कबीर साहेब ने कहा है कि,
"पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।"
यह पुस्तक पढ़-पढ़कर तो पूरा जगत् मर गया, लेकिन पंडित कोई बना नहीं। शास्त्र के शास्त्र पढ़ डाले पर ढाई अक्षर प्राप्त नहीं हुए और भटक कर मर गए। लेकिन जिसे प्रेम के सिर्फ़ ढाई अक्षर समझ में आ गए वह पंडित हो गया। अगर खुद प्रेमस्वरूप हो जाए तो वहाँ पूरा शास्त्र पूर्ण हो जाता है।
परम पूज्य दादा भगवान को भी बचपन से मन में यह प्रश्न था कि प्रेम की व्याख्या क्या होगी? अंत में उन्हें प्रेम शब्द की परिभाषा मिल गई।
दादाश्री: वोट इज़ द डेफिनेशन ऑफ लव?
प्रश्नकर्ता: मुझे पता नहीं। वह समझाइए।

दादाश्री: अरे, मैं ही बचपन से प्रेम की परिभाषा ढूंढ रहा था न! मुझे हुआ, प्रेम क्या होता होगा? ये लोग ‘प्रेम-प्रेम’ किया करते हैं, वह प्रेम क्या होगा? उसके बाद सभी पुस्तकें देखी, सभी शास्त्र पढ़े, पर प्रेम की परिभाषा किसी जगह पर मिली नहीं। मुझे आश्चर्य लगा कि किसी भी शास्त्र में ‘प्रेम क्या है’, ऐसी परिभाषा ही नहीं दी?! फिर जब कबीर साहब की पुस्तक पढ़ी, तब दिल ठरा कि प्रेम की परिभाषा तो इन्होंने दी है। वह परिभाषा मुझे काम लगी। वे क्या कहते हैं कि,
“घड़ी चढ़े, घड़ी उतरे, वह तो प्रेम न होय,
अघट प्रेम ही हृदय बसे, प्रेम कहिए सोय।“
उन्होंने परिभाषा दी। मुझे तो बहुत सुंदर लगी थी परिभाषा, ‘कहना पड़ेगा कबीर साहब, धन्य है! ’ यह सबसे सच्चा प्रेम। घड़ी में चढ़े और घड़ी में उतरे वह प्रेम कहलाएगा?!
बढ़े नहीं, घटे नहीं, वह सच्चा प्रेम। जो चढ़ जाए और उतर जाए वह प्रेम नहीं, पर आसक्ति कहलाता है! जिसमें कोई अपेक्षा नहीं, स्वार्थ नहीं, मतलब नहीं या दोषदृष्टि नहीं, निरंतर एक समान रहे, फूल चढ़ाए वहाँ आवेग नहीं, गाली दे वहाँ अभाव नहीं, ऐसा अघट और अपार प्रेम, वही शुद्ध प्रेम है!
