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स्थितप्रज्ञ अर्थात् क्या?

भगवद् गीता में श्रीकृष्ण भगवान, अर्जुन को स्थितप्रज्ञ होने के लिए कहते हैं। खुद जिस दशा में पहुँचने का लक्ष्य रखता है उस दशा में पहुँचे हुए व्यक्ति के लक्षण कैसे होते हैं यह जानने की उत्कंठा होना वह स्वाभाविक है। अर्जुन भी इसी उत्सुकता के साथ, दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण भगवान से इस प्रकार पूछता है।

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किम् प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥ ५४॥

अर्थात् “हे केशव! स्थितप्रज्ञ मनुष्य की प्रकृति कैसी होती है? स्थितप्रज्ञ व्यक्ति किस तरह से बात करता है? किस तरह से बैठता है? किस तरह से चलता है?” यानी उसके आचरण कैसे होते हैं?

तब भगवान अर्जुन को समझाते हैं कि जो प्रज्ञा (सम्यक् बुद्धि) में स्थिर हो चुके हैं , जो असार को अलग रखते हैं और सार को ग्रहण करते हैं, वह स्थितप्रज्ञ दशा है!

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि जो मनुष्य सभी परिस्थितियों में आसक्ति रहित रहता है; जो शुभ में खुश होकर प्रशंसा नहीं करता, या अशुभ में कभी भी द्वेष नहीं करता, उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है।

परम पूज्य दादा भगवान हमें सरल भाषा में स्थितप्रज्ञ दशा का स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं कि, स्थितप्रज्ञ दशा हो तो उससे मनुष्य इमोशनल नहीं होता। जो मोशन में रहे वह स्थितप्रज्ञ। जब भीतर की स्थिरता ना जाए, किसी चीज़ का असर ना हो, अपमान आए, सुख या दुःख के दिन आएँ, तो भी इन सभी में निर्लेप रह सके उसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं। परंतु स्थितप्रज्ञ दशा से निरंतर समाधि उत्पन्न नहीं होती। जब तक स्वरूप का ज्ञान ना हो तब तक समाधि उत्पन्न नहीं होती। भ्रांति जाए तब समाधि उत्पन्न होती है!

प्रियजनों के विरुद्ध युद्ध करने के विचार से इमोशनल और हताश हो चुके अर्जुन को उठाने के लिए श्रीकृष्ण भगवान ने उन्हें स्थितप्रज्ञ होने के लिए कहा था। जबकि श्रीकृष्ण भगवान स्वयं तो उससे भी बहुत ऊँची, संपूर्ण विरक्त दशा में रहते थे।

परम पूज्य दादाश्री, जो श्रीकृष्ण भगवान के ह्रदय की बात को जानकर बैठे हैं, वे कहते हैं कि, “’यह आत्मा है और अन्य से वह पर है', शब्द से ऐसा भेद डालना शुरू हो जाए तो स्थितप्रज्ञ दशा शुरू हो जाती है और ठेठ आत्मा का अनुभव होने तक जो दशा रहती है, वह स्थितप्रज्ञ दशा कहलाती है!”

वे बताते हैं कि “स्थितप्रज्ञ दशा मतलब शुद्ध हो चुकी बुद्धि से आत्मा के गुणधर्म जानता है और उसे पहचान जाता है, लेकिन अनुभूति नहीं होती। स्थितप्रज्ञ दशा से तो दुनिया को और सभी तत्वों को जानता है, पहचानता है, उसी को शुद्ध समकित कहते हैं।"

स्थितप्रज्ञ वह अनुभव दशा नहीं है। स्थितप्रज्ञ अर्थात् प्रज्ञा में स्थिर होना, प्रज्ञा की तरफ़ आगे बढ़ना। दो शब्द हैं बुद्धि यानी कि अज्ञा और प्रज्ञा। संसार से बाहर न निकलने दे उसका नाम बुद्धि और आत्मा से बाहर न निकलनें दे उसका नाम प्रज्ञा। आत्मा की ओर जाने वाली दशा को स्थितप्रज्ञ दशा कहा जाता है, लेकिन उसमें संपूर्ण आत्मा प्राप्त नहीं होता। जैसे नरसिंह मेहता ने कहा कि, “मैं करता हूँ मैं करता हूँ यही अज्ञानता।“ उसी तरह स्थितप्रज्ञ दशा वाले को शंका होती है कि “यह मैं नहीं करता हूँ, मैं आत्मा हूँ।” लेकिन उसे अनुभव में नहीं आता।

स्थितप्रज्ञ दशा में बुद्धि सम्यक् होने लगती है कि, “मुझे किसी को दुःख नहीं देना है, वैर नहीं बाँधना है, और यदि कोई मुझे दुःख दे तो मुझे बदला नहीं लेना है।“ इसलिए स्थितप्रज्ञ एक ऐसी दशा है जिसमें संसार से वापस लौट रहा है, लेकिन अभी आत्मा में प्रवेश नहीं हुआ है। स्थितप्रज्ञ वह ऊँची दशा है। लेकिन स्थितप्रज्ञ दशा और आत्मा जानने इन दोनों में बहुत अंतर होता है। स्थितप्रज्ञ यानी प्रज्ञा में स्थिर होना, वह दशा है। यह दशा प्राप्त करने के बाद भी व्यक्ति को आत्मा प्राप्त करना बाकी रहता है। एक बार आत्मा प्राप्त होने के बाद कर्मों में राग-द्वेष किए बगैर समभाव से हल आ जाता है।

स्थितप्रज्ञ दशा से भी आगे आत्मस्वरूप का ज्ञान है, जिससे आत्मा की सीधी अनुभूति होती है। उसे परमार्थ समकित कहा जाता है। जिससे पूरे जगत को और जगत के तत्त्वों को देख सकते हैं, पहचान सकते हैं और अनुभव कर सकते हैं! जब आत्मदर्शन होता है, तब उसमें प्रज्ञा शक्ति प्रकट होती है। मूल आत्मा की प्रतीति बैठती है तभी प्रज्ञा प्रकट होती है, फिर वह नियमपूर्वक मोक्ष में जाता ही है। स्वरूपज्ञान प्राप्त होने पर प्रज्ञा जागृत हो जाती है।

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