
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भव अर्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५॥
दूसरे अध्याय के इस श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन से कहते हैं कि वेदों में प्रकृति के तीन गुणों का वर्णन किया गया है। हे अर्जुन! तू त्रिगुणात्मक से परे हो जा। जो निर्द्वंद्व है, शुद्ध सत्त्व में सदा स्थिर है, योगक्षेम (अप्राप्त को प्राप्त करने और प्राप्त की रक्षा करने के प्रयत्न) से परे है, ऐसे आत्मा में स्थिर हो जा।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “‘त्रैगुण्य विषयाः वेदाः निस्त्रैगुण्यो भव अर्जुन’ यह ग़ज़ब का वाक्य श्रीकृष्ण भगवान ने भगवद् गीता में कह दिया है। वे खुद तीर्थंकर भगवान श्री नेमिनाथ से मिलने से पहले वेदांत के अभ्यासी थे। वेदों का सार निकालकर आगे का मार्ग दर्शाते हुए उन्होंने अर्जुन से कहा कि, “वेद इन तीन गुणों वाले हैं, इसलिए तू इनसे पार निकलेगा तभी तेरा काम होगा। ये तीन गुण वापस द्वंद्व हैं, इसलिए तू त्रिगुणात्मक से परे हो जा और आत्मा को समझ!”
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि वेद तीन गुणों को ही प्रकाशित करते हैं, सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। इन तीनों गुणों के प्रतीक के रूप में तीन अधिष्ठाता देवों को रखा गया है - ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ये कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि गुणों के प्रतीक के रूप में उन्हें रखा है, ताकि गुणों की गुह्य बात को न समझ सकने वाले भक्त भी इस प्रतीक की भक्ति कर सकें। हम जिन्हें भजते हैं, उनके गुण हमें प्राप्त होते हैं। तमोगुण वाले महादेव की भक्ति करते हैं, सत्त्वगुण वाले ब्रह्मा की भक्ति करते हैं और रजोगुण वाले विष्णु की भक्ति करते हैं।
श्रीकृष्ण भगवान ने इन तीनों गुणों की विशेषता भी बताई है।
सत्त्वं(म्) सुखे संजयति, रजः (ख्) कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः (फ्), प्रमादे संजयत्युत॥ १४.९॥
हे भारत! सत्त्वगुण सुखों में बाँधकर रखता है। रजोगुण कर्म में बाँधकर रखता है। लेकिन तमोगुण ज्ञान पर आवरण लाकर, वास्तव में प्रमाद में बाँधकर रखता है।
परम पूज्य दादा भगवान इन तीनों प्रकृतियों के गुणों वाले मनुष्यों का वर्णन यहाँ करते हैं।
दादाश्री: सत्त्वगुण किसे कहते हैं? साधु-संत जिस भगवान के मार्ग पर मुड़े होते हैं, वे सभी सत्त्वगुण में आते हैं। और रजोगुणी किसे कहते हैं? पूरा दिन, एक दस मिनट बैठना हो, बैठाना हो न, तो उसे बिच्छू काटता है ऐसा लगता है। पूरा दिन काम ही करते रहते हैं। वह रजोगुणी, आपने देखा है? पूरा दिन काम करते रहते हैं, दो घंटे उसे बैठना हो तो उससे बैठा नहीं जाता, ये सभी रजोगुणी कहलाते हैं। और पूरा दिन वासना में पड़े रहते हैं, काम नहीं करते, वे सभी तमोगुणी।
सत्त्वगुण धारण करने वाले मनुष्य निर्मल होते हैं, शांत होते हैं, किसी को दुःखदायी नहीं होते और परोपकारी स्वभाव के होते हैं। रजोगुण कर्म में आसक्ति अधिक होती है, कर्म करने की प्रवृत्ति प्रबल होती है। ऐसे व्यक्ति खुद भी खाली नहीं बैठ सकते और दूसरों को भी खाली नहीं बैठने देते। तम यानी अंधकार। जैसे अंधकार प्रकाश को ढक देता है, वैसे ही जब तमोगुण बढ़ जाता है तो ज्ञान पर आवरण आ जाता है। जिनमें तामसिक गुण अधिक होता है उनका स्वभाव क्रोधी होता है।
