कोई हमसे पूछे कि क्या, आप क्रोध करते हैं या क्रोध हो जाता है? तब हम क्या कहते हैं कि, "क्रोध करने की मेरी इच्छा तो नहीं होती, लेकिन फिर भी क्रोध हो जाता है।" उसी तरह, सामने वाले व्यक्ति की भी क्रोध करने की इच्छा ना होते हुए भी उसे क्रोध आ जाता है। जैसे हमारा गुस्सा हमारे कंट्रोल में नहीं है, वैसे ही सामने वाले के कंट्रोल में भी नहीं है। यदि कोई हमारे ऊपर क्रोध करे और फिर हम उनके ऊपर क्रोध करें, तो आग और भड़क जाएगी।
जब सामने वाला क्रोध करे, तब हमें कौन सी समझ हाज़िर रखनी चाहिए, इसकी समझ परम पूज्य दादा भगवान यहाँ दे रहें हैं।
प्रश्नकर्ता: लेकिन दादा, कभी जब कोई व्यक्ति अपने सामने गरम हो जाए, तब क्या करना चाहिए?
दादाश्री: गरम तो हो ही जाएँगे न! उनके हाथ में थोड़े ही है? अंदर की मशीनरी हाथ में नहीं है न! यह तो जैसे-तैसे करके मशीनरी चलती रहती है। यदि खुद के हाथ में होता तो कोई मशीनरी गरम होने ही नहीं देता न!
वह कहते हैं कि “गरम हो जाना, भयंकर निर्बलता कहलाती है। अत: जब बहुत अधिक निर्बलता होगी, तभी गरम होगा न! अत: जो गरम होता है उस पर तो दया रखनी चाहिए कि इस बेचारे का इस पर बिल्कुल भी कंट्रोल नहीं है। जिसका खुद का स्वभाव ही उसके कंट्रोल में नहीं है, उस पर दया रखनी चाहिए।"
कई बार हम ऐसा कहते हैं कि "मुझे तो क्रोध नहीं करना था लेकिन उन्होंने क्रोध किया तो मुझे भी गुस्सा आ गया!" लेकिन सामने वाला क्रोध करे तो यह उसकी कमजोरी है पर अगर हम भी उसके सामने क्रोध करें तो हम भी कमजोर हो गए! फिर जैसे आमने-सामने बम-गोले फेंके जाते हैं ऐसा युद्ध शुरू हो जाता है और आसपास के लोग तमाशा देखने इकट्ठा हो जाते हैं क्योंकि उन्हें नई फिल्म देखने को मिलती है।
फिर भी कई लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि हम शांत हो भी जाएँ, तब भी अगर सामने वाला क्रोध करे तब क्या करें? परम पूज्य दादा भगवान इसकी सुंदर समझ देते हैं।
प्रश्नकर्ता: हम कितने भी शांत रहे लेकिन पति क्रोध करे तो हमें क्या करना चाहिए?
दादाश्री: वह क्रोध करे और उसके साथ झगड़ा करना हो तो आपको भी क्रोध करना चाहिए अन्यथा नहीं! यदि फिल्म बंद करनी हो तो शांत हो जाना। फिल्म बंद नहीं करनी हो तो पूरी रात चलने देना, कौन मना करता है? क्या आपको पसंद है ऐसी फिल्म?
प्रश्नकर्ता: नहीं, ऐसी फिल्म पसंद नहीं है।
दादाश्री: क्रोध करके क्या करना है? वह आदमी खुद क्रोध नहीं करता है, यह तो ‘मिकेनिकल एडजस्टमेन्ट’ (डिस्चार्ज होती मनुष्य प्रकृति) क्रोध करता है। इसलिए फिर खुद को मन में पछतावा होता है कि यह क्रोध नहीं किया होता तो अच्छा था।
प्रश्नकर्ता: उसे ठंडा करने का उपाय क्या है?