प्रेम की यथार्थ परिभाषा तो प्रेममूर्ति ज्ञानी ही दे सकते हैं। इस परिभाषा में हमें सच्चे प्रेम को नापने का थर्मामीटर मिलता है और अगर इस थर्मामीटर से नापें, तो संसार के सभी रिश्तों में जिस प्रेम की बात होती है, वह सच्चा प्रेम नहीं है। परम पूज्य दादा भगवान सच ही कहते हैं कि प्रेम वह अलौकिक भाषा का शब्द है, लेकिन लोक व्यवहार में यह शब्द इस्तेमाल हो हो कर अपना अर्थ खो चुका है। संसार में प्रेम हो ही नहीं सकता। लोग प्रेम को समझते ही नहीं।
तो अब प्रेम को समझें किस तरह? प्रेम की टेस्टिंग के बाद जहाँ टेस्ट के गलत परिणाम आएँ, वहाँ प्रेम नहीं है यह पक्का हो जाता है। इसका मतलब यह है कि प्रेम कहाँ नहीं है यह समझ में आए तो सच्च्चा प्रेम किसे कहा जाए यह समझ में आ जाएगा।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं,"जहाँ स्वार्थ हो वहाँ प्रेम रह नहीं सकता जहाँ 'मेरा-तेरा' होता है, वहाँ अवश्य स्वार्थ है।
उदाहरण के तौर पर, दो व्यक्ति प्रेम विवाह करते हैं और जब कुछ सालों के बाद उनका तलाक हो जाता है, तब जायदाद के लिए कोर्ट में दावा करते हैं। धंधे में दो पार्टनर एक-दूसरे के साथ मिलकर धंधा शुरू करते हैं। शुरू में तो दोनों के बीच बड़ा प्रेम वाला रिश्ता होता है। लेकिन सालों बीतते धीरे-धीरे मुनाफे में 'मेरा-तेरा' होने लगता है। ज़्यादा कमाने की लालच में एक पार्टनर दूसरे पार्टनर को धोखा देता है और 'मेरे' परिवार को ज़्यादा से ज़्यादा फायदा मिले ऐसा सोचकर पार्टनर को धंधे से बाहर कर देता है। तब वहाँ पार्टनरशिप में इतना ज़्यादा द्वेष उत्पन्न हो जाता है कि प्रेम की एक बूँद भी दिखाई नहीं देती। अगर दोनों के बीच में प्रेम था तो कहाँ गया?
पहले एक ही घर में दो भाई प्रेम से रहते हैं। लेकिन शादी के बाद दोनों माँ-बाप की जायदाद के लिए झगड़ते हैं और अलग हो जाते हैं। अरे, जायदाद के लिए माँ-बाप को भी घर से निकाल देते हैं। गाय दूध देती है तब तक उसे घर में रखते हैं वरना उसे कसाईखाने में भेज देते हैं। यानी कि स्वार्थ पूरा होने तक अपना मानते हैं और स्वार्थ पूरा न होने पर पराया कर देते हैं। तो फिर इसे प्रेम कैसे कहा जा सकता है?
जहाँ कोई अपनी चीज़ दूसरे को नहीं दे सकता, उल्टा दूसरों का भी खुद छिनने का रवैया रखता है, वहाँ प्रेम हो ही नहीं सकता। जहाँ सिर्फ़ अपने फायदे का ही खयाल हो, वहाँ प्रेम नहीं होता। ऐसी स्वार्थ बुद्धि हो वहाँ मेरा-तेरा का भेदभाव होता है। जहाँ स्वार्थ है वहाँ प्रेम नहीं।
अगर रिश्तों में एक-दूसरे से अपेक्षा हो कि "मैं तुम्हारे लिए इतना कुछ करता हूँ, बदले में तुमने मेरे लिए क्या किया?" हर व्यक्ति को उसने जो अच्छा किया उसके बदले में और कुछ नहीं तो सामने वाला दो अच्छे शब्द बोले, उसके काम की कदर करे ऐसी अपेक्षा होती है। जहाँ बदले की अपेक्षा है वहाँ प्रेम नहीं।
