परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “पूरी दुनिया को नहीं जीतना है, घर को ही जीतना है।” घर में सबसे नाजुक संबंध पति-पत्नी का होता है। दोनों एक-दूसरे के साथ भावना के बंधन से बंधे हुए होते हैं। अगर दोनों में से किसी एक को थोड़ी सी भी ठेस लगे, तो संबंध टूट सकता है।

जब पति-पत्नी शादी करते हैं, तब वे एक-दूसरे को सुखी करने के उद्देश्य से शादी करते हैं। लेकिन शादी के बाद एक-दूसरे से सुख प्राप्त करने की अपेक्षा जन्म लेती है और जब वह अपेक्षाएँ पूरी नहीं होती, तब क्लेश होता हैं। एक-दूसरे के साथ निभा लेना, उसी का नाम वैवाहिक जीवन है। पति-पत्नी में प्राकृतिक भेद होने के बावज़ूद भी अगर दोनों एक-दूसरे को जैसे हैं, वैसे ही स्वीकार कर सकें, तो संबंध निभेगा। पति-पत्नी के संबंध में दिव्यता कब आती है? जब दोनों के बीच शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है। शुद्ध प्रेम यानी जिसमें राग-द्वेष न हो। सामने वाला व्यक्ति अच्छा करे, तो बहुत अधिक ख़ुश न हो जाए और ख़राब करे, तो उसके दोष न दिखाई दें।
पति-पत्नी को एक-दूसरे के साथ कैसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए, यह पढ़ाने के लिए कोई कॉलेज नहीं होता, जिसमें परीक्षा देकर पास होने पर ही आदर्श पति या पत्नी का सर्टिफिकेट (प्रमाणपत्र) मिलता हो। अगर ऐसा होता तो, मान सकते थे कि वैवाहिक जीवन जीना आ जाएगा। यहाँ हमें परम पूज्य दादा भगवान से ऐसी कई प्रैक्टिकल चाबियाँ मिलती हैं, जिनसे पति-पत्नी को रोज़मर्रा के व्यवहार में आने वाली समस्याओं का समाधान मिलता है। जिससे पति-पत्नी के व्यवहार की उलझनों में थोड़ा सा ही नज़रिया बदलने से, प्रेम से सुखी और दिव्य वैवाहिक जीवन जिया जा सकता है।
वन फैमिली किसे कहेंगे कि जहाँ 'मेरा-तेरा' का भेद ना हो, सब एक हों। वन फैमिली में मतभेद नहीं होते, टकराव नहीं होते। पति-पत्नी दोनों को एक-दूसरे के परिवार के लिए भी एकता होती है। जहाँ 'मेरा-तेरा' होता है, वहाँ शांति नहीं होती।
पति-पत्नी के बीच मतभेद कब शुरू होते है? जब से वे एक-दूसरे की गलतियाँ निकालते हैं, तब से। अगर खाना अच्छा नहीं बना, तो पति किचकिच करे, गुस्सा करे और कितने तो थाली फेंकते हैं। दूसरी तरफ, पति पूरा दिन काम करके, थककर घर आता है, तब पत्नी नॉन स्टॉप पूरे दिन की शिकायतें पति को सुनाती है और शांति से खाने नहीं देती। पति-पत्नी को 'हाउ टू और्गेनाइज़ फ़ैमिली?' इसकी कला आनी चाहिए। पति को थाली में जो भी आ जाए, उसे खा लेना चाहिए। पत्नी को भी अपने पति को घर में प्रेम से, शांति से खाना खिलाना चाहिए।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, डेवलप्ड (विकसित) समाज के मनुष्य हर एक परिस्थिति में एडजस्ट कर लेते हैं।
दादाश्री: जीवन जीना अच्छा कब लगता है, कि जब सारा दिन उपाधि (बाहर से आने वाले दु:ख) नहीं हो। जीवन शांति से व्यतीत हो, तब जीवन जीना अच्छा लगता है। यह तो घर में क्लेश होता रहता है, तब जीवन जीना कैसे अच्छा लगे? यह तो पुसाएगा ही नहीं न! घर में क्लेश नहीं होना चाहिए। शायद कभी पड़ोसी के साथ हो या बाहर के लोगों के साथ हो, मगर घर में भी? घर में फैमिली की तरह लाइफ जीनी चाहिए। फैमिली लाइफ कैसी होती है? घर में प्रेम, प्रेम और प्रेम ही छलकता रहे। अब तो फैमिली लाइफ ही कहाँ है? दाल में नमक ज़्यादा हो तो सारा घर सिर पर उठा लेता है। ‘दाल खारी है’ कहता है! अंडर डेवेलप्ड (अर्ध विकसित) लोग। डेवेलप्ड (विकसित) किसे कहते हैं, कि जो दाल में नमक ज़्यादा हो, तो उसे एक ओर रखकर बाकी भोजन खा ले। क्या यह नहीं हो सकता? दाल एक ओर रखकर दूसरा सब नहीं खा सकते? ‘दिस इज़ फैमिली लाइफ।’ बाहर तकरार करो न! माई फैमिली का अर्थ क्या? कि हमारे बीच तकरार नहीं है किसी भी तरह की। एडजस्टमेन्ट लेना चाहिए। खुद की फैमिली में एडजस्ट होना आना चाहिए। एडजस्ट एवरीव्हेर।
