शंका किसे कहें? किसी व्यक्ति या बात पर विश्वास न आए, वह शंका नहीं है। बल्कि जो शक रात में सोने न दे, जिससे परिवार अस्त-व्यस्त हो जाए, वह शंका है। जीवन में खासकर नज़दीकी संबंधों में शंकाएँ उत्पन्न होती रहती है। सामान्य तौर पर यदि पति किसी दूसरी महिला के साथ हँस-हँसकर बातें करता हो, तो पत्नी के मन में शक पैदा हो जाता है। उसी तरह यदि पत्नी किसी के साथ हँसकर बातें करती हो, तो पति के मन में शक पैदा हो जाता है। फिर दोनों एक-दूसरे को ताने-वाने मारकर या आक्षेप लगाकर दुःख पहुँचाते हैं। लड़की कॉलेज से देर से आए, तो संदेह होता है कि कहाँ गई होगी?

जिसके प्रति अत्यंत मोह होता है वहाँ सबसे ज़्यादा संदेह होता है, वो भी बिना किसी कारण के। आजकल जहाँ संबंधों में एक-दूसरे के प्रति वफादारी कम है, वहीं विवाहेतर संबंध व्यापक हो गए हैं, युवाओं में शादी से पहले डेटिंग का चलन बढ़ गया है, ऐसे इस कलियुग के वातावरण में विश्वास न रह पाए ऐसा हो सकता है। उसमें भी “आजकल किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, नज़र तो रखनी ही पड़ती है!” इस प्रकार की लोकमान्यता आग में घी डालने का काम करती है।

एक दिन शंका की नज़र से देखें ऐसा नहीं है, लेकिन रोज़-रोज़ आशंका होती रहती है, जिसका कोई अंत नहीं होता। आगे बढ़कर मन में तरह-तरह की कुशंकाएँ उत्पन्न होती हैं, फिर ऐसा वास्तव में हुआ हो या न भी हुआ हो। संदेह करके मनुष्य खुद तो दुःखी होता ही है और आस-पास वालों को भी दुःखी कर देता है। इसलिए जितनी हो सके उतनी सावधानी रखें और समझदारी से काम लें, लेकिन संदेह न करें।

यहाँ हमें परम पूज्य दादाश्री से शंका कहाँ-कहाँ और क्यों होती है? इससे क्या नुकसान होता है? शंका खड़ी हो ऐसे संयोगों में कौन-सी सावधानी रखनी चाहिए इन सभी की प्रैक्टिकल समझ प्राप्त होती है।

शंका के स्थान:

पति-पत्नी के बीच शक

सबसे ज़्यादा शक पति-पत्नी के बीच होता है। यदि पति के फोन में भूल से किसी अनजान नंबर से कोई अजीब सा मैसेज आ जाए, तो पत्नी को शक होने लगता है कि हसबैंड का कोई लफड़ा तो नहीं है न? आजकल ऐसे स्पैम मैसेज आते रहते हैं, इसमें पति को पता भी नहीं होता कि कौन ऐसे मैसेज भेज रहा है। लेकिन पत्नी की दृष्टि में आते ही तूफान शुरू हो जाता है! पत्नी हर रोज़ पति का फोन चेक करती है और बार-बार पता लगाती है कि पति के फोन में कौन मैसेज करता है, किसके साथ बातें करता है, किसे मैसेज भेजता है। ऑफिस से आने में पति को देर क्यों होती है? पति का कोई दूसरा लफड़ा तो नहीं है न? पति के कोई गलत संबंध न हों, फिर भी पत्नी के दिमाग में शक का कीड़ा एक बार घुस जाए तो फिर निकलता नहीं है। पति चाहे जितना समझाए, फिर भी पत्नी मानती नहीं है। बात इतनी बिगड़ जाती है कि अंत में डायवोर्स की नौबत आकर खड़ी हो जाती है।

