निजदोष दर्शन से निर्दोष

"दूसरों के दोष देखने से कर्म बँधन होता है और खुद के दोष देखने से कर्मों से मुक्ति मिलती है।" यह कर्म का सिद्धांत है।

अपने खुद के स्वरूप की अज्ञानता ही सबसे बड़ी भूल है। "मैं कौन हूँ?" यह अज्ञान ही सभी दोषों का मूल कारण है?

ज्ञानीपुरुष के आर्शीवाद से यह दोष भस्मीभूत हो जाता है और परिणाम स्वरूप बाकी के सभी दोष भी खत्म होने लगते हैं।

जब तक व्यक्ति को आत्माज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक वह सभी में दोष देखता है और खुद के दोष कभी नहीं देख सकता।

आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद में आपको अपने मन-वचन-काया के प्रति पक्षपात नहीं रहता और ऐसी निष्पक्षपाती दृष्टि के परिणाम स्वरूप आप खुद के दोष देख सकते हैं।

निजदोष दर्शन से निर्दोष

जो चीज़ एक व्यक्ति के हिसाब से सही है वही चीज़ दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से गलत हो सकती है|उत्तम यहि है की दूसरों की गलतियाँ ढूँढना टाले|

Spiritual Quotes

  1. टीका करनी यानी दस का करना एक! शक्तियाँ व्यर्थ होती हैं और नुक़सान होता है!
  2. जगत् सारा स्वतंत्र है। आपकी भूलें ही आपकी ऊपरी हैं बस, हमारी भूलें होती हैं वे ही! भूलें और ब्लंडर्स!!! यानी आपकी भूल नहीं हो तो कोई आपका नाम देनेवाला भी नहीं है वर्ल्ड में।
  3. दोष हो उसमें हर्ज नहीं है, पर दोष दिखाई देना चाहिए।
  4. भूल को मिटाने के लिए भूल को भूल कहना पड़ता है। उसका पक्ष नहीं लेना चाहिए।
  5. हर एक अड़चन जो आती है न, पहले सहन करने की ताकत आती है, बाद में अड़चनें आती हैं। नहीं तो मनुष्य वहीं का वहीं खतम हो जाए। मतलब कानून ऐसे हैं सब।
  6. वास्तव में, एक्ज़ेक्टली क्या है यह जगत् कि इस जगत् में कोई दोषित है ही नहीं। आपको दोष दिखता है, वह आपकी देखने की दृष्टि में अंतर है। 
  7. कोई मनुष्य किसीका कुछ कर सकता ही नहीं है, ऐसा यह स्वतंत्र जगत् है।
  8. किसीका दोष दिखाई दे तब तक दुःख रहता है। दूसरों के दोष दिखने बंद हुए यानी छुटकारा।
  9. निजदोष देखने की दृष्टि उत्पन्न हो गई यानी परमात्मा होनी की तैयारी हुई।
  10. भूल बिना का ज्ञान और भूल बिना की समझ होगी तो तू खुद ही मोक्ष स्वरूप है।

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