
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, अहिंसा का पालन करने के लिए स्वाद की इन्द्रिय, यानी जीभ पर बहुत कंट्रोल रखना पड़ता है। जो अहिंसा का पालन करना चाहते हैं, उन्हें मांसाहार या अंडों का सेवन नहीं करना चाहिए।
वे यह भी कहते हैं कि, जो मांसाहार करते हैं, उनसे चिढ़ना नहीं चाहिए। मांसाहार जिनका आहार है, उनके सामने आपत्ति उठाना हमारा उद्देश्य नहीं है। बस, जिन्हें अहिंसा पालन करने की भावना हैं, उनके लिए यहाँ सही समझ प्राप्त होती हैं।
दो इन्द्रियों से लेकर पाँच इन्द्रिय तक के सभी जीवों को खाना वह मांसाहार कहलाता है। इन जीवों को मारने से उन्हें त्रास (दुःख) पहुँचता है, इसलिए इन्हें 'त्रसकाय' जीव कहा जाता हैं। सीप, शंख, चींटी, कीड़े-मकोड़े, मुर्गी, सूअर, गाय सभी त्रसकाय जीव हैं। अंडे केवल पंचेन्द्रिय जीव ही देते हैं, जिनके कान नहीं होते, इसलिए अंडे खाने से पंचेन्द्रिय जीवों की हिंसा होती हैं। इन जीवों को आहार में उपयोग करना मांसाहार कहलाता है। कुछ लोग मछली या अंडे को मांसाहार में शामिल नहीं करते, उनके लिए यह विभाजन मददगार (सहायक) सिद्ध हो सकता है।
दूसरा, जब मुर्गी या उसके बच्चों को पकड़ने के लिए जाएँ, तो वे जान बचाने के लिए भाग जाते हैं। क्योंकि, उन्हें जीने की इच्छा हैं, और मरने का भय है। जब हम गेहूं और चावल को पकाते हैं या फल-सब्जियां काटते हैं, तो वे भागते नहीं हैं। प्राणियों की जब हिंसा होती है, तो उन्हें जितना ज़्यादा दुःख होता है, उतना ही ज़्यादा हिंसा का गुनाह बंधता है। दो इन्द्रियों से लेकर पांच इन्द्रियों तक के सभी जीवों को मारने से उन्हें दुःख पहुँचता है, इसलिए मांसाहार में हिंसा निश्चित रूप से जुड़ी होती है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “एक तो, जो जीव अपने से त्रास पाए, उसे दुःख नहीं देना चाहिए, उसे त्रास नहीं देना चाहिए। और गेहूँ है, बाजरा है, चावल है, उन्हें खाओ। उसका हर्ज नहीं है। वे अपने से त्रास नहीं पाते, वे अभान अवस्था में हैं और ये कीड़े-मकोड़े वे तो दौड़ जाते हैं, उन्हें नहीं मारना चाहिए। ये सीप-शंख के जो जीव होते हैं, जो हिलते-डुलते हैं, ऐसे दो इन्द्रिय से लेकर और पाँच इन्द्रिय तक के जीवों को कुछ नहीं करना चाहिए।“
मांसाहार करने से पहले, उस कत्लखाने में जहाँ प्राणियों को मारा जाता है, जाकर देखना चाहिए। आजकल इसके वीडियो भी इंटरनेट पर देखने को मिलते हैं। मुर्गे को काट रहे हों और उसकी चीखें सुनाई दें, तो कोई भी मानवतापूर्ण हृदय वाले को इतनी ज़्यादा तकलीफ़ होती है कि सहन ही नहीं होती। प्राणियों को कैसे रखा जाता है, उनकी संख्या बढ़ाने के लिए क्या उपाय किए जाते हैं, अंडे नहीं देने वाली मुर्गी या दूध नहीं देने वाली गायों को किस तरह निर्दयता से मार दिया जाता है, यह सब देखें तो शौक या दिखावे के कारण जो मांसाहार किया जाता है, उस पर संयम आ सकता है।