Suspicion

उसी तरह, पति को भी पत्नी के ऊपर शक होता है। यदि पत्नी किसी दूसरे पुरुष के साथ फोन पर बात करे, तो पति को शक होता है कि किसके साथ बात कर रही है? किसकी आवाज़ है, कोई दूसरा पुरुष तो नहीं है न ? रात को पत्नी पास में न सो रही हो, तो पता करने जाता है कि कहाँ गई? पत्नी घर से बाहर जाए और देर से आए, तो शक होता है। पति पत्नी की जासूसी करने लगता है कि वह घर से बाहर कहाँ जाती है, कब आती है, किससे मिलती है। फिर वास्तविकता में कुछ हो या न हो, लेकिन शंका खुद को ही खा जाती है। गलती से भी यदि पत्नी को किसी दूसरे पुरुष के साथ बातें करते हुए देख लिया, तो मुसीबत आ जाती है! कई बार तो पति को खुन्नस चढ़ती है कि पत्नी ने उसके साथ धोखा किया है और उसे मार डालने तक के विचार आ जाते हैं। हकीकत में दूसरा पुरुष पत्नी का पुराना मित्र या साथ में काम करने वाला हो सकता है। पति का गुस्सा देखकर पत्नी चाहे जितनी भी माफ़ी माँगे, कोई दोष न होते हुए भी दोबारा किसी पुरुष के साथ बात नहीं करने का वादा करे, फिर भी पति के मन से शक का कीड़ा पूरी ज़िंदगी नहीं निकलता।

माता-पिता का बच्चों पर संदेह

जो चीज़ अत्यंत प्रिय हो, उसी पर संदेह होता है। बच्चों पर माता-पिता को अत्यंत मोह और पज़ेसिवनेस होती है, इसलिए संदेह करते ही रहते हैं। आजकल जब लड़के-लड़कियाँ टीनएज में आते हैं, कॉलेज में जाने लगते हैं, तभी से माता-पिता को चिंता होने लगती है कि “क्या कर रहे हैं? किसके साथ बातें करते हैं?” उनका फोन बजे तब भी, “सामने कोई बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड तो नहीं है न?” ऐसा संदेह बना रहता है। लड़कियाँ बड़ी होती हैं और पिता के मन में संशय होता ही रहता है कि “अब लड़कियों की उम्र हो गई है, क्या करती होंगी? कहाँ जाती होंगी? वे किन्हें फ्रेंड्स बनाती होंगी?” फिर यह संदेह उन्हें मार डालता है।

Suspicion

माता-पिता को यदि बच्चों पर संदेह करने लगें, तो फिर एक-दूसरे के ऊपर का विश्वास उड़ जाता है और प्रेम जैसी वस्तु ही नहीं रहती। माता-पिता क्रोध में इमोशनल होकर कुछ भी बोल देते हैं, तब बच्चों का मन टूट जाता है और वे और अधिक बिगड़ जाते हैं। खुद को संदेह का भूत लग गया तो वह पूरी रात नहीं छोड़ता, महीनों तक चलता ही रहता है। अंत में माता-पिता तो दुःखी होते ही हैं और बच्चे भी तंग आ जाते हैं।

परिस्थितियों के कारण संदेह

कुछ परिस्थितियों में हमें संदेह खड़ा होता रहता है। जैसे कि, किसी को पैसे दिए हों तो वह वापस देगा या नहीं देगा? यदि पैसों पर अत्यधिक प्रेम हो, तो धंधे में भागीदार के ऊपर संदेह होता रहता है कि कहीं वह पैसे तो नहीं ले लेता होगा? हमने ही कोई कीमती गहना भूल से कहीं रख दिया हो और वह न मिले, तब घर में नौकरों के ऊपर संदेह करें कि कहीं चुरा तो नहीं लिया होगा न? परिणामस्वरूप हमें चैन नहीं पड़ता, वह संदेह है।

बाहर गाड़ी में घूमने गए हों तो आशंका होती है कि कहीं एक्सीडेंट हो जाएगा तो? कहीं जा रहे हों और आशंका होने लगे कि कोई मेरा सामान चोरी कर लेगा तो? ये सभी आशंकाएँ हमें परेशान कर देती हैं।

कुछ परिस्थितियों में हमें लगता है कि संदेह करना ज़रूरी है, पर वह वास्तव में संदेह नहीं होता। जैसे, वैज्ञानिक अपनी खोज पर संदेह करके आगे दूसरी खोज करते हैं, वह संदेह नहीं बल्कि जिज्ञासा है।

शंका के कारण:

