
लोभ का विरोधी शब्द है संतोष। जितना संतोष रहता है उतना लोभ खत्म होता है। पर संतोष रखने से नहीं रहता। जितनी सही समझ होगी परिणामस्वरूप उतना ही संतोष रहेगा। या फिर पहले अनंत अवतार भौतिक सुख भोगे हुए हों तो आज संतोष रहता है कि कोई चीज़ नहीं चाहिए।
हर एक को धनवान होना है। लेकिन पैसों का ढेर होना उसे हम धनवान मानते हैं। परम पूज्य दादाश्री धनवान की अलौकिक व्याख्या देते हुए कहते हैं कि ज़रूरत भर के रुपये आएँ और ज़रूरत भर के जाएँ, फिर अड़चन नहीं आती, उसी को धनवान कहते हैं। ऐसी समझ हाज़िर रहे तो लोभ खड़ा ही न हो। लेकिन वास्तविकता में चाहे जितना धन कमाएँ फिर भी तृप्ति नहीं होती। मनुष्य गाँव का जीवन छोड़कर जीवननिर्वाह के लिए शहरों में आते हैं। बहुत से शहर में आकर खूब कमाते भी हैं। अरबों रुपये कमा लेने के बाद भी कोई ऐसा नहीं कहता कि कमाने ही आए थे, अब बहुत कमा लिया, ज़्यादा कमाने की ज़रूरत नहीं है! दुनिया में कोई पैसे कमाकर संतुष्ट हुआ हो ऐसा देखने को नहीं मिलता। पैसे कमाकर घड़ी भर संतोष होता है! लेकिन फिर इच्छा वापस लौटती है और तृप्ति नहीं होती। तृप्ति यानी फिर कभी इच्छा उत्पन्न ही न हो!
जिसकी लोभ की गाँठ हो उसे सुख नहीं रहता। जितना परिग्रह कम, संतोष ज़्यादा, उतनी जीवन में शांति! परिग्रह ज़्यादा हो तो वह यदि खो जाए, जल जाए, चोरी हो जाए तो हमें दुःख और अशांति खड़ी हो जाती है। पूरा दिन लोभ के ध्यान में ही जाता है। खाने-पीने में, पहनने-ओढ़ने में भी चित्त नहीं रहता है।
जिसे कोई इच्छा ही नहीं उसे कषाय बिल्कुल नहीं! जिसे कुछ चाहिए ही नहीं, उसकी लोभ की सारी गाँठें टूट जाएँ तब अनंत समाधि सुख बर्तता है!
संत कबीर ने कहा है कि,
“खाय पी खीलाय दे, कर ले अपना काम,
चलती वखत रे नरो, संग न चले बदाम!”
पैसा कोई साथ लेकर नहीं गया है। यदि लेकर जा सकते तो कोई अपने बच्चों को भी देकर जाएँ ऐसे नहीं हैं। जीवन जीना तो उसे आया कहा जाता है जो अपना सब अच्छे रास्ते पर लुटा दे। ऐसा नहीं करें तो एक दिन मृत्यु आएगी तब तो वैसे भी खुद लुट जाएगा। साथ में क्या आएगा। हमने जितना औरों के दिलों को सुकून पहुँचाया होगा, वह खुदके साथ आएगा। इसलिए, लोभ की गाँठ तोड़ने के लिए जो लक्ष्मी कमाई हो उसमें से कुछ पूँजी को बचत में रखकर बाकी की लक्ष्मी अच्छे रास्ते पर खर्च कर देनी चाहिए। धार्मिक यात्रा में खर्च करें, मंदिर बनाने जैसे सत्कार्यों में दान दें, भूखे को खिलाएँ, अस्पताल बनवाएँ तब भी लोभ कम होता है। मौज-शौक में लक्ष्मी बर्बाद कर दें तो वह अंत में गटर में जाती है।
लोभ तोड़ने के लिए पैसे हाथ में लें ज़रूर, पर हाथ में चिपकने न दें। यानी पैसे पर इतनी ज्यादा प्रीति न रखें कि पैसे छूटे ही नहीं। पैसा कमाते वक्त जो आनंद होता है वही आनंद खर्च करते वक्त भी होना चाहिए। “इतने खर्च हो गए !” ऐसा नहीं बोलना चाहिए। पैसे खर्च हो जाएँगे इस तरह से भय में रहने के बजाय, इसे अलग अलग कार्य में खर्च करें , जिससे लोभ छूट जाए और बार-बार दिया जा सके।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, गरीबी और अमीरी दोनों अहितकारी हैं, नॉर्मालिटी होनी चाहिए। हाथ भले खाली हों पर दिल का राजा होना अच्छा है! मार्केट में सब्ज़ी या ऐसी कोई वस्तु खरीदने गए हों तो जिस भाव में मिले उस भाव में ले लें। उन्होंने वर्षों पहले एक व्यक्ति को उपाय बताया था कि, “हर रोज़ पंद्रह बीस रुपये का चिल्लर डालते जाना! दिन प्रति दिन लोभ कम होता जाएगा, फिर उसके एक हफ्ते बाद एक साथ सौ रुपये डालकर आ जाना तो मन ठिकाने आ जाएगा।” उस समय सौ रुपये की बहुत कीमत थी। एक बार देने की शुरुआत करें तो मन बड़ा होता जाता है।
