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परधर्म भयावह अर्थात् क्या?

भगवद् गीता के अठारहवें अध्याय के छियासठवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं,

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६॥

अर्थात् सभी धर्मों का त्याग करके केवल मेरी शरण में आ जा। तू भयभीत मत हो, मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा!

श्रीकृष्ण भगवान किन धर्मों का त्याग करने के लिए कहते हैं? यहाँ श्रीकृष्ण भगवान के हृदय की बात लोगों को समझ में नहीं आई इसलिए वैष्णव धर्म वह श्रीकृष्ण भगवान का धर्म है और बाकी धर्मों का त्याग करना है, ऐसा अर्थघटन होने लगा। लेकिन वास्तविकता में श्रीकृष्ण भगवान के समय में वैष्णव या जैन धर्म आदि धर्मों के विभाजन थे ही नहीं। सभी धर्म को छोड़कर श्रीकृष्ण भगवान की शरण में जाने से मोक्ष है, इसके पीछे का रहस्य क्या है? वह ज्यों का त्यों रह गया।

तीसरे अध्याय के पैंतीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान ऐसा भी कहते हैं,

श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५॥

अर्थात्, परधर्म का श्रेष्ठ रूप से पालन करने की बजाय, स्वधर्म का भूल सहित पालन करना भी अधिक कल्याणकारी है। स्वधर्म में मृत्यु हो जाना उत्तम है, जबकि परधर्म भयावह है।

यहाँ स्वधर्म और परधर्म का सही अर्थ समझना मुश्किल हो गया और लोगों ने यह अर्थ निकाल लिया कि वैष्णव धर्म ही स्वधर्म है और जैन, शैव, मुस्लिम या पारसी आदि अन्य धर्म वह परधर्म! श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है “परधर्म भयावह,” तो इसका अर्थ लोगों ने यह निकाल लिया कि वैष्णव के अलावा दूसरे किसी भी धर्म का पालन करना, वह भयावह है। अरे, इतना ही नहीं, लोग यहाँ तक कहने लगे कि, “यदि हाथी सामने से आ रहा हो और भागने की जगह न हो, तो कुचलकर मर जाना, लेकिन बगल में जैन का मंदिर हो तो वहाँ मत जाना, क्योंकि श्रीकृष्ण भगवान ने ‘परधर्म भयावह’ कहा है!”

क्या भगवान श्रीकृष्ण वैष्णव धर्म के प्रति पक्षपाती होंगे? यदि पक्षपाती हों, तो भगवान कैसे कहलाएँगे? क्या भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को ऐसा सिखाते होंगे? कोई भी सच्चा भक्त या सच्चा वैष्णव यह मानने को तैयार नहीं होगा। मूल पुरुष के जाने के बाद, पीछे से धर्मग्रंथों का इस प्रकार से अर्थघटन करना यानी चुपड़ने की दवा पी जाना ऐसा इलाज करने जैसा है। श्रीकृष्ण भगवान के हृदय की बात उड़ ही जाती है। फिर धर्म के अनुयायियों की क्या दशा होगी?

भगवद् गीता का एक-एक शब्द रहस्यमय है। कोई अनुभवी ज्ञानी पुरुष ही उसका रहस्य समझा सकते हैं। परम पूज्य दादा भगवान इस रहस्य का खुलासा यहाँ करते हैं।

“देहधर्म वह परधर्म है और आत्मधर्म वह स्वधर्म है।” – परम पूज्य दादा भगवान

परम पूज्य दादाश्री सरल भाषा में समझाते हुए कहते हैं कि देहधर्म में पाँच इन्द्रियों के धर्म, जैसे, आँख का धर्म, कान का धर्म, नाक का धर्म, जीभ का धर्म, और स्पर्श का धर्म आ जाते हैं। इसके अलावा, मन का धर्म और बुद्धि का धर्म ये सभी देहधर्म कहलाते हैं। यह देहधर्म वह परधर्म है और वह भयावह है, और स्वधर्म में ही मोक्ष है ऐसा श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं। तब लोग उल्टा समझ बैठे कि स्वधर्म मतलब वैष्णव धर्म और बाकी सभी परधर्म। भगवान क्या कहना चाहते हैं, यह बात लोगों को समझ में नहीं आई।

वैष्णव धर्म और धर्म क्रियाओं को स्वधर्म मानकर अन्य धर्मों के प्रति तिरस्कार करने वाली मान्यता के विषय में, परम पूज्य दादाश्री हमें यहाँ सही समझ प्रदान करते हैं।

