाकी है। समझ में नहीं आता? नालायक!" तो यह अतिक्रमण कहलाएगा। ऐसे पूरे दिन में कितनी बार लोगों को दु:ख पहुँचाने वाला व्यवहार हो जाता है। कई बार हमारी इच्छा न होते हुए भी अतिक्रमण हो जाता है। मुँह से न कहें, लेकिन मन में किसी के लिए गलत विचार आ गए हों, तो वह भी अतिक्रमण कहलाता है। व्यवहार में अधिकतर हमें पता भी चल जाता है कि यह अतिक्रमण हो गया है। जगत् किस आधार पर खड़ा है? अतिक्रमण दोष से।

अतिक्रमण होना वह स्वाभाविक है, लेकिन प्रतिक्रमण करना वह हमारा पुरुषार्थ है। अतिक्रमण से पाप कर्म रूपी जो दाग़ पड़े हो, वो प्रतिक्रमण करने से तुरंत मिट जाते है। किसी को किंचित्‌मात्र भी दु:ख न हो ऐसा जीवन होना चाहिए। यदि अतिक्रमण जान-बूझकर न किया हो और सहज भाव से हो गया हो, तब भी उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए।

यथार्थ प्रतिक्रमण

जगत् के लोग भी माफी माँग लेते हैं, लेकिन इससे सच्चा ‘प्रतिक्रमण’ नहीं होता । यह तो रास्ते में 'सॉरी' या 'थैंक्यू' कहें, उसके जैसी बात है। ऐसी ऊपरी माफी माँगने का कोई महत्त्व नहीं है। महत्त्व वास्तव में यथार्थ प्रतिक्रमण करने का है, जो आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान ऐसे तीन चरणों में होता है। आलोचना यानी जैसा दोष हुआ हो उसका वैसे ही स्वरूप में इकरार करना। फिर अपनी भूल पर पछतावा करना वो प्रतिक्रमण कहलाता है। उसके बाद जो दोष हुआ है, वह दोबारा न हो उसके लिए दृढ़ निर्णय-निश्चय करना वह प्रत्याख्यान कहलाता है।

आलोचना अधिकतर लोकनिंदा के कर्मों के लिए करनी पड़ती है, जो लोगों को स्वीकार्य नहीं होती। ऐसे भारी दोष जो हम किसी दूसरे से नहीं कह सकते, उनकी आलोचना करनी चाहिए। आलोचना करते समय, "वे क्या कहेंगे?" ऐसा भय रखे बगैर जैसा है, बिल्कुल वैसे ही दोष को उजागर कर देना चाहिए। आलोचना करने से सारा दोष चला जाता है और हम हल्के हो जाते हैं। लेकिन जहाँ संपूर्ण विश्वास हो वहाँ ही आलोचना करनी चाहिए, नहीं तो इस जगत् के लोग उसका दुरुपयोग कर सकते हैं। वास्तव में किसी आप्तजन, ‘ज्ञानी पुरुष के पास ही आलोचना करनी चाहिए। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “मनुष्य ने यथार्थ आलोचना की ही नहीं है। वही मोक्ष जाने में रोकती है। गुनाह हो जाए तो हर्ज नहीं है। यथार्थ आलोचना हो जाए तो कोई हर्ज नहीं है।“

पाप से वापस लौटना उसी को प्रतिक्रमण कहते हैं। अपनी भूल के लिए दिल से पछतावा करना वह प्रतिक्रमण है। परम पूज्य दादाश्री हमें यहाँ प्रतिक्रमण की यथार्थ समझ दे रहे हैं।

प्रश्नकर्ता: यानी यह जो प्रतिक्रमण करते हैं, वह और कन्फेशन, दोनों एक समान ही हुए न फिर?

दादाश्री: नहीं, वह एक समान नहीं हुआ। प्रतिक्रमण तो, जब अतिक्रमण हो जाए तब फिर बार-बार धोना और यदि फिर से दाग़ पड़े तो फिर से धोना है और पाप कन्फेस करने, ज़ाहिर करने हैं, दोनों चीज़ें अलग हैं।

प्रश्नकर्ता: प्रतिक्रमण और पश्चाताप में क्या फर्क है?

दादाश्री: पश्चाताप, वह सामान्य रूप से खेद करना है। क्रिश्चियन रविवार को चर्च में पश्चाताप करते हैं। जो पाप किए हैं, उनका सामूहिक पश्चाताप करते हैं। और प्रतिक्रमण तो कैसा है कि ‘जिसने गोली मारी, जिसने अतिक्रमण किया, वह प्रतिक्रमण करे, उसी क्षण! ‘शूट ऑन साइट’ (देखते ही गोली मारना) उसे धो डाले।

अब प्रतिक्रमण किया तो फिर "अब ऐसी भूल दोबारा नहीं करूँगा।" इसे प्रत्याख्यान कहते हैं। यह भूल दोबारा नहीं होगी, ऐसा निश्चय करना उसे प्रत्याख्यान कहते हैं। प्रत्याख्यान लेने के बाद फिर वही भूल हो जाए, तो फिर से प्रतिक्रमण करना चाहिए। ऐसा करते-करते दोष हल्का हो जाता है। जैसे हमारे कपड़े पर दाग़ पड़ा हो और हम टेबल साफ़ करें तो दाग़ नहीं मिटेगा। उसी तरह, वास्तव में जो दोष हुआ है, उसी के प्रतिक्रमण करके उसी के प्रत्याख्यान करने होते हैं।

आलोचना-प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान यानी रोज़ का बहीखाता निकालना है। ये तीनों साथ में होने चाहिए।

