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आत्महत्या संबंधी विचारों को कैसे रोका जा सकता है?

हममें से कई लोगो ने कभी न कभी तो आत्महत्या जैसे नेगेटिव विचारों का अनुभव किया होगा, जो हमें ये सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि, ऐसे विचार आएँ तब क्या करना चाहिए? बहुत बुरे संयोगों में या हमें जब कोई खराब समाचार मिला हो, तब इस प्रकार के विचार और अधिक तीव्र हो जाते हैं। इससे हमारे मन की शांति भी भंग हो जाती है।

आत्महत्या के विचार किसी को भी अच्छे नहीं लगते, लेकिन हम इन विचारों को कैसे रोक सकते हैं?

इस कठिन समय में नीचे दी गई समझ अवश्य ही सहायक हो सकती है:

वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को अपनाएँ

  • यह समझना चाहिए कि हमें जो भी विचार आते हैं, वे पिछले जन्म के आधार पर आते हैं; उनका हमारी वर्तमान परिस्थिति से कोई संबंध नहीं है।
  • जब भी आत्महत्या संबंधी विचार आएँ, तब उन विचारों में एकाकार नहीं होना चाहिए और अपने आप से कहना चाहिए कि, “मैं ऐसे विचारों से सहमत नहीं हूँ और मुझे आत्महत्या नहीं करनी है।” इस प्रकार की समझ सेट करके हम आत्महत्या संबंधी विचारों का विरोध कर सकते हैं।
  • अपने नकारात्मक विचारों को पॉज़िटिव विचारों में बदलें।

नीचे दिए गए उपयोगी टिप्स आज़माएँ:

  • पूरे दिन में पंद्रह मिनट वॉक, अध्ययन या किसी ऐसी मनपसंद गतिविधि में कार्यरत रहें, जिससे हमें आनंद मिलता हो।
  • अपनी दिनचर्या में परिवर्तन लाएँ।
  • याद रखें कि, कोई भी संयोग हमेशा के लिए नहीं होते।
  • हमें जिस पर विश्वास हो, ऐसे व्यक्ति के साथ अपनी भावनाएँ शेयर करें। भावनाएँ व्यक्त करने पर हमारे परिवारजन और मित्र भी हमारी सहायता करने में प्रसन्नता महसूस करेंगे।
  • हमारे विचार हमारे स्वास्थ्य पर कैसी असर कर रहे हैं, इसका निरीक्षण करें। ऐसा करने से हमें तुरंत ही अनुभव होगा कि नेगेटिव विचारों की हमारे शरीर पर कैसी असर हो रही है!

नीचे दिए गए संवाद के द्वारा, आत्महत्या संबंधी आने वाले विचारों के विरुद्ध कैसी समझ रखनी चाहिए, इस विषय पर ज्ञानी पुरुष परम पूज्य दादा भगवान, मुमुक्षुओं को उत्कृष्ट समझ प्रदान करते हैं, इस विषय में और अधिक पढ़ते हैं।

प्रश्नकर्ता: मुझे (कई बार) आत्महत्या करने के बहुत विचार आते हैं, तो क्या करूँ?

दादाश्री: तुझे क्यों आत्महत्या करनी है? तुझे क्या दु:ख आ पड़ा है कि आत्महत्या करनी है?

प्रश्नकर्ता: सामाजिक और आर्थिक, दो ही दु:ख हैं।

दादाश्री: तुझे आत्महत्या नहीं करनी चाहिए। और क्या हो सकता है? इस देह की आत्महत्या यानी वह बड़ी आत्महत्या, फिर मन की आत्महत्या करता है। मन की आत्महत्या करता है, यानी संसार पर से मन उठ जाता है, ऐसा नहीं करना चाहिए। उसकी वजह से बेटे पर से भी मन उठ जाता है, सब पर से मन उठ जाता है, ऐसा नहीं करना चाहिए। तुझे निभा लेना चाहिए। यह संसार यानी जैसे-तैसे निभाकर निकाल  करने जैसा है। अभी कलियुग है, उसमें कोई क्या करे? ‘देअर इज़ नो सेफसाइड ऐनी व्हेर’ (कहीं भी सलामती नहीं)।

आत्महत्या करके बल्कि परेशानियाँ मोल लेता है। एक बार आत्महत्या करे तो उसके बाद कितने ही जन्मों तक उसके प्रतिस्पंदन आते रहते हैं! और ये जो आत्महत्या करते हैं न वे कोई नयी बार नहीं करते हैं, पिछले जन्म में आत्महत्या की हुई होती है उसके प्रतिस्पंदन के कारण करते हैं। आज आत्महत्या करते हैं, वह तो पहले की हुई आत्महत्या के कर्म का फल आता है। इसलिए खुद अपने आप ही आत्महत्या करता है। ऐसे प्रतिस्पंदन डले हुए होते हैं कि वह वैसा ही करता हुआ आया होता है, इसलिए खुद अपने आप ही आत्महत्या करता है। और आत्महत्या के बाद अवगति वाला जीव भी बन सकता है।

उदाहरण के तौर पर, जब हम किसी से बहुत प्रेम करते हैं, तब हमें उनसे बहुत सी अपेक्षाएँ होती हैं, जैसे कि उन्हें भी हमसे उतना ही प्रेम करना चाहिए। लेकिन, जब हमारी अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तब क्या हमें दुःख नहीं होता? इसलिए सांसारिक जीवन उतार–चढ़ाव से भरा हुआ है। जब परिस्थितियाँ खराब होंगी, तब हम कुछ भी नहीं कर पाएँगे।

इस विज्ञान के द्वारा आत्महत्या संबंधी विचारों का सामना करना बहुत आसान हो जाता है। ऐसा लगेगा कि ये बातें सिर्फ़ सुनने में ही अच्छी लगती हैं, लेकिन वास्तविकता में यह एक क्रियाकारी विज्ञान है! इस विज्ञान के माध्यम से अनेक लोगों ने संसार में कठिन संयोगों के बावजूद भी मुक्ति का अनुभव किया है। आप भी इस प्रकार का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं!

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