शुरुआत में पति-पत्नी में एकता होती है। फिर धीरे-धीरे विचारों में भेद शुरू होते हैं। विचारों में भेद होने तक कोई परेशानी नहीं आती, लेकिन जब यह बढ़कर मतभेद और अंत में मनभेद तक पहुँचते हैं, तब संबंधों में दरार पड़ जाती है। उदाहरण के लिए, पत्नी ने बचपन से देखा होता है कि उसके पिता घर के कामों में उसकी माँ की मदद करते हैं, इसलिए शादी के बाद पत्नी को भी यह अपेक्षा रहती है कि, मेरे पति भी कम में मेरी मदद करें। अगर पति की परवरिश ऐसे परिवार में हूई हो, जहाँ उसने बचपन से घर के काम नहीं किए हों, तब वहाँ विचारभेद होता है। पति को भी ऐसी उम्मीद होती है कि मेरी माँ की तरह मेरी पत्नी को सामने बैठकर मुझे गरम-गरम खाना खिलाना चाहिए। लेकिन आजकल, पत्नियाँ नौकरी या अन्य संयोगों के कारण यह अपेक्षा पूरी नहीं कर पाती हैं, तब विचारभेद होने लगते हैं। ऐसे समय में दोनों में से किसी एक को एडजस्ट हो जाना चाहिए। वो भी समझकर एडजस्ट हों, सहन करके स्प्रिंग न दबाएँ। समझकर या बातचीत करके परिस्थिति को सुलझाएँ, जिससे अंदर किसी भी प्रकार की कोई कड़वाहट न रहे।
सास-ससुर के साथ भी 'वन फैमिली' की तरह ही रहना चाहिए। सामान्य तौर पर, पति या पत्नी में से कोई एक, अपने माता-पिता या परिवार के लिए आर्थिक या शारीरिक रूप से मदद करे तो दूसरे को ईर्ष्या होने लगती है। तब दोनों को समझना चाहिए कि हर किसी के लिए उसके माता-पिता पूज्यनीय होते हैं। उन्हें बचपन से ही माता-पिता की सेवा करने के संस्कार मिले होते हैं। इसलिए, जब उनके परिवार में कोई समस्या आती है, तो वे मदद करने के लिए दौड़ पड़ते हैं। तब 'मेरा-तेरा' का भेद करने की बजाय, पति-पत्नी को एक-दूसरे का साथ देना चाहिए और कहना चाहिए कि, "कोई समस्या हो तो मुझे बताईएगा।" ऐसा सहयोग दोनों तरफ से समान रूप में होना चाहिए।
पति-पत्नी एक-दूसरे के लाइफ पार्टनर कहलाते हैं, तो फिर वहाँ जुदाई कैसे हो सकती है? यदि पत्नी, अपने पत्नी धर्म से चूक जाए या पति अपने पति धर्म से चूक जाए, तो क्लेश होना निश्चित है। जहाँ क्लेश और कलह होंगे, वहाँ 'वन फैमिली' कहाँ से होगी? परिवार में चाहे कैसी भी आर्थिक, पारिवारिक या शारीरिक परेशानियाँ आएँ, फिर भी 'वन फैमिली' में एक-दूसरे को संभाल लेना चाहिए। यदि एक व्यक्ति संबंध तोड़े, तो दूसरे को जोड़ते रहना चाहिए, ताकि संबंध निभ सके, नहीं तो टूट जाता है। पति-पत्नी घर में एक-दूसरे के पूरक होकर, बिना किसी शिकायत के रहें, तो वैवाहिक जीवन में प्रेम बन रहता है।
जब से पति-पत्नी एक-दूसरे के काम में दखल करना शुरू करते हैं, तब से क्लेश शुरू हो जाता है। इसका सुंदर सोल्यूशन देते हुए परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, पति-पत्नी को एक-दूसरे के डिपार्टमेंट अलग-अलग रखने चाहिए। मान लीजिए कि, रसोई और घर में आने वाली चीजों की ज़िम्मेदारी पत्नी की हो, तो इसमें पति को, "क्या चीज़ ख़रीदी?", "कितने की आई?", "इतनी महंगी क्यों आई?", "खर्च का हिसाब दो", ऐसा बोलकर कलह या क्लेश नहीं करना चाहिए। दूसरी तरफ, यदि पैसे के निवेश, धंधे में पैसे लगाने, प्रॉपर्टी खरीदने आदि की जिम्मेदारी पति की है, तो पत्नी को, "कहाँ पैसे दिए?", "नुकसान क्यों हुआ?", "निवेश करने से पहले मुझसे क्यों नहीं पूछा?" ऐसी बातों में दखल नहीं देनी चाहिए। स्वाभाविक रूप से, घर के खर्च का बजट पहले से ही तय कर लेना चाहिए, फिर दोनों को अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्रता देनी चाहिए। आजकल पति-पत्नी दोनों सामान रूप से पढ़े-लिखे होते हैं और सामान रूप से कमाते हैं। तो ज़ाहिर है की, एक-दूसरे के कम में दखल हो ही जाती है। फिर भी वहाँ पर दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ बाँट लें, तो टकराव कम हो सकता है।
अगर पति-पत्नी अपने-अपने डिपार्टमेंट बाँट भी लें, फिर भी आपस में प्यार भरा रिश्ता बनाए रखना चाहिए। अगर किसी एक के डिपार्टमेंट में कोई समस्या आए, तो दूसरे को प्रेम से संभाल लेना चाहिए। नहीं तो दोनों में से किसी एक को आ सकता है और वह गलत कदम भी उठा सकता है।
पति-पत्नी के बीच सबसे बड़ी समस्या तब होती है, जब वे किसी दूसरे के पति या पत्नी के साथ तुलना करना शुरू कर देते हैं। पत्नी इस तरह से तुलना करती है कि, "फलाने का पति कितना कमाता है, वह अपनी पत्नी का कितना ध्यान रखता है, उसे घूमाने ले जाता है, उसे बंगला बनवाकर देता है।" वहीं पति भी ऐसी तुलना करते हैं कि, " फलाने की पत्नी कितना अच्छा खाना बनाती है, उसका ड्रेसिंग स्टाइल कितना अच्छा है और वह बच्चों को कितने अच्छे से संभालती है", वगैरह। पति-पत्नी को कभी भी ऐसी तुलनाएं नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से सामने वाले को बहुत दुख होता है और शंका भी उत्पन्न होती है। वास्तव में, जहाँ सच्चा प्यार हो, वहाँ दूसरे के पति या पत्नी के बारे में बिल्कुल भी दृष्टि या विचार नहीं बिगाड़ने चाहिए।
