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मन की शांति के लिए ‘एडजस्ट एवरीव्हेर’

क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि, कुदरत में ऐसी कई चीजें हैं जो अपने आस-पास के वातावरण के अनुसार एडजस्ट हो जाती हैं?

  • जैसे नदी का पानी अपने रास्ते में आने वाले पेड़ों, चट्टानों और पत्थरों के साथ आसानी से एडजस्ट हो जाता है। यह सब केवल अपनी मंजिल यानी समुद्र तक पहुँचने के लिए होता है!
  • या जैसे सूखे इलाकों या रेगिस्तान में, पेड़ों की जड़ें पानी की खोज में ज़मीन में दूर-दूर और गहराई तक फैल जाती हैं। इस तरह पेड़ रेगिस्तान में एडजस्ट कर लेते हैं।
  • कुछ खास ऋतुओं में, पक्षियों और जानवरों को अपने जीवन को बचाने के लिए पलायन करना पड़ता है।

ये तो कुदरत के अपने आस-पास के वातावरण के साथ एडजस्ट होने के बस कुछ ही उदाहरण हैं।

लेकिन...

जीवन में एडजस्ट होने के पीछे क्या उद्देश्य है?

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परम पूज्य दादा भगवान ने ‘एडजस्ट एवरीव्हेर’ के रूप में हमें एक अद्भुत चाबी प्रदान की है। तो चलिए, जीवन में एडजस्ट होने के पीछे क्या उद्देश्य है, यह उन्हीं के शब्दों में पढ़ते हैं:

प्रश्नकर्ता: ‘एडजस्टमेन्ट’ की जो बात है, उसके पीछे क्या भाव है? कहाँ तक ‘एडजस्टमेन्ट’ लेना चाहिए?

दादाश्री: भाव शांति का है, हेतु शांति का है। अशांति पैदा नहीं होने देने की तरकीब है। ‘दादाजी’ का विज्ञान ‘एडजस्टमेन्ट’ का है। ग़ज़ब का ‘एडजस्टमेन्ट’ है यह। और जहाँ ‘एडजस्ट’ नहीं होते, वहाँ आपको उसका स्वाद तो आता ही होगा न?! ‘डिस्एडजस्टमेन्ट’ ही मूर्खता है। ‘एडजस्टमेन्ट’ को हम न्याय कहते हैं। आग्रह-दुराग्रह न्याय नहीं कहलाता। किसी भी प्रकार का आग्रह, न्याय नहीं है। हम किसी भी बात पर अड़े नहीं रहते।

अभी तक एक भी व्यक्ति हमसे डिस्एडजस्ट नहीं हुआ है। जबकि इन लोगों के साथ तो घर के चार सदस्य भी एडजस्ट नहीं हो पाते। क्या एडजस्ट होना आएगा या नहीं? ऐसा हो सकेगा या नहीं? हम जैसा देखें वैसा तो हमें आ जाता है न? इस संसार का नियम क्या है कि जैसा आप देखोगे, उतना तो आपको आ ही जाएगा। उसमें कुछ सीखने जैसा नहीं रहता। क्या नहीं आएगा? मैं आपको जो उपदेश देता रहता हूँ न, वह नहीं आएगा। लेकिन आप मेरा आचरण देखोगे तो आसानी से आ जाएगा।

हम भले ही इस दुनिया के बारे में बहुत कम जानते हों, यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। हमें अपने कार्यक्षेत्र के बारे में भी बहुत कम जानकारी हो सकती है, वह भी ठीक है। लेकिन अपने मन की शांति के लिए हमें एडजस्ट होना आना बहुत ज़रूरी है। हमें एडजस्ट होना तो सीखना ही पड़ेगा, वरना हम ही दुखी होंगे। इस सीख को जीवन में उतारकर हम अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं।

