अलग-अलग लोगों के लिए मोक्ष / मुक्ति / स्वतंत्रता का अर्थ अलग है। हालाँकि आध्यात्मिक मार्ग में इसका अर्थ एक ही है।
“मोक्ष अर्थात् सनातन सुख। सर्व दु:खों से आत्यंतिक मुक्ति!”
– परम पूज्य दादा भगवान
प्रत्येक जीव सुख की खोज में है। हम जो कुछ भी करते हैं, सुख पाने के लिए करते हैं। सुख की खोज में रहना यह प्रत्येक जीव का सहज स्वभाव है। एक बच्चे की तरह वह खिलौनों में, खेलने में, लाड़ प्यार में सुख की खोज करता है। जैसे जैसे बड़ा होता जाता है, वैसे-वैसे सुख के साधन बदलते जाते हैं लेकिन सुख की खोज चलती रहती है। व्यक्ति पैसों में, चीज़ों में, संबंधो में, प्रतिष्ठा आदि में सुख ढूंढता है। हालाँकि, यह सब चीज़ें, रिश्तों में से किसी को भी शाश्वत सुख नहीं प्राप्त होता, कभी ना कभी वे हमें छोड़ देते हैं या हम उन्हें छोड़ देते हैं। जब वे हमसे दूर जाते हैं तब जितना हमने उनसे सुख लिया था उतने ही प्रमाण में हमें दुःख लगता है। इस प्रकार, संसार कायमी सुख की खोज में दौड़ रहा है। लेकिन क्षणिक सुख ही प्राप्त होता है जिसका परिणाम दुःख होता है। मोक्ष का अर्थ शाश्वत सुख के अलावा और कुछ नहीं है।
परम पूज्य दादा भगवान से शाश्वत सुख के विषय पर हुई बातचीत के माध्यम से जानते हैं।
प्रश्नकर्ता : मैं आत्मा को ढूँढ रही हूँ।
दादाश्री : आत्मा को कोई ही व्यक्ति ढूँढ सकता है। सभी जीव आत्मा को नहीं ढूँढते। ये सब जीव क्या ढूँढ रहे हैं? सुख को ढूँढ रहे हैं। दु:ख किसी जीव को पसंद नहीं है। छोटे से छोटा जीव हो या मनुष्य हो या स्त्री हो, दु:ख किसीको पसंद नहीं है। अब इन सबको सुख तो मिलता है, परन्तु किसीको संतोष नहीं है। उसका क्या कारण होगा? यह सुख, वह सच्चा सुख नहीं है। एक बार सुख स्पर्श कर गया फिर दु:ख कभी भी नहीं आए, वह सच्चा सुख कहलाता है। वैसा सुख ढूँढ रहे हैं! मनुष्य जन्म में उसे मोक्ष कहा जाता है। फिर कर्म पूरे हुए कि मोक्ष हो गया! परन्तु पहला मोक्ष यहाँ से हो ही जाना चाहिए। कषाय नहीं होने चाहिए। कषाय तुझे होते हैं क्या?
प्रश्नकर्ता : होते हैं।
दादाश्री : कषाय तुझे बहुत पसंद हैं क्या?
प्रश्नकर्ता : पसंद तो नहीं, परन्तु होते हैं।
दादाश्री : कषाय ही दु:ख है! पूरा जगत् कषायों में ही पड़ा हुआ है। लोगों को कषाय पसंद नहीं हैं। परन्तु फिर भी कषायों ने उन्हें घेर लिया है। कषायों के ही ताबे में सब आ गए हैं। इसलिए वे बेचारे क्या करें? कितना ही भले गुस्सा नहीं करना हो फिर भी हो जाता है। तुझे कैसा सुख चाहिए, ‘टेम्परेरी या परमानेन्ट?’
प्रश्नकर्ता : सभीको शाश्वत सुख चाहिए।
दादाश्री : फिर भी शाश्वत सुख मिलता नहीं है, उसका क्या कारण है?
प्रश्नकर्ता : हमारे कर्म ऐसे हैं, और क्या?
दादाश्री : कर्म चाहे जैसे भी हों परन्तु हमें शाश्वत सुख देनेवाले, दिखानेवाले कोई मिले नहीं है। जो भी कोई शाश्वत सुख भोग रहे हों, उन्हें हम कहें कि ‘मुझे रास्ता दिखाइए तो आपका काम हो जाएगा।’ परन्तु वैसे कोई मिले नहीं हैं। दु:खी और सिर्फ दु:खी ही मिले हैं। इसलिए दु:ख उनका भी नहीं गया और आपका भी नहीं गया। सिर्फ ‘ज्ञानी पुरुष’ ही सर्वदा सुखी रहते हैं। वे मोक्ष में ही रहते हैं। उनके पास जाएँ तो आपका निबेड़ा आ जाएगा। नहीं तो भटकते रहना है। इस काल में शांति किस तरह रहे? ‘स्वरूप के ज्ञान’ के बिना शांति किस तरह रहे? अज्ञान ही दु:ख है।
प्रश्नकर्ता : मोक्ष प्राप्ति प्रत्येक मनुष्य का हक़ है?
दादाश्री : मोक्ष प्राप्ति का हर एक मनुष्य का नहीं, हर एक जीव का हक़ है, क्योंकि हर एक जीव सुख ढूँढ़ रहा है। वह सुख ‘इसमें मिलेगा, इसमें मिलेगा’ ऐसी आशा में ही अनंत जन्मों से भटक रहा है। वह शाश्वत सुख ढूँढ रहा है। शाश्वत सुख, वही मोक्ष।
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