निगोध (निचले स्तर के जीव) से लेकर एकेन्द्रिय जीव (जिनमें केवल एक इन्द्रिय होती हैं) के विकास की यात्रा में करोड़ों, अरबों अवतार के डेवलपमेंट के बाद, अनगिनत योनियों में भ्रमण करके अंत में पंचेन्द्रिय (पाँच इन्द्रियों वाले) जीव के रूप में उसका जन्म होता है। इनमें चार पैर वाले प्राणियों और मनुष्यों का समावेश होता हैं और उनकी हिंसा का दोष बहुत बड़ा होता है। हम इसे एक साधारण उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए, अगर घर को पाँच ईंटों और सीमेंट से बनाया गया हो और हम उसे तोड़ दें, तो निर्माण का कितना नुकसान होगा? ज्यादा नहीं। लेकिन अगर पाँच मंज़िला घर बन चुका हो, अंदर इंटीरियर भी तैयार हो गया हो, तो कितना नुकसान होगा? कई गुना ज्यादा! इसलिए, जैसे पाँच ईंटों की तुलना में पांच मंजिला घर को तोड़ने का अपराध बहुत ज़्यादा है, वैसे ही एकेन्द्रिय जीव की हिंसा की तुलना में पंचेन्द्रिय जीव की हिंसा का अपराध बहुत बड़ा होता है।
एकेन्द्रिय जीव में आत्मा पर जो आवरण है, वह थोड़ा टूटा होता है, जबकि पंचेन्द्रिय जीव में वह आवरण अधिक टूटा होता है और ऊपर से मन भी डेवलप हुआ है। मनुष्य में तो और भी आगे बढ़कर मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार भी डेवलप होते हैं। इसलिए, डेवलपमेंट की शुरुआत में किसी जीव को मारने की तुलना में ज़्यादा डेवलप हुए जीव को मारने में अधिक खतरा होता हैं।
हिंसा का अपराध अगर सापेक्ष रूप से समझें तो दाल, चावल, सब्जी, रोटी, सलाद आदि भोजन लेने में जितना नुकसान होता है, उससे हजार गुना अधिक नुकसान मुर्गे के बच्चे को मारकर खाने में होता है। जबकि मनुष्य के साथ झगड़ा करने में इससे भी कई गुना नुकसान होता है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, अहिंसा के पालन में पहले बड़े जीवों की रक्षा करनी चाहिए। वे कहते हैं कि, “पहले मनुष्यों को सँभालो। हाँ, वह बाउंड्री सीखो कि मनुष्यों को तो मन-वचन-काया से किंचित्मात्र दुःख नहीं देना हैं। फिर पंचेन्द्रिय जीव - गाय, भेंस, मुर्गी, बकरे, ये सब जो हैं, उनकी मनुष्यों से थोड़ी-बहुत कम, परन्तु उनकी सँभाल रखनी चाहिए। उन्हें दुःख नहीं हो ऐसा ध्यान रखना चाहिए। मतलब यहाँ तक ध्यान रखना है। मनुष्य के अलावा के पंचेन्द्रिय जीवों को, लेकिन वह सेकन्डरी स्टेज में। फिर तीसरी स्टेज कौन-सी आती है? दो इन्द्रिय से ऊपर के जीवों का ध्यान रखना।“
किसी जीव की हत्या करना बहुत बड़ा अपराध है। इससे भयंकर बैर बंधता है और उस दंड को भुगतने के लिए अधोगति में जाना पड़ता है। उसमे भी मनुष्य की हत्या करना वह दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह है।
अगर हम किसी जीव को दुःख पहुँचाते हैं, तो वह जीव बैर बाँधता है। इस बैर का परिणाम भयानक हो सकता है, जिसमें वह जीव बदले में हमें ही दुःख देता है और आगे बढ़कर हमें मार भी सकता है। बैर बंधने के कई कारण हो सकते हैं। मुख्य रूप से लक्ष्मी (धन), विषय-विकार और अहंकार के कारण बैर बंधता है। जैसे कि, पैसों की वसूली के समय सामने वाला पैसे नहीं देता और ऊपर से ऐसा कहता है कि, "जो करना है कर ले! पैसे नहीं दूँगा, तो तुम क्या कर लोगे?" तब वसूली करने वाला व्यक्ति गुस्से में आकर कहता है, "अगर नहीं दिया तो मार डालूँगा!" इस प्रकार, लक्ष्मी (धन) के कारण बैर बंधता है। फिर, दूसरे भव में सामने वाले को मारने के निमित्त बन सकते हैंI कई बार अपने ही पति या पत्नी के साथ कोई अवैध विषय-विकारी संबंध रखते हैं, तब भी, "मैं उसे मार ही डालूँगा!" ऐसे भाव खुद कर बैठते हैंI जिससे सामने वाले को मारने के बीज पड़ते हैं।

