युवाओं के टीनेज में आने से उनमें होने वाले शारीरिक बदलाव, सोशल मीडिया का ज्यादा प्रभाव, स्कूल या कॉलेज के फ्रेंड सर्कल में होने वाले दिखावे, इन सभी के परिणामस्वरूप वे आकर्षण में फंस जाते हैं। उनके अंदर किसी व्यक्ति के लिए फीलिंग्स शुरू हो जाती है, उसकी मौजूदगी में खिंचाव महसूस होता है और अंदर से वह अच्छा लगने लगता है, दिन-रात उस व्यक्ति के ही विचार आते रहते हैं, कल्पनाएँ और चिंतवन शुरू हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि, उन्हें प्रेम हो गया! कभी तो ऐसा लगता है, जैसे सातवें आसमान में हैं, तो कभी ऐसा लगता है कि, यदि धरती जगह दे तो अभी धरती में समा जाऊँ। हालात देखें तो उतार-चढाव, उतार-चढाव होते ही रहते हैं। क्या वास्तव में यह प्रेम है?
यह सिर्फ़ नाम का प्रेम महज आकर्षण तक सीमित नहीं रहता। जब आकर्षण का प्रवाह दोनों ओर बह रहा हो, तब एक-दूसरे के साथ मीठी-मीठी लंबी बातें होती हैं, परिचय बढ़ता है और अकेले में मिलने की शुरुआत होती है। आगे चलकर, वे मर्यादाएँ लाँघते हैं और फिर फिसलते हैं। आजकल के युवाओं को यह सब मज़ा करने में कुछ भी गलत नहीं लगता। लेकिन जब इस मज़ा की सज़ा आती है, तब सहन नहीं होता। फिर, प्रेम के नाम पर धोखाधड़ी, ठगना और विश्वासघात शुरू हो जाता है। संबंध टूटने के बाद निराशा और डिप्रेशन आ जाता है। जीवन जीने जैसा नहीं लगता। कल्पनाओं से सुख पाने के लिए जो हवाई महल बनाए थे, उनके असलियत में टूटने से उतना ही दुःख होता है।
इस तरह से फंसकर कई युवा लड़के-लड़कियाँ धोखा खाते हैं। कोई चरित्र से लूटा जाता है, तो कोई पैसों से! आज जिसके साथ घूम रहे हैं, कल पता चलता है कि वह किसी और के साथ घूम रहा है, तब वे बहुत दुःखी हो जाते हैं। तो सच में प्रेम कहाँ है? अगर प्रेम है, तो प्रेमी से दुःख क्यों मिलता है? झगड़े क्यों होते हैं? क्यों दोनों अलग हो जाते हैं? ऐसे दिखावटी संबंधों को कैसे परखा जा सकता है? खासकर टीनएज में क्या ध्यान रखना चाहिए?