पति-पत्नी का एक-दूसरे पर हक जताना, एक-दूसरे के लिए पज़ेसिव होना भी कई बार क्लेश का एक कारण बन जाता है। जहाँ पति-पत्नी के बीच एक-दूसरे के लिए अत्यंत राग और आसक्ति हो, वहाँ पज़ेसिवनेस उत्पन्न होती है। जैसे कि, अगर पति को घर में किसी और के लिए अधिक अटैचमेंट हो, तो पत्नी को असुरक्षा का भय उत्त्पन्न होने लगता है कि, यदि मेरे हिस्से का कम हो जाएगा तो? उससे यह सहन नहीं होता। परिणामस्वरूप, बात-बात में शंका उत्पन्न होने लगती है। दूसरी ओर, यदि पत्नी रात को देर से घर आए या फोन पर किसी के साथ हंसकर बात करे, तो पति को भी पत्नी के ऊपर शंका होने लगती है। जाने-अनजाने में, वे सामने वाले को सभी राग के संबंधों से अलग कर देते हैं, फिर चाहे वह उनके माता-पिता हों, भाई-बहन हों या दोस्त हों। अंत में, दोनों में से कोई एक घुटन महसूस करने लगता है और उसके लिए संबंध निभाना मुश्किल हो जाता है।
अगर शादी से पहले पति को कोई लड़की पसंद थी और इस बात का पत्नी को पता चल जाए, तो उसे ईर्ष्या होने लगती है। इसके अलावा, अगर वह लड़की वर्तमान में भी उसके पति के संपर्क में है, तो पत्नी को ज्यादा जलन होती है। पत्नी अपने पति को बात-बात में ताने मारती है कि, "मैं तुम्हारा सब कुछ सहन कर लेती हूँ। लेकिन पहले जो लड़की तुम्हें पसंद थी, वह तुम्हें नहीं सहन करेगी?" फिर पति चाहे कितनी भी सफाई दे, तो भी पत्नी के गले से यह बात नहीं उतरती। दूसरी तरफ, जब बच्चा होता है, तब पत्नी का सारा ध्यान उसके पालन-पोषण की तरफ ही लगा रहता है। तब "तुम्हारे पास मेरे लिए समय ही नहीं है, तुम मेरा ध्यान नहीं रखती", ऐसा कहकर पति भी पत्नी को सुनाता है। एक-दूसरे के लिए ज़रुरत से ज़्यादा आसक्ति होने के कारण द्वेष हुए बगैर नहीं रहता है।
पति-पत्नी का जीवन विश्वास की नींव पर आधारित है। उसमें एक-दूसरे के चरित्र के ऊपर शंका करने से वैवाहिक जीवन में दरार पड़ जाती है। शादी से पहले पति या पत्नी के जो भी रिश्ते रहे हों, लेकिन एक बार अग्नि की साक्षी में फेरे लेने के बाद, पुराना सबकुछ भूलकर अब प्रेम से जीवन जीना चाहिए। हर एक पति-पत्नी अपनी पज़ेसिवनेस को पहचानकर और उससे क्या नुकसान हो रहा है यह सोचे, तो वह इसमें से बाहर निकल सकते हैं। अगर आसानी से ना पहचान में आए, तो एक-दूसरे के लिए हमारी क्या-क्या अपेक्षाएँ और आग्रह हैं, उसे पहचानकर हम इसमें से बाहर निकलें तो धीरे-धीरे प्रेम वाला व्यवहार हो सकता है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “संसार में इन झगड़ों के कारण ही आसक्ति होती है। इस संसार में झगड़ा तो आसक्ति का विटामिन है। झगड़ा नहीं हो तब तो वीतराग हुआ जाए।“ वे कहते हैं कि, आसक्ति वाला प्रेम हमेशा रिएक्शनरी (प्रतिक्रिया वाला) होता है। जब पति-पत्नी एक-दूसरे से नाराज होते हैं, तब कुछ समय के लिए वह एक-दूसरे से दूर रहते हैं। दूर रहने से फिर आसक्ति बढ़ जाती है, और पति-पत्नी को ऐसा लगने लगता है कि उनका प्रेम बढ़ रहा है। नज़दीक आने पर फिर से आसक्ति के कारण दोनों में टकराव होता है। जहाँ आसक्ति ज्यादा होती है, वहाँ दखल भी ज्यादा होती है। वह प्रेम नहीं है। प्रेम तो उसे कहते हैं कि, जिससे हम प्रेम करते हों, उसका पूरी जिंदगी में हम एक दोष भी न देखें। पति-पत्नी में अगर ऐसा चलता हो कि, "तुम ऐसे हो, तुम वैसे हो!" तो वह प्रेम नहीं है। जहाँ आसक्ति होती है, वहाँ आरोप लगाए बगैर रहते नहीं हैं।
परम पूज्य दादाश्री समाधान देते हुए कहते हैं, “जिस घर में स्त्री-पुरुष के बीच टकराव कम होता है, वहाँ आसक्ति कम है, ऐसा मान लेना।“ पति-पत्नी के बीच की खिटपिट को वे एक नया ही नाम देते हैं, जिसका वर्णन सुनकर पति-पत्नी को अपनी ही गलती पर स्वाभाविक रूप से हँसी आती है।
दादाश्री: जिस घर के दोनों जने आमने-सामने बहुत लड़ते हों न, तो हम समझ जाएँ कि यहाँ आसक्ति अधिक है। इतना समझ जाना। इसलिए फिर हम नाम क्या रखते हैं? ‘लड़ते हैं’ ऐसा नहीं कहते। तमाचा मारे आमने-सामने, तो भी हम उसे ‘लड़ते हैं’ ऐसा नहीं कहते। हम उसे तोतामस्ती कहते हैं। तोता ऐसे चोंच मारता है, (वो ऐसे चोंच मारता है) तब दूसरा तोता ऐसे चोंच मारता है, पर अंत में खून नहीं निकालते। हाँ, वह तोतामस्ती! आपने नहीं देखी है तोतामस्ती?
अब ऐसी सच्ची बात सुनें, तब हमें अपनी भूलों पर और अपनी मूर्खता पर हँसना आता है। सच्ची बात सुने तब मनुष्य को वैराग आता है कि हमने ऐसी भूलें की?! अरे, भूलें ही नहीं, पर मार भी बहुत खाई!
