
अहिंसा का पालन करने के लिए सबसे पहले हिंसा यानी क्या? वह जानना पड़ेगा। हिंसा कैसे नुकसान करती है? और सही अर्थ में अहिंसा क्या है? इस ज्ञान को जानने के बाद ही उस पर श्रद्धा बैठती है तभी अहिंसा वर्तन में आती है और हिंसा रुकती है। इसलिए अहिंसा का पालन करने के लिए सबसे पहले सच्ची समझ प्राप्त करनी चाहिए।
हमारे मन-वचन-काया से यानी कि, हमारे विचारों से, हमारी वाणी से या हमारे वर्तन से किसी भी जीव को किंचित्मात्र दुःख होना, वह हिंसा है। हिंसा करने से पाप कर्म बंधते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप हमें ही दुःख भुगतना पड़ता है।
“किसी भी जीव को हमारे मन-वचन-काया से किंचित्मात्र दुःख न हो, वही सच्ची अहिंसा है।“

अहिंसा के पालन में सबसे पहले मनुष्यों को दुःख न हो वह जागृति रखनी है, क्योंकि उसे बड़ी हिंसा कहा गया है। उसमे भी हमारे घर या परिवार के नज़दीकी लोगों को दुःख न हो उसका खास ध्यान रखना चाहिए। उसके बाद हमारे जीवन में हमें जो व्यक्ति मिलती हैं उन सभी को दुःख नहीं देना चाहिए।
मनुष्यों के बाद पंचेन्द्रिय जीवों को नुकसान न हो, इसका ध्यान रखना चाहिए। उसके बाद, क्रम से चार इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, दो इन्द्रिय और एकेन्द्रिय जीवों की अहिंसा का पालन करना चाहिए। उसमें भी त्रसकाय जीवों, जिन्हें दुःख या भय लगता है, त्रास पड़ते ही जो भय से भागते हैं, ऐसे जीवों को बिल्कुल दुःख नहीं पहुँचाना चाहिए।
एकेन्द्रिय जीवों में स्पर्श इन्द्रिय का विकास होता है। इनमें वायुकाय, तेउकाय, अपकाय, वनस्पतिकाय और पृथ्वीकाय के जीवों का समावेश होता है। इन जीवों को त्रास या दुःख आए तो भागते नहीं हैं, इसलिए इन्हें स्थावर जीव भी कहा जाता है। इन जीवों की हिंसा से अधिक त्रसकाय जीवों की हिंसा में ज़्यादा जोखिम होता है।
दो इन्द्रिय जीवों में स्पर्श और स्वाद (जीभ) की इन्द्रिय का विकास होता है। इनमें केंचुए, कृमि, कौड़ी, सीप, शंख आदि का समावेश होता है। तीसरी नाक की इन्द्रिय का विकास होता है। तीन इन्द्रिय जीवों में जूं, लीख, खटमल, चींटी, काली चींटी, इल्ली, घुन, दीमक, कनखजूरा, घोंघा आदि शामिल होते हैं। चार इन्द्रिय जीवों में आँख की इन्द्रिय का विकास होता है। जिसमें मच्छर, मक्खी, तितलियाँ, पतंगे, मकड़ियाँ, भँवरे आदि समावेश पाते हैं। अंत में कान की इन्द्रिय का विकास होता है, जिसमें कुछ जीवों के छेद होते हैं। छेद वाले जीव अंडे देते हैं और कान वाले जीव बच्चों को जन्म देते हैं। साँप, चूहा, गिलहरी, छिपकली, चमगादड़ और सभी पशु-पक्षी उसी तरह मनुष्य भी पंचेन्द्रिय जीवों में आते हैं।
स्थूल जीवों की हिंसा में जोखिम है, उसमें भी पंचेन्द्रिय जीवों की हिंसा में सबसे ज़्यादा जोखिम है। हम एकेन्द्रिय जीवों की अहिंसा की पर ध्यान देकर क्षमा याचना करते हैं, लेकिन दूसरी ओर घर के लोगों के साथ कलह करके दुःख पहुँचा देते हैं, तो यथार्थ अहिंसा का पालन नहीं होता। घर के लोगों के साथ झगड़ा या क्लेश हो, तो सबसे पहले उसकी माफी माँगनी चाहिए।
एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा में सबसे कम पाप बंधता है, फिर भी रास्ते चलते पेड़ की पत्तियाँ तोड़ें ऐसे अनर्थकारी कार्य भी नहीं करने चाहिए। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "दातुन की ज़रुरत हो तो आप पेड़ से कहना कि, 'मुझे एक टुकड़ा चाहिए।' ऐसे माँग लेना।"
हिंसा के दो प्रकार होते हैं। एक है द्रव्य हिंसा और दूसरी है भाव हिंसा। संसार खचाखच जीवों से ही भरा हुआ है। हम जीवों के समुद्र में रहते हैं। कुछ जीवों को सीधे आंखों से देख सकते हैं, जबकि बहुत से जीव दिखते ही नहीं। ऐसे में द्रव्य हिंसा से कौन बच सकता है? एक बार हाथ घुमायें तो कई जीव नष्ट हो जाते हैं। तो, फिर जीवों के इस समुद्र में रहने के बावजूद यथार्थ अहिंसा का पालन कैसे संभव है?