अत्यधिक मोह और मालिकी भाव

शंका का कारण है अत्यधिक मोह और राग। पति को पत्नी के प्रति अत्यधिक मोह हो तो पत्नी के छोटे-छोटे आचरणों पर शंका होती है। इसी प्रकार पत्नी को भी पति के प्रति अत्यधिक मोह और मालिकी भाव हो कि “मेरा पति मेरा ही रहना चाहिए!”, इसलिए शक पैदा होने लगता है। हकीकत में कुछ न हो तो भी एक-दूसरे पर आक्षेप लगाते रहते हैं। पड़ोस में रहने वाले पति-पत्नी किसी और के साथ संबंध रखें तो क्या हमें शक होता है? नहीं। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस व्यक्ति के प्रति अत्यधिक मोह हो, जिसके ऊपर बहुत पज़ेसिवनेस हो, वहीं शक होता है। ऐसा शक भूत की तरह चिपक जाता है, जो पूरी रात सोने नहीं देता।

Suspicion

विपरीत बुद्धि

शंका की जड़ है विपरीत बुद्धि, जिसे व्यभिचारिणी बुद्धि कहा गया है। बुद्धि ही उल्टा दिखाती है, सबसे पहले वहम पैदा करती है और अनर्थ शंकाएँ खड़ी कर देती है। जिन लोगों के पास ज़रूरत भर की ही बुद्धि होती है, उन लोगों को शंका परेशान नहीं करती। जो बहुत बुद्धिशाली होते हैं, उन्हें ही शंका बहुत परेशान करती है। मान लीजिए कि किसी बुद्धिशाली व्यक्ति की चार बेटियाँ हों। वे बड़ी होकर युवावस्था में घर से बाहर जाएँ, तो उसके मन में चारों ओर के विचार घूमने लगते हैं कि “कहाँ जाती होंगी? किससे मिलती होंगी? देर क्यों हो गई?” और खुद ही उलझता रहता है। कुछ हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन संदेह के कारण खुद मारा जाता है। जबकि जिसके पास ज़रूरत भर की ही बुद्धि हो और उसकी चार बेटियाँ हों फिर भी उसे कोई संदेह नहीं होता। इसलिए शंका वह अधिक बुद्धि की दखलंदाजी है।

शंका से नुकसान:

कई लोगों को ऐसा लगता है कि “भाई, बात सच हो तो शंका तो करनी ही पड़ती है न!” लेकिन शंका करने से एक बाल जितनी भी मदद नहीं मिलती, उल्टा अनेक गुना नुकसान होता है। यदि शंका से दस प्रतिशत फ़ायदा होता हो और नब्बे प्रतिशत नुकसान होता हो, तब भी उसे चलने दें। लेकिन हकीकत में शंका से बिल्कुल भी फ़ायदा नहीं होता और बेहद नुकसान होता है।

शंका वह विनाश का कारण है। शंका हो जाए तो उसका अंत नहीं आता, मनुष्य खत्म हो जाता है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “इस दुनिया में शंकाशील और मृत, दोनों एक सरीखे ही हैं।” एक मिनट से ज़्यादा शंका हो, तो वह ज़हर पीकर आत्महत्या करने के बराबर है।

श्रीकृष्ण भगवान ने भी गीता में कहा है, “संशयात्मा विनश्यति”, अर्थात् जिस व्यक्ति को व्यवहार में हर जगह संदेह होता है पत्नी में, पिता में, माता में, भाई में, वह मनुष्य जीएगा ही कैसे?

शंका से मनुष्य का वजन बढ़ता नहीं, बल्कि घटता है। जीवित मुर्दा ही देख लीजिए। किसी भी परिस्थिति में शंका करने से जो घटना घटित होने वाली है, वह कहीं रुकती तो नहीं है, बल्कि उल्टा शंका का रोग घुस जाता है, जो मनुष्य को जीते-जी मानसिक और शारीरिक रूप से खत्म कर देता है।

जब हम किसी व्यक्ति पर संदेह करते हैं तब दो चीज़ें होती हैं। एक तो हमें दुःख होता है। और दूसरा, सामने वाले व्यक्ति पर संदेह करने का गुनाह लगता है। एक बार यदि शंका की बेल बढ़ी तो वह चैन से बैठने नहीं देती। शंका ने तो बड़े-बड़े राजाओं और चक्रवर्तियों को मार डाला।