यदि युवा तथाकथित प्रेम के इस लुभावने स्वरूप के पीछे की वास्तविकता क्या है, सच्चा प्यार कैसा होता है और जीवन में कहाँ तक, कितनी सीमा रखनी चाहिए, यह समझ लें, तो वे गलत दिशा में आगे बढ़ने से रुक सकते हैं।
भारतीय आर्यसंस्कृति के अनुसार, जीवन के पहले पच्चीस वर्ष ब्रह्मचर्याश्रम कहलाते हैं, जिसमें पहले के समय में युवा शुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरु से शिक्षा प्राप्त करते थे। लेकिन आजकल, पश्चिमी संस्कृति के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण टीनेज के बच्चों का स्कूल के दौरान ही गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड बनाने का ट्रेंड शुरू हो गया है। इसके बाद वे तथाकथित प्रेम में पड़ जाते हैं।
बदलते समय में, लड़के-लड़कियाँ स्कूल या कॉलेज में एक-दूसरे के साथ बात ही न करें, ऐसा प्रतिबंध लगाना मुश्किल हो गया है। इसलिए जब तक उनके बीच सिर्फ सच्ची फ्रेंडशिप हो, तब तक उसे चला लेते हैं। लेकिन देखा-देखी में, सभी विद्यार्थियों में गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड रखने का दबाव पैदा होना और ऐसा करके खुद को गौरवान्वित महसूस करना, वह अनुचित है।
नाज़ुक उम्र में बच्चों की समझ परिपक्व नहीं होती है। साथ में घूमना-फिरना, मूवी देखने जाना, मौज़-मस्ती करने को वे गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड रखने जैसा समझते हैं। ना तो शादी की उम्र होती है और ना ही शादी की कोई बात या विचार! गलत तो तब होता है, जब घरवालों को बताए बगैर, चोरी-छिपे मिलना शुरू हो जाता है। माँ-बाप को पता चले और वे रोकें, तो बच्चे उल्टा विरोध करते हैं और धमकियाँ देते हैं। माँ-बाप उन्हें संकुचित और पुराने ख्यालों (ओल्ड फैशन ) वाले लगते हैं। वे समझ नहीं पाते कि, माँ-बाप ही उनका सबसे अधिक हित चाहते हैं। इस काल में होने वाली भयानक घटनाओं के कारण ही वे बच्चों की सलामती के लिए कुछ रोक-टोक करते हैं। लेकिन लड़के-लड़कियाँ इसे प्रतिबंध समझकर विरोध करते हैं।
टीनएजर्स ही नहीं, बल्कि युवाओं में भी शादी से पहले ऐसे संबंध बनाने का ट्रेंड है। शुरुआत में तो उन्हें मज़ा आता है। लेकिन फिर दो-पाँच साल बाद देखें तो वही लोग बहुत दुःखी होते हैं। जिस व्यक्ति को अपना माना हो, जिस पर बहुत विश्वास किया हो और जिस पर सबसे ज्यादा भरोसा किया हो, वहीं से धोखा होता है। इन सबका असर उनके पढ़ाई या करियर पर तो पड़ता ही है, परंतु चित्त वृत्तियों के बिखर जाने से पूरी मानसिकता कमज़ोर हो जाती है। तब उन्हें समझ में आता है कि, माता-पिता की बात मान ली होती, तो अच्छा होता!
शादी से पहले जब लड़के-लड़कियाँ साथ में घूमें, तो कई बार उसे "लफड़ा" या "अफेयर" भी कहा जाता है। एक प्रश्नोतरी सत्संग में परम पूज्य दादाश्री एक प्रसंग का सुंदर वर्णन करते हुए "लफड़ा" शब्द का यथार्थ अर्थ समझाते हैं।
दादाश्री: आप छोटे थे, तब ऐसी बला लिपटी थी किसी तरह की? तब पुरावे (प्रूफ) इकट्ठे होते हैं, सब एविडेन्स इकट्ठे होते हैं, तब फिर बला लिपट जाती है।
प्रश्नकर्ता: बला क्या है?
दादाश्री: हाँ, वह मैं बताऊँ। एक नागर ब्राह्मण था, वह ऑफिसर था। वह उसके बेटे को कहता है, ‘यह तू घूम रहा था, मैंने तुझे देखा था, तू साथ में बला किसलिए लेकर घूमता है?’ लड़का कॉलेज में पढ़ता था, किसी गर्लफ्रेंड के साथ उसके बाप ने देखा होगा। उसे बला ये लोग नहीं कहते, पर ये पुराने ज़माने के लोग उसे बला कहते हैं। क्योंकि फादर के मन में ऐसा हुआ कि ‘यह मूर्ख आदमी समझता नहीं, प्रेम क्या है वह। प्रेम को समझता नहीं और मार खा जाएगा। यह बला लिपटी है, इसलिए मार खा-खाकर मर जाएगा।’ प्रेम को निभाना वह आसान नहीं है। प्रेम करना सभी को आता है, पर उसे निभाना आसान नहीं है। इसलिए उसके फादर ने कहा कि, ‘यह बला किसलिए खड़ी की?’
