अगर हम डर के कारणों को समझ लें, तो डर से बाहर निकलने के उपाय अपने आप मिल जाते हैं। परम पूज्य दादा भगवान द्वारा दिए गए समझ रूपी खजाने में से, डर के पीछे के सटीक कारणो का विश्लेषण यहाँ प्राप्त होता है।
कुछ भय भविष्य की चिंता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं। "कल क्या होगा?" ऐसी अग्रशोच में लोग भय और चिंता में दिन बिताते हैं। इन्कम टैक्स का नोटिस आए तो "अब क्या होगा?", ऐसा भय निरंतर लगता रहता है। दिन भर चिंता और आंतरिक क्लेश होते रहते हैं। विद्यार्थियों को परीक्षा देने के बाद परिणाम क्या आएगा, इसकी बहुत अधिक चिंता हो तो भय पैदा होने लगता है। नौकरी के लिए इंटरव्यू देते समय भी "असफलता मिलेगी तो क्या होगा?" ऐसे भय से कामकाज पर बुरा असर पड़ता है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “भविष्य के विचार करने पर यदि भय लगे तो समझना कि आर्तध्यान हुआ है। आर्तध्यान में खुद अपनी चिंता करता रहता है कि ऐसा होगा तो क्या होगा? ऐसा होगा तो क्या होगा? ऐसी घबराहट होती रहती है।“ आर्तध्यान यानी किसी दूसरे को दुःख नहीं पहुँचाता, लेकिन खुद दुःखी होता रहता है। इसके परिणामस्वरुप खुद को ही बहुत दुःख होता है और भय उत्त्पन्न होता है।
भय वह परिणाम है। इसके रूट कॉज़ में द्वेष, अभाव और तिरस्कार काम करते हैं। उदाहरण के लिए, अगर कोई पुलिसवाला हमारे घर का दरवाजा खटखटाता है, तो तुरंत अंदर भय पैदा हो जाता है। क्यों? क्योंकि, पुलिस के प्रति कुछ द्वेष-अभाव है। वकील का नोटिस आए कि कोर्ट में उपस्थित होना है, तो? तुरंत घबराहट होने लगती है। क्योंकि, कोर्ट के प्रति नापसंदगी है। इतना ही नहीं, किसी भी जीव के प्रति जैसे कि, छिपकली, तिलचट्टा, बिच्छू, सांप आदि से डर लगे तो समझ जाना चाहिए कि उनके लिए कुछ अभाव-तिरस्कार है ही।
हमने कई लोगों को कहते हुए सुना है, कि "मुझे अपनी नौकरी अच्छी नहीं लगती, बॉस से डर लगता है।" कुछ लोग कहते हैं, कि "मुझे कड़वी दवा अच्छी नहीं लगती, उसे पीने के नाम से ही कंपकंपी छूट जाती है।" इस तरह हम चलते-फिरते वस्तुओं और व्यक्तियों को "नापसंद" करते रहते हैं। परिणामस्वरूप, उसके प्रति अभाव होता है और उससे धीरे-धीरे भय उत्पन्न होता है। वस्तु ही नहीं, हमारे नज़दीकी व्यक्तियों में भी अगर कोई व्यक्ति "नापसंद" हो, तो धीरे-धीरे उस व्यक्ति के लिए भी भय उत्पन्न हो जाता है। हमेशा जो चीज़ अच्छी नहीं लगती उसका भय बैठ जाता है। कोई व्यक्ति नापसंद हो, तो उस व्यक्ति को देखते ही भय लगता है। जिसका हम तिरस्कार करते हैं, उसका भय हमारे अंदर प्रवेश कर जाता है, ऐसा नियम है। क्योंकि, "अच्छा नहीं लगता" ऐसा कहने से साइकोलॉजिकल इफेक्ट होता है। लेकिन उसी व्यक्ति के लिए "अच्छा लगता है" कहें तो उसका भय नहीं लगता। जिनके प्रति नापसंदगी रहती है, उस व्यक्ति के लिए मन में ही माफ़ी माँगते रहें और 'वे अच्छे हैं, भले हैं' ऐसा पाँच-पच्चीस बार बोलते रहें, तो भी द्वेष की गाँठ टूट जाती है और भय चला जाता है। फिर व्यवहार अच्छा होता है।
अभाव, तिरस्कार और भय के बीच का संबंध हमें यहाँ परम पूज्य दादा भगवान के पास से मिलता है।
दादाश्री: तिरस्कार करता रहता है, इसलिए भय लगता है। तिरस्कार करने से भय लगता है। आपके अनुभव में थोड़ा ऐसा आया है?