चल कर जाएँ, वाहन चला रहे हों तब कई जीव कुचले जाते हैं। घर में या अन्य स्थानों पर साफ़-सफाई में भी जीवों की हिंसा होती ही है। खेती-बाड़ी के व्यवसाय में भी कहीं न कहीं, जाने-अनजाने हिंसा हो जाती है। तो इस हिंसा से बचने के लिए क्या करना चाहिए? अहिंसा पालन करने का हमारा संपूर्ण भाव होता है फिर भी क्रियाओं में हम कितनी अहिंसा रोक सकते हैं?
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, आज की क्रिया वो पूर्व के भाव का परिणाम है। पूर्व में भाव में लीकेज रखा हो कि, "हिंसा हो जाए, उसमें मैं क्या करूँ?" तो उसके परिणामस्वरूप हमारे निमित्त से आज हिंसा हो जाएगी। इसलिए परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, "मुझे अहिंसा का पालन करना ही है" यह भाव मजबूत कर लो। किसी जीव को किंचित्मात्र दुःख न हो, हिंसा न हो, यह भाव निश्चित करो और हो जाए तो माफी माँग लो।"

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, “सुबह पहले बाहर निकलते समय 'मन-वचन-काया से किसी भी जीव को किंचित्मात्र दुःख न हो' ऐसी पाँच बार भावना करके और फिर निकलना चाहिए। फिर किसी को दुःख हो गया हो, उसे याद रखकर उसका पश्चाताप करना चाहिए।“
किसी भी जीव को दुःख न हो, ऐसी भावना करने से हमारी श्रद्धा दृढ़ होती है। फिर जब दुःख हो जाए, तो सच्चे दिल से पश्चात्ताप करने से वह दोष दोबारा न हो, इसके लिए जागृति रहती है। इसके बावजूद प्रश्न उठता हो कि संपूर्ण अहिंसा कैसे संभव है, तो उसकी यथार्थ समझ हमें परम पूज्य दादाश्री के नीचे दिए गए संवाद में से मिलती है।
प्रश्नकर्ता: अपने आसपास संबंधित जीवों में से किसी जीव को दुःख न हो, वैसा जीवन संभव है क्या ? हमारे आसपास में हर एक जीव को हर एक संयोग में संतोष दिया जा सकता है?
