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प्रेम स्वरूप कैसे बनें?

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “प्रेमस्वरूप हो जाओ तो यह जगत् आपका ही है।“ क्योंकि यह जगत प्रेम से ही सुधरता है। अगर हम प्रेम से कहें तो बात बिगड़ती नहीं, और यदि थोड़े से भी द्वेष से कहें तो पूरी बात बिगड़ जाती है। जो प्रेम वाला व्यक्ति हो, वह कठोर शब्द बोले तो भी सामने वाले को खराब नहीं लगता और उसका कल्याण करता है।

प्रेम स्वरूप होने की सुंदर चाबियाँ परम पूज्य दादा भगवान हमें यहाँ देते हैं।

दादाश्री: असल में जगत् जैसा है वैसा वह जाने, फिर अनुभव करे तो उसे प्रेमस्वरूप ही होगा। जगत् ‘जैसा है वैसा’ क्या है? कि कोई जीव किंचित् मात्र दोषी नहीं, निर्दोष ही है जीव मात्र। कोई दोषी दिखता है वह भ्रांति से ही दिखता है। अच्छे दिखते हैं, वह भी भ्रांति और दोषी दिखते हैं, वह भी भ्रांति। दोनों अटेचमेन्ट-डिटेचमेन्ट हैं। यानी कोई दोषी असल में है ही नहीं और दोषी दिखता है इसलिए प्रेम आता ही नहीं। इसलिए जगत् के साथ जब प्रेम होगा, जब निर्दोष दिखेगा, तब प्रेम उत्पन्न होगा। यह मेरा-तेरा, वह कब तक लगता है? कि जब तक दूसरे को अलग मानते हैं तब तक। उसके साथ भेद है तब तक, यह मेरा लगता है उससे। तो इस अटेचमेन्टवाले को मेरा मानते हैं और डिटेचमेन्टवाले को पराया मानते हैं, वह प्रेमस्वरूप किसी के साथ रहता नहीं।

जब व्यवहार में कहीं दुःख हो जाता है, तब जिस व्यक्ति की तरफ़ से दुःख आया हो, वह व्यक्ति हमें दोषित दिखाई देता है। “मुझे जो दुःख हुआ है, वह सामने वाले ने ही दिया है”, ऐसा हमारी दृष्टि में रहता है, इसलिए प्रेम स्वरूप नहीं हो पाते हैं। जब किसी की तरफ़ से दुःख आए, तब मन से भी उसके लिए कोई स्पंदन ना जाए, अहंकार से भी कोई स्पंदन खड़ा ना हो, तब प्रेम स्वरूप होने की शुरुआत होती है।

व्यवहार में किसी व्यक्ति के प्रति प्रेम कब उत्पन्न होता है? उस व्यक्ति के प्रति अब तक जो भी भूलें हुई हों, उनकी माफ़ी मांग लें तब। "सामने वाले से एक भी दोष नहीं हुआ है, लेकिन मुझे ही दोषित दिख रहा है, इसलिए मेरा ही दोष है", ऐसा समझ में रहे तो प्रेम स्वरूप हो सकते हैं।

प्रेम स्वरूप का पाठ सिखाते दादाश्री

"सामने वाले से हमें परेशानी हो जाए तो उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन हमें वह देखना है कि हम से सामने वाले को कोई परेशानी न हो। तभी सामने वाले का प्रेम संपादित होगा!"
- परम पूज्य दादा भगवान

यदि कोई व्यक्ति हमें हमेशा मान-सम्मान दें, तो वहाँ एकता और प्रेम बना रहता है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति हमारा घोर अपमान कर दे और सबके बीच हमें नीचा दिखा दे, तब भी उसके लिए ज़रा सा भी द्वेष उत्पन्न ना हो, तो यह प्रेम स्वरूप होने की शुरुआत होती है। इतना ही नहीं, यदि कुछ समय बाद वही व्यक्ति फिर से हमारे सामने आए, और फिर से वही अपमान याद आए और द्वेष उत्पन्न होने लगे, तो भी हमारे प्रेम का संपादन नहीं होता है। इस प्रकार धीरे-धीरे सभी के साथ शुद्ध प्रेम स्वरूप होना है।

शुद्ध प्रेम स्वरूप किस तरह रहें, उसका परम पूज्य दादा भगवान विस्तृत विश्लेषण करते हैं।

प्रश्नकर्ता: शुद्ध प्रेम स्वरूप यानी किस तरह रहना चाहिए?

