सभी माता-पिता को ऐसा लगता है कि बच्चों को सही मार्ग पर चढ़ाने की माता-पिता की फर्ज़ पूरी करनी चाहिए और इसलिए बच्चों के ऊपर गुस्सा तो करना ही पड़ता है! लेकिन परम पूज्य दादा भगवान इस लौकिक मान्यता को पूरा नकारते हुए सच्ची समझ देते हैं कि, बच्चे क्रोध करने से नहीं, बल्कि प्रेम से सुधरते हैं।
बच्चों के ऊपर गुस्सा किए बगैर, चिढ़े बगैर माता-पिता कैसे उनका प्रेम से पालन-पोषण कर सकते हैं जिससे उनकी आंतरिक शक्तियाँ टूटने के बजाय खिल उठे, इसकी सम्पूर्ण समझ हमें यहाँ मिलती है।
खासकर माता-पिता अपने बच्चों के ऊपर पढ़ाई के लिए, काम-काज के लिए, उनका व्यवहार सुधारने के लिए या उनके कहे अनुसार वो करें इसके लिए क्रोध कर देते हैं। बच्चे संस्कारी हों, विनयी हों तो छोटे हों तब तक सुन लेते हैं। बाद में समझ आने पर वे माता-पिता का विरोध करते हैं। आजकल की जनरेशन में तो खास ऐसा होता है। उनको सुधारना तो बाजू में रहा, उल्टा घर में क्लेश का वातावरण खड़ा हो जाता है।
परम पूज्य दादा भगवान तार्किक रूप से नीचे समझाते हैं, कि अगर गुस्सा करने से बच्चे सुधरते हैं तो गुस्सा कीजिए, लेकिन अगर वह उल्टे ज़्यादा जिद्दी होते हों तो गुस्सा बंद रखना चाहिए।
प्रश्नकर्ता: घर में बच्चों पर क्रोध आता है तो क्या करूँ?
दादाश्री: नासमझी से क्रोध आता है। जब आप उसे पूछो कि ‘तुझे बड़ा मज़ा आया था?’ तब वह कहेगा कि ‘मुझे अंदर बहुत बुरा लगा, बहुत दु:ख हुआ था।’ उसे दु:ख होता है, आपको दु:ख होता है! इसमें बच्चे पर चिढ़ने की ज़रूरत ही कहाँ रही फिर? और चिढ़ने से सुधरते हैं तो चिढ़ना। रिज़ल्ट (परिणाम) अच्छा आए तो चिढ़ना काम का है। रिज़ल्ट ही अच्छा नहीं आए तो चिढ़ने का क्या अर्थ है? क्रोध करने से फायदा होता हो तो करना और यदि फायदा नहीं हो तो ऐसे ही चला लेना न!
प्रश्नकर्ता: अगर हम क्रोध न करें तो वह हमारी सुनेगा ही नहीं, खाएगा भी नहीं।
दादाश्री: क्रोध करने के बाद भी कहाँ सुनते हैं?!