दुनिया में यदि सबसे बड़ा रोग हो तो वह शंका है! सभी प्रकार के ताप, संताप, परिताप और उत्ताप वह शंका से ही उत्पन्न होते हैं। शंका वह प्रत्यक्ष दुःख है! शंका में गहरे उतरें तो मरण तुल्य दुःख होता है। शंका का परिणाम तो खुद को अकेले ही भुगतना है; सामने वाले का जो होना होगा, वह होगा। शंका यानी खुद गड्ढा खोदकर उसमें खुद ही गहरे उतरना। फिर उसमें से बाहर नहीं निकला जाता है।

शंका वह भूत जैसी है, चिपक जाती है। शंका की बजाय डायन चिपकी हो तो वह अच्छी है, उसे ओझा उतार देता है। लेकिन शंका चिपक जाए तो नहीं जाती। एक बार शंका घुसने के बाद कभी नहीं निकलती, इसलिए शंका को घुसने ही नहीं देना चाहिए।

शंका से ही भय उत्पन्न होता है और भय से शंका उत्पन्न होती है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, शंका के कारण ही यह संसार बिगड़ रहा है और गिर रहा है। शंका उठने लगे तो कुदरत ही हमें दंड देती है; किसी दूसरे को दंड नहीं देना पड़ता।

शंका अत्यंत दुःखदायी होती है और उससे नए प्रकार का संसार खड़ा होता है। जैसे बबूल का बीज बोएं तो सिर्फ़ बबूल ही उगता है, और बरगद का बीज बोएं तो सिर्फ़ बरगद ही उगता है। लेकिन शंका नाम का बीज ऐसा है कि उससे सत्रह सौ प्रकार की वनस्पतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और पूरा जंगल बन जाता है। एक तरफ़ कलह चलता रहता है और दूसरी तरफ़ संदेह होता रहता है इसलिए उस व्यक्ति के प्रति भाव बिगड़ते ही अनेक प्रकार के भयंकर कर्म बंधते हैं। शंका तो मनुष्य को अधोगति में ले जाती है।

इतना ही नहीं, शंका यानी खीर में एक सेर नमक डाल देने जैसा है, उससे खीर फट ही जाती है। यदि हम किसी व्यक्ति को शंका की दृष्टि से देखते रहें, तो दूसरे ही दिन उसके मन में हमारे प्रति दूरी आ जाती है। शंका एक बार प्रवेश कर जाए तो फिर उसका अंत नहीं आता।

शंका बिना कारण के सामने वाले को दोषित दिखाती है। इसमें यदि किसी सज्जन व्यक्ति के ऊपर शंका करें तो हमारा अनेक गुना नुकसान हो जाता है।

किसी के चरित्र के संबंध में शंका नहीं करनी चाहिए। उसमें बहुत बड़ा जोखिम है, क्योंकि वह गलत भी निकल सकता है। कोई सती हो और उसे यदि वेश्या कहें, तो उससे भयंकर पाप बंधता है, जिसका फल कई जन्मों तक भोगना पड़ता है।

शंका के उपाय:

शंका शांत होती है सही समझ से

सही समझ आए तो शंका दूर हो जाती है और खुद सुखी हो जाता है। उदाहरण के तौर पर, किसी व्यक्ति ने भूत की बात सुनी हो कि कोई व्यक्ति को भूत लग गया है। फिर उसकी पत्नी मायके चली जाए और वह खुद रूम में अकेला सो रहा हो, तभी रसोईघर में से कुछ खड़खड़ाने की आवाज़ आए। तब वो बात याद आ जाती है और वहम होने लगता है कि भूत आया होगा! इतने में कोई मित्र आकर उसे जगाता है और उसे डरा हुआ देखकर वह पता लगाता है कि रसोईघर में क्या है? तब पता चलता है कि एक बड़ा चूहा अंदर घुस गया था और उसने प्याला गिरा दिया था, वो खड़का था। अब जो ज्ञान बैठा था, उसका विपरीत ज्ञान बैठे तब वहम दूर हो जाता है।

