
सामान्य तौर पर माँसाहार न करने वाले लोगों को भी अंडे खाने में कोई जोखिम नहीं लगता। कई बेकरी की वस्तुओं जैसे कि केक और बिस्किट, जिनमें अंडे एक सामग्री के रूप में डाले जाते हैं, जिसे खाने में कई शाकाहारियों को भी कोई परेशानी नही होती। कुछ लोग तो अनजाने में ही ऐसे चॉकलेट, आइसक्रीम, नूडल्स या ब्रेड जैसे खाद्य पदार्थों को खुशी-खुशी खाते हैं, जिनमें अंडे की सफेदी या अंडे का उपयोग होता है।
इतना ही नहीं, आजकल यह धारणा भी प्रचलित हो गई है कि अनफर्टिलाइज्ड अंडे शाकाहारी होते हैं और उन्हें खाने में कोई हिंसा नही होती। इन सभी मान्यताओं के सामने, यहाँ पर वास्तविकता खुली की गई है।
वास्तव में, पंचेन्द्रिय जीव, जिनके कान नहीं होते, वे अंडे देते हैं। पंचेन्द्रिय जीव के बच्चें भी पंचेन्द्रिय ही होते हैं। इसलिए अंडा खाने में बड़ी हिंसा होती है, क्योंकि एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय जीवों तक जितना ज़्यादा जीव का डवलपमेंट होता है, उतना ही ज़्यादा हिंसा का गुनाह लगता है।

अंडा माँसाहार कहलाता है, क्योंकि अंडे से मुर्गी जन्म लेती है। मुर्गी एक पंचेन्द्रिय जीव है, और अंडा उसका सुप्त रूप (सुषुप्त अवस्था) है। अंडा ठीक वैसे ही है, जैसे मनुष्य में माँ के गर्भ में तीन महीने का अल्पविकसित मनुष्य का जीव होता है, उसी तरह अंडा एक अल्पविकसित मुर्गी ही है। अगर कोई तीन महीने के बच्चे को मार डाले, तो वह दो साल के मनुष्य के बच्चे को पाल-पोषकर मार डालने के बराबर ही है। उसी प्रकार अंडा खाना भी मुर्गी (चिकन) खाने के बराबर ही है। इसलिए अंडा शाकाहारी है, या अंडा खाने में कोई हिंसा या नुकसान नहीं होता, यह सब अंडों की बिक्री और उपयोग बढ़ाने के लिए किया गया प्रचार है, लेकिन इसमें कोई वास्तविकता नहीं है।
आजकल अहिंसक अंडे, जिन्हें दूसरे शब्दों में अनफर्टिलाइज्ड अंडे या आर्टिफिशियल अंडो के रूप में बेचे जाते हैं, उन्हें खाने योग्य माना जाना बहुत प्रचलित हो गया है। ऐसा कहा जाता है कि मुर्गे के संपर्क में आए बिना जो अंडे मुर्गी देती है, उन्हें अनफर्टिलाइज्ड अंडे कहा जाता है। इसमें जीव की हिंसा नहीं होती।
पर आर्टिफिशियल अंडे पूरी तरह से मानव निर्मित तो होते ही नहीं हैं। मुर्गी जो अंडे देती हैं, उनमें से मुर्गी का बच्चा जन्म ले सकता है, लेकिन ऐसे हालात बनाए जाते हैं, जिससे वह बच्चा जन्म न ले सके। फिर भी, उसमें जीव तो होता ही है, लेकिन वह जीव आवरण में होता है, बेहोशी की स्थिति में होता है। जैसे मनुष्य में माँ के गर्भ में दो महीने का बच्चा होता है, उसने अभी जन्म नहीं लिया होता है। लेकिन अगर अंदर उसे सुई चुभाई जाए, तो उसे दर्द तो होगा ही। मनुष्य जीव के गर्भपात को एक मनुष्य की हत्या के बराबर का गुनाह माना जाता है। उसी तरह अंडो को खाने में भी मुर्गी को खाने जितना ही गुनाह लगता है, चाहे वह अनफर्टिलाइज्ड अंडे हो या फर्टिलाइज्ड अंडे, दोनों में कोई फर्क नहीं पड़ता।