तब वह लड़का कहता है, ‘बापूजी, क्या कहते हो यह आप? वह तो मेरी गर्लफ्रेंड है। आप इसे बला कहते हो यों? मेरी नाक कट जाए ऐसा बोलते हो? ऐसा नहीं बोलते।’ तब बाप कहता है, ‘नहीं बोलूँगा अब।’ उस गर्लफ्रेंड के साथ दो वर्ष दोस्ती चली। फिर वह दूसरे किसी के साथ सिनेमा देखने आई थी और वह उसने देख लिया। इसलिए उसके मन में ऐसा लगा कि यह तो पापाजी कह रहे थे कि ‘यह बला लिपटाई है’, यानी वैसी यह बला ही है।
इसलिए पुरावे (घटक, परिस्थितियाँ) मिल जाएँ न तो बला लिपट जाती है, फिर छूटता नहीं और दूसरों को लेकर फिरें, तब फिर रात-दिन लड़के को नींद ही नहीं आती। होता है या नहीं होता ऐसा? उस लड़के ने जब जाना कि ‘यह तो बला ही है। मेरे पापा कहते थे वह सच्ची बात है।’ तब से वह बला छूटने लगी। मतलब, जब तक गर्लफ्रेंड कहे और उसे बला समझे नहीं, तब तक किस तरह छूटे?!
प्रश्नकर्ता: तो फिर यह मोह और प्रेम, उसका निर्णय करना हो तो किस तरह किया जा सकता है?
दादाश्री: प्रेम है ही नहीं, तो फिर प्रेम की बात किसलिए करते हो? प्रेम है ही नहीं। सब मोह ही है यह तो। मोह! मूर्छित हो जाता है। बेभानपन, बिलकुल भान ही नहीं!
जब माँ-बाप या शुभचिंतक चेतावनी देते हैं, तब हम उनकी बात मानने के लिए तैयार नहीं होते। लेकिन बाद में जब हकीकत सामने आती है, तब समझ आता है कि, यह प्रेम नहीं, बला है! पिछले जन्म के राग-द्वेष के कारण आज के संयोग मिलते हैं, आकर्षण होता है, और फिर बला चिपक जाती है! फिर जब बड़ा पुण्य जागता है, तब उस लड़के को जैसा अनुभव हुआ, वैसा अनुभव होता है, सही समझ देने वाले संयोग मिल जाते हैं। जब बला को बला समझने की समझ आती है, तभी से उससे छूटने की शुरुआत होती है।
पश्चिमी देशों में जब डेटिंग की शुरुआत हुई, तब उसका आशय था शादी से पहले एक-दूसरे के साथ सार्वजनिक स्थानों पर मिलना और शादी के लिए एक-दूसरे की योग्यता को परखना। आजकल डेटिंग के कई माध्यम आ गए हैं। अब आमने-सामने मिलने से पहले फोन, चैट, वीडियो कॉल, इंटरनेट और फोन एप्लीकेशन के द्वारा भी डेटिंग शुरू हो गई है। टेक्नोलॉजी के कारण पूरी दुनिया में टीनएजर्स और युवाओं के बीच डेटिंग का कल्चर दीमक की तरह तेजी से फैल चुका है। युवा भविष्य में शादी करने का उद्देश्य भूल चुके हैं और आज ही, इसी पल मज़ा कर लेने का दृष्टिकोण व्याप्त हो चुका है।
चार-छह महीने एक व्यक्ति के साथ डेटिंग करना, घूमना-फिरना और मिलना, या एक रात के लिए मौज़-मस्ती करना, मर्यादा लांघना, फिर ब्रेक-अप होना, यह सब नॉर्मल हो गया है। थोड़ा समय बीता नहीं, कि दूसरे डेटिंग पार्टनर की तलाश में निकल पड़ते हैं। कई लोग तो एक के साथ डेट करते हैं और दूसरे एक-दो लोगों को बैकअप में रखते हैं। एक के साथ ब्रेकअप हो जाता है, तो वे दूसरे के साथ शुरू कर देते हैं। इन सब में लड़के-लड़कियों का मन ख़राब हो जाता है और उनका शील भी टूट जाता है। अगर हम आज किसी एक व्यक्ति के साथ डेटिंग करें और वह छह महीने या एक साल के बाद छोड़कर चला जाए, तो फिर इसका क्या मतलब है? इस चक्कर में अपनी और सामने वाले की भावनाओं को ठेस पहुँचती है। समय और शक्ति दोनों उल्टी दिशा में खर्च हो जाते हैं।
