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यदि मैं सही हूँ तो, मुझे क्यों एडजस्ट होना चाहिए?

'ज्ञानी' तो सामनेवाला टेढ़ा हो तो भी उसके साथ एडजस्ट हो जाते हैं। 'ज्ञानीपुरुष' को देखकर चले तो सभी तरह के एडजस्टमेन्ट लेना सीख जाएगा। इसके पीछे का साइन्स क्या कहता है कि वीतराग हो जाओ, राग-द्वेष मत करो। यह तो भीतर थोड़ी आसक्ति रह जाती है, इसलिए मार पड़ती है। व्यवहार में जो एकपक्षीय-निस्पृह हो चुके हों, वे टेढ़े कहलाते हैं। आपको ज़रूरत हो, तब सामनेवाला यदि टेढ़ा हो, फिर भी उसे मना लेना चाहिए। स्टेशन पर मज़दूर की ज़रूरत हो और वह आनाकानी कर रहा हो, फिर भी उसे चार आने ज़्यादा देकर मना लेना होगा और नहीं मनाएँगे तो वह बैग हमें खुद ही उठाना पड़ेगा न!

डोन्ट सी लॉज़, प्लीज़ सेटल सामनेवाले को सेटलमेन्ट लेने को कहना, 'आप ऐसा करो, वैसा करो' ऐसा कहने के लिए वक्त ही कहाँ है? सामनेवाले की सौ भूलें हो, फिर भी आपको तो खुद ही भूल है' कहकर आगे बढ़ जाना है। इस काल में लॉ थोड़े ही देखा जाता है? यह तो आखिरी हद तक पहुँच चुका है। जहाँ देखें वहाँ दौड़धाम, भागमभाग! लोग उलझ गए हैं। घर जाए तो वाइफकी शिकायतें, बच्चों की शिकायतें, नौकरी पर जाए तो सेठजी की शिकायतें, रेल में जाए तो भीड़ में धक्के खाता है। कहीं भी चैन नहीं। चैन तो होना चाहिए न? कोई लड़ पड़े तो उस पर दया आनी चाहिए कि 'अरे, इसे कितना तनाव होगा कि लड़ पड़ा!' जो अकुलाएँ, वे सभी कमज़ोर हैं।

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