छोटे बच्चे हमारा कहा नहीं मानते, खाने के लिए, कपड़े पहनने के लिए, खिलौनों के लिए ज़िद करते हैं तब माता-पिता उनके ऊपर गुस्सा हो जाते हैं। इतना ही नहीं, बच्चों के मन में डर घुस जाता है कि मम्मी-पापा डाँटेंगे, इसीलिए वे बड़े होने पर बाहर कोई गलत काम करके आते हैं तो भी घर में नहीं बताते। क्रोध से बोलने के बजाय, बचपन से ही बच्चों को समझाकर कहें तो उनका व्यवहार सुधरता है और बड़े होने के बाद माता-पिता के डर के कारण कोई बात छुपाते नहीं हैं।
परम पूज्य दादा भगवान के पास कई माता-पिता आकर प्रश्न पूछते और बच्चों के साथ कैसे व्यवहार करें इसकी प्रैक्टिकल समझ प्राप्त करते थे। उसी प्रकार की कुछ समझ यहाँ पर दी गईं हैं।
दादाश्री: यहाँ हमारे पास डाँट-डपट बिल्कुल नहीं होती! डाँटने पर मनुष्य स्पष्ट नहीं कह सकता, कपट करता है। इसी वजह से संसार में ये सब कपट पैदा हुए हैं! दुनिया में डाँटने की ज़रूरत नहीं है। बेटा सिनेमा देखकर आए और हम उसे डाँटें तो दूसरे दिन बहाना बनाकर, ‘स्कूल में कुछ कार्यक्रम था’ कहकर सिनेमा देखने जाता है! जिसके घर में माँ सख्त हो, उसके बेटे को व्यवहार नहीं आता।
प्रश्नकर्ता: कोल्ड ड्रिंक्स ज़्यादा पिए, चॉकलेट ज़्यादा खाए, उस वक्त डाँटती हूँ।
दादाश्री: उसमें डाँटने की कहाँ ज़रूरत है! उसे समझाना चाहिए कि ज़्यादा खाने से क्या नुकसान होगा। आपको कौन डाँटता है? यह तो बड़प्पन का झूठा अहंकार है! ‘माँ’ बनकर बैठी है, बड़ी! माँ बनना आता नहीं और सारा दिन बच्चे को डाँटती रहती हो! अगर आपको सास डाँटती हो तो मालूम पड़े। बच्चे को डाँटना शोभा देता होगा? बच्चे को भी ऐसा लगे कि यह तो (माँ) दादी से भी बुरी है। इसलिए बच्चे को डाँटना छोड़ दो। धीरे से समझाना कि यह सब नहीं खाना चाहिए, उससे तेरा शरीर बिगड़ेगा।
वह गलत करे तो भी उसे बार-बार मत पीटो। गलत करे और बार-बार पीटें तो क्या होगा? एक आदमी तो जैसे कपड़े धो रहा हो, उस प्रकार बच्चे की धुलाई कर रहा था। अरे भाई, बाप होकर लड़के की यह क्या दशा करता है? उस समय बेटा मन में क्या तय करता है, जानते हो? सहन नहीं हो तो मन में सोचता है, ‘बड़ा होने पर आप को मारूँगा, देख लेना।’ भीतर ठान लेता है। बड़ा होकर फिर उसे मारता भी है।
मारने से जगत् नहीं सुधरता। डाँटने से या चिढ़ने से भी कोई नहीं सुधरता। सही करके दिखाने से सुधरता है। जितना बोलें उतना पागलपन है।
परम पूज्य दादा भगवान समझाते हैं कि, बच्चों के साथ आप फ्रेंडशिप करोगे तो सुधरेंगे। बाकी फादर-मदर की तरह रौब जमाने जाओगे तो वह बहुत जोखिम है। फ्रेंड गलत कर रहा हो तो हम उसे कहाँ तक समझाएँगे? वह माने वहाँ तक, लेकिन ना माने तो हम "जैसी तुम्हारी मर्जी" ऐसा कहकर छोड़ देते हैं। फ्रैंड को बुरा लगे, ऐसा हम नहीं बोलते। वैसे ही, बच्चे न मानें तो उन्हें क्रोध करके मनाने की बजाय, मित्र की तरह समझाना चाहिए।
व्यवहार में भले हमें माता-पिता की तरह फर्ज़ निभानी हो, लेकिन भीतर यह तय कर लेना चाहिए कि हमें बच्चों के साथ बच्चा जैसा बनकर रहना है, एक मित्र की तरह रहना है, तब उसके साथ फ्रेंडली व्यवहार करना आसान हो जाएगा। जबकि बाहर चाहे जितना फ्रेंडली होने जाएँगे, लेकिन अंदर अगर मानते हैं कि "मैं पैरेंट्स हूँ, मुझे कहना ही पड़ेगा।" तो बच्चों को माता-पिता से फ्रेंडली व्यवहार का अहसास नहीं होगा।
