हम जिन भावनाओं को महसूस करते हैं, वे हमारे संजोग, हमारे चारित्र और दूसरों के साथ हमारे संबंधों से उत्पन्न होती हैं। जब विचार बिना किसी रुकावट के स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होते हैं, तो हम मानसिक शांति का अनुभव करते हैं। हालांकि, जब कभी चिंता के विचारो में उछाल आए, वह हमारी आंतरिक दशा में अशांति, हलचल और चंचलता का कारण बनती है, जिससे हम भावुक हो जाते हैं। ऐसे अतिशय मामलों में, ये विचार इतने ऊँचे स्तरों पर होते हैं कि हम आत्महत्या करने का सोचने लगते हैं।

हमारे विचार ट्रेन की पटरी जैसे हैं। जब ट्रेन (हमारा मन) सहज रूप से पटरी (हमारे विचार) पर चलती है, तो वह प्रवाह में है और उसमें कोई विक्षेप नहीं होता। जब कभी ट्रेन को आंतरिक इंजीनियरिंग निष्फलता भुगतनी पड़ती है तो वह पटरी से उतर जाएगी और हजारों यात्रियों की जान भी ले सकती है। अगर हमारे विचार संतुलन में होते हैं तो हम शांति और स्थिरता का अनुभव करते हैं। इसके विपरीत, यदि हम अपने विचारों पर नियंत्रण खो देते हैं, तो हम अपने आपको दुःख और दर्द देंगे!
यहाँ दूसरी समानता है: उद्वेग और पीड़ा बर्क के गोले जैसी है। जैसे-जैसे समय निकलता जाता है, इकट्ठे हुए बुरे विचारों का असर हमारे निर्णय को उस स्थिति तक ले जाता है जहाँ हमें लगता है कि आत्महत्या करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
जब विचार सामान्य से आगे बढ़ें तब आप साधारण से असाधारण की तरफ बढ़ने लगते हैं। जिसके फलस्वरूप आप उन नेगेटिव विचारों को स्वीकार के आंतरिक उलझन, भय और आंतरिक अशांति का अनुभव करते हैं। यहाँ कुछ चीज़ें है जो आप वापस कंट्रोल पाने के लिए कर सकते हो:
मन की भावनात्मक स्थिति बेहद हानिकारक और खतरनाक हो सकती है, जिसके प्रभाव से आप आत्महत्या करने के लिए अतिसंवेदनशील हो सकते हैं। इसलिए, अपने विचारों के प्रति जागृत रहो और जिस तरह से आप महसूस कर रहे हैं उसे बदलने के लिए हर संभव प्रयास करो। मन के विचारों को इस हद तक ना बढ़ने दें कि जिसकी वजह से आप भावुक, असंतुलित या डिप्रेस हो जाएँ। यदि आप अपने आपको नियंत्रण खोते हुए पाते हैं, तो सहायता और समर्थन के लिए पहुँचें।
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