जब मुर्गी, सूअर, गाय जैसे पंचेन्द्रिय प्राणियों की हत्या होती है, तब उनके खून को देखकर घबराहट होने लगती है, प्राणियों की पीड़ा देखकर कंपकंपी छूटती है, तो फिर उनका मांस खाते वक्त वह पीड़ा याद आनी चाहिए। यदि प्राणियों को जिंदा काटने की हिम्मत न होती हो, तो उनका मांस नहीं खाना चाहिए।
मांसाहार करने वाला व्यक्ति अक्सर यह तर्क करते हैं कि खुद तो प्राणियों को नहीं मारते, बल्कि कसाई उन्हें मारता है, तो खुद को पाप कैसे लग सकता है? तो उनके लिए परम पूज्य दादा भगवान यहाँ सही समझ देते हैं।
परम पूज्य दादाश्री के पास एक कसाई आया था। उसने परम पूज्य दादाश्री के पास से ज्ञान लिया था, फिर भी उसने अपना कसाई का धंधा जारी ही रखा था। किसी ने परम पूज्य दादाश्री से पूछा कि उस कसाई की क्या दशा होगी? जवाब में उन्होंने नीचे दी गई हकीकत खुली की।
दादाश्री: पर कसाई की दशा क्या बुरी है? कसाई ने क्या गुनाह किया है? कसाई को तो आप पूछो तो सही कि, ‘भाई तू क्यों ऐसा काम करता है?’ तब वह कहेगा कि, ‘भाई, मेरे बाप-दादा करते थे, इसलिए मैं करता हूँ। मेरे पेट के लिए, मेरे बच्चों के पोषण के लिए करता हूँ।’ हम पूछें, ‘पर तुझे इसका शौक है?’ तब वह कहता है, ‘ना, मुझे शौक नहीं।’ यानी इस कसाई से तो माँसाहार खानेवाले को अधिक पाप लगता है। कसाई के लिए तो उसका काम ही है बेचारे का।

कसाई से ज़्यादा गुनाह उस माँसाहारी व्यक्ति पर लागू होता है, जिसकी वजह से यह काम करना पड़ता है। भोजन के इतने ज़्यादा शाकाहारी विकल्प उपलब्ध होते हुए भी, जीभ के स्वाद या शौक के लिए मांसाहार करने वाले व्यक्ति को ज़्यादा जोखम होता है। जबकि, हिंसा करने के पीछे कसाई का अपना शौक नहीं होता, पैसे कमाने की मजबूरी होती है। मांसाहार करने वाला इस हिंसा का अनुमोदन (समर्थन) करता है, इसलिए उसका गुनाह लगता है।
इसलिए, इस हिंसा का सबसे ज़्यादा फल मांसाहार करने वाले के हिस्से में आता है। खाने वाले के कारण मारने वाले को मारना पड़ता है, इसलिए मारने वाले को उसका गुनाह लगता है। इन दोनों के अलावा, जानवरों को पालने वाले, उन्हें मारने के औज़ार बनाने वाले, उनका ट्रांसपोर्ट करने वाले, उन्हें कोल्ड स्टोरेज में रखने वाले, मांस बेचने वाले, खरीदने वाले, परोसने वाले, उन सबके हिस्से में बड़ी जिम्मेदारी आती है। संक्षेप में, मांसाहार में हिंसा करना, करवाना और उसकी अनुमोदना (समर्थन) करना उसके आधार पर गुनाह (पाप) बंधता है।
मनुष्य अपने शौक के लिए मांसाहार करता है, उसे परम पूज्य दादाश्री ने हार्ड रौद्रध्यान (हिंसक और क्रूर मानसिक अवस्था) कहा है। दूसरों का नुकसान करना वह रौद्रध्यान कहलाता है। और उसमें भी दूसरों को नुकसान पहुँचाकर स्वयं खुश होना, उसे हार्ड रौद्रध्यान कहा गया है। खाने के शौक के लिए किया गया रौद्रध्यान का फल अधोगति की ओर ले जाता है।
जब चिकन (मुर्गी के बच्चे) की जान निकलती है तभी उसका मांस खाने को मिलता है। जिन्हें अहिंसा का पालन करना है, उन्हें यह सोचना चाहिए कि यदि कोई हमारे बच्चे को अपने शौक के लिए मार डाले, तो कितना दुःख होगा? तो क्या मुर्गी के बच्चे को नहीं होता होगा?