दादाश्री: जिसे ऐसा देने की इच्छा है, वह सबकुछ कर सकता है। एक जन्म में सिद्ध नहीं होगा, तो दो-तीन जन्मों में भी सिद्ध होगा ही! आपका ध्येय निश्चित होना चाहिए, लक्ष्य ही होना चाहिए, तो सिद्ध हुए बगैर रहता ही नहीं।
मान लीजिए कि रसगुल्ला या ऐसा कोई व्यंजन बनाना हो, तो कई बार प्रैक्टिस करते हैं, महीनों तक घर के लोगों पर प्रयोग करते हैं, फिर परफेक्ट व्यंजन हम मेहमानों को परोसते हैं। जैसे किसी भी नई चीज़ के लिए हम निश्चय करते हैं कि "मुझे सीखना ही है", फिर खूब अभ्यास करने के बाद अगर वह सिद्ध हो सकता है, वैसे ही "किसी को दुःख न हो" यह निश्चय कायम रखें, तो यह भी सिद्ध हो सकता है। लेकिन यह निश्चय हमेशा के लिए होना चाहिए। हमारी गलती कहाँ होती है कि निश्चय करने के बाद परिस्थितियों के कारण भाव बिगड़ जाते हैं। “ये तो होता ही है न! वाहन चलाएँ तो कीड़े-मकौड़े कुचल ही जाते हैं। हम कितना ध्यान रखें? थोड़ा तो नुकसान होगा।“ ऐसे भाव बिगड़ने से निश्चय नहीं टिकता।
हमारा भाव ”संपूर्ण अहिंसा पालनी है“ ऐसा निश्चित हो, लेकिन हमारे आसपास का कोई व्यक्ति हिंसा हो ऐसे कार्यों को करे, तब क्या करना चाहिए? मान लीजिए कि, कोई घर में मक्खी, मच्छर या कॉकरोच और छिपकली जैसे जीवों को मारता हो, तो उसे कैसे समझाएँ? इन प्रश्नो का उत्तर देते हुए परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, हमें धीरे-धीरे उस व्यक्ति को सही समझ देनी चाहिए, ताकि वह मान जाए। हमारे पॉज़िटिव प्रयास होंगे, तो एक दिन उसका फल मिलेगा।
लेकिन हम अहिंसा के आग्रही हो जाएँ और हिंसा का आचरण करने वाले व्यक्ति पर चिढ़ जाएँ, तो वह उल्टा हमारी बात नहीं मानेगा। उसके बदले प्रेम से उस व्यक्ति को समझाना चाहिए कि "कोई हमें इस तरह डराए या मार डाले तो हमें कितना दुःख होगा? तो हमें भी किसी को नहीं मारना चाहिए।"
फिर भी वह व्यक्ति न माने, तो क्या करें? इसके लिए परम पूज्य दादा भगवान सुंदर उपाय नीचे के संवाद में बताते हैं, जो हमारे सत्ता में है।
प्रश्नकर्ता: हिंसा रोकने के प्रयत्नों में निमित्त बनने के लिए आपने पहले समझाया था। जो अहिंसा के आचार को नहीं मानता हो तो उसे प्रेमपूर्वक समझाकर बात करनी चाहिए। पर प्रेमपूर्वक समझाने के बावजूद भी न माने तो क्या करना चाहिए? हिंसा चलने देनी या शक्ति द्वारा रोकने का प्रयत्न करना योग्य माना जाएगा?
दादाश्री: हमें भगवान की भक्ति इस तरह करनी, जिन भगवान को आप मानते हों उनकी, कि 'हे भगवान, हर एक को हिंसा रहित बनाओ।' ऐसी आप भावना करना।
हिंसा को रोकने के लिए क्रोध करके सामने वाले को दुःख दे दें, तो भी गुनाह लगता है और हिंसा को रोकें नहीं और चलने दें तो भी गुनाह लगता है। इसलिए हिंसा को रोकने के प्रयास में अंत में कोई उपाय न मिले तब सच्चे दिल से प्रार्थना और भावना करके छोड़ देना चाहिए।
हिंसा को रोकने के उपायों में हमें संपूर्ण अहिंसक रहना चाहिए। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “सामने वाला मनुष्य हिंसा का हथियार काम में ले तो हम अहिंसा का हथियार काम में लें, तो सुख आएगा। नहीं तो हिंसा से हिंसा कभी भी बंद होनेवाली नहीं है। अहिंसा से हिंसा बंद होगी।“
