
आमतौर पर जब घर में मच्छर, मक्खी, चींटियाँ, खटमल, छिपकली या कॉकरोच दिखाई दें, तो हम तुरंत डर या चिढ़ के कारण उन्हें मारने के उपाय करते हैं। बाजार में भी मच्छर जैसे जीवों को मारने के लिए रसायनयुक्त स्प्रे और बैटरी से चलने वाले इलेक्ट्रिक उपकरण मिलते हैं, जिनके संपर्क में आते ही वह जीव मर जाते हैं। कॉकरोच को मारने के लिए दवाइयाँ छिड़कना, चींटियों का उपद्रव होने पर वहाँ पानी डालना, कॉकरोच या छिपकली को झाड़ू जैसे साधनों से मारना, मच्छर को दोनों हाथों से कुचल कर मारना, ये सभी हिंसक उपाय हैं। ये जिव-जंतु तीन या चार इन्द्रियों वाले जीव होते हैं, जबकि छिपकली और साँप पाँच इन्द्रियों वाले जीव होते हैं। उनको मारने का भाव करना या उन्हें मार डालना, वह गुनाह है।
परम पूज्य दादा भगवन कहते हैं कि, “जो आप ‘क्रियेट’ कर सकते हो, उसका आप नाश कर सकते हो। आप ‘क्रियेट’ नहीं करते, उसका नाश आप नहीं कर सकते।” यानि कि, जिसे आप सृजित कर सकते है, उसे विसर्जित भी कर सकते है।
वे कहते हैं कि अगर आप एक खटमल या मच्छर स्वयं नहीं बना सकते, तो आपको उन्हें मारने का अधिकार भी नहीं है। हमारे अधिकार की सीमा से बाहर किसी भी चीज़ को छीनना एक गुनाह है। वे एक और उदाहरण से समझाते हैं, कि मान लीजिए किसी मालिक ने अपने बगीचे में, उसकी सीमा के पास तोरी या लौकी की बेलें उगाई हों। उन बेलों पर उगी हुई सब्ज़ियाँ अगर बगीचे की सीमा के बाहर लटक रहे हों। अब, अगर कोई व्यक्ति सीमा के बाहर से गुज़र रहा हो और वह सब्जी तोड़ ले, तो कानूनी तौर पर किसी और के बगीचे से सब्ज़ी तोड़ रहा है। अगर मालिक देख लिया, तो उसे ज़रूर दंड देगा। उसी तरह, यह पूरी दुनिया भगवान का बगीचा है और इसमें रहने वाले हर जीव को जीने का पूरा अधिकार है। जैसे किसी और के बागीचे से एक लौकी या तोरी तोड़ना गुनाह है, वैसे ही इस दुनिया में किसी भी जीव को मार डालना भगवान के बागीचे को लूटने के बराबर गुनाह है और उसका दंड अवश्य ही मिलता है।
एग्रीकल्चर कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों को भी अध्ययन के उद्देश्य से पतंगों जैसे जीवों को मारकर उनका एल्बम बनाना पड़ता है। जितने अधिक और सुंदर पतंगे पकड़ते हैं, उतने अधिक मार्क्स मिलते हैं। ठीक उसी तरह, डॉक्टरी की पढ़ाई में भी मेंढकों और कॉकरोच की चीरफाड़ करनी पड़ती है, जिसमें प्रत्यक्ष हिंसा होती है। क्या हम किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला में एक कीट या कॉकरोच स्वयं बना सकते हैं? अगर नहीं, तो उन्हें मारने का अधिकार भी नहीं है। पढ़ाई के कारण अगर ऐसी हिंसा में भागीदार होना पड़े, तो उसके उपाय के बारे में परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि रोज़ भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए, कि "मेरे भाग में ऐसी हिंसा कहाँ से आई? हे भगवान, मैं क्षमा मांगता हूँ, अब ऐसा फिर न आए, ऐसा करना।" सच्चे पछतावे के साथ की गई हिंसक क्रिया की जोखमदारी कम हो जाती है। जबकि, खुशी-खुशी से हिंसा करने की जोखिमदारी ज़्यादा होती है। जितना खुश होके काम किया होगा, उतनी ही कड़वाहट भुगतनी पड़ती है।
हर जीवमात्र में भगवान विराजमान हैं। एक ओर हम धर्म करते हैं, भगवान का नाम लेते हैं, और दूसरी ओर उसी जीव को मार डालते हैं, जिसमें स्वयं भगवान विराजमान हैं, तो यह कहाँ का न्याय है? इसलिए हमें किसी भी जीव को, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, फिर भी उसे कोई भी दुःख न पहुँचे, ऐसा वर्तन रखना चाहिए।
यदि घर में मक्खी, मच्छर या अन्य जीवों का उपद्रव बढ़ जाए, तो उससे बीमारियाँ फैलती हैं। उन्हें दूर करने के लिए कौन-कौन से अहिंसक उपाय करने चाहिए, इसकी विस्तृत समझ हमें यहाँ परम पूज्य दादा भगवान से मिलती है।
घर में जीव-जंतुओं के होने का मुख्य कारण यह होता है, कि वहाँ पर्याप्त साफ़-सफ़ाई नहीं होती। खटमल यानी कि स्वेदज है। वे मनुष्य के पसीने से ही उत्पन्न होते हैं और मनुष्य को ही काटते हैं। क्योंकि, खटमल या मच्छर जैसे जीवों का भोजन ही मनुष्य का खून है। अगर उन्हें बढ़िया घी डालकर खिचड़ी परोसे, फिर भी वे नहीं खाएँगे!