इतना ही नहीं, आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो मुर्गा, मुर्गियां, बकरे, सूअर, मछलियाँ, ये सभी प्राणी या तो मनुष्य में से अधोगति में गए हुए हैं या मनुष्य गति के लायक जीव हैं, इसीलिए मनुष्य के आसपास दिखाई देते हैं। उन्हें मारने में बड़ा नुकसान है।
मांसाहार करने से क्या आंतरिक नुकसान होता है, यह हमें परम पूज्य दादाश्री यहाँ समझा रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: कहा जाता है कि माँसाहार करने से नर्कगति होती है।
दादाश्री: वह बात बिलकुल सच्ची है और खाने की काफी कुछ चीज़ें हैं। किसलिए बकरे को काटते हो? मुर्गी को काटकर खाते हैं, तो उसे त्रास नहीं होता होगा? उसके माँ-बाप को त्रास नहीं होता होगा? आपके बच्चे को खा जाए तो क्या होगा? यह माँसाहार, यह सोचे बिना का है सारा। निरी पाशवता है सारी। अविचार दशा है और हम तो विचारशील हैं। एक ही दिन माँसाहार खाने से तो मनुष्य का दिमाग़ खतम हो जाता है, पशु जैसा हो जाता है। इसलिए दिमाग़ यदि अच्छा रखना हो, तो अंडे खाना तक भी बंद कर देना चाहिए। अंडे से नीचे की सारी पाशवता ही है।
बहुत से लोगों के घर में नॉनवेज (मांसाहार) बनता ही नहीं है। लेकिन जब वे बाहर रेस्टोरेंट या पार्टी में जाते हैं और वहाँ दूसरों को नॉनवेज खाना खाते देखकर उनका मन ललचा जाता है। तब वह ख्याल रख सकते हैं, कि दो इंच की जीभ के स्वाद के लिए, जो स्वाद ज़्यादा लंबा टिकने वाला ही नहीं, उसके लिए किसी जीव को नुकसान होता हो, तो हमें सुख कैसे आ सकता है?
जिन्हें खाने का शौक है, उनके लिए शाकाहार (वेजिटेरियन भोजन) में भी बहुत स्वादिष्ट व्यंजन उपलब्ध हैं। उन्हें खाने और खिलाने में मांसाहार जैसा भारी पाप नहीं लगता।
कितने लोग ऐसा कहते हैं कि हम शौक के लिए नहीं, बल्कि शरीर को आवश्यक प्रोटीन और पोषक तत्त्व मिलें इसलिए मांसाहार करते हैं। इसमें क्या गुनाह है? कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि भगवान ने यह दुनिया बनाई है, बकरी जैसे प्राणी और मछलियाँ बनाई हैं, वह मनुष्य को खाने के लिए ही बनाई हैं। परम पूज्य दादा भगवान इन सभी मान्यताओं के सामने तार्किक और वैज्ञानिक प्रमाण देते हैं।
अगर शक्ति प्राप्त करने के लिए मांसाहार आवश्यक होता, तो यह समझना चाहिए कि शक्तिशाली जानवर जैसे की हाथी, घोड़े, दरियाई घोड़े (हिपोपोटेमस) सभी पूरी तरह से शाकाहारी प्राणी हैं। अगर यह जानवर बहुत भूखें हों और उन्हें मांसाहार दिया जाए, तो भी वे उसे नहीं खाते।
अगर भगवान ने इस दुनिया के प्राणियों को मनुष्य के खाने के लिए बनाया होता, तो सूअर, बकरी, गाय या मुर्गियाँ ही क्यों खाई जाती हैं? मनुष्य बिल्ली, कुत्ते या शेर को मार कर क्यों नहीं खाते? अगर खाने के लिए ही यह दुनिया बनाई होती, तो सभी चीजें एक जैसी खाने योग्य ही बनाई होती। जैसे गेहूँ के पौधे के साथ-साथ घास (खरपतवार) भी उगता है, लेकिन हम उसे नहीं खाते।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि मनुष्य का शरीर मांसाहार के लिए नहीं, बल्कि शाकाहार के लिए बना है। मांसाहारी प्राणियों के दांत बड़े होते हैं, चीरने वाले दांत बाहर निकले होते हैं और उनके नाखून लंबे और मुड़े हुए होते हैं, जिनसे वे अपने शिकार को चीरकर फाड़ सकते हैं। जबकि, मनुष्य के दांत और नाखून ऐसे नही होते। दूसरा, मांसाहारी जानवर जैसे कि, बाघ या शेर पूरी जिंदगी कभी घास नहीं खाते। और शाकाहारी प्राणियों जैसे कि गाय, भैंस, बकरी पूरी जिंदगी कभी मांस नहीं खाते।
