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खेती-बाड़ी में हिंसा हो तो क्या करना चाहिए?

खेती-बाड़ी करते समय किसानो को जाने-अनजाने में हिंसा का अपराध करना पड़ता हैं। ज़मीन जोतने के दौरान छोटे कीटों से लेकर साँप जैसे पंचेन्द्रिय जीव मर जाते हैं। इतना ही नहीं, फसल को कीटों से बचाने के लिए उस पर कीटनाशक दवाइयाँ  छिड़कनी पड़ती हैं, उसमें भी हिंसा का पाप कर्म बंधता है। क्योंकि, कीटनाशक दवाइयाँ जीवों को मारने के उद्देश्य से ही बनाई जाती हैं, खरीदार भी जीवों को मारने के उद्देश्य से खरीदता है और जीवों को मारने के उद्देश्य से ही उसका उपयोग भी करता है।

इसके अलावा, खेती करते समय एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा होती है। जैसे कि, एक फसल को उखाड़कर दूसरी लगानी होती है तब, तंबाकू जैसे फसलो में पौधों की जड़ें तोड़नी हो तब। इन सब में भी जीवों को अप्रत्यक्ष रूप से दुःख पहुँचता ही है। परम पूज्य दादाश्री समझाते हैं, कि एक पौधे को उखाड़ने में पच्चीस प्रतिशत पाप लगता है और दूसरा पौधा उगाने में पचहत्तर प्रतिशत पुण्य बंधता है। फिर, पाप और पुण्य दोनों का फल अलग-अलग भुगतना पड़ता है।

इस हिंसा के उपाय में परम पूज्य दादा भगवान यह समझाते हैं, कि कार्य करते समय कार्य के पीछे हमारे भाव कैसे हैं, उसी के आधार पर कर्म बंधते हैं। किसानों के लिए खेती करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, इस व्यवसाय को न बदला या बंद नहीं किया जा सकता। इसलिए, व्यवसाय से जुड़ी हिंसा के प्रति परम पूज्य दादाश्री भाव बदलने का सुंदर उपाय बताते हैं।

दादाश्री: आखिर में जो-जो कार्य करने पड़ते हैं, वे प्रतिक्रमण करने की शर्त पर करने चाहिए। आपको इस संसार व्यवहार में किस तरह चलना वह नहीं आता। वह हम आपको सिखलाते हैं। उससे नये पाप बँधेगे नहीं।

खेत में तो खेती-बाड़ी करें, इसलिए पाप बँधते ही हैं। पर वे बँधते हैं उसके साथ हम आपको दवाई देते हैं कि ऐसा बोलना। उससे पाप कम हो जाएँगे। हम पाप धोने की दवाई देते हैं। दवाई नहीं चाहिए? खेत में गए इसलिए जोतो-करो, उसमें पाप तो होंगे ही। अंदर कितने ही जीव मारे जाते हैं। यह गन्ना काटते हो तो पाप नहीं कहलाता? वे जीव ही हैं न बेचारे? पर उसका क्या करना वह हम आपको समझाते हैं, जिससे आपको दोष कम लगे और भौतिक सुख अच्छी तरह भोगो।

खेती-बाड़ी में जीवजंतु मरे, उसका दोष तो लगता है न? इसलिए खेती-बाड़ीवालों को हररोज़ पाँच-दस मिनट भगवान के पास प्रार्थना करनी चाहिए कि यह दोष हुआ उसकी माफ़ी माँगता हूँ। किसान हो उसे कहें कि तू यह काम करता है, उसमें जीव मरते हैं। उसका इस तरह से प्रतिक्रमण करना। तू जो गलत करता है, उसमें मुझे आपत्ति नहीं। पर उसका तू इस तरह प्रतिक्रमण कर।

सबसे पहले व्यवसाय के कारण जो हिंसा होती है, उसे समझना चाहिए। फिर उसका जोखिम समझना चाहिए और यह निश्चय करना चाहिए कि हिंसा तो मजबूरी में करनी पड़ रही है, लेकिन मुझे हिंसा नहीं करनी है। फिर जितनी बार हिंसा होती है, उतनी बार सच्चे दिल से पछतावा करना चाहिए।

खेती-बाड़ी में हिंसा होती है, इस कारण पैसे की हानि उठाकर भी व्यवसाय को बंद करने का आग्रह रखना उचित नहीं है। लेकिन, अनुकूल परिस्थितियाँ मिलें तो व्यवसाय बदला जा सकता है। फिर भी, व्यवसाय बदले या बंद किए बिना भी, केवल भाव बदलकर हिंसा के गुनाह से छुटकारा पाया जा सकता है।

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