खासकर टीनएज में डेटिंग खतरनाक साबित हो सकती है। नादान उम्र में संबंधों या भावनाओं की जटिलता समझ में नहीं आती। जब एक से अधिक अफेयर और ब्रेक-अप हो जाते हैं, तब खुद को कैसे संभालना है, इस समझ की कमी होती है। परिणामस्वरूप, वे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। अक्सर इंटरनेट के माध्यम से होने वाले परिचय में, झूठी प्रोफाइल के साथ डेटिंग करने वाले व्यक्ति के चंगुल में फंसने के मामले भी सामने आते हैं।
सेफ साइड इसी में है कि पढ़ने की उम्र में डेटिंग से दूर ही रहें। अठारह-उन्नीस साल के लड़के-लड़कियों की उम्र कोई डेटिंग पार्टनर ढूंढने की नहीं होती, बल्कि अपने करियर पर ध्यान देने के लिए होती है। जब डेटिंग शुरू होती है, तब उन्हें पढ़ाई की किताबों में उस व्यक्ति की फोटो ही नज़र आती है। परिणामस्वरूप परीक्षाओं के रिज़ल्ट भी ख़राब आने लगते हैं।
आजकल के युवाओं की ऐसी दलील होती है कि, इन सब से उनके करियर पर असर नहीं पड़ता, इसके बावजूद भी अंदर गहराई में चित्त फैक्चर होता ही है, चंचलता बढ़ जाती है, स्थिरता और मनोबल टूट जाता है। मानसिक शक्तियों के क्षीण होने पर निर्बलता आती है और सहनशक्ति कम हो जाती है। वे मोह के साधनों, जैसे टीवी, मूवी, सोशल मीडिया और इंटरनेट में डूबे रहते हैं। मनुष्यों के साथ व्यवहार करना उन्हें अच्छा नहीं लगता। छोटी-छोटी बातों में डिप्रेस होकर गलत कदम उठाने में हिचकते नहीं हैं। कई तो डिप्रेशन, एडिक्शन या व्यसनों के भी शिकार हो जाते हैं। यदि इन जोखिमों पर दृष्टि जाए तो डेटिंग से दूर रह सकते हैं।
शादी की उम्र हो और किसी व्यक्ति के साथ परिचय बढ़ाना हो, तो वहाँ एक मित्र जैसा व्यवहार रखना चाहिए। सार्वजनिक स्थानों में मिलना चाहिए, एक-दूसरे के शौक, नज़रिया, स्वभाव आदि जानना चाहिए। अगर किसी एक को गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड के रूप में पसंद कर लिया हो, तो फिर उसी के साथ शादी करनी चाहिए और पूरी जिंदगी उसी के साथ सिन्सियर (वफ़ादार) रहना चाहिए। उसमें अगर सामने वाला शादी करने के लिए तैयार ना हो, तब वहाँ सावधान हो जाना चाहिए। लेकिन उसमें मर्यादा पार नहीं करनी चाहिए।
शादी से पहले शारीरिक संबंध बनना वह पाशवता है। इससे अधोगति के पाप कर्म बंधते हैं। नियम यह है कि, अगर एक व्यक्ति के साथ ऐसे दोष हुए हों, तो उसके साथ हिसाब बंध जाता है और अगले जन्म में वह जहाँ जाए वहाँ हमें भी जाना पड़ता है। जब गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड डेट करते हैं, एक-दूसरे का भोग करते हैं और फिर अलग होकर दूसरे के साथ घूमते हैं, तब उनमें से एक व्यक्ति द्वेष रख सकता है और वैर बाँध सकता है। क्योंकि, जितना ज़्यादा अटैचमेंट होता है, उतना ही द्वेष होता है। फिर वह जन्मों-जन्म तक छोड़ता नहीं है और वैर वसूलता है।
परम पूज्य दादा भगवान से भी युवाओं ने डेटिंग और फ्रेंडशिप के बारे में प्रश्न पूछे हैं। उनके जवाबों में युवाओं को सही दिशा मिलती है।
प्रश्नकर्ता: क्या डेटींग करना पाप है? डेटींग यानी ये लोग लड़के लड़कियों के साथ बाहर जाएँ और लड़कियाँ लड़कों के साथ बाहर जाएँ, तो क्या वह पाप है? उसमें कुछ हर्ज है?