मनुष्य का जीवन कैसा होना चाहिए। जो परोपकार के लिए, दूसरों के कल्याण के लिए उपयोग हो जाए वैसा। तीर्थंकर, चक्रवर्ती सम्राट होने पर भी, राजपाट, वैभव, रानियाँ सब छोड़कर चल निकले थे ! खुदका और दूसरों का कल्याण करने हेतु। इसी का नाम जीवन है। घर के दो पाँच लोगों के लिए तो अनंत अवतार जीवन खर्च किया है, अब एक अवतार तो दूसरों के लिए बिताना चाहिए ! जिसने जीवन में सेवाभाव का ऊँचा हेतु नक्की किया हो कि, कैसे करके लोग सुखी हों, किस तरह लोगों के जीवन में मददरूप बनें”, तो उसे लक्ष्मी बाय प्रोडक्शन में मिल ही जाती है, क्योंकि मनुष्यों में भगवान विराजमान हैं। मनुष्यों की सेवा करना वह भगवान की भजना करने के बराबर है। और जहाँ नारायण राजी तो लक्ष्मीजी भी राजी हो जाती हैं।
पैसे तो जितने आने वाले होंगे उतने ही आएँगे। धर्म की ओर मुड़ेंगे तो भी और अधर्म की ओर मुड़ेंगे तो भी। लेकिन अधर्म में लक्ष्मी का दुरुपयोग होगा और दुखी होंगे, जबकि धर्म में लक्ष्मी का सदुपयोग होगा और सुखी होंगे।
लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। आज पैसा है तो दो साल बाद कुछ भी नहीं होता। आज फ़ायदा तो कल नुकसान। इसलिए इसका इतना ज़्यादा आधार मानकर नहीं बैठना चाहिए। इसके बजाय नुकसान के समय सही समझ सेट करनी चाहिए।
लोभी व्यक्ति के दो गुरु होते हैं। एक धूर्त और दूसरा नुकसान। पैसों का मोह कम करने की कोशिश करने पर भी कम नहीं होता। लेकिन जब भयंकर नुकसान होता है तब लोभ की गाँठ धड़ाधड़ टूट जाती है। या तो कोई धूर्त धोखा दे जाए तब लगता है कि इसकी जगह अच्छे रास्ते में खर्च किया होता तो अच्छा होता।
लोभी व्यक्ति को पैसों का नुकसान हो जाए तब भीतर या बाहर क्लेश हुए बिना नहीं रहता। जैसे कि, नौकर से महँगे चाय के कप-प्लेट टूट जाएँ तो नौकर को डाँट देता है। लेकिन सस्ती कीमत का मटका टूट जाए तो कुछ नहीं होता। जिस चीज़ को कीमती माना है वहाँ ज़्यादा असर होता है। इसलिए चीज़ की कीमत डीवैल्यू कर देनी चाहिए।
पच्चीस लाख के आसामी को पचास हजार रुपये के लिए कोई फँसा दे तो लोभी आदमी के भीतर क्लेश शुरू हो जाता है! उस समय अगर ऐसा हिसाब रखें कि साढ़े चौबीस लाख की ही पूँजी थी, तो क्लेश नहीं होगा।
धंधे में मंदी के समय जब आर्थिक दबाव आता है, जैसे कि, इनकम टैक्स और सेल्स टैक्स भरने हों, लोगों को वेतन देना हो, तब लोग “ऐसा कर लूँ, वैसा कर लूँ” इस तरह की बेकार ही कोशिशें करते रहते हैं। ऐसे समय में लोभ से प्रेरित होकर भागदौड़ करने लगते हैं तो सब बिगड़ जाता है। अधीरता से उलझन बढ़ती है। इसके बजाय धीरज रखें तो आसानी से रास्ता निकल आता है। भारी नुकसान हो तब पॉज़िटिव रहकर प्रयत्न करने का अपना फर्ज़ पूरा करें, लेकिन दिन-रात उसकी चिंता करना, उसके बारे में सोचते रहना वह गुनाह है। इससे लोभ की ग्रंथि बड़ी होती है, और छूटने के बजाय और अधिक बंध जाते हैं।
जब खाने-पीने, कपड़े-लत्ते हर चीज़ में लोभ पैदा होने लगे, तब अपने लोभ की निंदा करने से वह चला जाता है। पैसे बचाकर खुश हो, तब “अरे, ऐसा किया? इसमें क्या अच्छा है? ये आपको शोभा देता है?” ऐसे इसे डाँटेंगे तब इससे छूट पाएँगे।
जब लोभ पैदा हो तब पछतावा करें तब भी गाँठ हल्की होती जाती है। लोभ की गाँठ से प्रेरित होकर झूठ बोलकर लोगों के पैसे लिए हों, बुद्धि से ट्रिक्स लगाकर चोरी या छल किया हो, भ्रष्टाचार किया हो, बिना हक का हड़प लिया हो, तो ऐसे हर प्रसंग को याद करके माफ़ी माँगें और फिर ऐसी भूल न हो इसके लिए निश्चय करें इससे भी लोभ की गाँठ कम होती जाती है। क्योंकि ऐसी चोरियाँ बाहर पकड़ में नहीं आती, लेकिन कुदरत के बहीखाते में उसका गुनाह दर्ज हो जाते हैं!
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