अगर पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ फ्रेंडशिप जैसा व्यवहार रखें, तो आसक्ति कम होती है। अगर वे एक-दूसरे के हसबैंड-वाइफ नहीं, बल्कि कम्पैनियन के रूप में रहें, तो झगड़े कम होते हैं और प्रेम बना रहता है।
दादाश्री: अर्थात् आप बहनों को समझना है कि अपनी जिस गलती को पति समझ सकते हों, उनकी वह गलती हमें नहीं निकालनी है। जो गलती बहनें समझ सकती है, वह गलती पति को नहीं निकालनी चाहिए।
प्रश्नकर्ता: कई लोग अपनी भूल समझते हैं, फिर भी नहीं सुधरें, तो?
दादाश्री: वे कहने से नहीं सुधरेंगे। कहने से तो बल्कि उल्टा चलते हैं। वह तो किसी समय जब सोच रहा हो, तब आप कहना कि यह गलती कैसे सुधरेगी? आमने-सामने बातचीत करो, ऐसे फ्रेन्ड की तरह। वाइफ के साथ फ्रेन्डशिप रखनी चाहिए। नहीं रखनी चाहिए? औरों के साथ फ्रेन्डशिप रखते हो। फ्रेन्ड के साथ ऐसे क्लेश करते रहते हो रोज़-रोज़? उसकी भूलें डायरेक्ट दिखाते रहते हो? नहीं! क्योंकि फ्रेन्डशिप टिकानी है। और यह तो शादी की है, कहाँ जाने वाली है? ऐसा हमें शोभा नहीं देता। जीवन ऐसा बनाओ कि बगीचे जैसा। घर में मतभेद नहीं हों, कुछ नहीं हो, घर बगीचे जैसा लगे। घर में किसी को थोड़ी भी दख़ल नहीं होने देना। छोटे बच्चे की भी भूल, अगर वह जानता हो तो नहीं दिखानी चाहिए। नहीं जानता हो वही भूल दिखानी चाहिए। आपको कैसा लगता है?
प्रश्नकर्ता: ठीक है, सही बात है।
दादाश्री: जान-बूझकर गलतियाँ बतानी चाहिए क्या? जो वह जानता है, वे उसे क्यों बताएँ। तुझे बताते हैं, बहुत बताते हैं क्या.......?
ये तो उसे परेशान करते हैं और अपना पतिपना ज़ाहिर करते हैं! पत्नी को संभालना नहीं आया और आए पति बनने! पत्नी को संभाला, ऐसा कब कह सकते हैं कि पत्नी के मन में प्रेम बिल्कुल भी कम न हो। ये तो परेशान करता है, तो प्रेम टूट जाता है और कहती है ‘कभी-कभी अगर मेरी भूल हो जाए तो वह शिकायत करता है।’ गलती होती है या नहीं होती इंसान से? लेकिन लोगों को जान-बूझकर पतिपना करने की आदत पड़ गई है! अंदर ही अंदर पति बनने की इच्छा है, और गलती कैसे निकालें? अब आज से आपको समझ में आ गई है यह बात?
प्रश्नकर्ता: हाँ।
दादाश्री: यह तो बेकार पागलपन था पतिपना करने का। यानी कि पतिपना नहीं करना चाहिए। पतिपना तो उसे कहते हैं कि जब सामने कोई प्रतिकार न हो। ये तो तुरंत प्रतिकार।

पति-पत्नी के संबंधों में छोटी-छोटी बातों पर मतभेद हो जाते हैं। व्यूपॉइंट (दृष्टिकोण) के डिफ़रेंस (अंतर) के कारण बात-बात में खिटपिट, रोक-टोक और झगड़े होते हैं। खुद को सच्चा साबित करने के परिणामस्वरूप दोनों एक-दूसरे को बिना मांगी सलाह देते रहते हैं, फिर चाहे सामने वाला उसे स्वीकार करे या न करे। कई बार सलाह सही भी होती है, लेकिन पूर्वाग्रह के कारण दोनों एक-दूसरे की बातों को सुनने के लिए तैयार नहीं होते।
पति चाहे ऑफिस में बड़ी पोस्ट पर क्यों न हो, लेकिन घर में पत्नी को ऐसा ही लगता है कि, पति को तो कुछ भी पता ही नहीं होता! अगर पति थोड़ा सा भी उसकी इच्छा के अनुसार ना कर पाए, तो पत्नी नाराज होकर मुँह फुलाकर बैठ जाती है। कई पत्नियाँ तो मायके चली जाती हैं और जब पति उन्हें मान-सम्मान से वापस बुलाकर लाते हैं, तभी लौटकर आती हैं। अगर उनकी इच्छा के अनुसार कार्य होते हैं, तो वह पति को दबाने लगती हैं। हर बात में पत्नी का पति पर नियंत्रण होता हैं। शुरुआत में तो पति भी भोलेपन के कारण पत्नी की हाँ में हाँ मिला देता है। लेकिन बाद में, पत्नी के कंट्रोल से वह घुटन महसूस करने लगता है। अंत में, दोनों के बीच प्रेम कम होता जाता है और क्लेश और कलह बढ़ जाते हैं।
कई बार पति भी पत्नी के अहंकार को ठेस पहुँचे, ऐसे आग्रह और अधिकार वाले लहेज़े में बात करते हैं। छोटे-छोटे झगड़े जब बड़ा रूप ले लेते हैं, तब कुछ पति अपनी पत्नी पर हाथ भी उठा देते हैं। खानदानी पुरुष कभी भी पत्नी पर हाथ नहीं उठाते। इससे पत्नी की मानसिकता बहुत ही डिस्टर्ब (बिगड़) हो जाती है। जब पति की तरफ़ से पत्नी को तरछोड़ लगती है, तब उसके मन में गहरे घाव हो जाते हैं, जो कभी भरते नहीं हैं। कई पत्नियों की स्थिति खूंटे से बंधी हुई गाय की तरह हो जाती है। वह बच्चों के भविष्य की चिंता और समाज के डर से खूंटे से बंधी रहती है। आधुनिक युग में जो महिलाएं आत्मनिर्भर होती हैं, वे इसे सहन करने के बजाय अलग हो जाती हैं।
इस प्रकार, क्लेश और झगड़े बढ़ने पर प्रेम से शुरू हुआ वैवाहिक जीवन दुख-दर्द में बदल जाता है। दोनों बड़ी उम्मीदों से विवाह के बंधन में बंधते हैं, लेकिन एक-दूसरे से भारी तरछोड़ लगने के कारण उनका विश्वास टूट जाता है। एक छत के नीचे रहते हुए भी, प्रेम और अभेदता दोबारा कभी वापस नहीं आते हैं।
सांसारिक जीवन में यह मान्यता है कि, घर में बर्तन होंगे तो आवाज तो होगी ही। पति-पत्नी में जब झगड़ा होता है, तब प्रेम बढ़ता है। परम पूज्य दादा भगवान इस मान्यता के विपरीत सही समझ देते हैं।
दादाश्री: मतभेद होता है या नहीं पत्नी के साथ? वाइफ के साथ मतभेद?
