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सबसे बड़ी हिंसा कौन सी है और उसमें से कैसे छूटा जा सकता है?

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, कि इस संसार में सबसे बड़ी हिंसा कषाय से अर्थात् क्रोध-मान-माया-लोभ से होती है, जिसे सूक्ष्म हिंसा या भावहिंसा कहा जाता है। भाव हिंसा वह सबसे बड़ी हिंसा है।

भावहिंसा से कितना नुकसान होता है, इसे सापेक्ष रूप से समझाते हुए परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि एक ओर अगर हम एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा को रोकने के लिए कंदमूल (जैसे आलू, प्याज आदि) का त्याग करते हैं, तो उससे तीन रुपये जितना लाभ होता है, परंतु कषायों के कारण करीबी लोगों को दुःख पहुँचाने पर, तीन करोड़ रुपये का नुकसान हो जाता है!

जीवों की रक्षा करना वह स्थूल अहिंसा है, जबकि कषाय न हों वहीं सूक्ष्म अहिंसा है। किसी जीव को मारने की तुलना में भी अधिक पाप कर्म कषाय से बंधते हैं। इसका मतलब यह नहीं है, कि हमें एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय जीवों की खुलकर हिंसा करनी चाहिए। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि द्रव्यहिंसा, यानी स्थूल हिंसा बंद हो, तभी भावहिंसा बनी रहती है। फिर भी, भावहिंसा का मुख्य महत्त्व है।

भावहिंसा

ज़्यादातर लोगों को भावहिंसा समझ में ही नहीं आती। कुछ अपवादों को छोड़कर, अधिकतर घरों में पूरा दिन भावहिंसा ही होती रहती है। पूरा दिन क्लेश और कलह में ही जीवन बीत जाता है।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, कि “अहिंसा आप बाहर पालते हो, वह संपूर्ण अहिंसा पालो, सूक्ष्म जीव या स्थूल जीव सबके लिए अहिंसा पालो, पर आपके आत्मा की भावहिंसा नहीं हो, वह पहले देखो। यह तो निरंतर भावहिंसा ही हो रही है। अब यह भावहिंसा लोग मुँह से बोलते ज़रूर है, पर भावहिंसा किसे कहते हैं, वह समझना चाहिए न?

पाँच इन्द्रियों से जो स्थूल रूप में दिखाई देता है, वह सारी हिंसा द्रव्यहिंसा (स्थूल हिंसा) कहलाती है। प्रत्यक्ष रूप से, मन, वचन और काया से जो जगत् में दिखाई देता है, वह द्रव्यहिंसा है। स्थूल हिंसा का तो फोटो खींचा जा सकता है, जबकि भावहिंसा का फोटो बाहर से नहीं खींचा जा सकता। सूक्ष्म रूप में, यह भाव हिंसा इस तरह से होती है कि किसी को दिखाई भी नहीं देती।

“जहाँ क्रोध-मान-माया-लोभ हैं, वह आत्महिंसा है।“ - परम पूज्य दादा भगवान

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि “भावअहिंसा यानी मुझे किसी भी जीव को मारना है, ऐसा भाव कभी भी नहीं होना चाहिए और किसी भी जीव को मुझे दुःख देना है, ऐसा भाव उत्पन्न नहीं होना चाहिए। मन-वचन-काया से किसी जीव को किंचित् मात्र दुःख न हो, ऐसी भावना ही सिर्फ करनी है। क्रिया नहीं भावना ही करनी है।“

स्थूल हिंसा को पूरी तरह रोक पाना हमारे हाथ में नहीं है। क्योंकि, भोजन के लिए एकेन्द्रिय वनस्पति पर निर्भर रहना पड़ता है, बीमारी में रोग नाशक दवाइयाँ लेनी पड़ती हैं। हर तरह की सावधानी रखने के बावजूद भी अनजाने में पैर पड़ जाने या वाहन के नीचे आने से भी कुछ जीव कुचल जाते हैं। इसलिए, द्रव्यहिंसा (स्थूल हिंसा) परतंत्र है, हमारे नियंत्रण में नहीं है। जबकि, भावहिंसा स्वतंत्र है। अनजाने में भी किसी जीव की हिंसा न हो, ऐसा भाव हम कर सकते हैं, जिसका फल अवश्य मिलता है। पूरी जिंदगी किसी को दुःख न पहुँचे इस तरह जीने का निश्चय करना तो हमारे हाथ में है।

दुःख देना वह बड़ी भावहिंसा

किसी को मानसिक दुःख देना, किसी पर क्रोध करना, गुस्सा करना, यह सब हिंसक भाव कहलाते हैं, जिसे भावहिंसा कहते हैं। मन, वाणी या वर्तन से किसी को दुःख देना यह सबसे बड़ी भावहिंसा कहलाती है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, कि हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए कि हमें कषाय न हो, क्योंकि, कषाय वह सबसे बड़ी हिंसा है। इसे आत्महिंसा और भावहिंसा कहा गया है। जब तक यह समझ में नहीं आता कि सूक्ष्म हिंसा किस-किस प्रकार से होती है, तब तक अहिंसा का पूरी तरह से पालन करना संभव नहीं होता।