दादाश्री: हाँ, लड़कों के साथ घूमने की इच्छा हो तो शादी कर लेना। फिर एक ही लड़का पसंद करना, एक निश्चित होना चाहिए। अन्यथा ऐसा गुनाह नहीं करना चाहिए। जब तक शादी न हो जाए, तब तक आपको लड़कों के साथ नहीं घूमना चाहिए।
प्रश्नकर्ता: यहाँ अमरीका में तो ऐसा है कि, लड़के-लड़कियाँ चौदह साल की उम्र से ही बाहर घूमने जाते हैं। फिर मन मिलें तो उसमें आगे बढ़ते हैं। उसमें से कुछ बिगड़ जाए, एक-दूसरे से मन न मिले तो फिर किसी और के साथ घूमते हैं। उसके साथ नहीं जमा तो फिर तीसरा, ऐसे चक्कर चलता रहता है और एक साथ दो-दो, चार-चार के साथ भी घूमते हैं।
दादाश्री: देट इज़ वाईल्डनेस, वाईल्ड लाइफ! (यह तो जंगलीपन है, जंगली जीवन!)
प्रश्नकर्ता: तब उन लोगों को क्या करना चाहिए?
दादाश्री: लड़की को एक लड़के के प्रति सिन्सियर (वफादार) रहना चाहिए और लड़का लड़की को सिन्सियर रहे, ऐसी लाइफ (जिंदगी) होनी चाहिए। इनसिन्सियर लाइफ, वह रोंग लाइफ है।
प्रश्नकर्ता: अब इसमें सिन्सियर कैसे रहें? एक-दूसरे के साथ घूमते हों, उसमें फिर लड़का या लड़की इनसिन्सियर हो जाते हैं।
दादाश्री: तब घूमना बंद कर देना चाहिए न! शादी कर लेनी चाहिए। आफ्टर ऑल वी आर इन्डियन, नोट वाइल्ड लाइफ। (आखिर हम भारतीय है, जंगली नहीं।)
अपने यहाँ शादी के बाद दोनों सारा जीवन सिन्सियरली (वफादारी से) साथ में रहते हैं। जिसे सिन्सियरली रहना हो, उसे पहले से ही दूसरे आदमी से फ्रेन्डशिप नहीं करनी चाहिए। इस मामले में बहुत सख्त रहना चाहिए। उसे किसी लड़के के साथ घूमना नहीं चाहिए और घूमना हो तो एक ही लड़का पक्का करके माता-पिता से कह देना कि शादी करूँगी तो इसके साथ ही करूँगी, मुझे किसी दूसरे से शादी नहीं करनी। इनसिन्सियर लाइफ इज़ वाइल्ड लाइफ। (बेवफा जीवन ही जंगली जीवन है।)
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, फ्रेंडशिप मोरल बाउंड होनी चाहिए। मोरल यानी हमें जो मिला, उसके प्रति हम सिन्सियर रहें और वह हमारे प्रति सिन्सियर रहे। आजकल तो चार महीने लड़के-लड़कियाँ साथ में रहते हैं और फिर कहते हैं कि, "हमारा ब्रेक-अप हो गया है। क्योंकि, मैं किसी और को लाइक करता हूँ।" जब साथ में थे, तब एक-दूसरे को आमने-सामने भरोसा दिलाया होता है कि, "तू मेरी, मैं तेरा, हम शादी करेंगे।" फिर जब, ब्रेक-अप होता है, तब सामने वाले को एक बड़ा आघात लगता है। मज़ा करके फेंक देते हैं और फिर दूसरे के साथ मज़ा करते हैं। सामने वाले की जिंदगी के साथ खेल खेलते हैं। लेकिन उसे पता नहीं है कि, अगले जन्म में इसके क्या परिणाम आएँगे। इसलिए, फ्रेंडशिप मोरल बाउंड होनी चाहिए और यदि पूरी जिंदगी रिश्ता निभाना हो, तो ही अटैच होना चाहिए।