हिंसक प्राणी जैसे कि, बाघ और शेर भैंस के बच्चे (बछड़े) पशुओं का शिकार करके उन्हें खा जाते हैं, वे अपनी भूख मिटाने के लिए उन्हें खाते हैं। जब उन्हें भूख लगती है, तब उसकी तड़प होती है, इसलिए वे उसे मारकर खा जाते हैं। लेकिन शिकार करने के बाद कितने दिनों तक वे किसी दूसरे प्राणियों को नहीं खाते। केवल मनुष्य ही ऐसा है, जो शौक के खातिर शाकाहारी शरीर होने के बाद भी बार-बार मांसाहार करता है।
आजकल हिंदू या जैन धर्म का पालन करने वाले लोगों के यहाँ, जहाँ मांसाहार नहीं होता था, उनके बच्चें भी अब मांसाहार करने लगे है। उन्हें सही समझ देते हुए परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि यदि आपके घर में माता-पिता या दादा-दादी मांसाहार नहीं करते हों, तो उन्हें मांसाहार नही करना चाहिए। क्योंकि, अगर माँ मांसाहार नहीं करती हो, तो उसका दूध पीने वाला बच्चा भी मांसाहार नहीं कर सकता। अगर खुद के खून में मांसाहार ना आया हो, तो वह उसको पचा नहीं सकता। आज भले ही पाचन ठीक लगे, लेकिन लंबे समय में यह खुद को नुकसान ही पहुंचाएगा। इसलिए, ऐसे व्यक्ति मांसाहार न करें तो उत्तम है। अगर आज के आज मांसाहार न छूटे तो भी, "यह गलत है और ये छूट जाए तो उत्तम है" ऐसी भावना रखनी चाहिए।
दूध भी प्राणियों से प्राप्त होने वाला आहार है। आजकल दूध पीने में हिंसा होती है, ऐसी मान्यता प्रचलित हो गई है। उसमे परम पूज्य दादा भगवान हमें सच्ची समझ देते हैं।
प्रश्नकर्ता: परन्तु दूध तो बछड़े के लिए कुदरत ने दिया है। हमारे लिए नहीं दिया।
दादाश्री: बात ही गलत है। वह तो जंगली गायें और जंगली भैंसें थीं न, उनका बछड़े पीए तो सारा दूध पी जाए। और अपने यहाँ तो अपने लोग गाय को खिलाकर पालते-पोषते हैं। इसलिए बछड़े को दूध पिलाना भी है और हम सबको दूध लेना भी है। और वह आदि-अनादि से ऐसा व्यवहार चालू है। और गाय को अधिक पोषण देते हैं न, तो गाय तो पंद्रह-पंद्रह लिटर दूध देती है। क्योंकि, उसे जितना अच्छा खिलाते-पिलाते हैं, उतना उसका दूध नोर्मल चाहिए, उससे कई अधिक होता है। इस प्रकार से लेना चाहिए और बच्चे को भूखा मारना नहीं।
चक्रवर्ती राजा तो हज़ार हज़ार, दो-दो हज़ार गाय रखते थें। उसे गोशाला कहते थे। चक्रवर्ती राजा दूध कैसा पीते होंगे ? कि हज़ार गायें हों गोशाला में उन हज़ार गायों का दूध निकालते, वह सौ गायों को पिला देते। उन सौ गायों का दूध निकालकर दस गायों को पिला देते। उन दस गायों का दूध निकालना और वह एक गाय को पिला देते उसका दूध चक्रवर्ती राजा पीते थे।
इसलिए, यदि पशुओं को त्रास दिए बिना, संतुलन बनाए रखते हुए, बछड़े को पीलाने के बाद ही दूध और दूध से बनी चीज़ों का उपयोग किया जाए, तो उसमें हिंसा नहीं मानी जाती। पाचन के उद्देश्य से दूध पीना या न पीना, यह हर किसी का खुद का निर्णय है। लेकिन, यदि गाय या भैंस के बच्चों के लिए पर्याप्त दूध रखकर अगर दूध पिया जाए, तो उसमे मांसाहार जितना हिंसा का अपराध नहीं लगता।
मांसाहार करने से आध्यात्म की धारण शक्ति कम हो जाती है। परम पूज्य दादाश्री इस विषय में यहाँ स्पष्टीकरण करते हैं।
प्रश्नकर्ता: इस माँसाहार का आध्यात्मिक विचारों में कोई असर होता है क्या?