सूक्ष्म हिंसा मतलब क्रोध, मान, माया, लोभ के कषाय। जो लोग स्थूल हिंसा कर रहे हों, उनके सामने हम उग्र होकर ऐसे कहें कि, "तुम लोग हिंसा करते हो, नहीं चलने देंगे, बंद करो!" तो वह फिर हिंसा में रहकर ही हिंसा को रोकने जाते हैं। इसलिए सामने वाला हमारी बात स्वीकार नहीं करेगा और हिंसा बंद नहीं होगी। जैसे वैर से वैर नहीं मिटता, लेकिन प्रेम से वेर मिटता है। उसी तरह कषाय रहित व्यवहार, प्रेम और वीतरागता ये अहिंसक हथियार हैं, जिनसे कभी न कभी हिंसा बंद होगी।
हमारे आसपास पंचेन्द्रिय जीवों की हिंसा हो रही हो, तो हमें अहिंसा का अनुमोदन भावना और प्रार्थना से करना चाहिए। वे कहते हैं कि,"अब इन गूँगे प्राणीयों की हिंसा नहीं करनी चाहिए, गौ हत्या नहीं करनी चाहिए, ऐसी भावना हमें विकसित करनी चाहिए और अपने अभिप्राय दूसरों को समझाने चाहिए। जितना अपने से हो सके उतना करना चाहिए। उसके लिए कोई दूसरे के साथ लड़ मरने की ज़रूरत नहीं है। कोई कहे कि, 'हमारे धर्म में कहा है कि हमें माँसाहार करना है।' अपने धर्म ने मना किया हो, उस कारण से झगड़ा करने की ज़रूरत नहीं है। हमें भावना विकसित करके तैयार रखनी, फिर जैसा भावना में होगा वैसी संस्कृति चलेगी।
अभयदान वह तो सबसे बड़ा दान है। अभयदान अर्थात् कोई भी जीव हमसे भयभीत न हो। अभयदान किसे देना है? जो जीव भयभीत होते हैं ऐसे हैं, त्रस्त होते हैं ऐसे जीवों को अभयदान देना है। जैसे कि, छोटी चींटी को भी हम हाथ लगाएँ तो वह भयभीत होती है, इसलिए उसे अभयदान देना चाहिए।
जीवों को अभयदान किस तरह से दे सकते हैं? किसी स्थान पर चिड़िया, कबूतर जैसे पक्षी बैठे हों, तो वे उड़ जाएँगे ऐसा सोच कर हमें धीरे से दूसरी ओर से चले जाना चाहिए। रात के बारह बजे रास्ते से पैदल गुजरें और दो कुत्ते सो गए हों, तो हमारे बूट से वे चौंककर जाग जाएँगे, ऐसा सोचकर बूट पैरों से निकालकर और धीरे-धीरे घर आना चाहिए। कोई मनुष्य या कोई भी जीव हमसे डरे, उसे मानवता कैसे कहा जाएगा?
तीर्थंकर भगवंत, जो स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम हिंसा से पर हुए हैं, उनके निर्वाण से पहले अंतिम सांस छूटती है, जिसमें वायुकाय जीवों की हिंसा होती है। यदि इस हिंसा का भगवान को कर्म बंधता हो तो उसे भुगतने के लिए फिर से जन्म नहीं लेना पड़ेगा? तो फिर मोक्ष कैसे संभव होगा! इसलिए उनके पास ऐसी कोई प्राप्ति होनी चाहिए जिससे क्रिया करने के बावजूद वे अहिंसक रहे और कर्मों से मुक्त रहकर मोक्ष जा सके।
जहाँ खुद हर तरह से बलवान हैं, खुद के पास सभी हथियार हाथ में हैं, फिर भी सामने से कोई मारने आए फिर भी खुद हथियार न उठाएँ; इतना ही नहीं, मन से भी प्रतिकार न करें वही अंतिम अहिंसा है! ज्ञानी पुरुष और तीर्थंकर संपूर्ण रूप से अहिंसक होते हैं। तीर्थंकर भगवान तो हर तरह से शक्तिशाली होते हैं, सामने वाले को मारने या हराने की पूरी-पूरी क्षमता हो फिर भी हथियार रखकर वीतराग होकर बैठे रहते हैं।
क्योंकि वे खुद आत्मस्वरूप हुए हैं। आत्मस्वरूप में किसी की हिंसा हो ही नहीं सकती। देह को “मैं हूँ” मानना, वहीं सूक्ष्मतम हिंसा होती है और आत्मस्वरूप होना वह सूक्ष्मतम अहिंसा है। आत्मस्वरूप में लीन हो जाएँ तभी देह होते हुए भी निर्वाण संभव होता है।
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