दादाश्री: कोई व्यक्ति अभी गालियाँ देता हुआ गया और फिर आपके पास आया तब भी आपका प्रेम घट नहीं जाता, उसका नाम शुद्ध प्रेम। ऐसा प्रेम का पाठ सीखना है, बस। दूसरा कुछ सीखना नहीं है। मैं जो दिखाऊँ वैसा प्रेम होना चाहिए। यह ज़िन्दगी पूरी होने तक में आ जाएगा न सब? वह प्रेम सीखो अब!

प्रेम स्वरूप होने के स्टेपिंग में, मूल से पहले द्वेष समाप्त होता है, यानी वीतद्वेष (द्वेष से मुक्त होना) होते है। फिर राग भी समाप्त होता है, तब वीतराग (राग से मुक्त) हो जाते है और तब प्रेम का संपादन होता है।

करीबी व्यक्ति के प्रति प्रेम बनाए रखने का तरीका

करीबी व्यक्ति, जिनके साथ हमारी बार-बार खिट-पिट होती रहती हो, उनके साथ प्रेम स्वरूप होना सबसे कठिन है। क्योंकि, नज़दीक रहने के कारण हमारे मन में उनके प्रति अनेक अभिप्राय बंध जाते हैं। वहाँ किस तरह प्रेम स्वरूप बनें, उसकी अत्यंत सुंदर और प्रैक्टिकल चाबियाँ परम पूज्य दादा भगवान हमें यहाँ देते हैं।

१) परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, “कोई इसे डांटे तो आप सामने वाले के विरोध में खड़े होंगे या नहीं? यह आपका इनके ऊपर प्रेम कहलाएगा।”

इसे विस्तार से समझें तो, घर में, परिवार में, नौकरी-धंधे में या सहाध्यायियों में कुछ करीबी व्यक्ति होते हैं, जिनके साथ हमारी रोज़ाना खिट-पिट होती ही रहती है। अब ऐसी कोई करीबी व्यक्ति हमारे साथ हों और अगर कोई तीसरा व्यक्ति उन्हें डांटे, तब यदि हम अपने करीबी व्यक्ति का पक्ष लेकर उस तीसरे व्यक्ति के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे अंदर करीबी व्यक्ति के लिए प्रेम है।

हमारे बीच चाहे जितनी भी खिट-पिट होती रहती हो, फिर भी ऐसे समय में हम अपने करीबी व्यक्ति का पक्ष लेकर सामने वाले को डांटने से रोकते हैं। क्योंकि, हम अपने करीबी व्यक्ति को प्रेम से जीतना चाहते हैं।

२) परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, “अगर वह आपको टेढ़ा कहे, तो आप समझ जाना कि उसका स्वभाव ही टेढ़ा है, लेकिन मुझे तो उसके ऊपर सिर्फ़ प्रेम ही रखना है।”

उदाहरण के तौर पर, कभी-कभी ऐसा भी होता है कि करीबी व्यक्ति हमें कुछ भी बोल दें, सुनाएँ या हमारा अपमान करे। तब भी हमें अंदर समाधान हाज़िर रहे कि, “इनका तो स्वभाव ऐसा है, लेकिन आफ्टर ऑल वह एक अच्छे इंसान हैं।” तो इस तरह हम करीबी व्यक्ति के साथ प्रेम बनाए रख सकते हैं।

वास्तव में तो राग और द्वेष के हिसाब से बंधे हुए व्यक्ति ही एक-दूसरे के करीब आते हैं। जब यह हिसाब बाहर आता है, तब एक-दूसरे को दुःख हो जाए, ऐसा व्यवहार हो जाता है। उस समय बाहर कुछ भी हो जाए, लेकिन अंदर से जुदाई ना होने दें और संभाल लें, तो प्रेम बना रहता है।

