प्रेम
सच्चे प्रेम में कोई अपेक्षाए नही रहती, न ही उसमें एक दूसरे की गलतियाँ दिखती है|
"मैं तुमसे प्रेम करता हूँ!"... "आई लव यू!"... "उसने मुझे प्रेम में धोखा दिया!"... "मम्मी, तुम मुझसे ज़्यादा भाई को प्रेम करती हो!"
व्यवहार में प्रेम शब्द इतना अधिक सामान्य हो गया है, कि हमें कदम-कदम पर यह प्रश्न उठता रहता है कि, प्रेम वास्तव में क्या है? प्रेम व्यक्त करने के लिए फीलिंग्स, इमोशन्स, अटैचमेंट, राग, मोह और वात्सल्य आदि शब्द भी प्रयोग किए जाते हैं। क्या इन भावनाओं को प्रेम कहा जा सकता है?
व्यवहारिक जीवन में अनेक जगहों पर प्रेम शब्द का प्रयोग होता है, लेकिन साथ ही साथ उसी व्यवहार या रिश्तों में जब राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं, तब प्रश्न उठता है, कि क्या इसे प्रेम कहा जाएगा? जहाँ रिश्तों में एक-दूसरे के प्रति स्वार्थ, लालच, बदले की आशा उभरती हो, वहाँ क्या वास्तव में यह प्रेम है? जहाँ एक-दूसरे पर दोषारोपण होता हो, आमने-सामने आक्षेप दिए जाते हों, तब प्रश्न उठता है कि प्रेम हो वहाँ ऐसा हो सकता है? सच्चा प्रेम किसे कहें? सच्चा प्रेम कहाँ मिलेगा?
इन सभी प्रश्नों के जवाब स्वयं प्रेममूर्ति ज्ञानी पुरुष के पास यहाँ मिलते हैं। वे सच्चे प्रेम की व्याख्या देते हैं, जिससे संसार में प्रेम के प्रति प्रचलित सभी गलत मान्यताएँ दूर हो जाती हैं। संसार में जिन्हें प्रेम के संबंध कहा जाता है, उनमें जब कड़वाहट उत्पन्न होती है, तब हृदय में अपार दुःख का अनुभव होता है। इन सभी रिश्तों में प्रेमपूर्ण व्यवहार कैसे विकसित करें, उसकी समझ यहाँ मिलती है। आज युवाओं और टीनएजर्स में प्रेम में पड़ने, प्रेम के टूटने और उसके परिणामस्वरूप हताश या डिप्रेश होने के मामले आजकल आम होते जा रहें हैं। इन सभी को सही मार्ग दिखाती हुई सुंदर समझ यहाँ स्पष्ट होती है।
पूरा जगत् सच्चे प्रेम से ही वश हो जाए ऐसा है। जिसे जगत् ने देखा नहीं, जाना नहीं, श्रद्धा में नहीं आया, अनुभव नहीं किया, ऐसा शुद्ध प्रेम वही परमात्म प्रेम है। ऐसा प्रेम जिसने चखा, फिर वह कभी भूलता नहीं! इस काल में, संसार की सभी जंजालों में जकड़े होने के बावजूद भी ऐसे शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने का मार्ग यहाँ खुला हो रहा है।
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