ज्ञान का प्रकाश होते ही शंका चली जाती है

ज्ञान का प्रकाश होते ही शंका दूर हो जाती है। मान लीजिए, हम अँधेरे में दो चमकती हुई लाइटें देखें तो शंका होती है कि “क्या होगा? कहीं भूत होगा तो?” फिर पूरी रात डर रहता है और नींद उड़ जाती है। उजाला होते ही पता चलता है कि ये तो बिल्ली बैठी थी उसकी चमकती हुई आँखें थीं, तब शंका चली जाती है। जैसे किसी कमरे में अँधेरे में बिजली की चमक में हमें साँप घुसता हुआ दिखाई दे, पर वह निकला या नहीं जब तक यह न देखें, तब तक हमें नींद नहीं आती, जबकि उसी रूम में दूसरे लोग खर्राटे लेकर सो रहे होते हैं। इसलिए साँप के घुस जाने का ज्ञान हुआ था, फिर भले ही साँप निकल गया हो लेकिन जब तक उसके निकल जाने का ज्ञान नहीं हो तब तक मन में शंका बनी रहती है और नींद नहीं आती। इसलिए शंका दूर होने के लिए सच्चा ज्ञान होना ज़रूरी है।

भूतकाल को भूलने से संदेह नहीं होता

कई बार पति-पत्नी के बीच भूतकाल की भूलों को याद करके एक-दूसरे के प्रति संदेह बना रहता है। अब भूतकाल तो बहते हुए पानी में कोई चीज़ बह जाए उसके जैसा है। क्या वह चीज़ फिर वापस आती है? नहीं आती। लेकिन उसे याद कर-करके हम अपना ही नुकसान करते हैं। जो कुछ हो चुका हो, उसे “फॉरगेट एंड फॉरगिव” यानी भूल जाना और माफ़ कर देना चाहिए। भूलें तो सभी से होती हैं, किसी की भूल बाहर दिखाई देती है और किसी की ढँकी रहती है। लोग जिसकी भूल बाहर दिखाई दे उसे दोषित ठहराते हैं और जिसकी दिखाई न दे वह सज्जन बनकर घूमता है। इसके बजाय जीवन से संदेह को निकाल दें, प्रेमपूर्वक एक-दूसरे के साथ रहें और बच्चों को अच्छे संस्कार दें।

शंका को खड़ी होते ही रोक दें

शंका को खड़ी ही न होने दें, उसे जन्म लेते ही मार दें। जब किसी व्यक्ति पर शंका होती है, तब खुद को और सामने वाले को बहुत दुःख होता है। इसलिए हमें सभी सतर्कता और सावधानी रखनी चाहिए, लेकिन शंका खड़ी नहीं होने देनी चाहिए। शंका हमेशा १००% गलत ही होती है, सही नहीं होती है, ऐसे समझकर एक ओर रख देना चाहिए। यदि आँखों से देखा हुआ गलत साबित हो सकता है, तो फिर अधूरी बातों में शंका क्यों करें?

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “चाहे किसी भी बारे में हो, नज़रों से देखी हुई बात हो न, तब भी शंका नहीं। जान लेना है, जान ज़रूर लेना। जानने में पाप नहीं है। आँखों से देखा हुआ भी गलत निकलता है। मेरे साथ कितनी ही ऐसी घटनाएँ हुई हैं! इन आँखों से देखता हूँ, फिर भी गलत निकलता है। ऐसे उदाहरण ‘एक्ज़ेक्ट’ मेरे अनुभव में आए हैं। तो और कौन सी चीज़ को सही मानें हम लोग? अत: देखने के बाद भी शंका नहीं करनी चाहिए। जानकारी में रखना। हमारी यह खोज बहुत गहरी है। “

