पिछले प्रश्नों में, हमने बाहरी वस्तुओं और परिस्थितियों के भय के बारें में जाना। लेकिन कुछ भय ऐसे होते हैं, जो पूरी तरह से आंतरिक होते हैं। यह आंतरिक भय हर एक में अलग-अलग तरीके से व्यक्त होता है। लेकिन इसके पीछे मुख्य कारण है, "अपमान का भय"।
यहाँ हम भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में अपमान के भय को पहचानकर उससे बाहर निकलने की चाबियाँ प्राप्त करेंगे।
जीवन में कोई भी निर्णय लेते समय सौ बार यह विचार तो आ ही जाता है, कि "मैं यह कदम उठाऊँगा तो रिश्तेदार और समाज में मेरी छवि अच्छी बनेगी या खराब?" कदम-कदम पर जीवन में प्रश्न उठते हैं, कि "मैं इस काम में सफल नहीं हुआ तो लोग क्या सोचेंगे?" संक्षेप में, हमारे आस-पास के या समाज के लोगों में हमारी इमेज क्या रहेगी, इसका लगातार दबाव महसूस होता रहता है।
परम पूज्य दादा भगवान हमें समझाते हैं कि कई बार हमारा बुरा न दिखे, इसके लिए झूठ बोलने की आदत भी पड़ जाती है।
प्रश्नकर्ता: मनुष्य बिना कारण झूठ बोलने के लिए प्रेरित होता है। उसके पीछे कौन-सा कारण काम करता होगा?
दादाश्री: क्रोध-मान-माया-लोभ के कारण करते हैं वे। कोई भी वस्तु प्राप्त करनी है, या तो मान प्राप्त करना है या लक्ष्मी प्राप्त करनी है, कुछ तो चाहिए। उसके लिए झूठ बोलता है या तो भय है, भय के मारे झूठ बोलता है। अंदर छुपा-छुपा भय है कि 'कोई मुझे क्या कहेगा?' ऐसा कुछ भी भय होता है। फिर धीरे-धीरे झूठ की आदत ही पड़ जाती है। फिर भय नहीं होता तो भी झूठ बोल लेता है।
वास्तव में, “लोग क्या सोचेंगे? समाज क्या कहेगा?” यह एक प्रकार की हमारी मान्यता ही है, हमारी ही बनाई हुई दुनिया है। कई बार तो कोई कहने भी नहीं आता कि यह आपने अच्छा किया या बुरा किया। फिर भी हम ही मानकर घूमते हैं, कि “कोई ऐसा कहेगा तो? कैसा लगेगा?” क्योंकि, हर कोई अपनी-अपनी दुनिया में, अपनी-अपनी उलझनों में फँसे हुए होते हैं। लगातार हमारे बारे में सोचने की किसी के पास फुर्सत नहीं होती।
"लोग क्या कहेंगे?" इसका एक सुंदर दृष्टान्त हमें एक कहानी में मिलता है। एक चूहा था। उसकी सात पूँछें थीं। इसलिए सभी उसे "सात पूँछों वाला चूहा!, सात पूँछों वाला चूहा!" ऐसे चिढ़ाते थे। इसलिए उसने एक पूँछ काटवा दी। तो फिर से लोग उसे "छह पूँछों वाला चूहा!, छह पूँछों वाला चूहा!" ऐसे चिढ़ाने लगे। फिर से उसने एक पूँछ काटवाई, लेकिन फिर भी लोगों का चिढ़ाना चालू ही रहा। चूहे ने एक-एक करके सारी पूँछें काटवा दीं। तो अंत में उसे "बिना पूँछ वाला चूहा!, बिना पूँछ वाला चूहा!" कहकर चिढ़ाने लगे। इस कहानी का सार यह है कि लोग तो हर एक बात में बोलेंगे। हमें उनकी असर में आकर जीवन में गलत निर्णय नहीं लेने चाहिए।
इस भय के पीछे एक प्रकार का ईगो (अहम्) काम करता है। जब हम लोगों में अच्छे दिखते है, तब हमारा ईगो बढ़ने लगता है। जब हम लोगों के बीच खराब दिखते है, तब वही ईगो नीचे गिर जाता है। यह मान कषाय का ही एक स्वरूप है। इसलिए, जब ऐसे हालात आ जाए जहाँ हमारा बुरा दिखे या हम गलत साबित होते हैं, वहाँ भय पैदा होता है, जो एक तरह से अपमान का भय है।
जिस परिस्थिति में हमें "लोग क्या कहेंगे?", ऐसा भय लगता है, तब अपने भीतर निष्पक्षपाती रूप से देखना चाहिए कि "हम सही रास्ते पर हैं या ग़लत?" अगर हम किसी का नुकसान हो, किसी को दुःख हो ऐसा काम नहीं कर रहे हैं, कोई गलत रास्ते पर नहीं चल रहे हैं, किसी का छीन लेने का या किसी दूसरे के हक्क का छीन लेने का हमारा इरादा नहीं है, तो फिर हमें डरने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन इनमें से कुछ भी कर रहे हैं, तो समाज का डर अच्छा है, इससे हम गलत काम करने से बच जाते हैं। तब अपने आप से ही पूछ लेना चाहिए कि "मैं कर रहा हूँ, वह सही है?" अगर हम कुछ गलत कर रहे होंगे, तो खुद के भीतर से ही सूझ पड़ेगी कि "यह गलत है, इसे नहीं करना चाहिए।"
