
व्यापार में यदि हम किसी के देनदार हों, यानी हमने किसी से पैसे उधार लिए हों और वह कर्ज़ चुकाना हो। या हम लेनदार हों, यानी हमने किसी को पैसे उधार में दिए हों और उसकी वसूली करनी हो। इन दोनों ही स्थितियों में हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए, इसकी सही समझ यहाँ मिलती है।
लक्ष्मी तो ग्यारहवाँ प्राण है। हर किसी को अपने पैसे प्रिय होते हैं। व्यापार में यदि हमने किसी से पैसे उधार लिए हों और उन्हें वापस नहीं लौटाएँ, तो सामने वाले को बहुत दुःख होता है। इसलिए हमें एक भाव रखना है कि हमसे किसी को किंचित्मात्र भी दुःख न हो। हमें पहले से ही निश्चय करना है, कि मेरे कारण किसी के पैसे नहीं डूबें, और अगर डूब भी गए, तो किसी भी हाल में पैसे वापस लौटाने ही हैं। व्यापार में घाटा हो जाए तो हर्ज नहीं हैं, लेकिन जिनके पैसे लिए हैं उनका कर्ज़ चुकता करने का हमारा भाव प्योर होना चाहिए। हमारा ध्येय निरंतर यही रहना चाहिए कि मुझे पाई-पाई चुका देनी है। यह सबसे बड़ी बात है।
आजकल व्यापार में घाटा हो जाए तो लोग लाखों-करोड़ों रुपये दबाकर दिवालियापन घोषित कर देते हैं यानी, व्यापार में दिवाला निकालते हैं, यह बहुत बुरा कहा जाएगा। किसी का पैसा दबाकर हम शांति से जिएँ और जिनके पैसे गए हों उन्हें दुःख हो इससे तो अनंत जन्म बिगड़ते हैं, इसलिए किसी का पैसा हज़म कर लेने की हमारी बिल्कुल इरादा नहीं होनी चाहिए। हमारी लक्ष्मी किसी के पास रहे तो उसका हर्ज नहीं है, लेकिन हमारे पास किसी की लक्ष्मी नहीं रहनी चाहिए।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि यह ध्येय लक्ष्य में रखकर फिर आप व्यापार का खेल खेलना, लेकिन खिलाड़ी मत बनना। अगर खिलाड़ी बन गए तो आप खत्म! खिलाड़ी यानी व्यापार में एक पार्टी से पाँच लाख उधार लेते हैं, फिर दूसरी पार्टी से दस लाख उधार लेते हैं, उसमें से पहले वाले को पाँच लाख चुका देते हैं। फिर तीसरी पार्टी से लेकर दूसरी को चुका देते हैं। ऐसा-वैसा करके बुद्धि का चक्कर चलाते हैं, लेकिन अंत में बड़ा कर्ज़ हो जाता है और रोने का समय आता है।
नियम यह है कि किसी के पैसे लेते समय ही, यह पैसे मुझे वापस लौटाने ही हैं, ऐसा तय करने के बाद ही पैसे लें। जल्द से जल्द कर्ज चुकाने का हमारा भाव होना चाहिए, फिर परिस्थितिवश उसमें देर हो जाए तो उसमें हर्ज़ नहीं है, लेकिन भाव नहीं बिगड़ने चाहिए। यदि हमें व्यापार में अड़चन हो और पैसे न चुका पा रहे हों, तो हमें इतना देखना चाहिए कि हमारा भाव प्योर है या नहीं। "आज मेरे पास पूरे पैसे होते तो मैं आज ही वापस लौटा देता!" यह प्योर भाव कहलाता है। ऐसा प्योर भाव होगा तो पैसे अवश्य ही लौटा पाएँगे, फिर चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। भाव प्योर नहीं रहता है, तो पैसे नहीं लौटा पाएँगे।
यदि हमने किसी को पैसे दिए हों और वे वापस न आ रहें हों, तो हमें उन्हें वापस लेने का प्रयत्न करना चाहिए या हमारा हिसाब है ऐसा मानकर संतुष्ट होकर बैठ जाना चाहिए? इसके जवाब में परम पूज्य दादाश्री कहते हैं,"आपको स्वाभाविक रूप से प्रयत्न करने चाहिए। आपको उसे कहना चाहिए कि 'हमें ज़रा पैसों की तंगी है, यदि आपके पास हों तो हमें लौटा देना।' इस तरह से विनयपूर्वक, विवेक से कहना चाहिए और नहीं आएँ, तो फिर आप समझ लेना कि आपका कोई हिसाब होगा, जो चुक गया लेकिन यदि हम प्रयत्न ही नहीं करेंगे तो वह हमें मूर्ख समझेगा और वह उल्टे रास्ते पर जाएगा।" हमसे पैसे लेते समय कोई व्यक्ति जितना विवेक रखता है, उतना ही विवेक हमें भी किसी से पैसे वापस लेते समय रखना है।
