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मुझे कोई समझ नहीं सकता। कोई मेरा ध्यान नहीं रखता। मुझे अपने जीवन का अंत लाना है। मुझे क्या करना चाहिए?

जब हमें ऐसा लगता है कि ‘कोई मेरी कद्र नहीं करता’, कोई मुझे समझ ही नहीं सकता, ऐसी गलतफहमी हो या किसी की तरफ़ से हेल्प न मिले, तब ‘किसी को मेरी चिंता ही नहीं है’ यह मान्यता हमें सेल्फ डाउट, अकेलापन, निराशा और डिप्रेशन की तरफ़ ले जा सकती है। और जब हम इतने दुःखी हो जाते हैं कि, हम इस नेगेटिविटी से आगे कुछ देख ही नहीं पाते, तब हम बदला लेने का सोचते हैं। जब जो लोग हमें कम महत्त्व देते हैं, तब उनसे कुछ महत्व पाने के लिए अनिवार्य रूप से, अंतिम उपाय के रूप में हम ‘मैं अपना जीवन समाप्त करना चाहता हूं' ऐसे विचारों की ओर बढ़ जाते हैं।

वास्तव में, ये विचार सिर्फ़ हमें ही नुकसान पहुँचाएँगे, किसी और को नहीं। जो अंत में आत्महत्या में परिणमित होते हैं। आत्महत्या करने के बहुत ही गंभीर परिणाम आते हैं।

दुःख के मूल कारणों को समझें

  • खासकर जब कुछ अच्छा हुआ हो, तब ऐसा शक होता है कि लोग अब हमें क्या कहेंगे।
  • हम अपने जीवन में इतने व्यस्त या उलझे हुए होते हैं कि, किसी ने हमारी प्रशंसा की हो, तो भी हमें उसकी कद्र नहीं होती।
  • हमें ऐसा लगता है कि, हम लोगों के प्रेम के लायक नहीं हैं।
  • लोग चाहे कितनी ही बार हमें कहें कि, “शाबाश! बहुत अच्छा काम किया!” पर प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण हमारा मन इन सभी शब्दों को नेगेटिव रूप से लेता रहता है।
  • सेल्फ डाउट, इनसिक्योरिटी, आत्मविश्वास का अभाव या स्पर्धा ये ऐसे कारण हैं, जो हमें यह मनवाते हैं कि “मेरी कद्र नहीं है”।

इसलिए, इसे बदलने के लिए हम क्या कर सकते हैं?

  • हम जो कुछ भी करें, वह बदले में अपेक्षा रखे बिना करें। अपेक्षा सिर्फ़ कष्ट और दुःख में परिणमित होती है।
  • हम जो भी काम करें, उसे अच्छे तरीके से पूरा करें।
  • हमें यदि मदद की ज़रूरत हो, तो उसके लिए हम सामने से पूछें। कभी-कभी हम मान लेते हैं कि, लोगों को पता है कि हमें हेल्प की ज़रूरत है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। कभी-कभी हमें जो दिखाई देता है, वैसा दूसरों को नहीं भी लगता है।
  • छोटे बनकर, हमने जो कुछ किया है, उसे सामने वाले को बताएँ और उस विषय में वो क्या सोचते हैं यह खुद उनसे पूछिए। हर व्यक्ति अपने में डूबा है। सभी अपनी-अपनी परेशानियों में डूबे रहते हैं। उनके साथ खुले दिल से बातचीत करें। तो निश्चित रूप से जवाब मिलेगा।
  • जो चीज़ हमें सही लगती है, वह चीज़ दूसरों को सही नहीं भी लग सकती। इसलिए हमेशा जांच कर लें कि, किसी भी काम के लिए क्या ज़रूरी है।
  • संकोच के बिना, दूसरों की कुशलता की मदद लें।
  • बातचीत करना, यह सभी संबंधों के लिए बहुत ज़रूरी है, चाहे वह स्कूल हो, ऑफिस हो या परिवार हो।
  • हम क्यों दुःखी हैं, इसके कारणों की जाँच करने का प्रयत्न करें, जैसे कि स्पर्धा, ईर्ष्या, अपेक्षाएँ, मान पाने की इच्छा या आत्मविश्वास की कमी।
  • दूसरों के अच्छे गुणों को देखें, उनकी गलतियों को देखने से बचें। एक-दूसरे की गलतियों को न देखें।
  • पॉज़िटिव रहें।
  • दूसरों की बात सुनें और उनके साथ रहें।
  • संबंधों में बदलाव के लिए हमें पहल करनी चाहिए।
  • अपने में परिवर्तन लाएँ। हमें देखकर दूसरे लोग भी सीखेंगे।
  • दूसरों को सुख देंगे तो हमें भी उतना ही सुख मिलेगा।
  • अपनी सोच बदलें, दूसरों को अनुकूल आए इस प्रकार से अपने मन को विकसित करें।
  • हम जो कुछ भी करें, उसमें हम आनंद लें। क्योंकि, हम जब कुछ ऐसा करते हैं जो हमें पसंद है, तब हम उसे बेहतर कर पाते हैं। उसी तरह, हम जब कुछ ऐसा करते हैं जो हमें पसंद नहीं है, तब उतना अच्छा परिणाम नहीं मिलता।

इसके अलावा, याद रखें कि, हमें जैसा लगता है वैसा करना ज़रूरी नहीं है। इसके पीछे कौन से कारण ज़िम्मेदार हैं, उसे समझें। यदि हम वास्तव में वर्तमान की उलझनों का समाधान लाने में सक्षम होंगे, तो इसका निश्चित रूप से समाधान आ जाएगा। इसे पाने के लिए हमें केवल समाधान के लिए तैयार रहने की ज़रूरत है, दूसरों को दुःख पहुँचाए बगैर अपने मन की बात कहें। अपनी और दूसरों की अपेक्षाओं को सुनने की तैयारी रखें। और जब भी हमें ज़रूरत हो, तब मदद मांगने में संकोच न करें।

मौन रहकर दुःख सहन करने की बजाय और खुद पर शंका करने की बजाय, हमें जो भी लगता है, उसे कह देना अधिक अच्छा है। खुले मन से बातचीत करने से, हमें चिंताएँ कम होती महसूस होंगी और हम ज़्यादा खुश रह सकेंगे।

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