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बच्चों के साथ प्रेम से किस तरह व्यवहार करें?

व्यवहार में बच्चें केवल प्रेम से ही वश में हो सकते हैं, वहाँ दूसरे सभी हथियार अंत में नाकाम साबित होते हैं। माता-पिता को ऐसा ही लगता है कि, हम अपने बच्चों को सिर्फ़ प्रेम ही देते हैं। लेकिन प्रेम शब्द का अर्थ बहुत गूढ़ है। कई माता-पिता बच्चों का मोह से पालन-पोषण करते हैं या तो फर्ज़ समझकर मज़बूरी में पालन-पोषण करते हैं। माता-पिता को अपेक्षा रहती है कि, मेरा बच्चा मेरे कहे अनुसार करे और अगर ऐसा न हो तो चिढ़ जाते हैं। यह प्रेम नहीं बल्कि आसक्ति है।

यदि बेटा बारहवीं में नब्बे प्रतिशत मार्क्स लाया हो, तो उसके माता-पिता खुश होकर पार्टी देते हैं और बेटे की होशियारी की तारीफ करते नहीं थकते! उसके लिए नई बाइक गिफ्ट में ले आते हैं। वही बेटा यदि चार दिन बाद बाइक ठोककर ले आए और बाइक का बुरा हाल हो जाए, तो वही माता-पिता उसे क्या कहेंगे? “अक्ल नहीं है, मूर्ख है, अब तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा!” चार दिन में तो “मेरा बेटा होशियार” ये सर्टिफिकेट वापस ले लिया! पूरा प्रेम उतर गया! क्या इसे प्रेम कहेंगे?

बच्चों के साथ प्रेम रखना है। प्रेम अर्थात् क्या? बच्चा अच्छा करके आए, तो माता-पिता को मन में उछाल न आए और खराब करके आए, तो उस पर टूट न पड़ें। लेकिन ऐसा प्रेम भाग्य से ही देखने को मिलता है।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "प्रेम समझदारीपूर्वक होना चाहिए।" वे माता-पिता को उनका अपने बच्चों के प्रति प्रेम समझदारीपूर्वक है या नहीं, यह परखने की दृष्टि देते हैं।

प्रश्नकर्ता: अभी तो, बच्चों को प्यार करते हैं, उसे ही प्रेम मानते हैं न!

दादाश्री: ऐसा? प्रेम तो ये चिड़िया को उसके बच्चों पर होता है। वह चिड़िया चैन से दाने लाकर और घोंसले में आती है, इसलिए वे बच्चेंमाँ आई, माँ आईकरके रख देते है। तब चिड़िया उन बच्चों के मुँह में दाने रख देती है।वह दानें कितने रखे रखती होगी अंदर मुँह में? और किस तरह एक-एक दाना निकालती होगी?’ ऐसे मैं विचार में पड़ गया था। वह चारों ही बच्चों को एक-एक दाना मुँह में रख देती है।

प्रश्नकर्ता: पर उनमें आसक्ति कहाँ से आती है? उनमें बुद्धि नहीं है न!

दादाश्री: हाँ, वही मैं कहता हूँ न? इसलिए यह तो एक देखने के लिए कहता हूँ। असल में तो वह प्रेम माना ही नहीं जाता। प्रेम समझदारीपूर्वक का होना चाहिए। पर वह भी प्रेम माना नहीं जाता, पर फिर भी अपने यहाँ दोनों का भेद समझाने के लिए उदाहरण देते हैं। अपने लोग नहीं कहते कि भाई, इस गाय को बछड़े पर कितना भाव है? आपको समझ आया न? उसके अंदर वह बदले की आशा नहीं होती न!