लेकिन अगर हम सच्चे और सही रास्ते पर चल रहे हैं, तो फिर डरने की बजाय सहज और सरल व्यवहार रखना चाहिए। इसमें भी, मनुष्य जीवन सार्थक हो ऐसे मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं, तो लोगों की बातों से डरने की ज़रूरत नहीं है। समाज का डर रखकर प्रगति में अवरोध डालने के बजाय, किसी बुजुर्ग, गुरु या शुभचिंतक की सलाह से आगे बढ़ना चाहिए।
कई बार हमें लोगों के सामने बोलने में डर लगता है, जिसे "स्टेज फियर" कहा जाता है। चाहे वो क्लास रूम में दूसरे विद्यार्थियों के सामने बोलना हो, स्टेज पर चढ़कर लोगों को संबोधित करना हो, या फिर मीटिंग में अपना मत प्रस्तुत करना हो। कुछ लोगों को जब उनके बोलने की बारी आती है, तो पसीने छूटने लगते हैं। उनके हाथ-पैर कांपने लगते हैं। “लोग मुझ पर हँसेंगे तो? मेरी टीका करेंगे तो? मेरी बात नहीं सुनेंगे या मेरे बारे में गलत सोचेंगे तो?” ऐसे तरह-तरह के भय उत्पन्न होते हैं और गले से शब्द बाहर ही नहीं निकल पाते। इन सबके पीछे खुद का अपमान होने का भय काम करता है। अपमान के भय से फिर इन्फीरियर कॉम्प्लेक्सिटी (हीन भावना) उत्पन्न होती है। फिर ऐसी हर एक परिस्थिति भय पैदा करती है।
काम शुरू करने से पहले ही परिणाम के विषय में नकारात्मक विचार शुरू हो जाएँ, तो फिर कार्य में निष्फलता मिलेगी ही। इसलिए, भय रखने के बजाय हमें पॉज़िटिव रहकर सभी प्रयत्न करने चाहिए। एक ही बार में एक बड़ा कदम उठाने के बजाय, छोटे-छोटे कदम उठाने चाहिए। जैसे कि, लोगों के सामने बोलना है, तो पहले से प्रैक्टिस करके तैयार रहना चाहिए। परिवार के सदस्यों या अपने मित्र मंडल के सामने बोलने का प्रयत्न करना चाहिए। ऐसे करते-करते धीरे-धीरे सार्वजनिक रूप से लोगों के बीच में बोलने का भय समाप्त हो जाएगा।
भय पैदा करने वाले प्रसंगों में, "ऐसे बोलना चाहिए या नहीं बोलना चाहिए?" ऐसी बुद्धि की गणना में नहीं पड़ना चाहिए। फिर, भले ही हमारे सामने हमारे जैसे या हमसे बड़े लोग हों, हमारी आंतरिक सहजता एक समान ही रहेगी।
कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति सबके सामने हमारा असहनीय अपमान कर देता है। कई बार हमारा अपमान नहीं हुआ होता, लेकिन किसी दूसरे का अपमान होते देखा हो, तो हमारे भीतर भय लगने लगता है कि "मेरा भी अपमान होगा तो?" फिर, उस अपमान होने के भय से हम कुछ भी कदम उठाने से पहले ही रुक जाते हैं। जैसे, किसी की शादी में हमें पहली लाइन में बैठाया गया हो और फिर दूसरे मुख्य मेहमान आएँ, तो हमें उठाकर पीछे की लाइन में बैठने के लिए कहें, तो अपमान लगता है। इस अपमान के भय से कुछ लोग पहले से ही पहली लाइन में नहीं बैठते।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि अपमान का भय वह तो दोगुना मान है। जिस व्यक्ति को अपमान का भय होता है, वे निरंतर कैसे मेरा अपमान न हो उसी की तैयारी में रहते हैं। कभी-कभी पैसों का नुकसान उठाकर भी, "मेरा अपमान तो नहीं हुआ न!" इसी जतन में ही रहते हैं। वह व्यक्ति निरंतर मेरा मान सलामत रहे और अपमान न हो, उसी का ध्यान रखने में बिना काम का बोझ लेकर घूमता रहता है।
कोई हमें ऐसे कड़वे शब्द सुनाए, जिससे हमें अपमान लगे, तो उस भय से निकलने की वैज्ञानिक समझ हमें परम पूज्य दादा भगवान से मिलती है।
प्रश्नकर्ता: दादा, कोई कड़वे शब्द कहे तो वे सहन नहीं होते, तो क्या करना चाहिए मुझे?
