जीवन के हर मोड़ पर हमें असफलता का भय सताता रहता है। जब स्कूल और कॉलेज में होते हैं, तब परीक्षा, खेल-कूद या अन्य गतिविधियों में असफलता का भय होता है। आगे चलकर करियर के क्षेत्र में, नौकरी या बिज़नेस में असफलता का भय या समाज में प्रतिष्ठा या पद बनाए रखने की स्पर्धा में असफलता का भय सताता रहता है।
खासकर बच्चों और युवाओं को परीक्षा के एक दिन पहले चिंता और घबराहट हो जाती है, कुछ को तो बुखार आ जाता है! पेपर लिखते समय तनाव के कारण पढ़ा हुआ भूल जाते हैं। अच्छे और होशियार लड़के-लड़कियाँ भी परीक्षा में नहीं आएगा, इस भय से डिप्रेशन में आ जाते हैं और परीक्षा ही नहीं देनी, ऐसा तय कर लेते हैं। कुछ विद्यार्थी फेल होने के डर से ही इतने घिर जाते हैं, कि परिणाम आए उससे पहले ही जीवन समाप्त करने का विचार करने लगते हैं।
एक बार असफल हो जाने से दुनिया का अंत नहीं हो जाता। परीक्षा देने से पहले पढ़ते समय पूरी एकाग्रता से पढ़ें, अवश्कतानुसार मेहनत करें । लेकिन फिर परीक्षा देते समय या परीक्षा देने के बाद उसकी चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। क्योंकि, चिंता करने से न तो परिणाम बदलेगा और न ही सुधरेगा। वास्तव में तो प्रकृति का नियम क्या है कि हमें चिंता होगी तो काम अवश्य बिगड़ेगा, जबकि चिंता न हो तो काम अच्छा ही होगा।
परिणाम खराब आए तो दुःखी होने की ज़रूरत नहीं है। फिर से परीक्षा दें। तय करें कि अब और अधिक अच्छे तरीके से पढ़ाई करेंगे और दिल से मेहनत करेंगे। फिर जो भी परिणाम आए वो हमारे हाथ में नहीं है, इसलिए उसे स्वीकार कर लें।
नौकरी-व्यवसाय या करियर के किसी भी क्षेत्र में असफलता के भय से ही चिंता का जन्म होता है। और इस चिंता ही चिंता में रातों की नींद भी हराम हो जाती है। करियर में असफलता अलग-अलग तरह से रूपक में आती रहती है। व्यवसाय में घाटा हो जाए या नौकरी से निकाल दिया जाए, यह तो साफ तौर पर असफलता है। इसके अलावा, नौकरी के इंटरव्यू में सफल न हो पाना, नौकरी में प्रमोशन न मिलना या वेतन में बढ़ोतरी न होना, इसे भी लोग असफलता मानते हैं।
परम पूज्य दादाश्री स्वयं व्यवसाय से कॉन्ट्रैक्ट का धंधा करते थे। एक बार उन्हें भी धंधे में घाटा हुआ था। परिणामस्वरूप, रात में चिंता होने लगी और नींद नहीं आ रही थी। लेकिन वे विचक्षण थे, इसलिए विचारणा शुरू हुई कि घाटा मेरा हुआ या धंधे का? और इस धंधे के मुनाफे में घर के सभी भागीदार होते हैं और घाटा हुआ तो मेरे अकेले के सिर पर ही क्यों? यदि यह घाटा भी परिवार के सदस्यों और भागीदारों में बाँट दिया जाए, तो मेरे हिस्से में कितना आएगा? बस उतनी ही चिंता करनी है।
व्यवसाय में असफल हो जाने के भय से अनीति, अप्रमाणिकता या भ्रष्टाचार की शुरुआत न करें। खास तौर पर, मनुष्यों के खाने की चीज़ों में या दवा में मिलावट करने से भयंकर पाप कर्म बंधते हैं। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि “आपको व्यापार करना हो तो अब निर्भयता से करते रहना, कोई भय मत रखना और व्यापार न्यायपूर्वक करना। जितना हो सके उतना, पॉसिबल हो उतना न्याय करना। नीति की मर्यादा में रहकर पॉसिबल हो उतना करना, जो इम्पॉसिबल हो वह मत करना। जो मनोव्यापार निर्भय बना दे, वह व्यापार काम का।“