प्रश्नकर्ता: मतभेद के बिना तो हसबैंड-वाइफ कहलाते ही नहीं न?
दादाश्री: हें, ऐसा! ऐसा है, ऐसा नियम होगा? किताब में ऐसा नियम लिखा होगा कि मतभेद पड़े तभी हसबैंड और वाइफ कहलाते हैं? थोड़े बहुत मतभेद होते हैं या नहीं?
प्रश्नकर्ता: हाँ।
दादाश्री: तो फिर हसबैंड और वाइफ कम होता जाता है, नहीं?
प्रश्नकर्ता: प्रेम बढ़ता जाता है।
दादाश्री: प्रेम बढ़ता जाए वैसे-वैसे मतभेद कम होते जाते हैं, नहीं?
प्रश्नकर्ता: जितने मतभेद बढ़ते जाएँ, जितने झगड़े बढ़ते जाएँ, उतना प्रेम बढ़ता जाता है।
दादाश्री: हाँ। वह प्रेम नहीं बढ़ता, वह आसक्ति बढ़ती है। प्रेम तो जगत् ने देखा ही नहीं। कभी भी प्रेम शब्द देखा ही नहीं जगत् ने। ये तो आसक्तियाँ हैं सभी। प्रेम का स्वरूप ही अलग प्रकार का है। यह आप मेरे साथ बात कर रहे हो न, यह अभी आप प्रेम देख सकते हो, आप मुझे झिड़को, तब भी आपके ऊपर प्रेम रखूँगा। तब आपको लगेगा कि ओहोहो! प्रेमस्वरूप ऐसे होते हैं। बात सुनने में फायदा है कुछ यह?
प्रश्नकर्ता: पूरापूरा फायदा है।
दादाश्री: हाँ, सावधान हो जाना। नहीं तो मूर्ख बन गए समझो। और प्रेम होता होगा? आपमें है प्रेम, कि उसमें हो? अपने में प्रेम हो तो सामनेवाले में हो। अपने में प्रेम नहीं है, और सामनेवाले में प्रेम ढूंढते हैं हम कि ‘आपमें प्रेम नहीं दिखता?’ मुए, प्रेम ढूंढता है? वह प्रेमी नहीं है! यह तो प्रेम ढूंढता है?! सावधान हो जा, अभी प्रेम होता होगा? जो जिसके शिकंजे में आता है उसे भोगता है, लूटबाज़ी करता है।
प्रेमपूर्वक वैवाहिक जीवन जीने के लिए पति-पत्नी को मतभेद और झगड़े कम हो जाएँ, ऐसा लक्ष्य रखना चाहिए। एक-दूसरे से प्रेम मिलने की आशा रखने की बजाय, खुद प्रेमस्वरूप होने का उद्देश्य रखना चाहिए। पति-पत्नी को एक-दूसरे के लिए और एक-दूसरे के व्यूपॉइंट (दृष्टिकोण) के लिए आदर होना चाहिए। अगर पति-पत्नी एक-दूसरे को सम्मान देंगे, तो बच्चें भी उन्हें देखकर सीखेंगे। शास्त्रों में कहा गया है, “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता।” स्त्री को आदिशक्ति और प्रकृति की देवी कहा गया है। जैसे हम बाहर माताजी की पूजा करते हैं, वैसे ही हमें घर में भी स्त्री को आदर देना चाहिए। एक पत्नी घर चलाती है, अपने पति के माता-पिता को प्रेम से रखती है, बीमार होने पर उनका ध्यान रखती है, तो पति को भी पत्नी का ध्यान रखना चाहिए। वहीं दूसरी ओर, बाहर की दुनिया में बड़े-बड़े काम करके आने वाले पुरुषों को भी घर में उनकी पत्नियाँ छोटी-छोटी बातों में उन्हें नीचा दिखा देती हैं, फिर चाहे वह कार ड्राइविंग हो, कपड़ों का चयन हो या घर के काम हों। इससे पतियों के अहंकार को भी चोट पहुँचती है। इसलिए, पत्नियों को भी अपने पतियों के साथ आदर से बात करनी चाहिए।
वैवाहिक जीवन में चाहे कैसी भी मुश्किलें क्यों ना आएँ, लेकिन अगर हमारा उनको देखने का नज़रिया बदल जाए और हम उनका हल सही समझ के साथ निकालें, तो फिर मूलभूत संस्कार फिर से स्थापित हो जाएँगे और हमारा वैवाहिक जीवन दिव्य बन जाएगा।
“अति परिचयात अवज्ञा!” अर्थात् जहाँ बहुत प्रेम होता है, वहीं अरुचि होती है, यह मानव स्वभाव है। पति-पत्नी दिन-रात एक-दूसरे के साथ एक ही घर में रहते हैं, इसलिए एक-दूसरे की प्रकृति के अवगुणों को नज़दीक से जानते हैं। फिर वे एक-दूसरे से ऊब जाते हैं। लेकिन अगर दोनों सच में एक-दूसरे की प्रकृति को समझकर काम लें, तो राग-द्वेष के बगैर व्यवहार का हल ला सकते हैं।
सामान्य तौर पर, पत्नियों को शॉपिंग करना बहुत अच्छा लगता है, जबकि पतियों को अच्छा नहीं लगता। पत्नियों की शिकायत रहती है कि, पति उनके साथ शॉपिंग में जाएँ तो रुचि ही नहीं लेते, जाते ही नहीं, या जाएँ तो मुँह बनाते हैं और किसी कोने में बैठे रहते हैं। अगर पति को बाहर घूमने का शौक हो और पत्नी को न हो, तो पति की भी शिकायत रहती है कि पत्नी को घर में ही रहना पसंद है, कहीं बाहर जाती ही नहीं। ऐसे समय में अगर दोनों थोड़ा एडजस्ट करके सामने वाले को पसंद हो उसमें सहभागी बन जाएँ, तो सामने वाले का मन संतुष्ट हो जाता है।