दादाश्री: परधर्म मतलब देह का धर्म और स्वधर्म मतलब आत्मा का स्वयं का धर्म। इस देह को नहलाते हो, धुलाते हो, एकादशी करवाते हो, वे सभी देहधर्म हैं, परधर्म हैं, इसमें आत्मा का एक भी धर्म नहीं है, स्वधर्म नहीं है। यह आत्मा ही अपना स्वरूप है। कृष्ण भगवान ने कहा है कि, 'स्वरूप के धर्म का पालन करना, वह स्वधर्म है। और ये एकादशी करते हैं या अन्य कुछ करते हैं, वह तो पराया धर्म है, उसमें स्वरूप नहीं है।'

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “परधर्म अर्थात् देहधर्म। देहधर्म अच्छी तरह से करोगे तो भौतिक सुख मिलेगा और स्वधर्म करोगे तो मोक्ष मिलेगा।”

स्वधर्म किसे कहते हैं, इसके गूढ़ रहस्य का खुलासा करते हुए वे समझाते हैं कि, “इन सभी धर्मों को देखते रहना उसका नाम स्वधर्म। कान ने क्या सुना, यह हम ‘देखते’ रहें, इसका नाम स्वधर्म।” लेकिन हम क्या करते हैं? कान ने सुना, तो कहते हैं “मैंने सुना!” धर्म कान का है और उसे अपने सिर पर ले लेते हैं!” देखती हैं आँखें, और कहते हैं “मैंने देखा।” जीभ ने चखा तो कहते हैं, “मैंने चखा।” इतना ही नहीं, अगर कढ़ी खट्टी हो गई हो तो बनाने वाले के साथ क्लेश कर देते हैं। ठंडी-गर्मी को महसूस करना वह स्पर्श का धर्म है। मन में विचार आए तो कहते हैं कि, “मैंने सोचा।” अब मन अच्छे या खराब विचार करे, तो भी वह अपने धर्म में ही है। लेकिन अज्ञानता से खुद उसमें मिल जाते हैं, इसलिए स्वधर्म चूक जाते हैं। इसी तरह चित्त का धर्म बाहर भटकना है, उसे भी अपने सिर पर ले लेते हैं। बुद्धि का धर्म है फ़ायदा-नुकसान बताना, निर्णय लेना, और हम मानते हैं कि, “मैंने निर्णय लिया।” संक्षेप में, किसी और के (देह, इन्द्रिय आदि के) धर्म को अपने ऊपर लेना वह परधर्म कहलाता है और खुद अपने धर्म में आना वह स्वधर्म कहलाता है। आत्मा का धर्म है इन सभी धर्मों को देखना और जानना। इसके बजाय दूसरों के धर्म को अपने सिर पर लेना वह परधर्म में प्रवेश किया कहलाता है। परधर्म स्वीकार किया, तो भयावह है, यानी परधर्म में भय है, दुःख है और वेदना है। खुद इन सभी को देखने और जानने के धर्म में रहे तो वह स्वधर्म है। स्वधर्म में आए तब शाश्वत सुख का अनुभव होता है, कर्म नहीं बँधते और मोक्ष होता है। स्वधर्म निर्भयता देता है, वीतरागता देता है, जबकि परधर्म राग-द्वेष कराता है और बँधन में डाल देता है।

सभी धर्म छोड़कर मेरी शरण में आ, इसके पीछे कृष्ण भगवान क्या कहना चाहते हैं, इसे समझाते हुए परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “'खुद का आत्मा ही कृष्ण है' ऐसा समझ में आए, उसकी पहचान हो जाए, तभी स्वधर्म का पालन किया जा सकता है। जिसे अंदर वाले कृष्ण की पहचान हो गई, वही सच्चा वैष्णव कहलाता है।" स्वधर्म का आचरण करने के लिए स्व को पहचानना ज़रूरी है और स्व को पहचानने के लिए जिसने स्व को पहचाना हो, ऐसे ज्ञानी पुरुष की शरण में जाना आवश्यक है। श्रीकृष्ण भगवान गीता में कहते हैं कि, ज्ञानी मुझे प्रिय में प्रिय हैं। ज्ञानी पुरुष जो इस गुह्य ज्ञान को लोगों को समझाते हैं, उससे प्रिय इस पृथ्वी पर कोई कार्य नहीं है। ऐसे ज्ञानी पुरुष कर्मों को ज्ञानाग्नि से भस्मीभूत करके आत्मा का साक्षात्कार कराने में समर्थ होते हैं। एक क्षण भी आत्मा विस्मृत नहीं होता और दिन-रात “मैं आत्मा हूँ” की जागृति बनी रहती है।

परम पूज्य दादाश्री जैसे अनुभवी ज्ञानी पुरुष जब इतनी सरल भाषा में इस गुह्य बात को समझाते हैं, तभी स्वधर्म और परधर्म का भेद स्पष्ट होता है और श्रीकृष्ण भगवान द्वारा दर्शाए गए मोक्ष का सच्चा मार्ग प्राप्त होता है! अन्य किसी प्रकार से यह संभव नहीं है।

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