वसूली के समय हमें अपने भीतर की समझ ऐसे सेट करनी चाहिए जिससे हमें चिंता न हो। यदि एक दिन हमें शंका हो और विचार आए कि, "वह पैसे नहीं लौटाएगा तो क्या होगा?" तो हमारा मन निर्बल होता जाता है। पैसे देने के बाद तय कर लेना है कि काली चिंदी में बाँधकर समुद्र में डाल दिए हैं उस तरह पैसे दिए हैं। इस तरह वापस आने की आशा रखे बिना ही पैसे देना, वर्ना देना ही मत। पैसे देने के बाद आशा रखें और न आए तो चिंता करें वह मूर्खता है।
किसी को दिए हुए पैसे वापस लेने की वसूली के लिए सहज प्रयत्न करें। मान लीजिए, हम सुबह दस बजे वसूली के लिए निकल पड़े, लेकिन व्यक्ति नहीं मिले तो, फिर बारह बजे गए, तब भी न मिले, तो घर लौटकर फिर डेढ़ बजे जाएँ, इस तरह धक्के खाते रहें ऐसा नहीं करना है। आजकल अगर फोन से वसूली करते हों, तो हर दो घंटे में फोन करें ऐसा नहीं करना चाहिए। सहज प्रयत्न यानी एक बार जाकर आ गए और नहीं मिले तो फिर दूसरी बार विचार नहीं करना है। कुछ दिन बाद फिर से जाएँ या फोन करें। हमारा सहज प्रयत्न हो तो कई बार ऐसा भी होता है कि हम गए और कोई नहीं मिले, लेकिन वापस लौट रहें हों, तभी वह सामने मिल जाते हैं और हमारा काम हो जाता है।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, “पाँच-सात बार वसूली करने गए हों तो अंत में वह कहेगा कि 'महीने बाद आना', उस समय यदि आपके भाव न बदलें तो घर बैठे पैसे आएँगे। लेकिन आपके भाव बदल जाते हैं न? 'ये तो बेअक्ल हैं। नालायक व्यक्ति हैं, चक्कर लगाना बेकार गया।' यों भाव बिगड़ जाते हैं। फिर से आप जाओगे तो वह गालियाँ देगा। आपके भाव बदल जाते हैं, इसलिए सामने वाला न बिगड़ता हो तो भी बिगड़ जाता है।“
जब पैसे समय पर वापस न मिलें, तब “हुआ सो न्याय!” यह समझ सेट करें तो सबसे पहले बुद्धि का संताप बंद हो जाता है। सही समझ पर श्रद्धा हो, तो हमें उस व्यक्ति पर क्रोध नहीं आता, अकुलाहट नहीं होती, दिन-रात चिंता नहीं होगी। फिर व्यवहार में हमें वसूली के लिए भी जाना है और व्यवहार को पूरी तरह से निभाना है। जब व्यक्ति से मुलाकात हो जाए तो मजाक में कहना कि “चार बार फोन किया, मिले नहीं, और आज मैं लकी या आप लकी, हम मिल गए! इस समय मुझे बड़ी परेशानी है। यदि आपके पास पैसे न हों, तो किसी से लेकर, व्यवस्था करके भी मुझे पैसे दिलवा दीजिए।” ऐसे-वैसे बात करके रास्ता निकालना। गुस्सा किए बिना विनयपूर्वक व्यवहारिक बात करेंगे, तो हमारा काम हो जाएगा।
अगर पैसे वापस आ जाएँ, तो देने वाले को बैठाकर चाय-पानी करवाएँ और कहें, “आपका उपकार मानना पड़ेगा कि आप रूपए लौटाने आए, वर्ना इस काल में तो रूपए वापस नहीं आते।” और अगर कोई कहे कि ब्याज नहीं दे सकता, तो कहिएगा, “मूल ले आए वही बहुत है!” जिसने पैसे लिए हैं, उसे वापस लौटाने का दुःख है और जिसने दिए हैं, उसे वापस लेने का दुःख है। दोनों में से कोई भी सुखी नहीं है, ऐसा विचित्र यह संसार है।
हमने जिसे पैसे दिए हों, उसकी नियत बदल जाए और पैसे लौटाने की बात से मुकर जाए, तब हम कानून का सहारा लेकर पैसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। उसके बावजूद हमारे पैसे हाथ में न आएँ, तब समझना कि उस व्यक्ति की नियत खराब हो गई है। भविष्य में कुदरत के न्यायालय में वह गुनहगार ठहराया जाएगा तब बहुत दुःखी होगा। तब हमें भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि “हे भगवान! उस व्यक्ति को सद्बुद्धि दीजिए।” यदि वह व्यक्ति हमें पैसे नहीं लौटाएगा, तो फिर कुदरत की कोर्ट में न्याय होगा और उसे अधिक ब्याज के साथ कई गुनी रकम चुकानी पड़ेगी, क्योंकि मनुष्यों के बनाए कानून भंग हो सकते हैं, लेकिन कुदरत के कानून को कोई तोड़ नहीं सकता।
संक्षेप में, यदि हमने किसी से पैसे उधार लिए हों, तो सच्चे दिल से वापस लौटाने के भाव के साथ पूरे-पूरे प्रयत्न करें और यदि किसी ने हमसे पैसे उधार लिए हों और वापस न लौटा रहा हो, तो संपूर्ण विनय के साथ पैसे वापस लेने के व्यावहारिक प्रयत्न करें, लेकिन वापस न मिलें, तो दुःखी मत हों।
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