वास्तविकता यह है, कि कोई भी भोजन तभी खाया जा सकता है, जब वह जीवित हो और उससे हमें पोषण मिले। सब्जियाँ भी एकेन्द्रिय जीव होती हैं और वे जीवित होती हैं, लेकिन उन्हें खाने में अंडों या मांसाहार जितना गुनाह नहीं माना जाता, इसलिए उन्हें खाने में हिंसा नहीं मानी जाती। उसी तरह, अनफर्टिलाइज्ड अंडे भी जीवित ही होते हैं। अगर वे जीवित न हों, तो उनसे शरीर को शक्ति नहीं मिल सकती। इसलिए, अनफर्टिलाइज्ड अंडे खाने से पंचेन्द्रिय जीवों की हिंसा होती है।
परम पूज्य दादा भगवान के साथ भी विदेश में रहने वाले लोगों ने इसी प्रकार का प्रश्न किया था, जिसका विस्तृत जवाब हमें यहाँ प्राप्त होता है।
प्रश्नकर्ता: कुछ लोग तो ऐसी दलील करते हैं, कि अंडे दो प्रकार के होते हैं, एक जीववाले और दूसरे निर्जीव। तो वे खाए जा सकते हैं या नहीं?
दादाश्री: फ़ॉरेन में वे लोग दलील कर रहे थे कि अहिंसक अंडे हैं! तब मैंने कहा, इस जगत् में जीव बिना का कुछ खाया ही नहीं जा सकता। निर्जीव वस्तु है न, वह खायी ही नहीं जा सकती। अंडे में यदि जीव नहीं हो तो अंडा खाया नहीं जा सकता, वह जड़ वस्तु हो गई। क्योंकि, जीव नहीं हो वह जड़ वस्तु हो गई। हमें जीव को खाना हो न तो उसे ऐसे काटकर और दो-तीन दिनों तक बिगड़ नहीं जाए तब तक ही खाया जा सकता है। यह सब्ज़ी-भाजी तोड़ने के बाद कुछ समय तक ही खायी जा सकती है। फिर वह खत्म हो जाती है। यानी जीवित वस्तु को खा सकते हैं। इसलिए अंडा यदि निर्जीव हो तो खा नहीं सकते, सजीव हो तभी खाया जा सकता है। इसलिए ये लोग यदि अंडे को सजीव नहीं कहते हों तो वे बातें सब हम्बग हैं। तब किसलिए लोगों को फँसाते हो ऐसा?
उन दूसरे प्रकार के अंडेवालों ने इस जगत् में उस अंडे को किस रूप में रखा है वही आश्चर्य है। दूसरे प्रकार के अंडेवालो को पूछा कि यह दूसरी प्रकार का जीव निर्जीव है या सजीव है, वह मुझे बताओ। निर्जीव हो तो खाया नहीं जा सकता। सारी दुनिया को मूर्ख बनाया, आप लोग किस तरह के हो फिर? जीव न हो वह खाया नहीं जा सकता हमसे, वह अखाद्य माना जाता है।
प्रश्नकर्ता: पर यह वेजिटेरियन अंडा फलता नहीं है।
दादाश्री: वह फलता नहीं है, वह डिफरेन्ट मेटर है। पर यह जीवित है।