यहाँ हमें, बच्चों के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार कैसा होता है? उसे कैसे विकसित करें? माता-पिता के रूप में हम कहाँ खड़े हैं? इन सभी की समझ मिलती है।

माली की तरह प्रेम से पालन-पोषण करें पौधे का

बगीचे में तरह-तरह के कितने फूल होते हैं, परन्तु माली हर फूल के पौधे को प्रेम से पाल-पोसकर बड़ा   करता है। पौधे को खाद-पानी देता है, पौधे से सड़े हुए पत्ते निकाल देता है, पौधे के चारों ओर बाड़ लगाकर उसे संरक्षण देता है और यदि कहीं से कोई टेढ़ी डाली निकलने लगे, तो उसे सहारा देता है, ताकि पौधा बढ़ सके। लेकिन माली ऐसी अपेक्षा नहीं रखता कि, मोगरे के पौधे से गुलाब ही उगना चाहिए, या गुलाब के पौधे से मोगरा ही निकलना चाहिए।

उसी प्रकार से, हमें बच्चों को भी उनकी प्रकृति के अनुसार खिलने देना चाहिए। उनकी प्रकृति के अनुसार पोषण देना चाहिए। लेकिन माता-पिता की गलती वहाँ होती है, जब वे अपनी प्रकृति के अनुसार बच्चों को गढ़ने जाते हैं। यदि माता-पिता के दो बेटे हों, जिसमें एक समझदार होता है और दूसरा शरारती होता है, तो माता-पिता मेहमानों के सामने कहते हैं कि, “छोटा बेटा बहुत जिद्दी है, सुनता ही नहीं है।” इसलिए छोटा बेटा भी यह सुनता है और मन में गाँठ बांधता है कि “जाओ, अब कभी सुनूंगा ही नहीं!” और ज़्यादा ज़िद करता है।

बच्चों की प्रकृति में अच्छे और बुरे दोनों गुण रहेंगे। बच्चों का प्रेम से पालन-पोषण करना मतलब उनके अच्छे गुणों को एप्रिशिएट करना और उन्हें एन्क्रेज करना। जब बच्चा कुछ गलत करके आए, झूठ बोले, चोरी करे, मनमानी ना हो तो गुस्सा करे और जिद करे, तब माता-पिता को उनको सही समझ देनी चाहिए। लेकिन बच्चों को कुछ गलत करते हुए देखते ही पैरेंट्स रिएक्ट कर देते हैं। इसके जवाब में परम पूज्य दादा भगवान सुंदर समझ देते हैं।

प्रश्नकर्ता: व्यवहार में कोई गलत कर रहा हो तो उसे टोकना पड़ता है, तो उससे उसे दुःख होता है। तो वह किस तरह उसका निकाल करें?

दादाश्री: टोकने में हर्ज नहीं है, पर हमें आना चाहिए न! कहना आना चाहिए न, क्या?

प्रश्नकर्ता: किस तरह?

दादाश्री: बच्चे से कहें, ‘तुझमें अक्कल नहीं, गधा है।ऐसा बोलें तो फिर क्या होगा वहाँ। उसे भी अहंकार होता है या नहीं? आपको ही आपका बॉस कहे कि,आपमें अक्कल नहीं, गधे हो।ऐसा कहे तो क्या हो? नहीं कहते ऐसा। टोकना आना चाहिए।

प्रश्नकर्ता: किस तरह टोकना चाहिए?

दादाश्री: उसे बैठाओ। फिर कहो, हम हिन्दुस्तान के लोग, आर्य प्रजा अपनी, हम कोई अनाड़ी नहीं और अपने से ऐसा नहीं होना चााहिए। ऐसा-वैसा सब समझाएँ और प्रेम से कहें तब रास्ते पर आएगा। नहीं तो आप तो मार, लेफ्ट एन्ड राइट, लेफ्ट एन्ड राइट ले लो तो चलता होगा?

परिणाम प्रेम से किए बिना आता नहीं। एक पौधा भी पालना-पोसकर बड़ा करना हो तो भी प्रेम से करते हो, तो बहुत अच्छा उगता है। पर वैसे ही पानी डालो न, और चीखो-चिल्लाओ तो कुछ नहीं होता। एक पौधा बड़ा करना हो तो! आप कहते हो कि ओहोहो, बहुत अच्छा हुआ पौधा। तो उसे अच्छा लगता है! वह भी अच्छे फूल देता है बड़े-बड़े!! तो फिर ये मनुष्य को तो कितना अधिक असर होता होगा?