जिसके लिए हम राग में सब कुछ कर देते हैं, अगर वही व्यक्ति हमारी अपेक्षाएँ पूरी नहीं कर पाता तो हमें उसके लिए द्वेष हो जाता है। बच्चों को पाल पोसकर बड़ा किया हो तो उसके बदले में वे हमारे कहे अनुसार करें, समाज में हमारा नाम रोशन करें, ऐसी माँ-बाप को अपेक्षा होती है। अगर बच्चे कुछ उल्टा करते हैं, तो "तू मेरी कोख से पैदा न हुआ होता तो अच्छा होता!" ऐसे कड़वे शब्द भी निकल जाते हैं। पति-पत्नी के रिश्तों में एक-दूसरे से सुख पाने की अपेक्षा होती है। पत्नी अच्छा-अच्छा खाना बनाकर खिलाए ऐसी पति को या पति घर के काम में मदद करे, बाहर धक्के खाए ऐसी पत्नी को अपेक्षाएँ रहती हैं। अपेक्षा पूरी नहीं होती तब दोनों में कलह शुरू हो जाता है। पत्नी पति से कहती है कि "आप मुझे प्यार नहीं करते, आप मेरा ध्यान नहीं रखते।" और पति को शिकायत रहती है कि "तुम्हारी सभी अपेक्षाएँ मैं मर-मरकर पूरी करता हूँ फिर भी तुम्हें संतोष नहीं।" परिणाम स्वरूप घर में झगड़े होते हैं।

सच्चे प्रेम में अपेक्षा नहीं होती। जहाँ अपेक्षा है, वहाँ सिर्फ़ आसक्ति है, मोह है।
अगर सामने वाला हमारी अपेक्षा के अनुसार व्यवहार करे और हमें प्रेम से बुलाए तो हम खुश हो जाते हैं और हमारी अपेक्षा से विपरीत व्यवहार करे, हमें अपमान से बुलाए तब हम दुःखी हो जाते हैं। लेकिन सामने वाला हमारी अपेक्षा पूरी करे या ना करे इसके पीछे का रहस्य हम नहीं जानते। यह रहस्य हमें यहाँ परम पूज्य दादा भगवान बता रहे हैं।
“लोग प्रेम की आशा रखते हैं वे मूर्ख हैं सारे, फूलिश हैं। आपका पुण्य होगा तो प्रेम से कोई बुलाएगा। उस पुण्य से प्रेम है और आपके पाप का उदय हुआ तब आपका भाई ही कहेगा ‘नालायक है तू, ऐसा है और वैसा है’, चाहे जितने उपकार करो तब भी। यह पुण्य और पाप का प्रदर्शन है और हम समझते हैं कि वे ही ऐसा करते हैं।
यानी यह तो पुण्य बोल रहा है, इसलिए प्रेम तो होता ही नहीं। ‘ज्ञानी पुरुष‘ के पास जाएँ, तब प्रेम जैसी वस्तु दिखती है। बाकी, प्रेम तो जगत् में किसी जगह पर नहीं होता।“
किसी व्यक्ति के साथ अगर हम "यह मुझे भविष्य में काम आएगा" या "यह मुझे फायदा पहुँचाएगा" ऐसे इरादे से प्रेमवाला व्यवहार करते हैं, उसे मतलब कहा जाता है। जैसे, अगर कोई डॉक्टर घर आते हैं तो हम "आइए आइए" कहकर उनका स्वागत करते हैं। इसके पीछे भविष्य में अगर हमें कोई बड़ी बीमारी आई, तो ये डॉक्टर काम आएँगे ऐसी लालच होती है। लेकिन जब घर के ही साढू भाई आते हैं, तब हम उन्हें वैसे ही नजरअंदाज़ कर देते हैं, क्योंकि वे हमें कोई फायदा नहीं पहुँचाने वाले। इस प्रकार, हम भविष्य में फायदा पाने का मतलब रखते हैं, लेकिन भविष्य का हमें कुछ पता नहीं है। कौन सी घड़ी में मृत्यु आ जाएगी यह कहा नहीं जा सकता, तो फिर मतलब रखने का क्या अर्थ?
