जो अहिंसक होता है, उसकी बुद्धि का प्रकाश बहुत बढ़ता है। किसी भी जीव को दुःख नहीं देने के परिणाम स्वरूप, बुद्धि सम्यक् होती जाती है। उससे किस तरह किसी को दुःख ना पहुंचे, उसकी ज़्यादा से ज़्यादा समझ और कुशलता विकसित होती जाती है। दूसरों को दुःख दें, वह विपरीत बुद्धि है, जिसमें “सामने वाला जिए या मरे, मुझे बस मज़ा कर लेना है", ऐसी पाशविक भावना होती है। जिससे बुद्धि का प्रकाश कम हो जाता है।
मानवता यह कहलाती है कि, कोई मुझे दुःख दें, तो मुझे अच्छा नहीं लगता, इसलिए मुझे किसी को दुःख नहीं देना चाहिए। मानवता दिखाने से उच्च बुद्धि प्रकट होती जाती है।
जो किसी को भी दुःख न दे, किसी जीव को न मारे, किसी का भी नुकसान न करें, इस प्रकार सावधानी से जीवन जीता हैं, उसकी बुद्धि इतनी सरल और उच्च प्रकार की होती है कि, हर मुश्किल में समाधान लाने की शक्ति प्रकट होती है।
कर्म का फल भोगते समय नए हिंसक भाव ना हो उसकी जागृति रखें, तो कर्मों का हिसाब पूरा हो जाता है।
मान लीजिए, जब हमें कुत्ता काट लें, तब वास्तव में कर्म का हिसाब पूरा होता है। लेकिन अगर हम उस कुत्ते के सामने हिंसक भावना रखते हैं कि, “इन कुत्तों को तो पकड़ कर मार ही डालना चाहिए, उन्हें ऐसा करना चाहिए, वैसा करना चाहिए”, तो हम हिंसा के नए बीज बो रहे हैं, जिनसे फिर वैसे ही कर्म का हिसाब वापस आएगा।
लेकिन, अगर हम उसी परिस्थिति में समता रखते हुए उपाय करें, पट्टी बांधकर, दवा वगैरह सब कुछ कराए, लेकिन कुत्तों को मारने का भाव ना करें, तो हिंसा के बीज नहीं पड़ते और हिसाब पूरा हो जाता है।
अहिंसा ही धर्म है और हिंसा ही अधर्म है। मन, वचन, काया से किसी भी जीव को किंचित्मात्र दुःख न हो ऐसा अहिंसा पालन करने का भाव हुआ, तभी से धर्म की ओर बढ़ना शुरू होता है। और जब से हिंसा करने का भाव हुआ तभी से अधर्म की शुरुआत हो जाती हैं।
आध्यात्मिक उन्नति भी अहिंसा से ही होती है। अध्यात्म का अर्थ है, आत्मा के सन्मुख जाना। स्वयं आत्मरूप में रहकर और दूसरों को भी आत्मरूप से देखना यही सबसे बड़ी अहिंसा है, जिसको पालन करने से खुद की ही आध्यात्मिक प्रगति होती है।
हर क्रिया के पीछे ज्ञान होता है। जैसे-जैसे मनुष्य का डेवलपमेंट यानी ‘उपादान’ बढ़ता है, वैसे-वैसे उसका ज्ञान बदलता है। प्राथमिक डेवलपमेंट में मनुष्य को मार डालता हैं, ऐसा ज्ञान अशुद्ध ज्ञान कहलाता है। इसके बाद, बहुत समय तक विकास होता-होता आगे बढ़ता है, तब वह मनुष्य को नहीं मारता, लेकिन मुर्गा मुर्गे, बकरे, सूअर को मारकर खाता है। उनमें से कई डेवलपमेंट के बाद प्राणियों की हिंसा नहीं करते, लेकिन अंडे खाना जारी रखते हैं। ये दोनों अशुभ ज्ञान कहलाते हैं। अशुद्ध ज्ञान और अशुभ ज्ञान हिंसा की ओर ले जाते हैं। आगे बढ़कर जब जीव शाकाहारी बनता है, तब शुभ ज्ञान में आता है और जब मनुष्य आत्मभाव में आता है, तब हमेशा के लिए अहिंसक बन जाता है, जिसे शुद्ध ज्ञान कहा जाता है। शुभ और शुद्ध ज्ञान अहिंसा की ओर ले जाते हैं।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि,”अहिंसा सिद्ध हो जाए तो मनुष्य भगवान हो जाए!” इतना ज़्यादा अहिंसा का महत्त्व है। लेकिन इस चरण पर हमें जितना समझ में आता है, उतनी अहिंसा पालने की शुरुआत करते हैं।
अहिंसा जैसा कोई बल नहीं है। अहिंसा का इतना ज़्यादा प्रभाव होता है कि, खुद संपूर्ण अहिंसक हो, तो उसके ऊपर अगर साँप छोड़ा जाए, तो साँप भी उसे नहीं डँसेगा, उल्टा वह भाग जाता है। शेर भी उसे कुछ नहीं कर सकता। जो संपूर्ण अहिंसा का पालन करता हो, उसे कोई मार नहीं सकता।
संपूर्ण अहिंसक मतलब जो किसी एक पक्ष में नहीं पड़ता। क्योंकि, एक पक्ष की तरफ़ से अगर एक शब्द भी बोलें, तो दूसरे पक्ष का अहंकार आहत होता है, उसे दुःख होता है। यह हिंसा कहलाती है। इतना ही नहीं, जो संपूर्ण अहिंसक होता हैं, उसे अपनी सुरक्षा के बारे में सोचना नहीं पड़ता। अपनी ‘सेफ साइड’ के प्रयासों में जितना भी प्रतिकार होता है, उस सब में हिंसा होती है। जैसे कि, ”अगर कोई मेरे साथ ऐसा करेगा, तो मैं उसे खत्म कर दूँगा”, ऐसे भाव रखना, सुरक्षा के लिए बम की खोज करना और हथियारों का इस्तेमाल करना, यह सब हिंसा है। किसी भी हिंसा के बाद उसका दंड आता है।
ज्ञानी पुरुष और तीर्थंकर संपूर्ण रूप से अहिंसक होते हैं। उनके सामने चाहे कितना भी उग्र अहंकार क्यों न हो, वह ठंडा पड़ जाता है। तीर्थंकरों की सभा में तो शेर और बकरी एक साथ बैठते हैं। शेर अपना हिंसक भाव भूल जाता है और बकरी अपना डर भूल जाती है।

लेकिन इस कलियुग में, जहाँ मनुष्यों के मन बिगड़ गए हैं, लोग व्यसनों के शिकार बन गए हैं, वहाँ सब कुछ पूरी तरह छोड़ देना संभव नहीं है। नहीं तो लोग लूट ही लेंगे। इसलिए हिंसा के सामने आवश्यक रक्षा अनिवार्य है।
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