दादाश्री: देख इसका तुझे खुलासा करूँ। इस रास्ते के बीच काँटा पड़ा हो, और हज़ारों लोग निकलें लेकिन काँटा किसी को भी नहीं चुभता, लेकिन जब चंदूभाई जाएँ तो काँटा टेढ़ा हो, फिर भी ऐसा चुभता है कि पँजे में से आरपार निकल जाता है। कड़वे का स्पर्श होना, वह हिसाबवाला होता है। और कड़वे का स्पर्श होता है, तब मानना चाहिए कि अपने कड़वे की रकम में से एक कम हुई। जितना कड़वा सहन करोगे, उतने आपके कड़वे कम होंगे। मीठा भी जब स्पर्श होता है, तब उतना कम होता है।
अपने को किसी ज्योतिषी ने हाथ देखकर कहा हो कि चार घात हैं, तो चार घातों में आपको सावधान रहना चाहिए। अब उसमें से एक घात गई तो आनंद मनाओ कि सिलक (जमापूँजी) में से एक कम हुई। वैसे ही अपमान, गालियाँ ऐसा सब अपने पास आए तो आनंद मानना कि सिलक में से एक दुःख कम हुआ।
सभी कुछ हिसाबवाला है, सिलक के साथ में है, कोई गप्प नहीं है। मरने तक का सभी कुछ हिसाब सहित है। यह तो हिसाब के अनुसार होता है कि इनकी तरफ से ३०१ आएँगे, उसके पास से २५ आएँगे, इसके पास से १० आएँगे।
किसी के साथ हज़ार गालियों का हिसाब हो तो वह एक गाली दे तो हमें ऐसा कहना चाहिए कि हज़ार में से एक तो कम हुई। अब नौ सौ निन्यानवे गालियाँ बाकी रहीं।
लेकिन यह कड़वा स्पर्श होता है तब अच्छा नहीं लगता। यह कम स्पर्श होता है, फिर भी कड़वा क्यों अच्छा नहीं लगता?