माता-पिता को बच्चों के साथ धैर्य से काम लेना चाहिए और उन्हें गलतियों से बाहर निकालना चाहिए। प्रेम वाला व्यवहार ऐसा होता है, जहाँ बच्चें की कमजोरियाँ माता-पिता के ध्यान में रहती ही हैं और वह किस तरह इसमें से बाहर निकले, इसके लिए उनके पॉज़िटिव प्रयत्न भी चलते रहते हैं।

नेगेटिव शब्दों के प्रभाव को समझिए

बच्चें छोटे होते हैं, तब से ही माता-पिता उन्हें "बहुत ज़िद्दी है”, "इतना परेशान करता है मुझे!", "मेरी बात मानता ही नहीं!", "तू पढ़ेगा नहीं तो कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा! मज़दूरी करेगा", "भाई पढ़ने में कितना अच्छा है, तू कुछ करता ही नहीं!" ऐसे अनेक नेगेटिव वाक्य बोलते ही रहते हैं। सालों तक लगातार नेगेटिव वाक्य सुन-सुनकर बच्चें की मानसिकता डीफोर्म हो जाती है। सालों तक माता-पिता बच्चों के ऊपर चिढ़ते रहते हैं, उनका दूसरों के साथ कम्पैरीज़न करते हैं, और टोकते रहते हैं, इससे बच्चों के दिल को दुःख पहुँचता है।

फिर बच्चे भी माता-पिता को सर्टिफिकेट देते हैं कि, "आप मुझसे प्यार नहीं करते हैं!" बच्चे बड़े होते हैं, तो घर से दूर भागते हैं, अधिकतर अपने दोस्तों के साथ बाहर रहते हैं और देर से वापस आते हैं। यदि घर में प्रेम हो तो माता-पिता के आते ही बच्चे बहुत खुश हो जाते हैं।

माता-पिता को अपेक्षा होती है कि मेरे बच्चें मेरे जैसे ही पढ़ने में होशियार हों। कई बार बच्चा पढ़ाई में कमज़ोर हो, तो उसके पास पढ़ाई के अलावा दूसरा कोई हुनर भी होता है। लेकिन माता-पिता उसके प्राकृतिक हुनर को पहचान नहीं पाते। माता-पिता को बच्चे की अच्छी बात कौन सी है, उसका निरीक्षण करना चाहिए।

यदि बच्चों के प्रति प्रेम हो, तो उनका एक भी दोष नहीं दिखता। यदि फर्ज़ के रूप में टोकना पड़े, तो भी समझाकर बात करें। लेकिन बच्चों को डाँटकर और नेगेटिव बोलकर दुःख न दें। बहुत से माता-पिता को प्रश्न होता है कि बच्चों को कई बार समझाने के बावजूद भी, वे लोग नहीं समझें तो क्या करें? परम पूज्य दादाश्री से भी ऐसा ही प्रश्न पूछा गया था। तब उन्होंने जो समझ दी थी, वह आज भी काम लगे ऐसी है।

प्रश्नकर्ता: संसार में रहने के बाद कितनी ही जिम्मेदारियाँ पूरी करनी पड़ती है और जिम्मेदारियाँ अदा करनी, वह एक धर्म है। उस धर्म का पालन करते हुए, कारण या अकारण कटुवचन बोलने पड़ते हैं, तो वह पाप या दोष माना जाता है? ये संसारी धर्मों का पालन करते समय कड़वे वचन बोलने पड़ते हैं, तो वह पाप या दोष है?

