मिकेनिकल इन्जिनियर की डिग्री प्राप्त करने के बाद में पूज्य दीपकभाई ने अपना खुद का कन्सल्टेन्सी का कार्य शुरू किया। सांसारिक जीवन में यह काम करते हुए भी उनका हृदय परम पूज्य दादाश्री और अक्रम विज्ञान को समझने में ही रहता था। वे अपना सारा खाली समय सेवा में तथा पूज्य नीरू माँ की मदद करने में बिताते थे। उन्हें दिया गया कोई भी कार्य वे पूरी सिन्सियरिटी से करते थे। उनको दिए गए कामों में, छोटे-छोटे काम जैसे झाडू लगाना, सत्संग और ज्ञानविधि की तैयारी करना, ज़मीन पर चटाई बिछाना और सत्संग के बाद में बिखरे हुए फूलों को समेटना, चटाईयों को समेटना और छोटे-मोटे भाग दौड़ के काम करना वगैरह थे। वे पुस्तक तैयार करने के लिए परम पूज्य दादाश्री की सत्संग की रिकॉडिंग, लिखाई और एडिटिंग में पूज्य नीरु माँ की सहायता करते थे।
१९७४ में एक दिन परम पूज्य दादाश्री ने पूज्य नीरु माँ से कहा था कि ‘दीपक बहुत सिन्सियर है। अगर इसे कोई सही दिशा में मोड़नेवाला मिल जाए, तो इसे जिस भी दिशा में ले जाया जाए, उसके शिखर तक पहुँच सकता है’।अपने खाली समय में पूज्य नीरु माँ, पूज्य दीपकभाई से ज्ञानीपुरुष के रूप में परम पूज्य दादाश्री की महानता, उनके जगत् कल्याण के मिशन और अध्यात्मिक प्रगति में ब्रह्मचर्य के महत्व के बारे में बात करती थीं। वे हमेशा पूज्य दीपकभाई को परम पूज्य दादाश्री के सत्संग में अध्यात्म के गूढ़ प्रश्न पूछने को कहती थीं, ताकि परम पूज्य दादाश्री अध्यात्म विज्ञान को और गहराई से समझाएँ। जितना अधिक वे अक्रम विज्ञान को समझते गए, उतना ही उनका ब्रह्मचर्य का और इस अध्यात्मिक मार्ग के पर चलने का निश्चय दृढ़ होता गया।
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