आमतौर पर हर एक व्यक्ति को पुलिस और कोर्ट-कचहरी का भय लगता है। पुलिस हमारे घर का दरवाजा खटखटाए तब से चिंता-बेचैनी शुरू हो जाती है। वकील की तरफ से कोर्ट में हाज़िर होने का नोटिस (सम्मन) आए तो अंदर घबराहट होने लगती है। पुलिस घर आकर हमारा नाम लेकर पूछती है कि "चंदूभाई घर में हैं?" तब तो पसीना ही छूटने लगता है। बाद में पता चलता है कि पुलिस कर्मचारी तो शादी का न्योता देने आया है!
परम पूज्य दादा भगवान पुलिस के भय का एक वैसा ही उदाहरण यहाँ दे रहे हैं।
पुलिस देखते ही घबराहट शुरू!
अब बाहर है तो किसी की गाड़ी में टक्कर मार कर आए हों और पुलिसवाला आए कि ‘चंदूभाई हैं क्या? चंदूभाई हैं क्या?’ तो क्या होगा?
प्रश्नकर्ता: घबराहट होती है।
दादाश्री: बहुत ही घबराहट होती है, नहीं? थोड़ी-बहुत?
प्रश्नकर्ता: यदि पुलिस में पहचान हो तो घबराहट नहीं होती।
दादाश्री: पहचान तो हर जगह पहचान तो हर जगह कहाँ से होगी? यह तो यहाँ पहचान हो और दूसरी जगह न हो।
अरे, भूल से पुलिसवाला इस चंदुभाई की जगह दूसरे चंदुभाई के यहाँ चढ़ जाए और उस चंदुभाई से ऐसा कहे कि हमारे पास समन है, उसके पहले तो उसे घबराहट हो जाती है और उसे हार्ट फेल न हो जाए तो अच्छा!
अब बोलिए, यह ऐसे ही कैसे सहा जाएगा? अभी दुःख आया नहीं, प्रत्यक्ष हुआ नहीं, उससे पहले तो सुनते ही!
आजकल किसी भी व्यक्ति से पुलिसवाला सिर्फ़ इतना कह दे, “चंदुलाल है?” तो पुलिसवाले के आने से पहले ही वह घबराने लगता है। अरे! इतनी अधिक निर्बलता क्यों होनी चाहिए? यह जगत् तो बहुत गहन है। कई जन्मों का देखा हुआ है, पर याद नहीं रहता न! इसलिए जगत् जानने योग्य है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि पुलिस या कोर्ट-कचहरी से डरने का कारण उनके प्रति हमारा द्वेष, अभाव और तिरस्कार है। अभाव, तिरस्कार ना हो तो पुलिस के भय से मुक्त हो सकते हैं। इसका व्यावहारिक उपाय बताते हुए वे कहते हैं, ''पुलिसवाले गलत हैं, परेशान करते हैं, मुझे अच्छे नहीं लगते।''
ऐसा कहेंगे तो फिर डर लगेगा। इसके बदले "पुलिसवाले अच्छे हैं, हमारी रक्षा करते हैं, भला करने वाले हैं, मुझे अच्छे लगते हैं।" ऐसा कहेंगे तो भय निकल जाएगा।
उसी तरह कोर्ट में जाना किसी को अच्छा नहीं लगता। कोर्ट से डर लगे उस समय “कोर्ट में क्या हर्ज़ है? वह तो न्याय का मंदिर है। वह बहुत अच्छी जगह है।” ऐसा करते-करते जाएँगे तो कोई डर नहीं लगेगा। सचमुच में, संपूर्ण भय कब जाएगा? जब क्रोध-मान-माया-लोभ के कषाय निर्मूल हो जाएँगे तब। लेकिन, ऐसी स्थिति ना आए तब तक बीच में ऐसे व्यावहारिक उपाय भय से मुक्त रहने के लिए प्रैक्टिकल मार्ग आसान कर देते हैं।
परम पूज्य दादा भगवान अपने जीवन के अनुभवों से ही उदाहरण सहित प्रैक्टिकल उपाय हमें देते हैं।
दादाश्री: पहले तो मुझे भी न्यायमंदिर (न्यायालय) में जाना अच्छा नहीं लगता था। इसलिए मैंने खुद पता लगाया कि किस कारण से यह अच्छा नहीं लगता? यह न्यायमंदिर कहलाता है। वहाँ सब लोग जाते हैं, छोटे बच्चे भी जाने के लिए तैयार रहते हैं। उसके बाद मुझे समझ में आया कि मुझे उसके प्रति तिरस्कार है, इसलिए भय घुस गया है।
फिर तो मैं ऐसे ही न्यायमंदिर की ओर घूमकर आ जाता था, ज़रा देख आता था, कोई लेना-देना नहीं हो, फिर भी ऐसे ही घूम आता था। कितना अच्छा है! इन वकीलों को देखो न, कितने अच्छे हैं। ऐसा कहूँ तो वकील के रूम में सब बैठे होते थे। कोई पहचानवाला वकील मिल जाए तो कहता, “अरे, आइए, आइए, आप बहुत दिनों बाद आए हैं! किसी की गवाही देने आए हैं?” मैंने कहा, “नहीं भाई, कुछ भी नहीं। बस देखने आया हूँ।” ऐसा करते-करते भय छूट जाता है।
यह तो व्यर्थ का भय लगता रहता है, बिना काम का! अब वहाँ न्यायमंदिर में हमें यदि गवाही देने जाना है, तो उसमें इतना अधिक भय क्यों? आपको न तो लेना, न देना, फिर भी? लेकिन नहीं, उसके अंदर भय घुस गया तो क्या होगा? और कटघरे में घुसते ही अंदर घबराहट होती है!
यह मैंने खुद ही खोजबीन की है। हालांकि मुझे कोई गुरु नहीं मिला। लेकिन यह खुद उलझे और खुद ही ढूंढे, खुद उलझे और खुद ढूंढे। इस तरह फिर खुद ही खोजबीन की। इसलिए मैं ये सभी उदाहरण दे सकता हूँ। अभी तक के जो उदाहरण हैं ना, वे मेरे अनुभव के उदाहरण हैं और हेल्पफुल हैं।
यह मैंने खुद ही खोजबीन की है। हालांकि मुझे कोई गुरु नहीं मिला। लेकिन यह खुद उलझे और खुद ही ढूंढे, खुद उलझे और खुद ढूंढे। इस तरह फिर खुद ही खोजबीन की। इसलिए मैं ये सभी उदाहरण दे सकता हूँ। अभी तक के जो उदाहरण हैं ना, वे मेरे अनुभव के उदाहरण हैं और हेल्पफुल हैं।
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