बच्चों को प्रेम से संभालना

जब युवा बेटे-बेटियाँ कॉलेज में पढ़ने जाते हैं, तब भी संदेह होता है कि “क्या करते होंगे? कहाँ जाते होंगे?” वे जहाँ भी जाएँ, वहाँ उनके पीछे-पीछे घूमते रहें। ऐसा कुछ दिनों तक हो सकता है। पर हमेशा के लिए क्या करें? इससे हमें अशांति होती है। इसलिए सभी सावधानियाँ रखें, पर संदेह न करें। अभी जमाना ऐसा है कि लड़के दूसरी लड़कियों को और लड़कियाँ दूसरे लड़कों को मित्र बनाती हैं, घूमने जाती हैं, तो संदेह करने से उसमें कोई परिवर्तन होने वाला नहीं है। हम उन लोगों को घर में बैठाकर भी नहीं रख सकते। इसलिए समय के अनुसार व्यवहार करना पड़ता है। इसके बजाय विश्वास रखें। बच्चों के साथ दोस्ती बढ़ाए, जब वे लोग घर आएँ तब उनके साथ बैठें, साथ में नाश्ता करें, उन्हें आनंद हो ऐसी अच्छी-अच्छी बातें करें तो उन्हें प्रेम लगेगा। माता-पिता ऊपरी प्रेम रखते हैं, इसलिए बच्चे फिर घर के बाहर प्रेम खोजते हैं। बहुत हो तो बच्चों को समझाकर भेजना चाहिए कि “हम खानदानी और संस्कारी परिवार के कहलाते हैं, इसलिए सावधानी से चलना। गलत कामों में नहीं फँसना।”

कई बार बेटी को किसी लड़के से प्रेम हो जाए और वह देर रात घर आए, तो माता-पिता गुस्से में उसे घर से निकाल देते हैं। उस समय यह विचार आना चाहिए कि “देर रात वह कहाँ जाएगी? किसका आश्रय लेगी?” एक नुकसान तो वह करके आई है, फिर उसे घर से निकाल दें तो दूसरा नुकसान हो जाएगा। इसके बजाय शांति से उसे घर में सोने दें, फिर दूसरे दिन समझाएँ कि “बेटा, घर टाइम से आ जाना। मुझे बहुत दुःख होता है। इतनी देर मत करना । हम खानदानी परिवार के हैं, हमें ऐसा शोभा नहीं देता।” लेकिन रात में देर से घर आए तो “किसके साथ घूमती होगी? क्या करती होगी?” इस प्रकार संदेह करने का कोई मतलब नहीं है।

सावधानी रखें, संदेह नहीं

घर में कोई पुरुष हमारी सगी बहन के साथ बातें कर रहा हो, तब भी संदेह नहीं करना चाहिए। उस समय हमें, “बहन, यहाँ आओ, मुझे ज़रा खाना दे दो न।” कहकर दोनों को अलग किया जा सकता है, लेकिन संदेह तो कभी नहीं करना चाहिए। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि विचार आएँ इतना करना चाहिए, लेकिन शंका नहीं करनी चाहिए। बहुत विचार करने से मनुष्य थक जाता है और विचारों का अंत आ जाता है, लेकिन संदेह यहाँ से घुसता है, वहाँ से घुसता है, लेकिन वह थकता नहीं है। संदेह करने से पहले खुद का ही बिगड़ता है, फिर सामने वाले का बिगड़ता है।

यदि किसी व्यक्ति को हमने दस लाख रुपये उधार दिए हों और हर महीने उसका ब्याज भी आता हो, फिर भी हमें सुनने में आए कि उस व्यक्ति को पच्चीस-तीस लाख का नुकसान हुआ है, तो हमें संदेह होता है कि “दस लाख रुपये वापस आएँगे या नहीं?” इस संदेह का अंत नहीं आता और दिन-रात कचोटता रहता है। पूँजी के लिए संदेह होता है, पर भूल जाते हैं कि ब्याज तो भेजा है। यदि मशीन में कपड़े धोने के लिए डाले हों और उसमें सोने की चेन चली गई हो, फिर वह न मिले, तो कामवाली बहन के ऊपर संदेह होता है कि उसने चोरी की होगी तो? फिर उसे आक्षेप दें तो, क्लेश होता है, उसे दुःख होता है और वह मन में बैर बाँधती है वह अलग। बाद में अपने ही कपड़ों से चेन मिलती है, तब पछतावा होता है। इसके बजाय कीमती वस्तु को संभालकर रखें और सावधानी बरतें, लेकिन संदेह न करें। “अब क्या होगा?” उसे शंका होना कहते हैं।