सामनेवाला कड़वा दे तब वह कौन से बहीखाते का है, वैसे नहीं जान लें तब तक वह अच्छा नहीं लगता। लेकिन यदि पता चले कि, 'अहो! यह तो इस खाते का है। तब फिर वह अच्छा लगेगा। यह तो जब तक वह रकम सिलक में हो, तभी तक देने आते हैं।
उससे कहें कि कड़वा फिर से दे न, तो भी वह नहीं देगा। ऐसी तो किसी के हाथ में सत्ता है ही नहीं। यह तो सारा रिलेटिव रिलेशन (व्यवहारिक संबंध) है। कड़वा-मीठा सबकुछ हिसाब से मिलता है। रोज़ कड़वा देनेवाला एक दिन ऐसा सुंदर दे देता है। ये सारे ऋणानुबंधी ग्राहक-व्यापारी के संबंध हैं।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, कि जैसे हम धंधे में लाभ और हानि का खाता रखते हैं, वैसे ही मान और अपमान का भी खाता रखना चाहिए। जितना मान मिले उसे हानि के खाते में और जितना अपमान मिले उसे लाभ के खाते में जमा करना चाहिए। ऐसा करने से जितना अधिक अपमान आएगा, उतना अधिक फ़ायदा हुआ ऐसा मानना चाहिए। उनकी यह समझ हमें यहाँ मिलती है।
दादाश्री: अपने बहीखाते में मान और अपमान का खाता रखो। जो कोई भी मान-अपमान दे जाए, उसे बहीखाते में जमा करते जाओ, उधार मत करना। चाहे कितना भी बड़ा या छोटा कड़वा डोज़ कोई दे जाए, तो उसे बहीखाते में जमा कर लेना। तय करो कि एक महीने में सौ जितने अपमान जमा कर लेने हैं। जितने ज्यादा आएँ, उतना अधिक मुनाफ़ा। यदि सौ के बजाय सत्तर मिलें, तो तीस का घाटा। फिर दूसरे महीने में एक सौ तीस जमा करना। यदि तीन सौ अपमान जमा हो गए, उसे फिर अपमान का भय नहीं रहता। 'जब अपमान का भय नहीं रहेगा, तब कोई अपमान नहीं करेगा', यह नियम ही है। जब तक भय है, तब तक व्यापार। भय गया कि व्यापार बंद। वह फिर पार उतर जाएगा है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, कि “अपमान को पचाना, वह तो महान बल है।" यदि कोई व्यक्ति हमारा एक बार अपमान कर दे और हमें उस व्यक्ति के प्रति एक भी नेगेटिव भाव या स्पंदन उत्पन्न न हो, तो वह अपमान पचाया कहा जाएगा। इस तरह अपमान पचाने से भीतर ज़बरदस्त शक्ति उत्पन्न होती है। इससे दूसरी बार पहले से भी बड़ा अपमान आए, तो उसे भी पचाने की शक्ति मिलती है। वे कहते हैं, कि अपमान हितकारी है और अपमान करने वाला उपकारी है। उनके जीवन के एक प्रसंग में से यह समझ मिलती है, जिसमें परम पूज्य दादाश्री खुद अपमान करने वाले को ढूँढने जाते थे।
दादाश्री: कोई हमें गालियाँ दे, हमें बुरा सुनने को मिला, वह तो बहुत पुण्यवान कहलाता है, नहीं तो वह मिलता ही नहीं न! मैं पहले ऐसा कहता था, आज से दस-पंद्रह साल पहले, कि भाई, कोई भी मनुष्य पैसों की अड़चन वाला हो, तो मैं कहता हूँ कि मुझे एक थप्पड़ मारना, मैं पाँच सौ रुपये दूँगा। एक आदमी मिला था, मैंने उससे कहा कि ‘तुझे पैसों की कमी है न? सौ-दो सौ की? तो तेरी कमी तो आज से ही पूरी हो जाएगी। मैं तुझे पाँच सौ रुपये दूँगा, तू मुझे एक थप्पड़ मार।’ तब बोला, ‘नहीं दादा, ऐसा नहीं हो सकता।’ मतलब थप्पड़ मारने वाले भी कहाँ से लाएँ? मोल लाएँ तो भी ठिकाना पड़े, ऐसा नहीं है और गालियाँ देने वाले का भी ठिकाना पड़े ऐसा नहीं है। तब जिसे घर बैठे ऐसा फ्री ऑफ कॉस्ट (मुफ्त में) मिलता हो, तो वह भाग्यशाली ही कहलाएगा न! क्योंकि, मुझे तो पाँच सौ रुपये देकर भी कोई मिलता नहीं था।
जिन्होंने आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति की है, उनके लिए यह समझना सरल है कि क्रोध-मान-माया-लोभ वह आंतरिक कमजोरियाँ हैं, जो आत्मा की शक्ति को आवरित करती हैं। 'मान' कषाय को अपना शत्रु मानना चाहिए। मान नाम का शत्रु कब हारेगा? जब अपमान पचाने की शक्ति आएगी तब। क्योंकि, मान वह 'फूड' है, लेकिन अपमान तो 'विटामिन' है। इसलिए अगर कोई कहे कि, "आपके पास अक्ल नहीं है।" तो हमें कहना चाहिए कि "वह तो पहले से ही नहीं थी, आपको अभी पता चला?" जिससे मान का रक्षण नहीं होगा, मान टूटेगा और आत्मशक्तियाँ प्रकट होने लगेंगी।
"इन्होंने मेरा अपमान किया", इस ज्ञान से भयंकर पाप कर्म बंधता है। हमने पहले दिए होंगे, उतने ही अपमान आज हमारें हिसाब में होंगे और उतने ही अपमान आएंगे। इसलिए, आए तो उसे शांत मन से जमा कर देना चाहिए। नया हिसाब शुरू नहीं करना चाहिए।
दादाश्री: अपमान करने वाला जब उपकारी माना जाएगा, तब आपके मान का छेदन होगा! अपमान करने वाले को उपकारी मानना चाहिए, उसके बजाय जब अपमान होता है तब इंसान दुःखी हो जाता है।
अपमान तो चखने जैसा है। घर बैठे आए तब चखते नहीं है, वर्ना शक्तियाँ कितनी बढ़ जाएगी! लेकिन जब अपमान आता है, तब लेता नहीं और छोड़ देता है। फिर शक्ति कैसे बढ़ेगी?