किसी चीज़ के लिए लड़कर लोगों के साथ कषाय करके उन्हें दुःख देना, वह हिंसा है। बाहर से भले ही अच्छा व्यवहार रखें, लेकिन अंदर किसी व्यक्ति के लिए बुरे विचार आएँ, तो वह मानसिक हिंसा है। अपने मन के अनुसार काम न हो तो मुँह फुलाकर घूमना, किसी का अपमान करना और जब कोई हमारा अपमान करें तो उससे लड़ना, अगर किसी व्यक्ति से काम बिगड़ जाए तो गुस्से में उसे डाँटना, खाना ठीक न बने तो बनाने वाले पर चिढ़ जाना या विषय-विकारों से प्रेरित होकर किसी को दुःख देना या तंग करना, यह सब सूक्ष्म हिंसा में आता है।

घर के लोगों पर चिढ़ाना, माँ-बाप को दुःख पहुँचाना, सास-बहू का आपस में झगड़ना, पति-पत्नी का एक-दूसरे को दुःख देना, यह सब आत्महत्या के समान हिंसा है। पूरा दिन एक-दूसरे को दुःख देने के भाव रखना, एक-दूसरे की गलतियाँ देखते रहना, वह हिंसा है।

क्रोध से, द्वेष से, अभाव से, अपमान से, तिरस्कार से, उपेक्षा से, मन का करने से, मोह से या विषय के कारण किसी को खुलेआम दुःख हो जाए या दूसरों को पता चले इस तरह उनके लिए भाव बिगड़ जाए, तो उसे रौद्रध्यान कहते हैं। जब जो पसंद हो उसके प्रति राग और नापसंद के प्रति द्वेष होता है, या बाहर किसी को भी पता ना चले और अंदर भाव बिगड़े, तो इसे आर्तध्यान कहा जाता है। जैसे कि, हम खाना खाकर बैठे हो और ठीक उसी समय अचानक घर पर कोई मेहमान आ जाएँ, तो मन में यह भाव आते है, कि “अब इस समय ये कहाँ से आ गए?” तो यह आर्तध्यान कहलाता है।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, कि “इस जगत् में सबसे बड़ी हिंसा कौन-सी? आर्तध्यान और रौद्रध्यान! क्योंकि, वह आत्महिंसा कहलाती है। वो जीवों की हिंसा तो पुद्‌गल हिंसा कहलाती है और यह आत्महिंसा कहलाती है।“

इसके अलावा, किसी व्यक्ति की निंदा करना वह भी उसे मारने के बराबर हिंसा है। किसी व्यक्ति की नेगटिव चर्चा करना, कि "वह ऐसा है, वैसा है" इसे निंदा कहते हैं। इसलिए, कभी भी किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए।

फिर, किसी मनुष्य के लिए एक थोड़ा सा भी खराब अभिप्राय नहीं होना चाहिए। अगर कोई दुश्मन गिरे और हमें उसमें खुशी हो, तो उसे पाशविक आनंद कहते है। दुश्मन के लिए भी खराब अभिप्राय हो, तो वह सबसे बड़ी हिंसा है।

इसके आलावा, जहाँ पक्षपात होता है, यानि हम लोग अलग हैं, तुम लोग अलग हो, ऐसा भेदभाव किया जाता है, वहाँ हिंसा होती है। पक्षपात दो तरह से होता है, एक व्यवहार में और दूसरा धर्म में। व्यवहार में, बच्चों या परिवार के सदस्यों के बीच पक्षपात होना, मायके और ससुराल के बीच पक्षपात हो, या फिर “हमारा धर्म ऊँचा और सही, तुम्हारा धर्म नीचा और गलत है", ऐसा पक्षपात होता है। किसी एक का पक्ष लेते हैं, तो दूसरे पक्ष को दुःख होता ही है, इसलिए यह भी सूक्ष्म हिंसा है।

बुद्धि से मारना बड़ी हिंसा है

ज़्यादा बुद्धि होने पर किसी को धोखा देना, लालच के कारण किसी व्यक्ति की मेहनत का मुफ्त में फायदा उठाना, मेहनत के बदले कम वेतन देना, यह सब सूक्ष्म हिंसा है। अधिक बुद्धिमान व्यक्ति का कम बुद्धिवाले को धोखा देना, वह तो भयंकर गुनाह है। अधिक बुद्धि का ऐसा दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

“ऐसे ही खून कर डाले, तो एक जन्मों का मरण हुआ, परन्तु यह तो बुद्धि से गोली मारने में अनंत जन्म का मरण होगा।“ - परम पूज्य दादा भगवान

बुद्धि तो प्रकाश है। अगर हमारे पास टॉर्च का ज्यादा प्रकाश हो, और कोई अंधेरे में दीपक लेकर चल रहा हो, तो उसे प्रकाश देना चाहिए। यानी जिसकी बुद्धि कम हो, उसकी अधिक बुद्धि वाले को मदद करनी चाहिए कि "आप ऐसे नहीं, ऐसा कीजिए, नहीं तो आप धोखा खा जाओगे।" लेकिन बुद्धि से मारना मतलब कि जब कम बुद्धि वाला हाथ लगे तो उसका शिकार करना, उसका फायदा उठाना, प्रकाश दिखाने के बदले पैसे माँगना!