यानी ऐसा सब ठसा दिया है, तो इन जैनों के बच्चों को कितनी मुश्किल! उस पर तो सभी बच्चे मेरे साथ झगड़े थे। फिर मैंने उन्हें समझाया कि ‘भाई, ऐसे ज़रा विचार तो करो। निर्जीव हो तो हर्ज ही नहीं, पर निर्जीव तो खाया ही नहीं जा सकता।’ फिर मैंने कहा, ‘नहीं तो फिर बहुत यदि अक्कलमंद होओगे तो आपसे अनाज कोई भी खाया नहीं जाएगा। आप निर्जीव चीज़ खाओ।’ तब निर्जीव चीज़ तो इस शरीर को काम लगती नहीं, उसमें विटामिन नहीं होते। निर्जीव जो चीज़ें हैं वे शरीर की भूख मिटाती ज़रूर हैं, पर उनमें विटामिन नहीं होते। इसलिए शरीर जीता नहीं है। ज़रुरी विटामिन नहीं मिलते न! इसलिए निर्जीव वस्तु तो चले ही नहीं। तब उन बच्चों ने स्वीकार किया कि आज से वे अंडे हम नहीं खाएँगे। समझाएँ तो लोग समझने को तैयार हैं और नहीं तो इन लोगों ने तो ऐसा घुसा दिया है कि बुद्धि फिर जाए। ये सब गेहूँ और चावल और ये सब खाते हैं, इतनी बड़ी-बड़ी लौकियाँ खा जाते हैं, वे सब जीव ही हैं न! नहीं हैं जीव? परन्तु भगवान ने खाने की बाउन्ड्री दी है कि ये जीव हैं, वे खाना। परन्तु जो जीव आपसे त्रास पाते हो उन्हें मारो नहीं, उन्हें खाओ नहीं, उन्हें कुछ भी मत करो।
अगर अंडे से निकले मुर्गी के बच्चे को छूने जाए तो वह भाग जाता है। उसे पीड़ा होती है। जिस जीव को नुकसान पहुँचता है और उन्हें पीड़ा होती है, दुःख होता है, तो वह त्रसकाय (दुःख सहने वाले) जीव होते हैं। मानवता के नज़रिए से देखें तो पीड़ा सहने वाले जीव की रक्षा करनी चाहिए या उसे मारकर खा जाना चाहिए? अंडे खाने वाले पर जीव हिंसा का दोष लगता है।
दूसरी बात, जब त्रसकाय जीवों को खाते हैं, तो खाने वाले के शरीर में भय और पीड़ा के परमाणु प्रवेश करते हैं। इससे वह स्वयं ही लंबे समय में तनाव, भय, स्ट्रेस और डिप्रेशन का शिकार बन जाता है। लगातार अंडे और मांस खाने वाले मनुष्य, चाहे कितने भी सुरक्षा के उपाय कर लें, फिर भी पूरे दिन भयभीत रहते हैं और ज़रा भी निडर नहीं रह सकते।
अंडे खाना पाशविकता (हिंसक प्रवृत्ति) कहलाता है। जैसे जंगली जानवर अपनी भूख मिटाने के लिए दूसरे जानवरों को मारकर खा जाते हैं, वैसे ही मनुष्य अंडो को खाते हैं। मानवता से भरा दिल रखने वाला व्यक्ति वही कहलाता है, जिसे यह विचार आए कि अगर मुझे कोई ज़रा सी सुई भी चुभा दे तो सहन नहीं होता, तो फिर किसी जीव को काटकर कैसे खाया जा सकता है?
अगर अंडे को काटें तो वह हिलता-डुलता नही, तो क्या उसे त्रसकाय (संवेदनशील) जीव नहीं कहा जाएगा? इसका उत्तर हमें परम पूज्य दादाश्री से मिलता है।
प्रश्नकर्ता: ये अंडे, वे त्रास पाते नहीं हैं, तो उन्हें खाना अच्छा है या नहीं?
दादाश्री: अंडे त्रास पाते नहीं हैं, परन्तु अंडे में अंदर जो जीव रहा है न, वह बेभान अवस्था में है। पर वह फूटे तब हमें पता चलता है या नहीं?
प्रश्नकर्ता: तुरन्त पता चलता है। पर अंडा हिलता-डुलता तो नहीं न! तब?
