
शास्त्रों में अनासक्त होने के तरीके बताए गए हैं, जिन्हें पढ़कर हम अनासक्त होने का प्रयत्न करते हैं। अगर कोई घर में, परिवार के साथ रहने वाला व्यक्ति प्रयत्न करे कि मुझे घर से, पत्नी से, बच्चों से अनासक्त होना है, तब भी उसे पूरी-पूरी सफलता नहीं मिलती है। घर का त्याग करके आश्रम में जाए तो वहाँ भी शिष्यों और शास्त्रों की आसक्ति बढ़ती जाती है। वास्तव में, जब तक "यह शरीर मैं हूँ" ऐसा देहाध्यास है तब तक अनासक्त योग में प्रवेश नहीं कर सकते, उल्टा राग-द्वेष बढ़ जाता है। लेकिन आत्मा का साक्षात्कार हो जाए तो सहज ही अनासक्त हो जाते हैं।
श्रीकृष्ण भगवान ने भगवद् गीता में अर्जुन को, मनोयोग और देहयोग यह सब छोड़कर आत्मयोगी बना दिया था। लेकिन क्या भगवद् गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को अनासक्त होने के लिए कुछ करवाया? क्या उन्होंने नामस्मरण, भक्ति, ध्यान या योग साधना करने को कहा? क्या उन्होंने अर्जुन से कहा कि तू द्रौपदी को छोड़ दे, राजपाट त्याग दे या युद्ध बंद कर दे? नहीं, भगवान ने सिर्फ़ अर्जुन को ज्ञान ही दिया। उन्होंने सभी प्रकार की समझ दी कि भक्ति उत्तम है, वैराग्य श्रेष्ठ है, अनासक्त श्रेष्ठ है, लेकिन वहाँ उनसे कुछ करवाया नहीं।
मंजिल तक पहुँचने के दो तरीके होते हैं। पहला तरीका जिसमें रास्ते का नक्शा देख-देखकर खुद मंज़िल खोजते-खोजते वहाँ पहुँचना और दूसरा तरीका है किसी मार्गदर्शक या ड्राइवर को ढूँढकर उनकी गाड़ी में बैठ जाना। फिर हम सो भी गए हों तो भी तेज़ी से मंज़िल पर पहुँच जाते हैं। इसी तरह, श्रीकृष्ण भगवान जैसे प्रत्यक्ष ज्ञानी से ज्ञान प्राप्त करके अर्जुन की तरह मंज़िल पर पहुँचना आसान है।
वास्तव में, जब से खुद आत्मा को जाने, वीतराग हो जाए, यानी अहंकार-बुद्धि पर राग छूटे और आत्मा पर राग शुरू हो जाए, तब अनासक्त हुआ कहा जाता है। “मैं आत्मा हूं” यह लक्ष बैठना उसे अनासक्त योग कहते हैं। अनासक्त वह मूल आत्मा की ओर जाने वाला रास्ता है। खुद अभी आत्मा से दूर है, लेकिन आत्मा की ओर जाने का पुरुषार्थ शुरू होना, यह अनासक्त योग का आरंभ हुआ और वहाँ से आत्मरूप होने तक का पुरुषार्थ ही अनासक्त योग है।
भगवद् गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, “तुम मुझे तत्त्व स्वरूप से पहचान।” और तत्त्वस्वरूप से देखने की दृष्टि प्रदान की। यह दृष्टि प्राप्त होने के पश्चात अंत में अर्जुन ने कहा,
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३॥
अर्थात् हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मेरा संदेह दूर होते ही मैं ज्ञान में स्थिर हो गया हूँ। अब मैं आपकी आज्ञा के अनुसार रहूँगा।