जहाँ ऐसा मतलब वाला व्यवहार होता है, वहाँ सामने वाले को भी पता चल जाता है कि "इनका इरादा मुझसे कुछ फायदा उठाने का है।" फिर वहाँ आपसी प्रेम नहीं रहता। बिना मतलब का प्रेम वह शुद्ध प्रेम कहलाता है। बल्कि सच्चे प्रेम में तो देने की, बलिदान की ही भावना होती है।
बहुत से लोग कहते हैं कि हमें ईश्वर के प्रति प्रेम है। लेकिन सच्चा प्रेम किसी भी हेतु बगैर का होना चाहिए, अहेतुकी होना चाहिए। अगर ईश्वर की पूजा-भक्ति-दर्शन के पीछे उनके पास से कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा या कामना है तो फिर ईश्वर के लिए हमारा प्रेम भी सच्चा प्रेम नहीं है। "सबका भला करना लेकिन शुरुआत मुझसे करना" ऐसे मतलब के साथ भगवान से प्रेम करेंगे तो फिर हमें भगवान के प्रति अनन्य प्रेम नहीं है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “प्रेम ऐसी चीज़ है कि दोष नहीं दिखते। इसलिए दोष दिखते हैं वह प्रेम नहीं था।“
जिनके साथ दिन-रात रहते हैं, उनके दोष देखे बिना कोई रह नहीं सकता। "उन्होंने ऐसा नहीं किया, वैसा नहीं रखा, ऐसा नहीं करते, हमेशा ऐसा ही करते हैं।" करीबी लोगों से हमें ऐसी शिकायतें बार-बार होती ही रहती हैं और हम मानते हैं कि हम एक-दूसरे से प्रेम करते हैं।
वास्तव में, जहाँ सच्चा प्रेम होता है, वहाँ सामने वाला जो कुछ भी करता है, वह सब स्वीकार्य होता है। यह तो जब पत्नी स्वादिष्ट पकौड़े बनाकर लाए तब उसके ऊपर प्रेम बढ़ जाता है, लेकिन जब वही पत्नी हीरे का महँगा सेट लेने की ज़िद करती है और पति उसे न दे पाए तब वे पूरी तरह से दोषित दिखाई देते हैं। फिर पत्नी के ऊपर प्रेम टिकता है? बेटा स्पोर्ट्स में इनाम लेकर आता है तो माँ-बाप खुश हो जाते हैं, लेकिन अगर वही बेटा एग्ज़ाम में फेल हो जाता है तो उसे गुस्से से डाँटते हैं। इसे प्रेम कैसे कहा जा सकता है? नई-नई शादी के बाद बहू ससुराल में आई हो और सास ने अपमान कर दिया हो तो बहू उसकी नोट ले लेती है। फिर वह पूरी ज़िंदगी उसे याद रखती है। अगर एक नेगेटिव नोट ली हो तो उसमें से अभाव, द्वेष और तिरस्कार होते ही रहते हैं।
जहाँ लगातार राग और द्वेष होते रहते हैं, वहाँ प्रेम नहीं होता। जिसके ऊपर प्रेम होता है, उसका एक भी दोष दिखाई नहीं देता। सामने वाले की एक भी भूल दिखाई नहीं देती।
जहाँ प्रेम होता है, वहाँ संकुचितता नहीं, विशालता होती है। कोई अपने बच्चों के लिए खिलौने लेकर आया हो और देवरानी का लड़का खेलने आए तो कहते हैं, "जल्दी से इसे छिपा दो," तो यह प्रेम नहीं कहलाएगा। प्रेमवाला तो सभी को समान रूप से देखता है और विशाल हृदय से बिना किसी भेदभाव के सभी को समा लेता है।
संकुचितता का एक सुंदर उदाहरण परम पूज्य दादा भगवान हमें यहाँ देते हैं।
प्रश्नकर्ता: प्रेम इतना संकुचित हो सकता है कि एक ही पात्र के प्रति सीमित रहे?