दादाश्री: वह तो यदि मशीन गरम हुई हो और ठंडी करनी हो तो थोड़ी देर बंद रखने पर अपने आप ठंडी हो जाएगी और यदि हाथ लगाएँ या उसे छेड़ेंगे तो हम जल जाएँगे।
प्रश्नकर्ता: मेरे और मेरे हज़बेन्ड के बीच क्रोध और बहस हो जाती है, कहा सुनी वगैरह। तो मैं क्या करूँ?
दादाश्री: क्रोध तू करती है या वह? क्रोध कौन करता है?
प्रश्नकर्ता: वह, फिर मुझ से भी हो जाता है।
दादाश्री: तो आप भीतर ही खुद को उलाहना देना, ‘क्यों तू ऐसा करती है? पहले किया हुआ तो भुगतना ही होगा न!’ लेकिन प्रतिक्रमण करने से ये सभी दोष खत्म हो जाएँगे। वर्ना हमारे ही दिए हुए दु:ख हमें भुगतने पड़ते हैं लेकिन प्रतिक्रमण करने पर ज़रा ठंडे पड़ जाते हैं।
जब सामने वाला गर्म होता है, तब हमें नरम पड़ जाना चाहिए। तब सामने वाला किसी दिन खुद ही नरम हो जाएगा। जब सामने वाला कुछ उल्टा बोले, तब हम गुस्से में आकर उसे दबाने की कोशिश करें तो उससे वह नरम नहीं होगा। शायद आज वह नरम और दबा हुआ दिखाई दे, लेकिन वह अपने मन में यह बात नोट (दर्ज) कर लेता है और फिर जिस दिन हम नरम होते हैं उस दिन सब कुछ एक साथ बाहर निकाल कर वसूल कर लेता है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, "अर्थात् जगत् बैर वाला है। कुदरत का नियम ऐसा है कि प्रत्येक जीव भीतर बैर रखता ही है। भीतर परमाणुओं का संग्रह करके रखता है, इसलिए हमें पूर्ण रूप से केस हल कर देना है।"
यदि हम किसी व्यक्ति पर क्रोधित हो गए हैं और उसे दुःख पहुँच गया, फिर बाद में हम अंदर पछतावा करते हैं कि यह गलत हुआ, लेकिन यदि सामने वाला व्यक्ति "यह क्रोधित है" ऐसा अभिप्राय दे, तो हमें अच्छा लगेगा? उसी तरह, सामने वाला व्यक्ति भी आज गुस्सा होकर कल पछतावा करता होगा इसलिए वह हमेशा का ही क्रोधी है हमें ऐसा अभिप्राय नहीं देना चाहिए।
जब बच्चों को घर में पढ़ाई के मामले में, काम-काज के मामले में, नौकरी-धंधे में और बच्चों के विवाह के बाद घर के व्यवहार के मामलों में अगर माता-पिता गुस्से में कोई टोका-टोकी कर देते हैं तब बच्चे भी उनके सामने गुस्सा हो जाते हैं। जनरेशन गैप के कारण अगर कोई मतभेद हों तो वहाँ पर भी बच्चे और युवा अपने माता-पिता पर गुस्सा होकर उन्हें दुःख पहुँचा देते हैं।
उस समय उन्हें यह विचार करना चाहिए कि गुस्सा करने से कोई समाधान नहीं मिलता है। इसके बजाय, माता-पिता कहें वैसे एडजस्ट हो जाना चाहिए। उनके कहे अनुसार करेंगे, तो माता-पिता राज़ी होते हैं और घर में शांति रहेगी। यदि आवश्यक हो, तो उनके साथ बैठकर बातचीत करनी चाहिए। उन्हें समझाना चाहिए कि हमारे क्या संजोग हैं, क्या विचार हैं जिनके कारण हमें उनकी बात योग्य नहीं लग रही है।