यह मोह दृष्टि किस तरह टूटेगी? समग्र भगवद् गीता का ज्ञान संजय अपनी सिद्धि द्वारा तादृश्य देखकर महाराज धृतराष्ट्र के समक्ष वर्णन कर सकते थे। फिर भी, संजय को वह ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ जो अर्जुन को प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण भगवान से हुआ। तो आज हज़ारों वर्षों बाद भगवद् गीता पढ़कर हमें वह ज्ञान कैसे हो सकता है? उसके लिए तो जो खुद आत्मज्ञान प्राप्त कर चुके हैं और दूसरों को भी प्राप्त करवाने में समर्थ हैं, ऐसे प्रत्यक्ष ज्ञानी के पास जाना पड़ेगा।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “'मैं अनासक्त हूँ', ऐसा 'उसे' भान हो तो मुक्ति मिल जाए। आसक्ति नहीं निकालनी है, 'अनासक्त हूँ' वह भान करना है।“ वे समझाते हैं कि, जैसे जलेबी खाने के बाद चाय फीकी लगती है, वैसे ही खुद का स्वरूप प्राप्त होने के बाद संसार फीका लगता है, यानी संसार से आसक्ति उड़ जाती है।
जैसे लोहचुंबक और आलपिन के बीच जो आसक्ति है, वह जाती नहीं। उसी तरह संसार में रहकर चाहे जितने प्रयत्न करें फिर भी आसक्ति नहीं जाती। उसका परिमाण कम होता है, लेकिन संपूर्ण अनासक्त नहीं हो पाते। क्योंकि संसार के रोम-रोम में ममता और आसक्ति है। अपने नाम के प्रति आसक्ति, परिवार के प्रति आसक्ति, पति-पत्नी के प्रति आसक्ति, बच्चों के प्रति आसक्ति, घर के प्रति आसक्ति, व्यवसाय के प्रति आसक्ति, पैसे के प्रति आसक्ति। आसक्ति कब जाती है? ‘खुद’ अनासक्त हो तब।
परम पूज्य दादा भगवान अनासक्त होने का तरीका समझाते हुए कहते हैं, अहंकार खत्म होने के बाद अनासक्त होते हैं। जब अहंकार और ममता दोनों जाएँ तब अनासक्ति! वे अनासक्त होने के लिए खुद की मूल भूल को तोड़ने का रास्ता यहाँ बताते हैं।
दादाश्री: यानी यह रूटकॉज़ है। उस रूटकॉज़ को तोड़ा जाए तो काम हो जाए। यह अच्छा-बुरा वह बुद्धि के अधीन है। अब बुद्धि का धंधा क्या है? जहाँ जाए वहाँ प्रोफिट और लोस देखती है। बुद्धि ज़्यादा काम नहीं कर सकती, प्रोफिट और लोस के अलावा। अब उससे दूर हो जाओ। अनासक्त योग रखो। आत्मा का स्वभाव कैसा है ? अनासक्त स्वरूप है। खुद का स्वभाव ऐसा है। तू भी स्वभाव से अनासक्त हो जा। अब जैसा स्वभाव आत्मा का है, वैसा स्वभाव हम करें, तब एकाकार हो जाएँ, फिर वह कुछ अलग है ही नहीं। स्वभाव ही बदलना है।
अब हम आसक्ति रखें और भगवान जैसे हो जाएँ, वह किस तरह होगा ? वह अनासक्त और आसक्ति के बीच मेल किस तरह हो ? अपने में क्रोध हो और फिर भगवान से मिलाप किस तरह हो ?
भगवान में जो धातु है, वह धातुरूप तू हो जा। जो सनातन है, वही मोक्ष है। सनातन मतलब निरंतर। निरंतर रहता है, वही मोक्ष है।
अनासक्त होने का सरल उपाय है आत्मज्ञान की प्राप्ति। जैसे हम अहमदाबाद से शुरू करें और वडोदरा की ओर बढ़ने लगें तो अहमदाबाद छोड़ना नहीं पड़ता, छूट ही जाता है। वैसे ही “मैं कौन हूँ?” और “कर्ता कौन है?” इस जागृति में आ जाएँ और आत्मा की ओर बढ़ने लगें तो सच्चे अनासक्त हो ही जाते हैं।
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