अगर सामने वाला तंतीला बोले या टोंट मारे, तो उनके सामने हम भी तंतीला बोलें, तो सामने वाला भी अपसेट होगा और हम भी अपसेट होंगे, तो ऐसे में प्रेम का संपादन नहीं होगा। लेकिन करीबी व्यक्ति के नेगेटिव वर्तन के सामने भी जब हम पॉज़िटिव दृष्टि रखें, तो प्रेम बना रहेगा।

३) आखिर में सबसे प्रैक्टिकल चाबी बताते हुए, परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, “अभी अगर आप दोनों   मतभेद करके निकले और कोई तीसरा ‘उनकी’ बुराई आपसे करने लगे, तो हम ‘उनके’ पक्ष में बातें करना शुरू कर दें, तो हम ‘उनके’ पक्ष में रहे वह प्रेम।”

इसे एक प्रैक्टिकल उदाहरण से समझते हैं। हमें करीबी व्यक्ति के साथ प्रेम बनाए रखना है, लेकिन हमारे बीच टकराव होते ही रहते हैं। हमारी खिट-पिट बंद कमरे में ही हुई हो, लेकिन बाहर लोगों ने सुन ली हो, तो फिर जब हम बाहर निकलतें हैं और तब कोई तीसरा व्यक्ति हमसे आकर ये कहता है कि, “उन्होंने आपके ऊपर बहुत गुस्सा किया ना? जैसे-तैसे बोल रहे थे!” तब भी हमें करीबी व्यक्ति के पक्ष में बोलें कि, “वह तो ज़रा ऊँची आवाज़ में बात हुई, लेकिन हमारे बीच ऐसा कुछ भी नहीं है। वह दिल के बहुत अच्छे हैं।”

अर्थात्, जिस व्यक्ति के साथ हमारे रोज़ झगड़े होते ही रहते हों और वह हमारा अपमान करता है, तब भी अगर कोई तीसरा व्यक्ति उनकी नेगेटिव बात लेकर हमारें पास आए, तब हम उस नेगेटिव में बिल्कुल भी ना पड़ें, बल्कि उसे पॉज़िटिव कर दें, तब करीबी व्यक्ति के साथ प्रेम स्वरूप होते हैं। तब हमारे वाणी-वर्तन से ही नहीं, बल्कि हमारे मन से भी हमें नेगेटिव नहीं होता, तो उसका प्रभाव सामने वाले पर अवश्य पड़ता है। जब कोई हाज़िर नहीं है, तब ऐसे व्यक्ति के बारे में नेगेटिव बातें करें, तो वह नेगेटिव स्पंदन उस व्यक्ति को पहुँचते ही हैं। इसके परिणामस्वरूप भेद बढ़ता ही जाता है। अगर प्रेम स्वरूप होना है, तो वह गैरहाज़िर व्यक्ति हमारें साथ खड़ा होकर सुन रहा है, इस तरह से बोलना चाहिए।

करीबी व्यक्ति हमारे प्रति प्रेम रखे या ना रखे, लेकिन हमें ऐसा ही प्रेम रखना है। प्रेम स्वरूप होने का रास्ता ही यह है।

सभी से अभेदभाव वही प्रेम स्वरूप

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, जितना भेद कम होगा, उतना शुद्ध प्रेम उत्पन्न होगा। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ एकता होती है। प्रेम स्वरूप होते है, तब सामने वाले को अभेदता लगती है। यदि हमें अपने घर के चार-पाँच लोग ही अपने लगें और बाहर के लोग पराए लगें, ऐसा मेरा-तेरा का भेद हो, तो वहाँ भी प्रेम नहीं होता। शायद सामने वाला व्यक्ति भेद करें, क्योंकि उनके पास भेद बुद्धि है। लेकिन मन से भी हमें उस व्यक्ति के साथ जुदाई न रहे, तब प्रेम स्वरूप होते हैं।

प्रेमस्वरूप अर्थात् क्या? इसे समझाते हुए परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "सभी को अभेदभाव से देखना, अभेदभाव से वर्तन करना, अभेदभाव से चलना, अभेदभाव ही मानना। ‘ये अलग हैं’ ऐसी-वैसी मान्यताएँ सब निकाल देनी। उसका नाम ही प्रेमस्वरूप। एक ही परिवार हो ऐसा लगे।"

जब सम्पूर्ण भेद समाप्त हो जाता है, तब सम्पूर्ण शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है। यही तरीका है। जो प्रेममूर्ति बन जाता है, उसे सभी एक ही लगते हैं, जुदाई लगती ही नहीं। जब तक 'यह हमारा है और यह तुम्हारा है' ऐसा भेद है, तब तक जुदाई लगती है। जब यह रोग निकल गया, यानी प्रेममूर्ति हो ही जाते हैं!