माता-पिता को ऐसा लगता है कि वे बच्चों के हित के लिए ही गुस्सा करते हैं। लेकिन माता-पिता को यह अहसास नहीं होता है कि वे बच्चों के मोह में वशीभूत होकर, उन्हें सुधारने के प्रयत्न में छोटी-छोटी बातों में जाने-अनजाने कचकच कर देते हैं।
आजकल बच्चों का मन कमज़ोर हो गया है, उनकी सहनशक्ति भी कम हो गई है। बच्चों के समझदार हो जाने के बाद कितने भी अच्छे आशय से उनके ऊपर क्रोध करें तो भी उनके अहंकार को ठेस लगती है। उनके ऊपर बात-बात में क्रोध करें तो बाद में बड़े होने के पश्चात् वे तंग आकर रियेक्ट होते हैं और किया हुआ क्रोध व्यर्थ जाता है। इसलिए बच्चों के साथ समझाकर, अटा-पटाकर और प्रेम से व्यवहार करें वही उत्तम है।
माता-पिता को ऐसा ही लगता है कि बच्चे जब गलती करें तब उन्हें कड़क होकर टोकना तो पड़ता ही है! ऐसे समय में बच्चों के साथ कैसे बात करनी, यह परम पूज्य दादा भगवान समझाते हैं।
बच्चे कोई गलत काम करें, तब क्रोध करने के बजाय माता-पिता को प्रेम से उनसे पूछना चाहिए कि, "तुम यह सब करते हो तो यह तुम्हें ठीक लगता है? तुमने सोच-समझकर किया था?" अगर ऐसा प्रेम से पूछें तो वो खुद ही कहेंगे कि, "नहीं, मुझे यह ठीक नहीं लग रहा है।" बाद में शांति से समझाना चाहिए कि "तो क्यों बेकार में हम ऐसा करें?"
अगर माता-पिता ऐसे शांति से बात करें तो बच्चे भी समझेंगे। क्योंकि गलत हुआ है, इसकी उन्हें खुद भी समझ पड़ती ही है। लेकिन अगर माता-पिता गुस्से में आकर ऐसा कहें कि, "मूर्ख, नालायक, ऐसा करना चाहिए?" तो उल्टा बच्चे भी पकड़ पकड़ेंगे कि, "अब तो ऐसा ही करूँगा, जाओ!"
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, "सामने वाले का अहंकार खड़ा ही ना हो। हमारी सत्तापूर्ण आवाज़ नहीं हो। अर्थात् सत्ता नहीं होनी चाहिए। बच्चों से आप कुछ कहो तो आवाज़ सत्तापूर्ण नहीं होनी चाहिए।"
छोटे बच्चों को कुछ भी कहें, उनके ऊपर क्रोध करें फिर उनके बड़े होने पर इसके क्या बुरे परिणाम आ सकते हैं वे परम पूज्य दादाश्री हमें नीचे समझा रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: संसार में रहते हुए कुछ ज़िम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं और ज़िम्मेदारियाँ निभाना एक धर्म है। यह धर्म निभाते हुए कारण-अकारण कटु वचन बोलने पड़ें तो यह पाप या दोष है?
दादाश्री: ऐसा है न, कटु वचन बोलते समय हमारा मुँह कैसा हो जाता है? गुलाब के फूल जैसा? अपना मुँह बिगड़े तो समझना कि पाप लगा। अपना चेहरा बिगड़े ऐसी वाणी निकले, तब समझना कि पाप हुआ। कटु वचन मत बोलना। थोड़े शब्द कहो लेकिन आहिस्ता से समझ कर कहो। प्रेम रखो तो एक दिन जीत सकोगे। कडुवाहट से नहीं जीत सकोगे। उल्टा वह विरुद्ध जाएगा और परिणाम विपरीत होगा। वह बेटा उल्टे परिणाम के बीज डालता है। ‘अभी तो मैं छोटा हूँ, इसलिए डाँट रहे हो लेकिन बड़ा होकर देख लूँगा।’ ऐसा अभिप्राय अंदर बना लेगा। इसलिए ऐसा मत करो, उसे समझाओ। एक दिन प्रेम की जीत होगी। दो दिन में ही उसका परिणाम नहीं आएगा। दस दिन, पंद्रह दिन, महीना भर उसके साथ प्रेम रखो। देखो, इस प्रेम का क्या नतीजा आता है, यह तो देखो!
