जीवन में कहीं भी भय रखने जैसा नहीं है। फिर भी, ऐसी कुछ बातें हैं, जिनमें भय रखना हितकारी है। इन बातों में वास्तव में भय नहीं, लेकिन सावधानी रखनी जरूरी है, क्योंकि अगर ऐसा नहीं करेंगे, तो हम मुश्किल में पड़ जाएँगे।
सामान्य तौर पर, अगर कोई गलत काम किया हो तो डर लगता है। चोरी की हो, किसी का कुछ हड़प लिया हो, चोरी-छिपे गलत काम किए हो, तो पकड़े जाने का भय रहता है। लेकिन, यदि हम सच्चे हैं, तो डरने की कोई ज़रूरत नहीं।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि “जिसे भला करना है, उसे कोई डर रखने की ज़रूरत नहीं है और जिसे बुरा करना है, वह चाहे जितना भी डर रखे फिर भी उससे कुछ फायदा होने वाला नहीं। यानी हमें भला करना है, ऐसा निश्चित रखना है।“
चोरी, झूठ, प्रपंच, भ्रष्टाचार, व्यभिचार या अणहक्क की लक्ष्मी और विषय भोगना, खाद्य पदार्थों या दवाइयों में मिलावट करना, बीड़ी या सिगरेट की लत रखना, इन सभी का डर रखना चाहिए। क्योंकि, इनका बहुत बड़ा गुनाह लगता है और भयंकर परिणाम आते हैं। अपराध करने से पहले उसके परिणाम के विचार से यदि मनुष्य गलत काम करने से रुक जाए तो वह डर अच्छा है।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, "हमारा चोरी करने के लिए मन ललचाय, तो तुरंत परिणाम दिखने लगते हैं। इसलिए डर लगता है। वो चोरी होगी ही नहीं।" इसलिए गलत कार्यों के परिणाम को भली-भांति समझ लिया हो, तो फिर गलत कार्य छूट ही जाते हैं।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "गलत के ऊपर आपको द्वेष है, गलत पसंद नहीं है, इसलिए डर लगता है। यह डर तो अच्छा है। इसमें नुकसान नहीं होता। गलत हो उसका डर तो अच्छा है।" उनके द्वारा दी गई सुंदर समझ हमें यहाँ मिलती है।
दादाश्री: गलत होने का डर है, इसलिए हमारे हाथों गलत नहीं होगा। गलत हो जाएगा, यह डर तो प्रिकॉशन है। यह डर नहीं, प्रिकॉशन है। भय नहीं है। प्रिकॉशन वह फियर नहीं है। आपको समझ में आया?
प्रश्नकर्ता: अभी थोड़ा और समझाइए।
दादाश्री: हम कुएँ के ऊपर बैठे हों, तब गिरने का भय लगता है। यह भय किसलिए लगता है कि हमें प्रिकॉशन लेना पड़े। नहीं तो गिर जाएँगे, प्रिकॉशन नहीं लेंगे तो। रात में सो गए हों वहाँ आगे, कुएँ की पाल के ऊपर सोने का समय आए, तो गिर जाएँगे या नहीं इसकी प्रिकॉशन लेकर और फिर सो जाना चाहिए। और ध्यानपूर्वक सोएगा, तो गिरेगा नहीं वह मनुष्य और लापरवाही से सो जाएगा, तो गिर जाएगा।
उदाहरण के लिए, जब हम गाड़ी चलाते हैं, तब आँखें बंद नहीं कर देते। खुली आँखों से गाड़ी चलाते हैं, जिससे वह कहीं टकरा न जाए। यह भयरूपी प्रिकॉशन (सावधानी) है। कभी गाड़ी टकरा भी जाती है, तब भी दूसरी बार सावधानी रखें, लेकिन भय नहीं।
गलत हो जाए उसका डर लगे तो अच्छा है। दूसरों को दुःख देने का डर रखने जैसा है। पाप करने से डरना चाहिए, लेकिन दूसरे किसी से डरने जैसा नहीं है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “इस दुनिया में डर किसका रखना है? किसी को दुःख देने की भावना हो, उससे डर रखना है। अगर आपको सुखी होना है, तो किसी को दुःख नहीं देना।“
मान लीजिए कि, हम किसी को डाँट रहें हों, यह पूरा वीडियो कोई रिकॉर्ड कर ले और फिर हमारी शिकायत करें, तो हमें डर लगता है। बाहर की मशीनरी हमारी वाणी और वर्तन रिकॉर्ड कर लेगा, उसका डर लगता है। लेकिन हमें यह समझ में नहीं आता कि मनुष्य के अंदर भी मशीनें ही काम कर रहीं हैं। हमारे शब्द सामने वाले के मन में टेप ही हो रहे हैं। इसका बड़ा जोखिम हमारे ऊपर आता है। ये शब्द सामने वाले के हृदय में अंकित हो जाएँगे, इससे सामने वाले के अहंकार को ठेस पहुँचेगी। फिर वो व्यक्ति याद रखकर उसका बदला लेगा, लेकिन इसका हमें भय नहीं लगता।
इसलिए, अगर बोलना हो तो व्यक्ति के लिए अच्छा बोलें, बिल्कुल भी बुरा न बोलें। यदि व्यक्ति की अनुपस्थिति में भी हम उसके बारे में कुछ भी बुरा कहते हैं, जिससे व्यक्ति को दुःख पहुँचे तो हमें ही इसका कड़वा फल भुगतना पड़ता है। इसलिए किसी भी जीव को किंचित्मात्र भी दुःख न हो, इसका भय रखना हितकारी है।
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