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एडजस्टमेन्ट लेने का हेतु क्या है और हमें किस हद तक एडजस्टमेन्ट लेना चाहिए ?

प्रश्नकर्ता : 'एडजस्टमेन्ट' की जो बात है, उससे पीछे भाव क्या है? फिर कहाँ तक 'एडजस्टमेन्ट' लेना चाहिए?

दादाश्री : भाव शांति का है, हेतु शांति का है। अशांति पैदा नहीं होने देने का कीमिया है। 'दादाजी' का 'एडजस्टमेन्ट' का विज्ञान है। गज़ब का 'एडजस्टमेन्ट' है यह। और जहाँ 'एडजस्ट' नहीं होते, वहाँ आपको उसका स्वाद तो आता ही होगा न?! 'डिसएडजस्टमेन्ट' ही मूर्खता है। 'एडजस्टमेन्ट' को हम न्याय कहते हैं। आग्रह-दुराग्रह, वह कोई न्याय नहीं कहलाता। किसी भी प्रकार का आग्रह, न्याय नहीं है। हम किसी भी बात पर अड़े नहीं रहते। जिस पानी से मूँग पकते हों, उसमें पका लेते हैं। अंत में गटर के पानी से भी पका लेते हैं!

अभी तक एक भी मनुष्य हम से डिसएडजस्ट नहीं हुआ है। और इन लोगों को तो घर के चार सदस्य भी एडजस्ट नहीं होते हैं। यह एडजस्ट होना आएगा या नहीं आएगा? ऐसा हो सकेगा कि नहीं हो सकेगा? हम जैसा देखें ऐसा तो हमें आ जाता है न? इस संसार का नियम क्या है कि जैसा आप देखोगे उतना तो आपको आ ही जाएगा। उसमें कुछ सीखने जैसा नहीं रहता। क्या नहीं आएगा? मैं जो आपको केवल उपदेश देता रहूँ, तो वह नहीं आएगा, लेकिन मेरा आचरण आप देखोगे तो आसानी से आ जाएगा।

यहाँ घर पर 'एडजस्ट' होना नहीं आता और आत्मज्ञान के शास्त्र पढ़ने बैठे होते हैं! छोड़ न! पहले 'यह' सीख न! घर में 'एडजस्ट' होना तो कुछ आता नहीं है। ऐसा है यह संसार।

संसार में और कुछ भले ही न आए, तो कोई हर्ज नहीं। धंधा करना कम आता हो तो हर्ज नहीं है, लेकिन एडजस्ट होना आना चाहिए। अर्थात्, वस्तुस्थिति में एडजस्ट होना सीखना चाहिए। इस काल में एडजस्ट होना नहीं आया तो मारा जाएगा। इसलिए 'एडजस्ट एव्रीव्हेर' होकर काम निकाल लेने जैसा है।

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