दादाश्री: ऐसा है न, कड़वा वचन बोलें, उस समय हमारा मुँह कैसा हो जाता है? गुलाब के फूल जैसा, नहीं? अपना मुँह बिगड़े तो समझना कि पाप लगा। अपना मुँह बिगड़े ऐसी वाणी निकली, वहीं समझना कि पाप लगा। कड़वे वचन नहीं बोलते। धीरे से, आहिस्ता से बोलो। थोड़े वाक्य बोलो, पर आहिस्ता रहकर, समझकर कहो, प्रेम रखो, एक दिन जीत सकोगे। कड़वे से जीत नहीं सकोगे। पर वह सामने विरोध करेगा और उल्टे परिणाम बांधेगा। वह बेटा उल्टा परिणाम बांधेगा।अभी तो छोटी उम्र का हूँ, इसलिए मुझे इतना झिड़कते हैं। बड़ी उम्र का हो जाऊँगा तब वापिस दूँगा।ऐसे परिणाम अंदर बांधता है। इसलिए ऐसा मत करो। उसे समझाओ। एक दिन प्रेम जीतेगा। दो दिन में ही उसका फल नहीं आएगा। दस दिन, पंद्रह दिन, महीने तक प्रेम रखा करो। देखो, उस प्रेम का क्या फल आता है, वह तो देखो! आपको पसंद आई यह बात? कड़वा वचन बोले तो अपना मुँह नहीं बिगड़ जाता?

प्रश्नकर्ता: हम अनेक बार समझाएँ, फिर भी वह न समझे तो क्या करें?

दादाश्री: समझाने की ज़रूरत ही नहीं है। प्रेम रखो। फिर भी हम उस समझाएँ धीरे से। अपने पड़ोसी को भी ऐसा कड़वा वचन बोलते हैं हम?

प्रश्नकर्ता: पर वैसा धीरज होना चाहिए न?

दादाश्री: अभी पहाड़ी पर से पत्थर गिरे और वह आपके सिर पर पड़े तो आप ऊपर देख लेते हो और फिर किस पर क्रोध करते हो? उस घड़ी शांत रहते हो न? कोई दिखता नहीं इसलिए हम समझते हैं कि यह किसी ने नहीं डाला। यानी अपने आप गिरा है।

इसलिए उसका हम गुनाह नहीं मानते। तब वह भी अपने आप ही गिरता है। वह तो डालने वाला तो व्यक्ति दिखता है, इतना ही। बाकी अपने आप ही गिरता है। आपके ही हिसाब चुक रहे हैं सब। इस दुनिया में सब हिसाब चुक रहे हैं। नये हिसाब बंध रहे हैं और पुराने हिसाब चुक रहे हैं। समझ में आया न? इसलिए सीधा बोलना बेटे के साथ, अच्छी भाषा बोलना।

बदले की आशा छोड़ो

जब बच्चें छोटे होते हैं, तब से माता-पिता उनके लिए बहुत मेहनत करते हैं, पैसे कमाते हैं, बचत करके अपने बच्चों को पढ़ाते-लिखाते हैं। फिर जब बच्चे बड़े होते हैं, तब माता-पिता को उनसे बदले की अपेक्षा उत्त्पन्न होने लगती है। जब अपेक्षा पूरी न हो, तब माता-पिता को उतना ही द्वेष और दुःख होता है। जहाँ थोड़ी सी भी बदले की अपेक्षा होती है, वहाँ प्रेम नहीं होता है। परम पूज्य दादा भगवान इसी विषय पर प्रकाश डालते हैं।

दादाश्री: यानी आसक्ति कहाँ होती है? कि जहाँ उसके पास से कुछ बदले की आशा होती है, वहाँ आसक्ति होती है और बदले की आशा बिना के कितने लोग होंगे हिन्दुस्तान में?

एक आम का पेड़ उगाते हैं न अपने लोग, तो क्या आम को उगाने के लिए ही उगाते हैं? ‘किसलिए भाई, आम के पेड़ के पीछे इतनी सब झंझट करते हो?’ तब वे कहते हैं, ‘पेड़ बड़ा होगा न, तो मेरे बच्चों के बच्चें खाएँगे और पहले तो मैं खाऊँगा।इसलिए फल की आशा से आम का पेड़ उगाता है। आपको क्या लगता है? कि निष्काम उगाता है? निष्काम कोई उगाता नहीं है?! इसलिए सभी खुद की चाकरी करने के लिए बच्चें बड़े करते होंगे न या भाखरी (रोटी) के लिए!