इसलिए, घर में साफ़-सफ़ाई रखनी चाहिए, ताकि खटमल, मक्खी या मच्छर टिक न सकें। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि चाहे किसी भी तरह के उपाय करें, लेकिन जीवों को नहीं मारना चाहिए। वे सुझाव देते हैं, कि खटमल, मच्छर, कॉकरोच जैसे जीव-जंतु न हों, इसके लिए घर में पोछा लगाना चाहिए, और रोज साफ़-सफ़ाई करनी चाहिए। अगर घर के कोनों की सफ़ाई न हो, तो वहाँ धूल और नमी जमा हो जाती है, उसमे सड़न होती है और फिर जीव उत्पन्न होते हैं। इसलिए सफ़ाई रखना वह उत्तम उपाय है, जिससे जीवों का उपद्रव कम हो जाएगा। फिर भी अगर जीव-जंतु हों, तो उन्हें पकड़कर बाहर निकाल देना चाहिए, लेकिन उन्हें मारना तो नहीं चाहिए।
खटमल जैसे जीवों को मारने से भी उनकी संख्या कम नहीं होती। अगले दिन फिर उतने ही खटमल दिखाई देंगे। ये जीव कुछ कालवर्ती होते हैं। उनकी ऋतु (समय) आने पर वे उत्पन्न होते हैं। फिर चाहे कितनी भी दवा छिड़कें, वे फिर भी उत्पन्न होते ही रहते हैं। इसलिए, दवा छिड़ककर गुनाह बढ़ाना नहीं चाहिए।
सिर के बालों में भी सफ़ाई न रखने से जूँ और लिख पड़ जाती है। उन्हें एक-एक करके मारने की बजाय, अहिंसक उपाय करने चाहिए और इसे रोकने के लिए बालों की नियमित सफ़ाई करनी चाहिए।
सफ़ाई रखने के बावजूद भी यदि घर में जीव-जंतु दिखाई दें, तो कुछ और उपाय करने चाहिए, जिनमें उनकी हिंसा न हो। जैसे कि, उन्हें पकड़कर घर के बाहर छोड़ आना। साथ ही, हम यह भावना भी कर सकते हैं, कि उन जीवों को कहीं और खाना मिल जाए। ऐसा करने से हमें भी उनको बाहर छोड़कर आने का संतोष होता है और जीव को नुकसान भी नहीं होता।
मनुष्य में बुद्धि का विकास हुआ है। हम निश्चय कर लें कि हमें जीवों की हिंसा करनी ही नहीं है, तो अन्य कोई भी उपाय मिल ही जाएँगे। किसी भी जीव को मार डालने की जोखिमदारी को अगर सही ढंग से समझ लेते हैं, तो हिंसक उपाय अपने आप ही बंद हो जाएँगे।
घर में चींटियाँ बहुत अधिक हो जाएँ, तो जहाँ उनका उपद्रव होता हों, उस जगह को बंद कर देना चाहिए। कुदरती रूप से उपद्रव कुछ दिनों तक चलता है, फिर उसका समय पूरा होते ही बंद हो जाता है। फिर भी यदि ज़रूरत पड़े, तो अन्य उपाय करें, लेकिन चींटियों को मारें नहीं।
कुछ लोग मानते हैं, कि अगर हम भगवान का नाम लेकर मच्छर को मारेंगे, तो उनकी ऊँची गति होगी और हम चैन की नींद सो पाएंगे। परम पूज्य दादा भगवान इसके सामने सच्ची समझ देते हैं।
प्रश्नकर्ता: और ये मच्छर बहुत त्रास देते है, वह?