बचपन से जिन्होंने हमें खिला-पिला कर बड़ा किया, हमारी बीमारी में हमारा ध्यान रखा, पढ़ाया, संस्कार दिए जिनकी वजह से हमारा जीवन है, उन माता-पिता के उपकार को कैसे भुलाया जा सकता है? यह ध्यान में रहे तो माता-पिता गुस्सा करें तब भी हम उनके सामने रिएक्ट होकर दुःख नहीं देंगे।
बच्चे जब छोटे होते हैं तभी से अगर उनकी मनमानी न हो तो वह अपनी ज़िद पूरी करने के लिए माता-पिता के ऊपर गुस्सा करते हैं। माता-पिता बच्चों का गुस्सा कम हो जाए उसके लिए उन्हें समझाकर, डराकर, धमकाकर उनका गुस्सा बंद करने की कोशिश करते हैं। लेकिन कोई उपाय काम नहीं करता। इसलिए माता-पिता की शिकायत रहती है कि हमारे बहुत समझाने पर भी बच्चे गुस्सा करते हैं, उनका क्रोध कैसे शांत करें? इसके लिए परम पूज्य दादा भगवान एक अचूक उपाय बताते हैं।
यदि माता-पिता ऐसा चाहते हैं कि छोटे बच्चे उनके ऊपर गुस्सा न करें, तो सबसे पहले माता-पिता को खुद गुस्सा करना बंद कर देना चाहिए क्योंकि बच्चे जो घर में देखते हैं, वही सीखते हैं। बचपन से ही बच्चे घर में देखते हैं कि मम्मी-पप्पा गुस्सा करते हैं, तो उन्हें लगता है कि ऐसा करना ही ठीक है। इसलिए यदि किसी भी स्थिति में माता-पिता बच्चों के सामने गुस्सा नहीं करेंगे, तो बच्चों का गुस्सा अपने आप ही बंद हो जाएगा।
जब सामने वाला व्यक्ति क्रोध करे तब अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से रिएक्ट करते हैं। कोई सामने बोल देता है, किसी को अंदर ही अंदर अकुलाहट होती है लेकिन वह बाहर कुछ नहीं बोलते, जबकि कुछ लोगों के अंदर के दरवाजे बंद हो जाते हैं। पर इन सभी में हमारे अंदर जो कषाय उत्पन्न होते हैं, उनमें हमारा ही समय और शक्ति बेकार होती है। इसलिए जब सामने वाला क्रोध करे तब हमें अपनी शक्तियों को सही दिशा में मोड़ना चाहिए।
सामने वाले व्यक्ति की शुद्धात्मा को याद करके उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि, "हे भगवान, उनके मन का समाधान हो ऐसी शक्ति दो। उनको मेरी वज़ह से क्रोध हो रहा है, इसके लिए मैं माफ़ी माँगता हूँ। उनको शांति मिले ऐसी प्रार्थना करता हूँ।"
जब कोई हमारे ऊपर बार-बार क्रोध करे तब यदि संभव हो तो उनके साथ शांति से बैठकर आमने-सामने बात-चीत करनी चाहिए। उनसे प्रेम से पूछना चाहिए, कि मेरी कहाँ भूल हो रही है, मुझे बताइए। घर में या काम-काज की जगह में जब सामने वाला व्यक्ति एक बात कहने के लिए उग्र होकर आठ-दस वाक्य बोले, तो हमें उसमें से अतिरिक्त वाक्यों को हटाकर बात का आशय समझ लेना चाहिए। अगर बात सही लगे तो उसे स्वीकार कर, सुधार लेना चाहिए। सामने वाले का पॉजिटिव देखना चाहिए कि "उनसे क्रोध हो गया, लेकिन वह दिल के बहुत अच्छे हैं।" ऐसी समझ रखने से हमारी शक्ति बढ़ती है और सामने वाले के मन का समाधान होने से उनका क्रोध बंद हो जाता है।
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