दादाश्री: वह तो नहीं होता। क्योंकि वहाँ बेभान अवस्था में है। इसलिए होता नहीं। वह तो मनुष्यों का भी गर्भ चार-पाँच महीने का हो, वह अंडे की तरह ही होता है। इसलिए उसे मारना नहीं चाहिए। उसमें से फूटता है तो क्या होता है, वह हम मनुष्य समझ सकते हैं।
आजकल तो कई डॉक्टर भी शाकाहारी परिवारों के बच्चों को प्रोटीन प्राप्त करने और स्वास्थ्य की दृष्टि से अंडे खाने की सलाह देते हैं।
प्रोटीन पाने के लिए अंडे ही खाने चाहिएँ, ये मान्यता बिल्कुल गलत है। शाकाहारी व्यंजन जैसे कि, अंकुरित मूंग और सोयाबीन में भरपूर प्रोटीन होता है। अन्य खाद्य पदार्थ जैसे पनीर, चना, दालें आदि में भी भरपूर मात्रा में प्रोटीन होता है। ताकतवर घोड़े शाकाहारी होते हैं और चने से प्रोटीन और शक्ति प्राप्त करते हैं। इसके अलावा, हाथी और दरियाई घोड़े (हिपोपोटेमस) जैसे शक्तिशाली जानवर भी पूरी तरह से शाकाहारी होते हैं। वे भूखे रहते हैं, लेकिन माँसाहार को कभी भी नहीं छूते। अगर शाकाहार में ताकत न होती, तो इन जीवों में इतनी शक्ति कहाँ से आती?
इसलिए, सिर्फ प्रोटीन के लिए अंडे खाना आवश्यक नहीं है। लेकिन मनुष्य अपनी जीभ के स्वाद या शौक के लिए अंडे खाने पर जोर देते हैं। अब ऐसा समय नहीं है, कि शाकाहारी भोजन उपलब्ध न हो। हर जगह न केवल शाकाहारी बल्कि जैन और वीगन भोजन के विकल्प भी आसानी से उपलब्ध होते हैं। वीगन यानी की जिसमें जानवरों से प्राप्त किसी भी प्रकार के खाद्य पदार्थ जैसे कि दूध, शहद आदि का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसलिए, इस समय में अंडे या मांसाहार बिलकुल नहीं करना है, ऐसा कोई तय करता है तो उसे भूखा रहने की नौबत नही आएगी।
A. अहिंसा का पालन करने के लिए सबसे पहले हिंसा यानी क्या? वह जानना पड़ेगा। हिंसा कैसे नुकसान करती है?... Read More
Q. हिंसा के जोखिम कहाँ-कहाँ हैं?
A. परम पूज्य दादा भगवान कुदरत का सिद्धांत समझाते हुए कहते हैं कि, “जो जीव आप बना सकते हो, उसे मारने का... Read More
Q. अहिंसा से होने वाले फ़ायदे कौन-कौन से हैं?
A. जो अहिंसक होता है, उसकी बुद्धि का प्रकाश बहुत बढ़ता है। किसी भी जीव को दुःख नहीं देने के परिणाम... Read More
Q. मनुष्यों और प्राणियों की हिंसा किस-किस प्रकार से होती है?
A. निगोध (निचले स्तर के जीव) से लेकर एकेन्द्रिय जीव (जिनमें केवल एक इन्द्रिय होती हैं) के विकास की... Read More
A. परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, अहिंसा का पालन करने के लिए स्वाद की इन्द्रिय, यानी जीभ पर बहुत... Read More
Q. जीव-जंतुओं को मारने से होने वाली हिंसा को कैसे रोका जा सकता है?
A. आमतौर पर जब घर में मच्छर, मक्खी, चींटियाँ, खटमल, छिपकली या कॉकरोच दिखाई दें, तो हम तुरंत डर या... Read More
Q. खेती-बाड़ी में हिंसा हो तो क्या करना चाहिए?
A. खेती-बाड़ी करते समय किसानो को जाने-अनजाने में हिंसा का अपराध करना पड़ता हैं। ज़मीन जोतने के दौरान... Read More
Q. सबसे बड़ी हिंसा कौन सी है और उसमें से कैसे छूटा जा सकता है?
A. परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, कि इस संसार में सबसे बड़ी हिंसा कषाय से अर्थात् क्रोध-मान-माया-लोभ... Read More
subscribe your email for our latest news and events