दादाश्री: ऐसा है न, इस जगत् में कोई भी वस्तु त्रास देती है न, वह नियम से बाहर कोई त्रास दे सकें ऐसा है ही नहीं। इसलिए वह कानून से बाहर नहीं है। आप नियम के अनुसार त्रास प्राप्त कर रहे हो। अब आपको बचना हो तो आप मच्छरदानी रखो। दूसरा रखो, साधन करो। पर उसे मारना वह गुनाह है।
प्रश्नकर्ता: बचाव करना, मारना नहीं है।
दादाश्री: हाँ, बचाव करना।
प्रश्नकर्ता: पर मच्छर को मारें, पर ‘श्रीराम’ कहें तो उसकी गति ऊँची जाती है?
दादाश्री: पर वह अपनी अधोगति करता है। क्योंकि उसे त्रास होता है।
किसी भी जीव को मारने से हम पाप कर्म से बंधते हैं, जिसका फल अधोगति आता है। इसलिए, विज्ञापनों से प्रेरित होकर या लोगों की बातों में आकर जीवों को मारने के उपाय नहीं करने चाहिए।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, कि बिना हिसाब के एक मच्छर भी आपको नहीं काट सकता, ऐसा स्वतंत्र जगत है। श्रीमद् राजचन्द्र जैसे ज्ञानी पुरुषों, जंगल में तप करने वाले तपस्वियों और तीर्थंकर भगवान महावीर को भी बहुत मच्छरों ने काटा था, क्योंकि जहाँ हिसाब चुकता होना होता है, वहाँ खुद भगवान भी कोई बदलाव नहीं कर सकते।
लेकिन हम बदलाव कहाँ कर सकते हैं? बदलाव तो भाव में करना है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि अगर आप दखल नहीं करेंगे, तो एक मच्छर भी आपको छू नहीं सकता। जीव-जंतुओं को मारने के जो भाव किए हैं, वे सभी दखल कहलाती है। जब तक हमारे अंदर इन जीवों के प्रति द्वेषभाव रहेगा, तब तक वे हमें काटते रहेंगे। जब हमारे अंदर इन जीवों के प्रति द्वेषभाव खत्म हो जाएगा, तब वे जीव हमें परेशान करना भी बंद कर देंगे। हम उपद्रव को मिटाने की तैयारी करते हैं, इसीलिए उपद्रव बंद नहीं होते। उपद्रव को मारने के भाव बंद होंगे, तो उपद्रव अपने आप कम होते जाएँगे, यही विज्ञान है।
हिंसा के जोखिम को समझने के बाद, हमें यह निश्चय करते है कि अब किसी भी तरह की हिंसा नहीं करेंगे, लेकिन अब तक जो हिंसा हो चुकी है, उसका क्या?
उसका उपाय हमें परम पूज्य दादाश्री से ही मिलता है। अब तक जो भी जीव-जंतुओं की हिंसा हो चुकी हो, उन्हें याद करके पश्चाताप करना चाहिए और ऐसी हिंसा दोबारा न हो उसके लिए निश्चय करना चाहिए।
अगर जीव-जंतुओं को स्प्रे करके मारा हो, इलेक्ट्रिक उपकरणों से मारा हो, कुचल कर मारा हो, साँप जैसे जीवों को डरकर मारा हो या किसी भी कारण से छोटे या बड़े जीवों की हिंसा हुई हो, तो उसका पश्चाताप करना चाहिए। विशेष रूप से बड़े जीवों को मारने के लिए एक-एक घंटे तक पश्चाताप करना चाहिए।
अगर बाहर किसी जीवों को मारा हो या उन्हें मारने का भाव भी किया हो, तो उस बिगड़े हुए भाव के लिए पश्चाताप करके, अपने भावों को बदल लेना चाहिए। ताकि हिंसा की जोखिमदारी से मुक्ति मिल सके।
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