परम पूज्य दादा भगवान इस गुनाह का जोखिम समझाते हैं।

प्रश्नकर्ता: मानसिक दु:ख देना, किसी को धोखा देना, विश्वासघात करना, चोरी करना बगैरह सूक्ष्म हिंसा मानी जाती है?

दादाश्री: वह सब हिंसा ही है। स्थूल हिंसा से भी अधिक यह हिंसा बड़ी है। उसका फल बहुत बड़ा आता है। किसी को मानसिक दु:ख देना, किसी को धोखा देना, विश्वासघात करना, चोरी करनी वह सब रौद्रध्यान में जाता है। और रौद्रध्यान का फल नर्कगति है।

इस सूक्ष्म हिंसा से बचने का रास्ता खुला है। यदि, अब भी लोगों को बुद्धि से धोखा देना छोड़ दें और अब तक ऐसे जो भी गुनाह किए हों, तो उनके लिए सच्चे दिल से पछतावा करें, तो उसकी जोखिमदारी कुछ कम हो जाएगी।

सबसे बड़ी अहिंसा - भाव अहिंसा

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि केवल एक ही भावना रखनी है कि, किसी भी जीव को किंचित्‌मात्र भी दुःख न हो। किसी को ना मन से दुःख हो, ना वाणी से दुःख हो और ना वर्तन से दुःख हो। बस, उसके जैसा बड़ा अहिंसक कोई नहीं है। इस भाव को हमें निरंतर ध्यान में रखना है। क्योंकि, अहिंसक भाव से किसी को थप्पड़ भी मारें, तो भी उसे चोट नहीं लगती, जबकि हिंसक भाव से फूल भी दें, तो सामने वाले को दुःख पहुँचता है। इसलिए हिंसा केवल क्रिया (बाहरी कर्म) से नहीं होती, बल्कि क्रिया के पीछे की हिंसक भावना से सबसे अधिक हिंसा होती है।

जिसे अहिंसा का पालन करना है, वह सूक्ष्म हिंसा में जागरूक रहता है। किसी को दुःख देने से पहले यह विचार आना चाहिए, कि अगर कोई मुझे ऐसा दुःख दे तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए दूसरों को भी वैसा दुःख नहीं देन चाहिए। अगर सामने वाला दुःख देता है या धोखा देता है, तो उसके उपाय करने चाहिए, लेकिन उस व्यक्ति पर गुस्सा नहीं होना चाहिए, राग-द्वेष नहीं करना चाहिए। तो सूक्ष्म रूप से अहिंसा का पालन करना कहलाता है। अगर कोई सामने वाला उकसाए फिर भी खुद हथियार न उठाएँ, तो उसे अहिंसा सिद्ध की, ऐसा कहा जाता है।

परम पूज्य दादा भगवान भाव अहिंसा का सुंदर उपाय बताते हुए कहते हैं, कि “हमें मन में हिंसकभाव नहीं रखना है। ‘मुझे किसी की हिंसा करनी नहीं’ ऐसा भाव ही मज़बूत रखना और सुबह पहले बोलना चाहिए कि, ‘मन-वचन-काया से किसी जीव को किंचित्‌मात्र दुःख न हो।’ ऐसा भाव बोलकर और फिर संसारी क्रिया शुरू करना, ताकि जिम्मेदारी कम हो जाए।“

अगर पूरे दिन में जाने-अनजाने किसी को दुःख पहुँचा हो, तो क्या करना चाहिए? वे कहते हैं, कि “घर जाकर ऐसा कहना कि आज सारे दिन में निश्चय करके निकला, फिर भी जो कोई किसी को दुःख हुआ हो, उसकी क्षमायाचना कर लेता हूँ। बस हो गया। फिर आपकी जोखिमदारी ही नहीं न!”

अर्थात मन में भावना ही करनी है और उस भावना के अनुसार निश्चय करके उसे पूरी ईमानदारी से निभाना है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि “किसी जीव की हिंसा करनी नहीं, करवानी नहीं या कत्र्ता के प्रति अनुमोदना नहीं करनी और मेरे मन-वचन-काया से किसी जीव को दुख न हो, ऐसी भावना रही कि आप अहिंसक हो गए! वह अहिंसा महाव्रत पूरा हो गया कहलाता है।“

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