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शुद्ध लक्ष्मी कि क्या निशानी है? अशुद्ध और भ्रष्टाचार से मिले हुए पैसो का क्या परिणाम होता है?

हमेशा ही, यदि लक्ष्मी निर्मल होगी तो सब अच्छा रहेगा, मन अच्छा रहेगा। यह लक्ष्मी अनिष्ट आई है उससे क्लेश होता है। हमने बचपन में तय किया था कि जहाँ तक हो सके तब तक खोटी लक्ष्मी पैठने ही नहीं देनी है। इसलिए आज छियासठ साल हुए, लेकिन फिर भी खोटी लक्ष्मी पैठने ही नहीं दी। इसी कारण तो घर में कभी क्लेश उत्पन्न हुआ ही नहीं। घर में तय किया था कि इतने पैसों से घर चलाना। व्यवसाय में लाखों की कमाई हो, लेकिन यह ‘पटेल’ सर्विस करने जाते तो तनख्वाह क्या मिलती? ज़्यादा से ज़्यादा छ: सौ-सात सौ रुपये मिलते। व्यवसाय, यह तो पुण्य का खेल है। अत: जितने नौकरी में मिलते उतने पैसे ही घर में खर्च कर सकते हैं, शेष तो व्यवसाय में ही रहने देने चाहिए। इन्कमटैक्सवाले का पत्र आने पर हम कहें कि, वह रकम थी वह भर दो। कब कौन सा अटैक आएगा (मुसीबत) उसका कोई ठिकाना नहीं। और यदि वह पैसे खर्च कर दें तो वहाँ इन्कमटैक्सवाले का अटैक आएगा तो हमें यहाँ वह दूसरा (हार्ट) ‘अटैक’ आ जाएगा। सब जगह अटैक घुस गए हैं न? इसे जीवन कैसे कहा जाए? आपको क्या लगता है। भूल महसूस होती है या नहीं? हमें वह भूल सुधारनी है।

लक्ष्मी सहज भाव से प्राप्त हो रही हो तो होने देना। लेकिन उस पर आधार मत रखना। आधार रखकर ‘चैन’ से बैठे लेकिन कब आधार खिसक जाए, यह कह नहीं सकते। अत: सँभलकर चलना ताकि अशाता (दु:ख परिणाम) वेदनीय में हिल न जाएँ।

प्रश्नकर्ता: सुगंधीवाली लक्ष्मी कैसी होती है?

दादाश्री: वह लक्ष्मी हमें ज़रा सी भी चिंता नहीं करवाती। घर में सिर्फ सौ रुपये हों, फिर भी हमें ज़रा सी भी चिंता नहीं करवाए। कोई यदि कहे कि कल से शक्कर पर कंट्रोल आनेवाला है, फिर भी मन में चिंता नहीं होगी। चिंता नहीं, हाय-हाय नहीं। वर्तन कैसा खुशबूदार, वाणी कैसी खुशबूदार, और उसे पैसे कमाने का विचार ही नहीं आता ऐसा पुण्यानुबंधी पुण्य होता है। पुण्यानुबंधी पुण्यशाली लक्ष्मी होगी तो उसे पैसे पैदा करने के विचार ही नहीं आएँगे। यह तो सब पापानुबंधी पुण्य की लक्ष्मी है। इसे तो लक्ष्मी भी नहीं कह सकते! निरे पाप के ही विचार आते रहें, ‘कैसे इकट्ठा करें, कैसे इकट्ठा करें’ यही पाप है। कहते हैं कि पहले के ज़माने में सेठों के यहाँ ऐसी पुण्यानुबंधी पुण्य की लक्ष्मी हुआ करती थी! वह लक्ष्मी जमा होती थी, जमा करनी नहीं पड़ती थी। जब कि इन लोगों को तो जमा करनी पड़ती है। वह लक्ष्मी तो सहज भाव से आया करती थी। खुद ऐसा कहे कि, ‘हे प्रभु! यह राजलक्ष्मी मुझे स्वप्न में भी नहीं हो’ फिर भी वह आती ही रहती थी। वे क्या कहते थे कि आत्मलक्ष्मी हो लेकिन यह राजलक्ष्मी हमें स्वप्न में भी नहीं हो। फिर भी वह आती रहती थी, वह पुण्यानुबंधी पुण्य।

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