'मूर्ख हो, बेअक्ल हो' किसी ने अगर ऐसा कह दिया तब हमें कहना चाहिए, 'भाई, मैं आज से नहीं, पहले से ऐसा ही हूँ।' ऐसा कहना।
प्रश्नकर्ता: तो ऐसा है कि अपमान सहन करना सीख जाना चाहिए?
दादाश्री: जब मान चला जाएगा, तब अपमान सहन करने की शक्ति आ जाएगी।
कुछ लोग ऐसा कहते हैं न कि 'मेरी कीमत नहीं की?' तेरी कीमत थी ही क्या? तू इस समुद्र से पूछकर आ कि तेरी कीमत कितनी है? एक लहर आएगी और तुझे खींच ले जाएगी! कितनी ही लहरों का मालिक, तेरे जैसे कितने ही लोगों को वह खींच ले गया! कीमत तो उनकी है, जिन्हें राग-द्वेष नहीं होते!
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि “ज्ञान प्राप्ति के बाद जिसे अपमान पचाना आ गया, तो वह ‘ज्ञानी’ बन जाएगा।” और “अपमान का जिसे किंचित्मात्र भी भय है वह ‘ज्ञानी’ नहीं है। जिसे मान में रुचि है, वह ‘ज्ञानी’ नहीं है।” आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद यह लक्ष में रखना चाहिए कि जिसका अपमान होता है, वह मेरा स्वरूप है ही नहीं। मेरा स्वरूप आत्मा है, और आत्मा को कोई भी शब्द छू नहीं सकता। अपमान का प्रसंग आत्मा का ज्ञान प्रकट करने में मदद करता है। इसीलिए तो परम पूज्य दादा भगवान ने यह सूत्र दिया है कि, कोई मान दे, तो उसे दुश्मन समझना और अपमान करे तो वह मान की गाँठ से छुड़वा रहा है, ऐसे उसे परम उपकारी मित्र समझना।
A. अगर हम डर के कारणों को समझ लें, तो डर से बाहर निकलने के उपाय अपने आप मिल जाते हैं। परम पूज्य दादा... Read More
Q. भूत, प्रेत, पिशाच, डायन, काली विद्या आदि का भय लगे तब क्या करें?
A. हम रात में कोई हॉरर मूवी (भूत की मूवी) देखकर या भूत की कहानी सुनकर सो गए हों। ऊपर से उस रात हम घर... Read More
Q. जीव-जंतु और जानवरों का भय कैसे दूर करें?
A. ज़्यादातर लोगों को जीव-जंतु जैसे कि, छिपकली, तिलचट्टा, बिच्छू या साँप से डर लगता है। अगर दीवार पर... Read More
Q. पुलिस और कोर्ट-कचहरी में जाने का भय लगे तब क्या करें?
A. आमतौर पर हर एक व्यक्ति को पुलिस और कोर्ट-कचहरी का भय लगता है। पुलिस हमारे घर का दरवाजा खटखटाए तब से... Read More
Q. असफलता के भय से बाहर कैसे निकलें?
A. जीवन के हर मोड़ पर हमें असफलता का भय सताता रहता है। जब स्कूल और कॉलेज में होते हैं, तब परीक्षा,... Read More
A. जीवन में कहीं भी भय रखने जैसा नहीं है। फिर भी, ऐसी कुछ बातें हैं, जिनमें भय रखना हितकारी है। इन... Read More
subscribe your email for our latest news and events