जीवन में आसानी से एडजस्ट होने की समझ

  • हम पृथ्वी पर बहुत कम समय के लिए ही आए हैं, इसलिए हमें टेम्पररी चीज़ों के लिए आपस में टकराने में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। जब हमारी मृत्यु होगी तब हमारे साथ कुछ भी नहीं आएगा, इसलिए हमें एडजस्ट हो जाना चाहिए। 
  • यदि हम रेगिस्तान में बर्फ के पहाड़ की मालिकी के लिए आपस में बहस करेंगे, तो हमारा ही समय बर्बाद होगा, क्योंकि अंत में बर्फ का पहाड़ तो पिघल ही जाएगा और हमारे हाथ कुछ भी नहीं आएगा। वास्तव में, हर चीज़ का अंत निश्चित है, इसलिए बेहतर यही है कि हम एडजस्ट हो जाएँ और मन की शांति बनाए रखें।
  • यदि कोई गलती करे, तो उनके दोष निकालने के बजाय उनके साथ एडजस्ट हो जाना ज़्यादा बेहतर है। कितनी बार हमारे साथ ऐसा होता है कि जब हम खुद तो गलतियाँ नहीं करना चाहते, लेकिन फिर भी वे हो जाती हैं, क्योंकि वह हमारे हाथ में नहीं है। इसी प्रकार, सामने वाला व्यक्ति भी भूल न करना चाहते हुए भी भूल कर बैठता है, इसलिए हमें यह समझकर एडजस्ट हो जाना चाहिए। दूसरी तरफ़, अगर कोई हमें बार-बार टोक रहा है, तब यहाँ हमारी भूमिका बदल जाती है। हमें यह समझना होगा कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं, यानी उनका दृष्टिकोण क्या है, क्योंकि अंत में वे हमारे भले के लिए ही हमें सलाह दे रहे हैं। यदि हम इन दोनों ही परिस्थितियों में अपनी भूमिका को समझने में कामयाब हो जाते हैं, तो इसमें हमारा ही फ़ायदा है।
  • हमारे घर में हर व्यक्ति का व्यक्तित्व और जीवनशैली अलग-अलग होती है, लेकिन अंततः वे हमारे अपने ही लोग हैं। अगर हम बार-बार टोकने और दखल देने के बजाय उन्हें अपने तरीके से जीने दें, तो वे खुश रह सकते हैं। इसलिए, सभी के लिए यही बेहतर है कि हम उनके स्वभाव को समझकर उनके साथ एडजस्ट हो जाएँ।
  • यदि हमारे जीवन में टकराव बढ़ेंगे, तो आपस में मतभेद पैदा होंगे, अततः हमारे घर से प्रेम चला जाएगा। इसके बजाय, यदि हम हमारे घर व आसपास के लोगों के साथ एडजस्ट होंगे, तो हमारे बीच प्रेम बना रहेगा।
  • यदि आप एडजस्ट नहीं होते और सामने वाले व्यक्ति को दुःख देते रहते हैं, तो उसी समय वह दुःख हमें खुद ही घेर लेता है। यदि हम सामने वाले व्यक्ति को दोषित नहीं देखेंगे, तभी हम खुश रह पाएँगे।

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “संयोग तो सारे बदलते रहेंगे। वे खुद “एडजस्ट” नहीं होंगे, आपको “एडजस्ट” होना पड़ेगा। संयोगों में भाव नहीं हैं और हम में भाव हैं। संयोगों को अनुकूल करना वह अपना काम। प्रतिकूल संयोग भी अनुकूल ही हैं। सीढ़ियाँ चढ़ते समय हाँफते हैं, लेकिन क्यों चढ़ते हैं? ऊपर जा पाएँगे, ऊपर का लाभ मिलेगा, यह भाव रहता है!"

यदि हम जीवन में प्रगति करना चाहते हैं और मन की शांति और सुख का अनुभव करना चाहते हैं, तो ‘एडजस्ट एवरीव्हेर’ अपने मनचाहे लक्ष्य तक पहुँचने का सबसे ज़रूरी और पहला कदम है।

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