दादाश्री: संकुचित हो ही नहीं, उसका नाम प्रेम। संकुचित हो न, कि इतने एरिया जितना ही, तब तो आसक्ति कहलाता है। और वह संकुचित कैसा? चार भाई हों, और चारों के तीन-तीन बच्चे हों और इकट्ठे रहते हों, तो तब तक सभी घर में हमारा-हमारा बोलते हैं। ‘हमारे प्याले फूट गए’ सब ऐसा बोलते हैं। पर चारों जब अलग हो जाएँ तब उसके दूसरे दिन, आज बुधवार के दिन अलग हुए तो गुरुवार के दिन वे अलग ही बोलते हैं, ‘यह आपका और यह हमारा।‘ ऐसे संकुचितता आती जाती है। इसलिए पूरे घर में प्रेम जो फैला हुआ था, वह अब ये अलग हुए इसलिए संकुचित हो गया।
राग और मोह को भी लोग संसार में प्रेम मानते हैं! लेकिन इन दोनों में बदले की आशा होती है और वह नहीं मिले तब जो अंदर विलाप होता है, उस पर से पता चलता है कि यह शुद्ध प्रेम नहीं था।
जहाँ मोह से एक-दूसरे से बंधे हुए हों, वहाँ मोह उतरते ही बिछड़ जाते हैं। वास्तव में, सच्चा प्रेम हो तो कभी भी बिछड़ें नहीं। राग के रिश्तों में, अगर कुछ अच्छा हो जाता है तो अचानक प्रेम बढ़ जाता है और अगर कुछ उल्टा हो जाता है तो प्रेम अचानक घट जाता है। ये दोनों ही आसक्ति कहलाते हैं, प्रेम नहीं।
जहाँ कोई भी प्रकार की कामना है कि "मुझे चाहिए, कुछ पाना है," वहाँ मोह है, आसक्ति है। आसक्ति में हद से ज़्यादा अटैचमेंट होता है, व्यक्ति के लिए पज़ेसिवनेस (मालिकाना भाव) होती है। सामने वाला भी घुट-घुटकर तंग आ जाता है और रिएक्शन में दुत्कार देता है। फिर खुद ही शिकायत करता है कि "मैं उसे इतना प्रेम करता हूँ, फिर भी वह दुत्कारता है।" लेकिन सच्चे प्रेम को कोई दुत्कार नहीं सकता।
हम यह मानते हैं कि संसार में जो मनुष्य इमोशनल नहीं है, वह पत्थर जैसा है। संसार में भावनाएँ तो होनी ही चाहिए, लेकिन वास्तव में इमोशनल होना या अधिक लगाव होना वह सब आसक्ति ही है।
जैसे जब तक ट्रेन मोशन में होती है, गति में होती है तब तक सलामत है, लेकिन जब ट्रेन इमोशनल हो जाती है, तब एक्सीडेंट हो जाता है। उसी तरह जब तक इंसान सहज होता है, तब तक सब कुछ सही चलता है, लेकिन जब वह इमोशनल हो जाता है या बहुत अधिक लगाव के कारण उद्वेग में आ जाता है तब प्रेम तो दूर रहा, बल्कि खुद को और दूसरों को दुःख दे देता है।
अगर सामने वाला थोड़ा सा भी इच्छा के विरुद्ध करे न तो उसकी कमान छटक जाती है। जहाँ ज़्यादा मोह हो वहाँ अगर कुछ छिड़ जाए तो इमोशनल हो जाता है। सहज व्यवहार में बुद्धि दखल करती रहती है कि "ऐसा करूँ कि नहीं करूँ, अच्छा लगेगा? बुरा लगेगा?" किसी ने महत्त्व नहीं दिया तो, "मुझसे पूछकर क्यों नहीं किया? मेरी कोई वैल्यू ही नहीं है?" ये सब इमोशनल होने के कारण होता है। इमोशनल होने से शरीर में बहुत से जीव मर जाते हैं।
इमोशनलपन हो, लगाव हो या अत्यधिक लगाव हो, इन दोनों में ही प्रेम नहीं होता। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “कोई भी लागणी है, आसक्ति है, तब तक व्यक्ति को टेन्शन खड़ा होता है और टेन्शन से फिर चेहरा बिगड़ा रहता है।“
प्रेम की यथार्थ परिभाषा परम पूज्य दादा भगवान (दादाश्री) हमें समझाते हैं।
प्रेम अर्थात्...
जो बढ़े नहीं, घटे नहीं पर निरंतर एक समान रहे
संक्षेप में, सच्चे प्रेम में अहंकार और ममता नहीं होते। अघट (जो बढ़े नहीं, घटे नहीं) और अपार प्रेम ही शुद्ध प्रेम है! और शुद्ध प्रेम ही परमात्म प्रेम है।
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