दादाश्री: अवश्य। माँसाहार, वह स्थूल भोजन है, इसलिए आध्यात्मिक की बुद्धि उत्पन्न नहीं होती है। अध्यात्म में जाना हो तो लाइट फूड चाहिए कि जिससे मद चढ़े नहीं और जागृति रहे।
वे आगे इसका कारण समझाते हुए कहते हैं, कि “वेजिटेरियन फूड होता है उसका आवरण पतला होता है, इसलिए वह ज्ञान को समझ सकता है, सब आरपार देख सकता है और वो माँसाहारी को मोटा आवरण होता है।“
मांसाहार में जीव को मारने का दोष तो लगता है, लेकिन उससे भी ज़्यादा नुकसान यह होता है कि हमारे आत्मा के ऊपर आवरण आ जाता है। उसी आवरण के कारण फिर ज्ञान की गूढ़ बातें समझने में रुकावट आती है। जो लोग शाकाहारी होते हैं, उनका ग्रास्पिंग पावर ज़्यादा होता है, इसलिए व्यवहार या आध्यात्मिक बातें वे जल्दी समझ जाते हैं।
इस दुनिया में बड़े और शक्तिशाली जीव छोटे, कमजोर जीवों को खाते हैं और वे छोटे जीव उससे भी छोटे जीवों को खाते हैं। ऐसा करते-करते पूरे जगत का आहार चक्र चलता रहता है। प्राणियों के बीच की हिंसा में हम जिम्मेदार नहीं है। लेकिन, जब मनुष्य के रूप में जन्म होता है, तब आहार में विवेक बनाए रखना फ़ायदेमंद होता है।
मनुष्य को जीवन जीने के लिए भोजन के बिना कोई रास्ता नहीं है। फिर भी, इस दुनिया में कोई भी निर्जीव चीज़ नहीं खाई जा सकती। जीव वाला भोजन लेने से ही शरीर को पोषण मिलता है। इसलिए मनुष्य को एकेन्द्रिय जीव जैसे कि वनस्पति, फ़ल, फूल और सब्ज़ियों का आहार के रूप में उपयोग करने की छूट है, क्योंकि एकेन्द्रिय जीवों में खून, पीप या मांस नहीं होता।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि मांसाहार और अंडे कभी नहीं खाने चाहिए। अहिंसा के उपाय बताते हुए वे यह भी कहते हैं, कि “आहार में सबसे ऊँचा आहार कौन-सा? एकेन्द्रिय जीवों का! दो इन्द्रिय के ऊपर के जीवों के आहार का, जिसे मोक्ष में जाना हो उसे अधिकार नहीं है। इसलिए दो इन्द्रिय से अधिक इन्द्रियवाले जीवों की जोखिम हमें नहीं उठानी चाहिए। क्योंकि, जितनी उनकी इन्द्रियाँ उतने प्रमाण में पुण्य की ज़रूरत है, उतना मनुष्य का पुण्य खर्च हो जाता है!”
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