प्रेम स्वरूप बनने की अंतिम चाबी है, सबको आत्मा के रूप में देखने की। इस तत्त्वदृष्टि से सामने वाले के साथ अभेदभाव रहता है, निर्दोष दिखता है और तब प्रेम स्वरूप होते हैं। लेकिन यह तत्त्वदृष्टि आत्मज्ञान के साथ होनी चाहिए, बुद्धि की सेटिंग से नहीं।

जैसे चूड़ी में हमें यह ध्यान रहता है कि, अंदर शुद्ध सोना ही है। वैसे ही तत्त्वदृष्टि में, सामने वाला चाहे कुछ भी करें, लेकिन आत्मभाव से हमें उसमें आत्मा ही दिखें और सामने वाला संपूर्ण निर्दोष दिखें। इस तरह, जब तत्त्वदृष्टि परिणाम पाकर अनुभव में आती है, तब प्रेम स्वरूप हुआ कहलाएगें।

प्रेमस्वरूप के रास्ते में आने वाले सोपान

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "प्रेमस्वरूप कब हुआ जाएगा? नियम-वियम न ढूंढो, तब।"  यदि कोई देर से आए, तो उसकी गलती निकालना कि "क्यों देर से आए?" तो यह प्रेम नहीं कहलाता। प्रेम में राग-द्वेष या आसक्ति नहीं होती। शुद्ध प्रेम के बदले में पैसे की, कीर्ति की, शिष्य बढ़ाने की या किसी प्रकार से विषय-विकार की मांग नहीं होती। जहाँ कुछ चाहिए, वहाँ प्रेम नहीं, बल्कि आसक्ति है।

दुनिया में लोग क्या चाहते हैं? मुक्त प्रेम। जिसमें स्वार्थ की गंध या किसी भी प्रकार का लालच न हो। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, भगवान दो जगहों पर रहते हैं। एक जहाँ प्रमाणिकता होती है और दूसरा जहाँ प्रेम हो। क्योंकि जहाँ प्रेम है, निष्ठा है, पवित्रता है, वहीं भगवान होते हैं।

प्रेम वह खुद ही परमात्मा है। प्रेमात्मा होने पर कुरूप व्यक्ति भी सुंदर लगता है। जहाँ प्रेम से काम लिया जाता है, जहाँ लेन-देन या सौदेबाजी नहीं होती, वहाँ प्रेम होता है। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ कोई ट्रिक या धोखाधड़ी नहीं होती और जहाँ धोखाधड़ी होती है, वहाँ प्रेम नहीं होता।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "निराग्रहीपन जब तक उत्पन्न नहीं होता तब तक जगत् का प्रेम संपादन नहीं होता। शुद्ध प्रेम निराग्रहता से उत्पन्न होता है और शुद्ध प्रेम वही परमेश्वर है।"

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति सत्य प्रेम की शुरूआत करें, तो भगवान हो जाए। सत्य प्रेम बिना मिलावट वाला होता है। उस सत्य प्रेम में विषय नहीं होता, लोभ नहीं होता, मान नहीं होता। वैसा बिना मिलावट वाला प्रेम, वह भगवान बना देता है, संपूर्ण बना देता है। रास्ते तो सभी आसान है, पर ऐसा होना मुश्किल है न!"

परम पूज्य दादाश्री के बताए गए रास्ते पर चलें, तो प्रेम स्वरूप होने का रास्ता खुला होता है। उन्होंने तरीका तो पूरा खुला कर दिया है। अब ज़रूरत है बस, उस दृष्टि को पकड़ कर उस रास्ते पर चलने की।

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