अंततः वेद भी यही कहते हैं कि “इन तीन गुणों से मुक्त होकर, तू पुरुष बन” क्योंकि खुद आत्मा रूप से इन तीनों गुणों से भिन्न है। करती है प्रकृति, लेकिन अज्ञानता से खुद मान लेता है कि मैंने किया, और उसी से बंधन होता है।

जैसे डोरी में लिपटा हुआ लट्टू जब खुलता है तो उसमें लट्टू का कोई पुरुषार्थ नहीं होता, वैसे ही प्रकृति नाच करवाती है और उसमें खुद मानता है कि “मैं नाचा!” तो इसमें खुदका क्या पुरुषार्थ? लाखों रुपए कमाए तो कहता है “मैंने कमाए”, और जब घाटा हो जाए तो कहता है “भगवान ने घाटा दिया।” इस प्रकार सही समझ नहीं होने के कारण ऐसे विरोधाभास में जीवन जीते हैं।
परम पूज्य दादाश्री अत्यंत सरल भाषा में, हल्के विनोद के साथ, प्राकृत गुणों में मनुष्य खुद किस तरह मिल जाता है उसका यहाँ सुंदर वर्णन करते हैं।
दादाश्री: यह तो प्रकृति जबरन करवाती है, और कहता है कि मैं कर रहा हूँ। दान करना, जप-तप, धर्मध्यान, दया, अहिंसा, सत्य आदि सभी प्राकृत गुण हैं। अच्छी आदतें और बुरी आदतें भी प्राकृत गुण हैं। प्राकृत चाहे कैसा भी स्वरूपवान क्यों न हो, लेकिन कब भेष बनाए या फ़जीहत करवाए, कह नहीं सकते। एक राजा हो, बड़ा धर्मनिष्ठ और दानेश्वरी हो, लेकिन जंगल में भटक गया हो और चार दिनों तक खाना नसीब नहीं हुआ हो, तो जंगल में भील के पास से माँगकर खाने में क्या उसे शरम आएगी? नहीं । तब कहाँ गई उसकी दानशीलता? कहाँ गई उसकी राजस्विता? अंदर से प्रकृति चिल्लाकर माँगती है, अतः जब संयोगों के शिकंजे में आता है, उस समय राजा भी भिखारी बन जाता है। वहाँ फिर औरों की तो बिसात ही क्या? यह तो प्रकृति दान करवाती है और प्रकृति भीख मँगवाती है, उसमें तेरा क्या? एक चोर बीस रुपयों की चोरी करता है और होटल में चाय-नाश्ता करके मजे लूटता है। लेकिन जाते-जाते दस रुपये का नोट कोढ़ी को दे देता है, यह क्या है? यह तो प्रकृति की माया है। समझ में आए ऐसी नहीं है।
कोई कहेगा कि आज मैंने चार सामयिक कीं और प्रतिक्रमण किया और दो घंटे शास्त्र पढ़े। यह भी प्रकृति करवाती है और तू कहता है कि मैंने किया। यदि तू ही सामयिक का कर्ता है, तो दूसरे दिन भी करके दिखा न? दूसरे दिन तो कहेगा कि आज तो मुझसे नहीं होता! ऐसा क्यों कह रहा है? और कल जो कहा था, 'मैंने किया,' इन दोनों में कितना बड़ा विरोधाभास है? यदि तू ही करनेवाला हो, तो 'नहीं होता', ऐसा कभी भी बोल ही नहीं सकता। 'नहीं होता,' इसका मतलब यही कि तू करनेवाला नहीं है। सारा संसार ऐसी उलटी समझ के कारण अटका हुआ है। त्याग करता है, वह भी प्रकृति ही करवाती है और ग्रहण करता है, वह भी प्रकृति करवाती है। यह ब्रह्मचर्य का भी प्रकृति जबरन पालन करवाती है, फिर भी कहता है कि मैं ब्रह्मचर्य पालन कर रहा हूँ। कितना बड़ा विरोधाभास !
ये राग-द्वेष, दया-निर्दयता, लोभ-उदारता, सत्य-असत्य सारे द्वंद्व गुण हैं। वे प्रकृति के गुण हैं और खुद द्वंद्वातीत है।
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