शंका के पश्चात्ताप करें

यदि किसी व्यक्ति पर शंका हो जाए और उसके लिए उल्टे विचार आएँ, तो जिस इष्टदेव या भगवान में श्रद्धा हो, उनकी साक्षी में सामने वाले व्यक्ति के भीतर के आत्मा को याद करके उनसे माफ़ी माँगनी चाहिए। जैसे-जैसे हम पछतावा करते जाएँगे कि “यह शंका हो रही ही यह गलत है, मैं इसकी दिल से माफ़ी माँगता हूँ, फिर शंका नहीं करूँगा,” तो ऐसे करते-करते वह कम हो जाएगी, नहीं तो शंका हमें भीतर से खोखला कर देगी।

दूसरी ओर, यदि कोई नज़दीकी व्यक्ति हमारे ऊपर शक करता हो उसमें भी चरित्र के संबंध में तो हमें पता करना चाहिए कि हमने कहीं कुछ गलत तो नहीं किया न? यदि गलत किया हो तो उसे सुधार देना चाहिए, और नहीं किया हो तो घर के व्यक्ति को हमारे ऊपर विश्वास आए ऐसे कदम उठाने चाहिए, लेकिन प्रभाव में नहीं आना चाहिए।

परिस्थिति का समाधान लाना

जिस परिस्थिति में शंका उत्पन्न हो, वहाँ उस परिस्थिति का समाधान लाना चाहिए, उसका उपाय करना चाहिए। यदि कोई उपाय न मिले तो मन को दूसरी ओर, पॉज़िटिव में मोड़ देना चाहिए, लेकिन शंका तो करनी ही नहीं चाहिए।

जैसे कि, हम अपने वृद्ध माता-पिता से दूर रहते हों और अचानक रात में उनका फोन आए, तो हमें लगता है कि “उन्हें कुछ हो गया होगा तो?” यह आशंका हमें कोई हेल्प नहीं करती, बल्कि उल्टा दुःख और भय उत्पन्न करती है। आशंका करके मन को जलाने से हम कहीं उन्हें बचा नहीं सकते। इसके बजाय आशंका होते ही तुरंत प्रार्थना करें कि “उनकी आत्मा को शांति मिले।” यानी आशंका खड़ी होने लगे तभी अपना ध्यान दूसरी ओर मोड़ देना चाहिए।

Suspicion

हम कार में जाने के लिए निकले और ड्राइवर आशंका करने लगे कि “कहीं कार का एक्सीडेंट हो जाएगा तो?” तब कार में बैठे सभी लोगों का मन खराब हो जाता है और भय घुस जाता है। इसलिए शंकाशील लोगों से संगति नहीं रखनी चाहिए। यदि हम समुद्र के किनारे खड़े हों और सुनी हुई बात याद आए कि लहर आई और व्यक्ति बह गया, तो उसे आशंका होने लगे कि “लहर आएगी और बह जाऊँगा तो?” फिर खुद भयभीत होकर घूमता रहता है, जबकि वास्तविकता में तो ऐसा कुछ होने वाला ही नहीं है। इसलिए आशंका करना वह मूर्खता है। ऐसा समझकर अपने विचारों को बदल देना चाहिए।

शंका के सामने शूरवीरता दिखाएं

पैदल यात्रा में जाने के लिए कोई संघ निकले और फिर शंका होने लगे कि “कहीं बारिश हो गई और वापस न पहुँच पाएँ तो? इसके बजाय यहीं से वापस चलो!” इस प्रकार किसी भी काम में शंका होने लगे तो उसमें सफलता नहीं मिलती। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “यानी जो काम करना हो उसमें शंका नहीं और शंका होने लगे तो करना मत। ‘मुझसे यह काम हो पाएगा या नहीं होगा’ ऐसी शंका हो तभी से काम नहीं हो पाता। शंका रहती है, वह तो बुद्धि का तूफान है।“

शंका के सामने शूरवीरता दिखाने की चाबी देते हुए परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, “जिसे शंका होती है न, उसे सभी झंझट खड़े होते हैं। कर्म राजा का नियम ऐसा है कि जिसे शंका होती है, वहीं पर वे जाते हैं! और जो ध्यान नहीं देते, उनके वहाँ तो वे खड़े भी नहीं रहते। इसलिए मन मज़बूत रखना चाहिए।“

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