आजकल कुछ लड़के-लड़कियाँ एक-दूसरे के रूप या स्टाइल से आकर्षित हो जाते हैं, तो कुछ पैसों से। परम पूज्य दादा भगवान युवाओं को सही समझ देते हुए कहते हैं, रूप देखकर प्रेम मत करना, बल्कि मिज़ाज देखकर प्रेम करना। मिज़ाज यानी व्यक्ति का स्वभाव। यदि हार्टिली मिज़ाज हो और प्रेम करें तो चलता है, लेकिन यदि स्वार्थ बुद्धि हो, तो वहाँ सावधान रहना।
परम पूज्य दादा भगवान ऐसे प्रेम को परखने की चाबी देते हैं।
प्रश्नकर्ता: ये लड़के-लड़कियाँ प्रेम करते हैं अभी के जमाने में, वे मोह से करते हैं इसलिए फेल होते हैं?
दादाश्री: सिर्फ़ मोह! ऊपर चेहरा सुंदर दिखता है, इसलिए प्रेम दिखता है, पर वह प्रेम कहलाता नहीं न! अभी यहाँ पर एक फुँसी हो जाए न, तो पास में जाए नहीं फिर। यह तो आम अंदर से चखकर देखें न, तब पता चले। मुँह बिगड़ जाए तो बिगड़ जाए, पर महीने तक खाने का अच्छा नहीं लगता। यहाँ बारह महीनों तक इतनी बड़ी फुँसी हो जाए न, तो मुँह न देखे, मोह छूट जाए और जब सच्चा प्रेम हो तो एक फुँसी, अरे दो फुँसियाँ हों, तब भी न छूटे। तो ऐसा प्रेम ढूंढ निकालना। नहीं तो शादी ही मत करना। नहीं तो फँस जाओगे। फिर वह मुँह चढ़ाएगी तब कहेंगे, ‘इसका मुँह देखना मुझे पसंद नहीं है।’ ‘अरे, अच्छा देखा था उससे तुझे पसंद आया था न, अब ऐसा नहीं पसंद?’ यह तो मीठा बोलते हैं न, इसलिए पसंद आता है। और कड़वा बोले तो कहेंगे, ‘मुझे तेरे साथ पसंद ही नहीं लगता।’
शादी से पहले लड़के-लड़कियाँ प्यार में पड़ते हैं, आकर्षण में खिंच जाते हैं। आजकल तो बहुत से शादी से पहले साथ में एक घर में (लिव-इन रिलेशन में) रहते हैं। लेकिन करीब से देखें, तो बात-बात में दोनों में मतभेद, आर्ग्युमेंट या झगड़े होते ही रहते हैं। प्रेम तो होता ही नहीं है। मनमानी नहीं हुई तो झगड़ते हैं। मोह पूरा ना हो तो झगड़ते हैं। अपेक्षाएँ पूरी ना हो तो भी झगड़ते हैं। अंत में, दोनों दुःखी ही रहते हैं।
खासकर लड़कियों का घर में मम्मी-पापा के साथ कलेश होता है, इसलिए हूँफ (अपनापन) पाने के लिए बाहर बॉयफ्रेंड ढूँढती हैं और ऐसे प्रेम में फंसकर बहुत धोखा खाती हैं। वास्तव में, उन्हें हूँफ नहीं मिलती। घर में माँ-बाप जो अठारह-बीस साल प्रेम और हूँफ देते हैं, उसकी कद्र नहीं रहती। अगर बाहर कोई दो अच्छे शब्द बोले, मान दे, तो उसके लिए जिंदगी लुटा देती हैं। जब लड़के से शादी के लिए पूछती हैं, तो वह उसकी बात टाल देता है। कई बार तो लड़का शादी का प्रॉमिस करके भोग भी लेता हैं और अपना स्वार्थ पूरा करके छोड़ देता हैं।