जब बच्चे बड़े और समझदार हो जाते हैं, तब पैरेंट्स ऐसी शिकायत करते हैं कि उन्हें बार-बार कहने के बावजूद भी वो सुनते नहीं, बात भी नहीं मानते। तब क्या करना चाहिए? उन्हें किस तरह से समझाना चाहिए?
इसके लिए परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “अपने कहने का परिणाम न आ रहा हो तो चुप हो जाना चाहिए। आप मूर्ख हैं, आपको बोलना नहीं आता, इसलिए चुप हो जाना चाहिए। अपने कहने का परिणाम न हो और उल्टा अपना मन बिगड़ेगा, आत्मा बिगड़ेगा ऐसा कौन करेगा?”
आजकल माता-पिता ज़रूरत से ज़्यादा इमोशनल होकर जो भावुकता दिखाते हैं उसे प्रेम कहते हैं। तब परम पूज्य दादा भगवान हमें, सच्चा प्रेम कैसा होता है उसकी समझ देते हैं।
दादाश्री: इस संसार को सुधारने का रास्ता प्रेम ही है। संसार जिसे प्रेम कहता है वह प्रेम नहीं, वह तो आसक्ति है। इस बच्ची से प्रेम करते हो, लेकिन वह ग्लास फोड़े तब प्रेम रहता है? तब तो तू चिढ़ता है। यानी वह आसक्ति है। बच्चे प्रेम खोजते हैं, लेकिन प्रेम मिलता नहीं। इसलिए फिर उनकी मुश्किलें वे ही जानें, न कह सकते हैं, न सह सकते हैं। आज के जवानों के लिए हमारे पास रास्ता है। इस जहाज का मस्तूल किस तरह सँभालना, इसका मार्गदर्शन मुझे भीतर से मिलता है। मेरे पास ऐसा प्रेम उत्पन्न हुआ है कि जो बढ़े नहीं और घटे भी नहीं। बढ़े-घटे, वह आसक्ति कहलाती है। जो बढ़े-घटे नहीं वह परमात्मप्रेम है। सभी प्रेम के वश रहा करते हैं। जिसे सच्चा प्रेम कहते हैं न, वह तो देखने को भी नहीं मिलता। प्रेम जगत् ने देखा ही नहीं। किसी समय ज्ञानीपुरुष अथवा भगवान हों तब प्रेम देख पाते हैं। प्रेम कम-ज़्यादा नहीं होता, आसक्ति होती है। वही प्रेम है, ज्ञानियों का प्रेम ही परमात्मा है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “बच्चों को कभी मारना मत। कोई भूलचूक हो तो समझाना ज़रूर, धीरे से माथे पर हाथ फेरकर उन्हें समझाना ज़रूर। प्रेम दोगे तो बच्चा समझदार होता है।”
हमारी इच्छा ना होने के बावजूद भी बच्चों के ऊपर क्रोध हो जाए तो उसी क्षण प्रतिक्रमण करके वापस लौट आना चाहिए। बच्चे के अंदर बैठे हुए आत्मा को याद करके दिल से उनकी माफ़ी माँगनी चाहिए कि, "मैंने बहुत क्रोध करके दुःख दे दिया, उसका पछतावा करता हूँ। ह्रदय से माफ़ी माँगता हूँ। मुझे माफ़ करो, और दोबारा ऐसी गलती नहीं करूँ, ऐसी शक्ति दो।" ऐसे माफ़ी माँगने से तुरंत बच्चों पर इसका प्रभाव पड़ता है।
दूसरा उपाय है, हम बच्चों के लिए भाव करतें रहें कि उनको सद्बुद्धि आए। बच्चे रातों रात सुधरें या न भी सुधरें, लेकिन माता-पिता को यह भावना करते रहनी चाहिए। बहुत लंबे समय से की जाने वाली भावना का बच्चों पर असर पड़े बगैर नहीं रहता। हम पकड़ पकड़ेंगे तो वो ज़्यादा उल्टा चलेंगे।
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