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‘थ्री विज़न’ विषय के आकर्षण को रोक सकता है।

मैंने जो प्रयोग किया था, वही प्रयोग इस्तेमाल करना। हमें वह प्रयोग निरंतर रहता ही है। ज्ञान होने से पहले भी हमें जागृति रहती थी। किसी स्त्री ने ऐसे सुंदर कपड़े पहने हों, दो हज़ार की साड़ी पहनी हो तो भी देखते ही तुरंत जागृति आ जाती है, इससे नेकेड (नग्न) दिखता है। फिर दूसरी जागृति उत्पन्न हो तो बिना चमड़ी का दिखता है और तीसरी जागृति में फिर पेट काट डालें तो भीतर आँतें नज़र आती हैं, आँतों में क्या परिवर्तन होता है वह दिखता है। खून की नसें नज़र आती हैं अंदर में, संडास नज़र आती है, इस प्रकार सारी गंदगी दिखती है। फिर विषय होता ही नहीं न! इनमें आत्मा शुद्ध वस्तु है, वहाँ जाकर हमारी दृष्टि रुकती है, फिर मोह किस प्रकार होगा?

श्रीमद् राजचंद्र ने कहा है कि 'देखते ही होनेवाली भूल टले तो सर्व दुःखों का क्षय हो।' शास्त्रों में पढ़ते हैं कि स्त्री पर राग मत करना, लेकिन स्त्री को देखते ही भूल जाते है, उसे 'देखते ही होनेवाली भूल' कहते हैं। 'देखते ही होनेवाली भूल टले' का अर्थ क्या कि यह मिथ्या दृष्टि है, वह दृष्टि परिवर्तित हो और सम्यक् दृष्टि हो तो सारे दुःखों का क्षय होता है। फिर वह भूल नहीं होने देगी, दृष्टि खिंचती नहीं।

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