अगर किसी ने भाव किया हो कि, “ऐसे अपराध करने वालों को तो मार ही डालना चाहिए” और किसी दूसरे ने वैसा अपराध किया हो, तो दोनों ही हिसाब के संकलन में आते हैं और हत्या का कारण बनते हैं। जब हम किसी को मारने का भाव करते हैं, तो कोई न कोई हमें मारने का भाव करता है, इस प्रकार से भी हम कर्मों के हिसाब में बंध जाते हैं। हालांकि, हत्या के पीछे हम जो देख या समझ पाते हैं, उससे कहीं ज्यादा कारण होते हैं। फिर भी, हत्या एक बहुत बुरे कर्म का फल है।
वास्तव में आत्मा अमर है। उसे भेद नहीं सकते, ना ही उसे नष्ट किया जा सकता है। देह तो पुतला है, वह किसी की हत्या नहीं कर सकता। लेकिन देह की क्रिया के पीछे अहंकार है। वह अहंकार हत्या करता है और अहंकार की हत्या होती है। जब खुद को दुःख होता है, तब अहंकार को इच्छा होती है कि, "इसे सीधा कर दूँ" "इसे खत्म कर दूं!" "तुझे छोड़ूँगा नहीं!" यह अहंकार का तीव्र द्वेषभाव उत्पन्न होता है। इसी द्वेष के हिसाब से हत्या करने वाला और हत्या का भोग बनने वाला, दोनों मिलते हैं। द्वेष के परमाणु इकट्ठा होने से, खराब कर्म का बंध पड़ता है। वह कर्म जब फल देगा, तब वह उतना ही बुरा परिणाम देगा, छोड़ेगा नहीं।
गर्भपात करवाना मनुष्य की हत्या करवाने के बराबर कृत्य है। इसका बहुत बड़ा पाप लगता है।
मेडिकल साइंस में बहुत प्रगति हुई है। अल्ट्रासाउंड के माध्यम से गर्भ में बच्चे की स्थिति देखी जा सकती है। कई बार माता-पिता यह देखते हैं कि, बच्चे में कोई शारीरिक कमी है, या लड़की है, इसलिए वे गर्भ में ही बच्चे को मार डालते हैं, जिसे गर्भपात कहा जाता है। कई युवा लड़के-लड़कियां शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाते हैं और उसमें भूल हो जाने से लड़की गर्भवती हो जाती है। फिर शादी की उम्र न होने या समाज में बदनामी के डर से वे गर्भपात करवाते हैं। खुद की मज़ा, दूसरे जीव की सज़ा हो जाती है, जो बहुत ही बड़ा गुनाह है।

इसमें सबसे बड़ा पाप गर्भपात करवाने वाली माँ को, फिर गर्भपात करने की अनुमति देने वाले पिता को लागू पड़ता है, और उसके बाद गर्भपात करने वाले डॉक्टर पर लागू पड़ता है। कई बार डॉक्टर के तौर पर कार्य करने वाले व्यक्ति को सीधा गर्भपात नहीं करता, लेकिन उसे गर्भपात की दवा लिखनी पड़ती है, और उसमें भी उतना ही गुनाह लागू पड़ता है। इसलिए, माता-पिता या डॉक्टर के रूप में गर्भपात का कार्य किया, करवाया या अनुमोदना दी इन तीनों का जोखिम तो है ही।
जब बच्चा गर्भ में पांच महीने का होता है, तब वह हिलना-डुलना शुरू कर देता है। इसलिए कई लोगों का मानना है कि पाँचवें महीने में जीव आता है, इसलिए उससे पहले बच्चे को मार सकते हैं। लेकिन यह बात बिल्कुल गलत है। जब बच्चे का जीव गर्भ में प्रवेश करता है, तब से ही उसमें जीवन होता है। आत्मा की हाज़िरी हो तो ही जीव की वृद्धि होती है, नहीं तो जीव की वृद्धि नहीं होती, यह सिद्धांत है। जैसे कि, पेड़ से काटी गई लकड़ियों में वृद्धि नहीं होती, लेकिन गर्भ में जीव अंडे से बढ़ते-बढ़ते बड़ा होता है। गर्भ में चौदह या अठारह हफ्तों के बाद जब सोनोग्राफी में बच्चे को देखें, तो उसके सभी अंग छोटे-छोटे विकसित होते हुए दिखाई देते हैं, और हृदय की धड़कने भी सुनाई देती है।
हम बच्चे को जन्म देकर उसे प्रेम से पाल-पोसकर बड़ा करते हैंI उसे दूध पिलाते हैं, खिलाते हैं, पिलाते हैं, पढ़ाते हैं, उसका विवाह करवाते हैं, उसकी सभी ज़रूरतों को पूरा करते हैं। अब वही बच्चे का छोटा स्वरूप गर्भ है, यह उससे अलग नहीं है। उसे हम कैसे मार सकते हैं? दूसरे बच्चे को जन्म दिया हो, तो उसके ही भाई या बहन को गर्भ में कैसे मारा जा सकता है? जो जीव मनुष्य से भगवान बनने की योग्यता (क्षमता) रखता है, आत्मज्ञान प्राप्त करके मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है, ऐसे जीव को मारने में कितना भयंकर गुनाह है?