चाहे जैसा भी प्रेम महसूस हो, लेकिन शादी से पहले चारित्र नहीं बिगड़ने देना चाहिए। क्योंकि, जहाँ सच्चा प्रेम होता है, वहाँ विषय नहीं होता और किसी भी प्रकार की लालच नहीं होती है।
फिल्मों में दिखाया जाता है कि, रोमियो-जूलियट और लैला-मजनू प्रेम में एक-दूसरे के लिए कुर्बान हो गए। इसे उत्कृष्ट प्रेम का उदाहरण कहते हैं और युवा उनका अनुसरण करते हैं। बहुत से युवा प्रेम में पड़ते हैं, फिर घर से विरोध आने पर "जन्म-जन्म के साथी हैं" ऐसा मानकर एक साथ जीवन समाप्त कर लेते हैं। इसकी जड़ में एक-दूसरे के प्रति ज़रूरत से ज़्यादा अटैचमेंट होता है, जिसके रिएक्शन में बहुत नुकसान होता है। दोनों एक-दूसरे का सहारा पाने की कोशिश करते हैं। और जब उसके ऊपर चोट पड़ती है, तब "इसके बगैर मैं कैसे रह पाऊँगा?" इस असुरक्षा के डर से जीवन समाप्त कर देते हैं।
परम पूज्य दादा भगवान इसे प्रेम नहीं, बल्कि इमोशनलपना कहते हैं।
प्रश्नकर्ता: दो लोग प्रेमी हों और घरवालों का साथ नहीं मिले, तो आत्महत्या कर लेते हैं। ऐसा बहुत बार होता है तो वह प्रेम है, उसे क्या प्रेम माना जाएगा?
दादाश्री: आवारा प्रेम! उसे प्रेम ही कैसे कहा जाए? इमोशनल होते हैं और पटरी पर सो जाते हैं! और कहेंगे, ‘अगले भव में दोनों साथ में ही होंगे।’ तो वह ऐसी आशा किसी को करनी नहीं चाहिए। वे उनके कर्म के हिसाब से फिरते हैं। वे वापिस इकट्ठे ही नहीं होंगे!!
प्रश्नकर्ता: इकट्ठे होने की इच्छा हो तब भी इकट्ठे होते ही नहीं?
दादाश्री: इच्छा रखने से कहीं दिन फिरते हैं? अगला भव तो कर्मों का फल है न! यह तो इमोशनलपन है।
जीवन का उद्देश्य क्या है, यह समझे बिना ही अंधेपन में युवा इस तरह जीवन बर्बाद कर देते हैं। फिर यह कल्पना ही होती है, कि साथ में मरेंगे और अगले जन्म में साथ में होंगे। लेकिन कल्पना और वास्तविकता में बहुत फर्क होता है। मनुष्य का आने वाला जीवन उसके कर्मों के अनुसार तय होता है। इसलिए, फिर साथ में जन्म होने की कोई गारंटी नहीं होती।
आज के युवाओं को अगर सही समझ मिले, तो उन्हें जैसे मोड़ा जाए वैसे मुड़ सकते हैं। इसलिए, परम पूज्य दादा भगवान की ऐसी यथार्थ बातें पूरी दुनिया में फैल जाएँ तो कई टीनएजर्स और युवाओं का जीवन बर्बाद होने से बच सकता है।
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