अगर दोनों में से किसी एक की प्रकृति मान की अपेक्षा रखने वाली हो तो, उन्हें एप्रिशिएट करें, बात-बात पर नीचा न दिखाएँ, तो व्यवहार में क्लेश बंद हो जाएँगे। अगर किसी एक की प्रकृति में लोभ अधिक हो, तो उन्हें वस्तुओं के खराब होने पर अंदर खटकता रहता है। तब ऐसी समझ फिट कर सकते हैं कि, खराब होने से पाँच सौ या हज़ार रुपये का नुकसान होगा, लेकिन क्लेश करने से लाख रुपये जितना नुकसान होगा, तो क्लेश बंद हो जाएँगा। अगर एक की प्रकृति जल्दबाज़ी वाली हो और दूसरे की शांत हो, तब कहीं बाहर जाने में देर हो जाए तो भी किचकिच होती है। वहाँ धीमी प्रकृति वाले को निर्धारित समय से पहले का समय दे दें, तो क्लेश टल सकता है। स्त्रियों की प्रकृति बातों को नोट करने वाली होती है। इसलिए पत्नी को कहीं दुःख हुआ हो, तो वह कहती है कि, “मेरे कलेजे में घाव हुआ है, यह मैं पूरी ज़िंदगी याद रखूँगी!” तब पति को पलटकर ताना नहीं मारना चाहिए, बल्कि बात को मोड़ लेना चाहिए और माफ़ी माँगनी चाहिए कि, “सॉरी, दुःख मत लगाना।” तो पत्नी का मन भी शांत हो जाएगा।
ऐसे ही अगर दोनों एक-दूसरे की प्रकृति को पहचानकर उसके अनुसार एडजस्ट हो जाएँ, तो व्यवहार सुंदर हो जाएगा। लेकिन पति-पत्नी एक-दूसरे की प्रकृति को कैसे पहचानें? उसकी सुंदर चाबी यहाँ परम पूज्य दादा भगवान देते हैं।
प्रश्नकर्ता: यह समझाइए कि किस प्रकार पहचानें? पति अपनी पत्नी को धीरे-धीरे सूक्ष्म रूप से प्रेम द्वारा किस तरह पहचाने, वह समझाइए।
दादाश्री: पहचानोगे कब? पहले तो समानता का दाँव दोगे तब। उन्हें स्पेस देनी चाहिए। जैसे बाज़ी खेलने बैठते हैं आमने-सामने, उस वक्त समानता का दाँव होता है, तब खेलने में मज़ा आता है। पर ये तो समानता का दाँव क्या देंगे? हम समानता का दाँव देते हैं।
प्रश्नकर्ता: किस प्रकार देते हैं? प्रैक्टिकली किस प्रकार से देते हैं?
दादाश्री: मन से उन्हें अलग है ऐसा नहीं लगने देते। वे उल्टा-सीधा बोलें, फिर भी, समान हों उस प्रकार से, अर्थात् प्रेशर नहीं लाते।
यानी सामने वाले की प्रकृति को पहचान लेना कि यह प्रकृति ऐसी है और ऐसी है। फिर और तरीके ढूँढ निकालना है।
बराबर हिस्सेदारी देना यानी कोई भी निर्णय लेना हो, तब सामने वाले पर किसी भी प्रकार का प्रेशर न डालें, सामने वाले को बोलने दें, अपनी मनमानी न करें, तो सामने वाले की प्रकृति पहचान में आती है और वह खिलती भी है। लेकिन अगर एक व्यक्ति अपने ही अनुसार दूसरे को चलाए, तो सामने वाला बातों को अपने मन में ही दबाता रहता है और अंत में स्प्रिंग की तरह उछलता है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “खुद की सेफसाइड रखे नहीं और खुद को होम दे, वह प्रेम सच्चा। वह तो अभी मुश्किल है बात।” पति-पत्नी के संबंध में अपनी सेफसाइड देखने की बात ही नहीं होती। “इसमें मेरा कितना?”, “मेरा क्या फ़ायदा?” ऐसा स्वार्थ या लालच नहीं होन चाहिए। जब आप ख़ुद को सामने वाले के प्रति समर्पित कर दें, परन्तु इसके बदले में सामने वाला आप के लिए कितनी भावुकता रखता है, उसका मूल्यांकन नहीं रखना चाहिए। प्रेम के संबंध में तो चाहे कितनी मुश्किल आए, दुःख आए, अड़चन आए, फिर भी तप करते रहते हैं, एडजस्टमेंट लेते ही रहते हैं। वहाँ अपनी सेफसाइड का विचार ही नहीं करते। उल्टा, सामने वाले के लिए सब कुछ करने की तैयारी होती है। खुद का विचार ही नहीं करते और सर्वस्व खुद को समर्पित कर देते हैं। अगर एक-दूसरे के लिए ऐसी सिन्सियारिटी हो, तो कुदरत भी उसे बहुत ऊँचा फल देती है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, पति-पत्नी में सिन्सियारिटी इतनी होनी चाहिए कि, सामने वाला चाहे कितना भी विश्वासघात करे, फिर भी प्रेम ना टूटे। ऐसा प्रेम संसार में मिलना मुश्किल है।