प्रश्नकर्ता: हाँ, आया है। लेकिन पहले तिरस्कार होता है या पहले भय होता है?
दादाश्री: पहले तिरस्कार होता है। पहले भय नहीं होता। तिरस्कार किस तरह? सुना हुआ हो कि ये पुलिसवाले बहुत खराब होते हैं, ऐसा ज्ञान हुआ हो, इसलिए पहले तिरस्कार बैठ जाता है। इस ज्ञान के आधार पर कहेगा कि पुलिसवाले बहुत खराब होते हैं। सबसे खराब पुलिसवाले होते हैं, ऐसा ज्ञान सुना हुआ हो, वही तिरस्कार है; उसके बाद भय लगता है। तिरस्कार का फल भय है। ज्ञान के आधार पर पहले तिरस्कार बैठता है और तिरस्कार से भय उत्पन्न होता है। फिर वह भय दिन-ब-दिन बढ़ता जाता है, और यदि पुलिसवाला उसके घर आया हो, तो उसे घबराहट हो जाती है, सिर्फ़ पूछने ही आया हो तब भी!
प्रश्नकर्ता: पड़ोसी का एड्रेस पूछने आया हो।
दादाश्री: हाँ, पड़ोसी का एड्रेस पूछने आया हो, तो अंदर आते ही डर लगेगा।
परम पूज्य दादा भगवान यहाँ पुलिस के उदाहरण द्वारा समझाते हैं कि लौकिक ज्ञान को जानने के आधार पर अभाव, तिरस्कार घुसा और भय की शुरुआत हुई। अब, सच्चा ज्ञान बैठे तो अभाव, तिरस्कार नहीं रहेगा और भय से मुक्त हो जाएँगे।
अक्सर भूत, प्रेत और चुड़ैल के डर के पीछे कल्पना काम करती है। बार-बार जो बातें सुनने में आती हैं, उसके अनुसार हमारी बुद्धि कल्पना करती है और न हो वहाँ भी भूत का आभास होता है। परम पूज्य दादा भगवान अपने ही जीवन के एक प्रसंग का वर्णन करते हैं और कहते हैं कि “ये जो कल्पना के भूत हैं, वे मार डालते हैं। अन्य और कुछ भी नहीं मारता।“
परम पूज्य दादा भगवान के बड़े भाई की पहली पत्नी का निधन हो गया था। परम पूज्य दादाश्री जब तेरह वर्ष के थे, तब का यह प्रसंग कल्पना के भय के सामने वास्तविकता खुली करता है।
प्रश्नकर्ता: आपने कहा है कि भूत का भय लगता था, तो भूत को देखा था।
दादाश्री: मैं तेरह साल का था तब मुझे बुखार आया था और दरवाज़े बंद करके बंद कमरे में बैठा हुआ था। सामने बहुत बड़ी अलमारी थी, और उसमें दरवाज़े नहीं थे। अंदर खाने बने हुए थे। तीन-चार खानों वाली अलमारी थी, लेकिन दरवाज़ा नहीं था उसमें। एक बार आँख खुली तो सामने कुछ धुंधला सा दिखाई दिया, और वहाँ मेरी (पहली) भाभी दिखाई दीं। मुझे तो मणिभाई की पहली पत्नी दिखाई देने लगीं। मणिभाई ने पहले शादी की थी न, तो वे सूरज भाभी दिखाई देने लगीं और मैंने उनका बेटा भी देखा, बेटा और भाभी दोनों दिखाई दिए। मैंने कहा, ‘ये कहाँ से आ गए वापस?’ और वह भी बेटे को लेकर चढ़ते-उतरते हुए दिखाई दिए। फिर वे उन अलमारी के खानों में पहली मंजिल पर चढ़े, फिर वापस बेटा दिखाई दिया, फिर दूसरी मंजिल पर चढ़े, तो बेटा दिखाई दिया। मैंने कहा, ‘ये भूत हैं या क्या हैं?’ लोग कहते थे कि वे मरने के बाद भूत बन गई हैं। तो मुझे बुखार के चक्कर में ऐसा दिखाई दिया था। उससे मुझ में डर बैठ गया। ऐसी प्रतिष्ठा की थी इसलिए वह दिखाई दिया। भूत बन गए, वह ज्ञान हाज़िर हो गया और लोगों ने स्थापन की थी कि भूत है इसलिए दिखाई दिया। फिर तो मैं परेशान हो गया और भयभीत हो गया। फिर तो एकदम से आँखें मींचकर दरवाज़ा खोल दिया। फिर भूत का दिखना बंद हो गया। ये सभी कल्पना के भूत थे! हम जैसी कल्पना करते हैं न, वैसा ही दिखाई देता है। जिस बारे में सोचते हैं, वैसा ही दिखाई देता है। इससे समझना यह है कि हम जैसी प्रतिष्ठा करते हैं वह वैसा ही फल देती है।
परम पूज्य दादा भगवान का कॉन्ट्रैक्ट का बिज़नेस होने के कारण उन्हें देर तक बाहर रहना पड़ता था। उनका स्वभाव ऐसा था कि वे बचपन से ही भय का सामना करते थे। ऐसे ही एक प्रसंग का यहाँ वर्णन किया गया है। उनके द्वारा दिखाई गई हिम्मत के आधार पर हमें काल्पनिक भय से मुक्त होने की चाबियाँ मिलती हैं।
दादाश्री: एक बार पालेज-बारेजा के सामने हमारा नाले का एक छोटा-सा काम चल रहा था, तो एक बार रात को मैं अँधेरे में जा रहा था। कॉन्ट्रैक्ट का बिज़नेस था इसलिए देर हो जाती थी, फिर अँधेरे में जाना पड़ता था। वहाँ अँधेरा हो गया था इसलिए भूत दिखाई दिया, चलता-फिरता दिखाई दिया।
अब कुछ था नहीं। बबूल का ठूँठ खड़ा था और उस पर पत्ते-वत्ते कुछ भी नहीं थे, इसलिए इंसान जैसा दिखाई दिया, इससे मुझे ऐसा लगा कि ‘लोग जो कहते हैं, वह बात सही है कि इस जगह पर रहता है’। तब वहाँ पर भी ऐसा किया था। मैंने कहा, ‘चलो अब, उसे छूकर ही जाना है हमें’।
यह जो सामना करने की आदत थी न पहले से, इसलिए मैं तो उस भूत की तरफ ही चला रौब से... मूल रूप से तो क्षत्रिय थे न! वहाँ जाकर जब मैंने उसे छूआ तब ठूँठ निकला! बबूल का ठूँठ देखा।
हम भी ऐसे कल्पना के भय से पीड़ित होते हैं। वहाँ यदि वास्तविकता का ज्ञान हो जाएँ, तो समझ में आता है कि भय रखने जैसा कुछ भी नहीं था।
ज़्यादातर लोकसंज्ञा के आधार पर मन में गलत वहम घुस जाता है और उसके परिणामस्वरूप भय उत्पन्न होता है। परम पूज्य दादाश्री के जीवन का ऐसा ही एक प्रसंग है, जिसमें गलत वहम के आधार पर उत्पन्न होने वाले भय के सामने वास्तविकता खुली होती है। ऐसे वहम का खोखलापन समझ में आते ही उसका भय आसानी से दूर हो जाता है।
परम पूज्य दादा भगवान कॉन्ट्रैक्ट का बिज़नेस करते थे। लगभग चौबीस वर्ष की आयु में उन्हें काम की साईट पर जाना पड़ा। साइकिल लेकर वहाँ गये और वापस आते समय रात के साढ़े ग्यारह बज गए थे। वे घोर अंधेरे में धूल-मिट्टी वाले रास्ते पर तेजी से साइकिल चलाकर आ रहे थे। रास्ते में एक महुआ का पेड़ आया। तब लोगों में बातें होती थीं कि उस महुआ के पेड़ पर भूत रहता है। उन्हे यह बात याद आई। तभी वहाँ लगभग दो सौ फुट की दूरी पर, बड़ी-बड़ी आग की लपटें उठती और शांत हो जाती, उठती और शांत होती हुई दिखाई दीं। उन्हें मन में वहम हुआ, कि "जैसा लोग कहते हैं, वैसा भूत होगा तो?" एक तरफ भय तो लगा, लेकिन परम पूज्य दादा भगवान का स्वभाव पहले से ही साहसी था। जहाँ-जहाँ अड़चने आती थी, वहाँ एक क्षत्रिय की तरह सामना करने की उनकी आदत और मुझे कुछ नहीं होगा ऐसा आत्मविश्वास भी! उन्होंने तय किया कि यदि भूत है तो उससे डरकर भागना नहीं है, बल्कि उसका सामना करना है।