प्रश्नकर्ता: चाकरी करने के लिए।

दादाश्री: पर अभी तो भाखरी हो जाती है। मुझे एक आदमी कहता है, ‘मेरा बेटा चाकरी नहीं करता।तब मैंने कहा, ‘फिर भाखरी नहीं करे तो क्या करेगा? अब कोई लड्डू बनो ऐसे हो नहीं, इसलिए भाखरी करे तो हल(!) जाएगा।

माता-पिता की सेवा करना हर बच्चे का फर्ज है ही और करनी ही चाहिए। लेकिन माता-पिता जब ज़रूरत से ज़्यादा लुटाते हैं, तब उनके लक्ष्य में रहना चाहिए कि बच्चे इसका बदला चुकाएं या ना चुकाएं, तब भी प्रेम घटेगा नहीं। कहते हैं ना, “पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कुमाता नहीं होती!”

बच्चों को प्रेम से सुधारिए

यदि बच्चों को सुधारने के लिए माता-पिता चाहते हैं कि, वे लोग उनकी बात सुनें, तो माता-पिता को उनके कहने के तरीके को बदलने की ज़रूरत है। क्योंकि, बच्चे ज़रा सी भी आदेश वाली आवाज़ सुनते ही अपने दरवाजे बंद कर देते हैं, यानी उनके स्वीकार करने की शक्ति बंद हो जाती है। जैसे, चाय में एक चम्मच चीनी डालें, तो वह घुल जाती है। लेकिन अगर पच्चीस-पच्चीस चम्मच चीनी डालें तो? इसी तरह, माता-पिता बच्चों को बचपन से ही ज़रूरत से ज़्यादा कहने लगें, तो फिर बच्चे माता-पिता की बात को स्वीकार नहीं करते हैं। चार साल के छोटे बच्चे के साथ भी समझाकर बात करनी चाहिए।

परम पूज्य दादा भगवान बच्चों को सुधारने की मास्टर की देते हैं।

दादाश्री: सामनेवाले का अहंकार खड़ा ही नहीं होता। सत्तावाली आवाज़ हमारी नहीं होती। इसलिए सत्ता नहीं होनी चाहिए। बेटे को आप कहो न, तो सत्तावाली आवाज़ नहीं होनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता: हाँ, आपने कहा था कि कोई अपने लिए दरवाज़े बंद कर दे, उससे पहले ही हमें रुक जाना चाहिए।

दादाश्री: हाँ, सही बात है। वे दरवाज़े बंद कर दे, उससे पहले हमें रुक जाना चाहिए। तो उसे बंद कर देने पड़े, तब तक अपनी मूर्खता कहलाती है, क्या? ऐसा नहीं होना चाहिए, और सत्तावाली आवाज़ तो कभी भी मेरी निकली ही नहीं। इसलिए सत्तावाली आवाज़ नहीं होनी चाहिए। छोटा हो तब तक सत्तावाली आवाज़ दिखानी पड़ती है। चुप बैठ जा। तब भी मैं तो प्रेम ही दिखलाता हूँ। मैं तो प्रेम से ही बस करना चाहता हूँ।

प्रश्नकर्ता: प्रेम में जितना पावर है, उतना सत्ता में नहीं न?!

दादाश्री: ना। पर आपको प्रेम उत्पन्न होता नहीं न? जब तक वह कचरा निकल न जाए! कचरा सब निकालती है या नहीं निकालती? कैसे अच्छे हार्टवाले! जो हार्टिली होते हैं न उनके साथ दख़ल नहीं करना। तुझे उसके साथ अच्छी तरह रहना चाहिए। बुद्धिवाले के साथ दख़ल करना, करना हो तो। पौधा बोया हो तो, आपको उसे डाँटते नहीं रहना चाहिए कि देख तू टेढ़ा मत होना, फूल बड़े लाना। हमें उसे खाद और पानी देते रहना है। यदि गुलाब का पौधा इतना सब काम करता है, ये बच्चें तो मनुष्य हैं और माता-पिता पीटते भी हैं, मारते भी है।

दुनिया हमेशा प्रेम से ही सुधरती है। इसके अलावा दूसरा कोई उपाय ही नहीं है इसके लिए। यदि धाक से सुधार होता हो न, तो यह गवर्नमेन्ट डेमोक्रेसी... सरकार लोकतंत्र उड़ा दे और जो भी गुनाह करे, उसे जेल में डाल दे और फाँसी दे दे। प्रेम से ही सुधरता है जगत्।