दादाश्री: सामनेवाले से कलमो (नियम) चाहे जितनी टूटें, सब आमने-सामने दिए हुए जो वचन चाहे जितने तोड़ें परन्तु फिर भी सिन्सियारिटी जाए नहीं, सिन्सियारिटी सिर्फ वर्तन में ही नहीं पर आँखों में भी नहीं जानी चाहिए, तब समझना कि यहाँ प्रेम है। इसलिए वैसा प्रेम ढूंढना। इसे प्रेम मानना नहीं। यह बाहर जो चला है, वह बाज़ारू प्रेम-आसक्ति है।
पति-पत्नी एक-दूसरे का स्वार्थ पूरा हो तब तक प्रेम से साथ में रहते हैं, और स्वार्थ न पूरा हो तो अलग हो जाते हैं, तो उसे प्रेम कहा ही कैसे जा सकता है? शादी की एनिवर्सरी पर हीरे का सेट लाकर दें, तो पत्नी बहुत खुश हो जाती है। पत्नी पति को मनपसंद भोजन बनाकर खिलाए, तो पति बहुत खुश हो जाता है। फिर यदि पति एनिवर्सरी भूल जाए, या पत्नी अच्छा खाना न बनाती हो, तो वही प्रेम टूट जाता है। स्वार्थ से आसक्ति उत्पन्न होती है। इसलिए जहाँ प्रेम में कम-ज्यादा होता रहता है, वह प्रेम नहीं है। प्रेम तो निरंतर एक समान रहता है।
पति-पत्नी के प्रेम में समर्पण कैसा होना चाहिए, इसकी सुंदर समझ हमें यहाँ परम पूज्य दादा भगवान देते हैं।
दादाश्री: प्रेम तो पहले होता था कि पति परदेश गया हो न, वह वापिस न आए तो पूरी ज़िन्दगी उसमें ही चित्त रहता, दूसरा कोई याद ही नहीं आता। आज तो दो साल पति न आए तो दूसरा पति कर ले! इसे प्रेम कैसे कहा जाए? यह तो संडास है, जैसे संडास बदलते हैं, वैसा! जो गलन है, उसे संडास कहते हैं। प्रेम में तो अर्पणता होती है!
प्रेम मतलब लगनी लगे वह। और वह सारे दिन याद आता रहे। शादी दो रूप में परिणमित होती है, किसी समय आबादी में जाती है तो किसी समय बरबादी में जाती है। प्रेम बहुत छलके तो वापिस बैठ जाता है। जो छलकता है, वह आसक्ति है। इसलिए जहाँ छलके, उससे दूर रहना। लगनी तो आंतरिक होनी चाहिए। बाहर का खोखा बिगड़ जाए, सड़ जाए तब भी प्रेम उतना का उतना ही रहे।
पति-पत्नी एक-दूसरे से हूँफ (संरक्षण, आश्रय) और आश्वासन की अपेक्षा के साथ शादी करते हैं और एक-दूसरे के प्रति समर्पित हो जाते हैं। लेकिन शादी के बाद तस्वीर कुछ और ही होती है, जिसका चित्रण हमें परम पूज्य दादा भगवान यहाँ देते हैं।
दादाश्री: ये लड़कियाँ पति पास करती हैं, ऐसे देखकर के पास करती हैं, फिर झगड़ती नहीं होगी? झगड़ती है? तब वह प्रेम कहलाए ही नहीं न! प्रेम तो कायम का ही होता है। जब देखो तब वही प्रेम, वैसा ही दिखता है। उसका नाम प्रेम कहलाता है, और वहाँ आश्वासन लिया जाता है।
यह तो हमें प्रेम आता हो और एक दिन वह रुठकर बैठी हो, तब किस काम का तेरा प्रेम! डालो गटर में यहाँ से। मुँह चढ़ाकर फिरती हो, उसके प्रेम का क्या करना है? आपको कैसा लगता है?
प्रश्नकर्ता: ठीक है।
दादाश्री: कभी भी मुँह न बिगाड़े, वैसा प्रेम होना चाहिए। वह प्रेम हमारे पास मिलता है।
जहाँ सच्चा प्रेम होता है, वहाँ रूठना-मनाना नहीं होता, भावनाओं में उछाल भी नहीं आते। फिर भी व्यवहार रसीला और संतुलन वाला होता है। परम पूज्य दादा भगवान इस बात को समझाते हुए कहते हैं, “घर में हमें सभी के साथ घट-बढ़ बिना का प्रेम रखना है। परन्तु उन्हें क्या कहना है कि, ‘आपके बगैर हमें अच्छा नहीं लगता।’ व्यवहार से तो बोलना पड़ता है न! परन्तु प्रेम तो घट-बढ़ बगैर का रखना चाहिए।” अगर यह गूढ़ बात समझ में आ जाए, तो पति-पत्नी का जीवन सचमुच दिव्य बन जाता है।

आजकल पति-पत्नी में ज़रा सा भी मनमुटाव हो जाए या दोनों में से किसी एक को ठेस लग जाए, तो बात डिवोर्स तक पहुँच जाती है। इतना ही नहीं, ठेस लगने के कारण भी मामूली होते हैं। गहराई से देखें तो खुद के मोह, अपेक्षा, आग्रह और अभिप्राय डिवोर्स के मुख्य कारण बन जाते हैं।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, जहाँ छोटी सी बात पर डिवोर्स हो जाता है, वहाँ प्रेम कहाँ से होगा?
प्रश्नकर्ता: मनुष्य प्रेम के बिना जी सकता है क्या?
दादाश्री: जिसके साथ प्रेम किया उसने लिया डायवोर्स, तो फिर किस तरह जीए वह?! क्यों बोलते नहीं? आपको बोलना चाहिए न?