साहस दिखाते हुए उन्होंने साइकिल की गति खूब तेज़ कर दी और जहाँ से आग की लपटें दिख रहीं थीं, वहीं साइकिल समेत टक्कर मारी, लेकिन वहाँ तो कोई भूत नहीं था! वहाँ एक व्यक्ति बीड़ी जला रहा था। परम पूज्य दादाश्री साइकिल सहित उस व्यक्ति पर गिर पड़े। व्यक्ति ने शोर मचाया कि, "भाई साहब, मुझे क्यों मार रहे हो?” फिर वे उसे पट्टी करवाने ले गए और कुछ रुपये देकर विदा किया।
इस प्रसंग से परम पूज्य दादाश्री ने युवावस्था में निष्कर्ष निकाला कि रात के अँधेरे में, हवा में वह व्यक्ति बीड़ी पीने के लिए माचिस जला रहा था। लेकिन हवा के कारण माचिस बुझ जाती थी, इसलिए वह बार-बार उसे जला रहा था। उस माचिस की लौ वैसे तो छोटी थी, लेकिन कल्पना के कारण वह बड़ी दिखाईं दे रही थी। महुआ में भूत है ऐसा लोगों ने कहा था, उससे वहम हो गया था, उसके परिणामस्वरूप यह भय उत्त्पन्न हुआ था। दूसरा कोई होता तो उन लपटों को देखकर भाग जाता और "महुए के पेड़ में भूत है" इस लोक मान्यता को अधिक दृढ़ कर देता। लेकिन, परम पूज्य दादाश्री ने साहस दिखाया, जिससे यह लोक मान्यता गलत साबित हुई। वास्तविकता सामने आने पर भय समाप्त हो गया।
कई बार लोग सुनी-सुनाई बातों पर बिना सोचे-समझे विश्वास कर लेते हैं, जिसके परिणामस्वरूप समाज में अंधश्रद्धा फैल जाती है। उदाहरण के लिए, ऐसी मान्यता प्रचलित है कि जब मनुष्य की मृत्यु होती है, तब यमराज उसके प्राण लेने आते हैं। जब रात को कुत्ता रोता है, तो लोग मानते हैं कि यमराज आए हैं, वह कुत्तों को ही दिखाई देते हैं, अब वह प्राण लेकर जाएँगे। इतना ही नहीं, जिन्होंने जीवन में पाप किए होते हैं, उन्हें यमराज रास्ते में पीटते-पीटते, खूब दुःख देकर ले जाते हैं। यमराज का वर्णन भी इतना भयानक होता है कि उसकी कल्पना करते ही भय उत्पन्न हो जाता है। मरते समय यमराज के नाम से मनुष्य भी काँपने लगता है और बच्चे तो बहुत घबरा जाते हैं। बड़े-बड़े दांत और नाखूनों वाले, लंबे-लंबे सींगों वाले यमराज भैंसे पर बैठकर आते हैं। उन्होंने काले कपड़े पहने होते हैं और चेहरा बहुत भयानक होता है।
परम पूज्य दादा भगवान को तेरह वर्ष की उम्र में पड़ोस के एक वृद्ध चाचा की सेवा में रात रुकना पड़ा। चाचा बीमार थे और अंतिम दिन गिन रहे थे। उन्होंने उस उम्र में बात सुनी थी, उससे भय उत्त्पन्न हुआ कि पक्का यमराज आएँगे और चाचा को ले जाएँगे, इसलिए वे पूरी रात जागते रहे। थोड़ी देर के लिए आँख लग गई, फिर जब सुबह झपककर जागे तो देखा कि चाचा तो जीवित थे। तब परम पूज्य दादाश्री की यमराज के भय से संबंधित ज़बरदस्त विचारणा शुरू हो गई कि इसकी सच्चाई क्या है? फिर तो