बच्चे हैं, प्रेम के भूखे

बच्चें प्रेम के भूखे हैं। यदि उन्हें घर में ही प्रेम का वातावरण मिलेगा, तो वे बाहर प्रेम नहीं ढूंढेंगे। लेकिन घर में मम्मी के साथ किचकिच, पापा के साथ टकराव होने के कारण वे छोटी उम्र में ही गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड के चक्कर में फंस जाते हैं। यदि प्रेम सच्चा होगा, तो फिर प्रेम से कहे गए दो कठोर शब्द भी बच्चों को दुःख नहीं देंगे, चोट नहीं पहुँचाएंगे। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, आप उसे एक चपत मारो तो वह रोने लगेगा, उसका क्या कारण है? उसे लगा इसलिए! ना, उसे लगने का दुःख नहीं है। उसका अपमान किया, उसका उसे दुःख है।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, बच्चे कोई सब्ज़ी नहीं हैं कि उन्हें सुधारना चाहिए। वे बच्चों को सुधारने का रामबाण इलाज बताते हुए कहते हैं, इस जगत् को सुधारने का रास्ता ही प्रेम है। जगत् जिसे प्रेम कहता है वह प्रेम नहीं है, वह तो आसक्ति है। इस बेबी पर प्रेम करो, पर वह प्याला फोड़े तो प्रेम रहेगा? तब तो चिढ़ते हो। इसलिए वह आसक्ति है।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, घर में माता-पिता से प्रेम, प्रेम और प्रेम ही मिलता हुआ देखें, तो बच्चों को घर के बाहर प्रेम खोजने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। घर का ऐसा वातावरण हो, फिर बच्चों को जैसा संस्कार देंगे उसके अनुसार वो चलेंगे।

बच्चों के प्रति प्रेम की परख

बच्चों के लिए माता-पिता का प्रेम सच्चा है या नहीं, यह कब पता चलता है? जब तक संबंधों मिठास रहती है, तब तक कुछ भी पता नहीं चलता, लेकिन जैसे ही संबंधों में कड़वाहट आती है, तब पता चलता है।

पूरी ज़िंदगी बेटा माँ-बाप की संपूर्ण आज्ञा में रहा हो। लेकिन, यदि एक ही बार गुस्से में, संयोगवश बेटा बाप को "आपके पास अक्कल नहीं है" ऐसा बोल दे, तो पूरी ज़िंदगी के लिए संबंध टूट जाता है! बाप भी कहता है, "तू मेरा बेटा नहीं, और मैं तेरा बाप नहीं!" और दोनों अलग हो जाते हैं। हमेशा के लिए दोनों के बीच दरार पड़ जाती है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "यदि सच्चा प्रेम हो, तब तो वह हमेशा के लिए वैसे का वैसा ही रहे, फिर गालियाँ दे या झगड़ा करे। उसके सिवा के प्रेम को तो सच्चा प्रेम किस तरह कहा जाए? मतलबवाला प्रेम, उसे ही आसक्ति कहा जाता है।"

बच्चें अच्छा करें, तो उनके साथ अच्छा व्यवहार हो और गलत करें तो गलत व्यवहार हो, ऐसा एक्शन-रिएक्शन वाला प्रेम सच्चा नहीं कहलाता है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "वह तो व्यापारी और ग्राहक जैसा प्रेम है, सौदेबाज़ी है। जगत् का प्रेम तो आसक्ति कहलाता है। प्रेम तो उसका नाम कहलाता है कि साथ ही साथ रहना अच्छा लगे। उसकी सारी ही बातें अच्छी लगे। उसमें एक्शन और रिएक्शन नहीं होते। प्रेम प्रवाह तो एक सरीखा ही बहा करता है। घटता-बढ़ता नहीं है, पूरण-गलन नहीं होता। आसक्ति पूरण-गलन स्वभाव की होती है।"

परम पूज्य दादा भगवान द्वारा दी गई इन सुंदर चाबियों का उपयोग करके, हर माता-पिता अपने बच्चों के साथ प्रेम भरा व्यवहार करना सीख सकते हैं।

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