प्रश्नकर्ता: सच्चा प्रेम हो तो जी सकता है। यदि मोह होता हो तो नहीं जी सकता।
दादाश्री: सही कहा यह। हम प्रेम करें तब वह डायवोर्स लें, तो किस काम का ऐसा प्रेम! वह प्रेम कहलाए ही कैसे? अपना प्रेम कभी भी न टूटे ऐसा होना चाहिए, चाहे जो हो फिर भी प्रेम न टूटे। मतलब सच्चा प्रेम हो तो जी सकता है।
प्रश्नकर्ता: सिर्फ मोह हो तो नहीं जी सकता।
दादाश्री : मोहवाला प्रेम तो बेकार है सारा। तब ऐसे प्रेम में मत फँसना। परिभाषावाला प्रेम होना चाहिए। प्रेम के बिना मनुष्य जी नहीं सकता, वह बात सच्ची है, पर प्रेम परिभाषावाला होना चाहिए।
प्रेम की परिभाषा आपको समझ में आई? वैसा प्रेम ढूंढो। अब ऐसा प्रेम मत ढूंढना कि कल सुबह वह डायवोर्स ले ले। इनके क्या ठिकाने?!
अगर पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के पॉजिटिव देखें, तो संबंध निभता है। परम पूज्य दादा भगवान एक सुंदर उदाहरण के माध्यम से यहाँ इसकी समझ देते हैं।
दादाश्री: हिन्दुस्तान में किस फैमिली में झगड़े नहीं होते, घर में? तो मुझे कई बार दोनों को समझा-समझाकर ठीक कर देना पड़ता है। तलाक लेने की तैयारियाँ ही चल रही होती हैं, कितने ही लोगों का ऐसा! लेकिन फिर क्या हो सकता है? कोई चारा ही नहीं है न! नासमझी से सब अलग हो जाते हैं! अपना पकड़ा हुआ छोड़ते नहीं और सभी बातें नासमझी की होती हैं। उसमें फिर मैं समझाता हूँ तब कहेंगे, नहीं। तब तो ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है।
प्रश्नकर्ता: यों भी साथ रहते हैं लेकिन अलग जैसे ही रहते हैं।
दादाश्री: ऐसा तलाक जैसा ही।
प्रश्नकर्ता: आपने सभी को इकट्ठा कर दिया।
दादाश्री: एक जन्म निभ सकेगा या नहीं? हल लाओ न, हर कहीं से। एक जन्म के लिए सिर पर आ पड़े हैं तो सिर पर आ पड़े हुओं के साथ हल नहीं लाना चाहिए?
हमारे संस्कार हैं ये तो। लड़ते-लड़ते दोनों को अस्सी साल हो जाएँ, फिर भी मरने के बाद तेरहवें के दिन शैय्यादान करते हैं। शैय्यादान में चाचा को यह भाता था और यह पसंद था, चाची सब बम्बई से मँगाकर रखती हैं। तब एक लड़का था न, वह अस्सी साल की चाची से कहता है, ‘माँजी, चाचा ने तो आपको छह महीने पहले गिरा दिया था। उस वक्त तो आप उल्टा बोल रही थीं चाचा के बारे में।’ ‘फिर भी, ऐसे पति नहीं मिलेंगे’ कहने लगी। ऐसा कहा उन्होंने। सारी ज़िंदगी के अनुभव में से ढूँढ निकालती हैं कि ‘पर वे दिल के बहुत अच्छे थे। यह प्रकृति टेढ़ी थी पर दिल के...’
प्रश्नकर्ता: अच्छे थे।
दादाश्री: यानी ऐसे पति दोबारा नहीं मिलेंगे, ऐसी परख करना आता है। तब कितनी ज़्यादा परख की होगी। पता नहीं चले कि भाई, अंदर से कैसे थे वे ! यह सब तो प्रकृति है, चिढ़ती है, ऐसा सब है। लेकिन ये अपने हिन्दुस्तान के संस्कार हैं! माँजी क्या कहती हैं? गिरा दिया था, वह बात अलग थी, परंतु मुझे ऐसे पति नहीं मिलेंगे! यह है हिन्दुस्तान का आर्य नारीत्व!
चाहे कैसी भी मुश्किलें आएँ, तब भी वैवाहिक जीवन निभा लेना चाहिए, यह हमारे संस्कार हैं। फिर भी, कुछ परिस्थितियों में जहाँ घर में व्यसन में पैसे उड़ाना, मारपीट वगैरह होती हो, खाने की मुश्किल हो और सभी प्रयत्न करने के बाद भी सुधार संभव न हो, तो मज़बूरी में अलग हो सकते हैं। लेकिन बिल्कुल छोटी-छोटी बातों पर डिवोर्स लेने का निर्णय करने से पहले ये विचार आना चाहिए, कि डिवोर्स के बाद के जीवन में प्रेम मिलेगा ही इसकी क्या गारंटी है? अगर फिर से शादी करेंगे तो वहाँ मुश्किलें नहीं आएँगी? सिर्फ़ विचार न मिलने के कारण अलग होने की ज़रूरत नहीं है। इसके बजाय जो वैवाहिक जीवन शुरू हुआ है, उसे पूरा करना चाहिए।
अनेक दंपति परम पूज्य दादा भगवान के पास तलाक लेने की तैयारी के साथ आते थे। उन लोगों के लिए उनकी भावना थी कि, “जीवन जीना सीखो, सुखी हो जाओ सभी। बच्चे अच्छे निकले, बच्चों में अच्छे संस्कार आएँ।” परम पूज्य दादाश्री से यह सच्ची समझ प्राप्त होते ही, अनेक लोगों के टूटते हुए घर जुड़ जाते थे। उनका वैवाहिक जीवन प्रेमपूर्ण और सुखी हो जाता था।
A. कबीर साहेब ने कहा है कि, "पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो... Read More
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A. परम पूज्य दादा भगवान की दृष्टि से मोह और आसक्ति, प्रेम नहीं हैं। वे हमें लौकिक मान्यताओं से... Read More
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A. व्यवहार में बच्चें केवल प्रेम से ही वश में हो सकते हैं, वहाँ दूसरे सभी हथियार अंत में नाकाम साबित... Read More
Q. परमात्म प्रेम यानी क्या? ऐसा प्रेम कहाँ मिलता है?
A. जो प्रेम बढ़े नहीं, घटे नहीं, वह प्रेम है, वे ही परमात्मा हैं!!! - परम पूज्य दादा भगवान शुद्ध... Read More
A. परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “प्रेमस्वरूप हो जाओ तो यह जगत् आपका ही है।“ क्योंकि यह जगत प्रेम से... Read More
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