प्रतिक्रमण - अभिप्राय बदलने का साधन

वास्तव में प्रतिक्रमण हमारा अभिप्राय बदलने के लिए करना है। मान लीजिए कि, हमने अपने माता-पिता या बड़ों के सामने ऊँची आवाज में बोल दिया हो, तो यह अतिक्रमण हुआ कहा जाएगा। तब यदि हम प्रतिक्रमण न करें, तो हम अतिक्रमण के पक्ष के कहलाएँगे। लेकिन अगर हम इस भूल के लिए पछतावा करते हैं, तो हम भूल के विरोधी पक्ष के हुए। जो अतिक्रमण हुआ उसके विरोध में बैठने के लिए प्रतिक्रमण करना है। हम क्रोध करके सामने वाले को दुःख दे दें और बाद में प्रतिक्रमण न करें, तो हम क्रोध से सहमत हैं ऐसा साबित होगा।

कई बार प्रतिक्रमण करने के बाद भी दोष में कोई बदलाव नहीं दिखाई देता हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रतिक्रमण प्रभावी नहीं है। दोष प्याज की परतों के जैसे होते हैं। जैसे-जैसे प्रतिक्रमण करते हैं, वैसे-वैसे एक-एक परत कम होती जाती है। ऐसा करते-करते अंत में सभी परतें समाप्त हो जाएँगी और दोष खत्म होकर रहेगा। हमारा वर्तमान जीवन पिछले जन्म का कर्मफल रूप है। मान लीजिए कि, कोई लड़का गलत रास्ते पर चला गया हो और दो लाख रुपये का कर्ज़ कर बैठा हो। फिर उसमें बदलाव आता है और आज वह तय करता है कि मुझे एक पाई का भी कर्ज़ नहीं करना है, उसी के अनुसार वर्तन भी करता है, महीने की जो तनख्वाह आती है, उसे कर्ज़ चुकाने के लिए दे देता है। अब आज उसने नया कर्ज़ नहीं लेने का निश्चय किया है, फिर भी पिछला कर्ज़ चुकाए बिना नहीं चलेगा। इसी तरह सच्चे दिल से यथार्थ प्रतिक्रमण करने पर कर्मों का कर्ज़ कम तो होगा, लेकिन आज ही आज समाप्त नहीं हो जाएगा।

प्रतिक्रमण के पीछे विज्ञान काम करता है, यह परम पूज्य दादाश्री हमें यहाँ समझाते हैं।

प्रश्नकर्ता: प्रतिक्रमण करने से पाप का नाश होता है, उसके पीछे का साइन्स क्या है?

दादाश्री: अतिक्रमण से पाप होता है और प्रतिक्रमण से पाप का नाश होता है। वापस लौटने से पाप का नाश होता है।

प्रश्नकर्ता: तो फिर कर्म का नियम कहाँ लागू होता है? हम यदि माफी माँगे और कर्मों से छूट जाए तो फिर उसमें कर्म का नियम नहीं रहा न?

दादाश्री: यही कर्म का नियम है! माफी माँगना, वही कर्म का नियम है!

प्रश्नकर्ता: तब तो सब पाप करते जाएँगे और माफी माँगते जाएँगे।

दादाश्री: हाँ! पाप करते जाना है और माफी माँगते जाना है, वही भगवान ने कहा है।

प्रश्नकर्ता: लेकिन सच्चे मन से माफी माँगना है न?

दादाश्री: माफी माँगने वाला सच्चे मन से ही माफी माँगता है और यदि झूठे मन से माफी माँगेगा तब भी चला लेंगे, इसलिए माफी माँगना।

प्रश्नकर्ता: तब तो फिर उसे आदत पड़ जाएगी!

दादाश्री: आदत पड़ जाए तो भले पड़ जाए, लेकिन माफी माँगना। माफी माँगे बगैर तो जैसे शामत आ गई! माफी का क्या अर्थ है? तो उसे प्रतिक्रमण कहते हैं और दोष को क्या कहते हैं? अतिक्रमण। कर्म का नियम क्या है? ‘अतिक्रमण करे तो उसका प्रतिक्रमण करो।’ समझ में आया आपको?

प्रश्नकर्ता: हाँ।

दादाश्री: अर्थात् माफी अवश्य माँगो और इन अक्लमंदों की, ज़रूरत से ज़्यादा अक्लमंदों की बात जाने दो। कोई गलत कर रहा हो और फिर माफी माँग रहा हो तो करने दो न! ‘दिस इज़ कम्प्लीट लॉ।’

कोई ब्रान्डी पीता है और यदि वह कहे कि ‘मैं माफी माँगता हूँ’। तो मैं कहूँगा कि ‘माफी माँगना, माफी माँगता जाना और पीते जाना, लेकिन मन में निश्चय करना कि मुझे अब छोड़ देनी है। सच्चे दिल से मन में निश्चय करना। फिर पीते जाना और माफी माँगते जाना। एक दिन उसका अंत आएगा’। मेरा यह विज्ञान शत प्रतिशत है।

यह तो विज्ञान है! उगे बगैर रहेगा नहीं। तुरंत फल देने वाला है।

कभी-कभी हमें ऐसा भी लगता है कि मैं प्रतिक्रमण करूँ, लेकिन सामने वाला मुझे माफ़ न करे तो क्या करना चाहिए? परम पूज्य दादाश्री इसके पीछे का विज्ञान समझाते हुए कहते हैं, कि सामने वाला माफ़ करे या न करे, वह हमें नहीं देखना है। प्रतिक्रमण वह हमारे अभिप्राय को बदलने के लिए है। अगर वह नहीं बदलेगा तो हमारा अभिप्राय हमारे पास ही पड़ा रहेगा और वह फिर से बिना उभरे रहेगा नहीं।

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