वे जगह-जगह जांच करने लगे। खूब ढूँढा लेकिन सच्ची बात नहीं जान पाए। इसलिए खुद विचारणा करते रहे। अंत में, पच्चीसवें वर्ष में, उन्होंने ढूँढ निकाला कि जमरा (यमराज) नाम का कोई जीव है ही नहीं, लेकिन नियमराज है। जगत नियम से ही चलाता है। पूरा जगत नियम के अधीन है। दूसरा कोई चलाने वाला नहीं है। हरएक जीव नियम से जन्म लेता है, नियम से मरता है; नियम से रात होती है, नियम से दिन होता है; कुदरत का नियम ही ऐसा है! ऐसा वास्तविक ज्ञान प्रकट करके लोगों को निर्भय बनने का मार्ग दिखाया।
अंततः सभी प्रकार के भय के मूल में अज्ञानता है। अधूरा ज्ञान भय पैदा करता है। जैसे कि, हम जंगल के रास्ते जा रहे हों और कोई कहे कि “रास्ते में बाघ-सिंह हैं।“ तो तुरंत हमें उस रास्ते पर जाने से भय उत्त्पन्न होता है। ज़रा सी अगर गर्जना की आवाज़ सुनी कि हमारे होश उड़ जाते हैं और भय से काँपने लगते हैं। फिर कोई हमें पूरा ज्ञान दे और कहे कि “बाघ-सिंह हैं, लेकिन पिंजरे में हैं।“ तो भय तुरंत गायब हो जाता है और शांति से जंगल से गुजर सकते हैं। इसलिए संपूर्ण ज्ञान हो तो भय दूर हो जाता है, लेकिन अधूरे ज्ञान से घबराहट रहती है। ऐसा ही दूसरा उदाहरण लेते है। रात में हम सोने जा रहे हों और रूम में साँप घुसता हुआ दिखे, तो जब तक वह बाहर न निकल जाए, तब तक हमें नींद नहीं आती। लेकिन साँप बाहर चला गया है, ऐसा ज्ञान हो जाए तो भय अपने आप निकल जाता है। बुद्धि का ज्ञान अधूरा है। बुद्धि के ज्ञान से कुछ हद तक भय को दूर किया जा सकता है। लेकिन संपूर्ण निर्भय होने के लिए आत्मज्ञान आवश्यक है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि “संसार में भयभीत होने जैसा नहीं है। जो कुछ होगा वह पुद्गल को ही होगा, हमारा कुछ भी होने वाला नहीं है।“ पुद्गल अर्थात् जिसका पूरण और गलन होता है वह। मन-वचन-काया वे पूरण-गलन स्वभाव के हैं, विनाशी हैं, टेम्परेरी हैं। जबकि आत्मा शाश्वत है, परमानेंट है।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि किसी सेठ की दुकान से माल चोरी हो गया हो और सेठ शोर मचाने लगे कि "मेरा सब कुछ चोरी हो गया!" तब हम उनसे कहें कि "सेठ तुम्हारा नहीं, यह तो दुकान का सारा माल चोरी हो गया है।" तो उन्हें बात समझ में आती है। इसी प्रकार आत्मा में से कुछ नहीं जाता, जो कुछ जाता है वह सब पुद्गल का जाता है। इस तरह बाहर के प्रत्येक संयोग पुद्गल को स्पर्श करते हैं, हमें स्पर्श नहीं कर सकते। ऐसा ज्ञान होने के बाद सभी प्रकार के भय से हमेशा के लिए मुक्ति मिलती है। हमारा खुद का स्वरूप आत्मा ही है, ऐसा भान हो और आत्मा का अनुभव हाज़िर रहे, तब संपूर्ण निर्भय पद प्राप्त होता है। परंतु, यह दशा नहीं आए तब तक भय पैदा करने वाली जगहों पर सावधानी रखनी जरूरी है, लेकिन भयभीत होना जरूरी नहीं है।
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