गर्भपात में एक जीवित मनुष्य को मारने जितना ही पाप होता हैं। इसके परिणाम स्वरूप, वह जीव बिना बैर बांधे रहेगा ही नहीं। इस पापकर्म का फल नरकगति भी हो सकता है, जिसमें कम से कम दस हजार वर्षों तक भयंकर यातना सहन करनी पड़ती है। इस प्रकार क्षणिक सुख के लिए गर्भ के जीव की हिंसा बहुत बड़ी है और इसका भयंकर गुनाह लगता है।
पशुओं की हिंसा का अर्थ हैं, पंचेन्द्रिय जीवों की हिंसा, इसलिए इसका भी बड़ा गुनाह माना जाता है। हिंसा के पीछे क्या आशय है, उसके आधार पर भी हिंसा का गुनाह लगता है। कुछ लोग बिना किसी स्पष्ट कारण के, केवल शिकार का आनंद लेने के लिए, हिरण जैसे पशुओं का शिकार करते हैं और फिर इस पर गर्व भी करते हैं कि, “देखो, मैंने कितना बड़ा शिकार किया!” अपने मोज़-शौक के लिए या दिखावे के लिए मूक पशुओं को नुकसान पहुँचाना, यह बड़ा गुनाह है, और इसका फल नरकगति होती है। कुछ लोग मज़बूरी में आकर शिकार करते हैंI जब घर में दूसरा कुछ खाने के लिए न हो, पत्नी और बच्चें भूख से तड़प रहे हों, तब हिरण या खरगोश जैसे जानवरों का शिकार करके घर में खाना खिलाते हैं। लेकिन उन्हें अपने अंदर भारी पश्चाताप और दुःख होता है कि, “ये मैंने गलत किया है।” हालात की वजह से प्राणियों की हिंसा करनी पड़े और खुद के अंदर पछतावा हो, फिर भी उस गुनाह के दंडस्वरूप तिर्यंचगति (जानवर योनि) प्राप्त होती है। शिकार करने की क्रिया दोनों में एक जैसी ही है, और दंड भी दोनों को ही मिलता है। लेकिन एक व्यक्ति मोज़-शौक के लिए करता है, जबकि दूसरा व्यक्ति मज़बूरी के मारे करता है, उसके आधार पर उसका फ़ल बदलता है। कितने ही सज्जन लोग ऐसे भी होते हैं कि, भले ही घर में सब भूख से तड़प रहे हों, फिर भी तय करते हैं कि, “किसी जीव को मार कर मुझे अपनी भूख नहीं मिटानी है।” तब वे मनुष्य गति के लायक बनते हैं।
चाहे माँसाहार करने के लिए प्राणियों को मारा हो या द्वेषवश पत्थर से किसी चूहे, बिल्ली या कुत्ते जैसे प्राणियों को मार दिया हो, क्रोध में आकर किसी पशु या पक्षी को चोट पहुँचाई हो या फिर धार्मिक क्रियाओं में बलि चढ़ाने के लिए मूक प्राणियों का कत्ल किया हो, किसी भी प्रकार से पशु हिंसा का पाप कर्म बंधता है, जिसका फल भुगतना ही पड़ता है।
उसमें भी भारत में गायों को पवित्र माना गया हैं और उन्हें माता के रूप में पूजा जाता हैं। ऐसा करना चाहिए कि गायों की हिंसा न हो। श्रीकृष्ण भगवान ने भी अपने समय में गौ-हिंसा रोकने के प्रयास किए थे। उस काल में गायों की हिंसा करके उनका मांस खाने का अधर्म शुरू हुआ था। इसे रोकने के लिए उन्होंने ‘गोवर्धन’, मतलब कि गायों के संरक्षण की व्यवस्था की थी। श्रीकृष्ण भगवान ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाया, यह उनके इस महान कार्य का प्रतीक है। उन्होंने गोरक्षा से गौ-हिंसा को रोका और गोवर्धन से गायों की संख्या बढ़ाने के प्रयास शुरू किए। श्रीकृष्ण भगवान की नेतृत्व में गोवर्धन के उदेश्य से जगह-जगह गौशालाएँ स्थापित की गईं, जहाँ हजारों गायों का पालन-पोषण हो ऐसी व्यवस्था की गई थी। गोवर्धन और गोरक्षा के कारण जगह-जगह दूध और घी का उत्पादन बढ़ा, जिसके आधार पर अनेक लोगों का जीवन-यापन होता था । आज भी गायों की हिंसा न हो और उनका संरक्षण किया जाना चाहिए।
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