अगर असफलता का गलत भय उत्पन्न हो, तो पिछले वर्षों में मिली सफलता को याद करें। यदि पहले इसी तरह के किसी विषय में चिंता और भय उत्पन्न हुए थे, फिर भी परिणाम तो अच्छा ही आया था। तो उससे अनुभव लें कि पहले सफल हुए थे, तो अब भी सफल होंगे।
कई बार परिणाम में असफलता मिलेगी, इस भय से कुछ लोग प्रयत्न करना ही छोड़ देते हैं। जैसे, परीक्षा में एक बार फेल हो गए, तो दोबारा परीक्षा ही नहीं देनी ऐसा तय करते हैं। या फिर, दूसरी परीक्षा की तैयारी करने के बजाय इधर-उधर भटककर समय बर्बाद कर देते हैं। ऐसा करने के बजाय, एकाध असफलता के बाद भी सिन्सियरली दोबारा प्रयास करना चाहिए।
जीवन में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं, लेकिन उनमें हमें डिस्टर्ब नहीं होना चाहिए। जैसे कि, मुंबई से अहमदाबाद गाड़ी चलाकर जाना हो और घर से बाहर निकलते ही थोड़ी दूर जाकर ट्रैफिक जाम मिल जाए, तो घर वापस आ जाएँगे कि "इतना ट्रैफिक जाम है, जाने का कोई फ़ायदा नहीं! अगर थोड़ी देर धीरज रखें, तो ट्रैफिक क्लियर हो जाएगा। किसी भी मामले में असफलता मिले या हमारी धारणा के अनुसार परिणाम न आए, तो उस एक परिणाम को साइड में रखकर नए सिरे से फिर से मेहनत करनी चाहिए। जिस ईश्वर में श्रद्धा हो उन्हें प्रार्थना करनी चाहिए और शक्तियाँ मांगनी चाहिए। फिर कहाँ कमी रह गई थी, उसे ढूँढ निकालें और वहाँ सुधार करके आरंभ से शुरुआत करनी चाहिए।
बहुत मेहनत करने के बाद भी असफलता आए, तब भी निराश होकर बैठे नहीं रहना चाहिए, बल्कि दूसरी बार "क्यों नहीं होगा?" कोशिश तो करें!" ऐसे सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रयास जारी रखने चाहिए।
पूरी-पूरी सफलता मिले ऐसी उम्मीद रखी हो, तो छोटी सी असफलता भी सहन नहीं होती। लेकिन अगर पूरी-पूरी असफलता के लिए तैयार हो, तो छोटी सी सफलता में भी संतुष्ट रह सकते हैं।
मान लीजिए, नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाना है और हमने हर तरह से पूरी तैयारी कर ली है। लेकिन अंदर से ऐसा दृष्टिकोण रखें कि “मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूँगा। फिर नौकरी मिले या न भी मिले, दोनों के लिए मेरी तैयारी है।” और बाद में यदि नौकरी मिल जाए, तो बहुत आनंद होता है। लेकिन अगर हम यह मानकर बैठे हो कि “यह नौकरी तो मुझे मिलकर ही रहेगी।” और यदि नौकरी न मिले तो हम निराश हो जाएँगे।
इसलिए, हर एक कार्य में असफलता के लिए तैयार रहना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि हम सफलता के लिए कोई प्रयत्न ही न करें। हमें पूरी निष्ठा से अपने प्रयत्न करने चाहिए। लेकिन साथ में ऐसा आंतरिक एडजस्टमेंट लेने से हम खराब परिणामों के लिए तैयार रहते हैं और असफलता में हारकर बैठ नहीं जाते।
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