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पैसों का लोभ यानी क्या? उसे किस तरह पहचानें?

लोभ की व्याख्या क्या है? खुद के पास बहुत पैसे हों, फिर भी रात- दिन पैसों के ही विचार आते रहते हों; “कहाँ से पैसे इकट्ठे करूँ?”; “कैसे अधिक धन कमा लूँ?”, “किस तरह इसे संभालूं?”, “कहाँ जमा कराऊँ जिससे ज़्यादा ब्याज मिले?” इन सब में निरंतर ध्यान रहे, वह लोभ है।

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, “जो चीज़ प्रिय हो गई हो, उसी की तान में रहना, उसे लोभ कहते हैं। वह मिल जाए फिर भी संतोष नहीं होता!”

लोभी व्यक्ति सुबह उठे तब से रात को सोने तक लोभ के विचारों में ही रहता है। कहाँ कितने रुपये पड़े हैं, बैंक में कितने हैं, दूसरी-तीसरी जगह कितने हैं यह निरंतर उसके ध्यान में ही रहता है। लोभी व्यक्ति हर चीज़ सस्ती ढूँढ निकालता है। सब्ज़ी मार्केट में जाए तो पाँच मिनट ज़्यादा घूमकर भी सस्ती सब्ज़ी ढूढता है। फिर सब्ज़ी अच्छी न हो तो खराब हिस्सा काटकर इस्तेमाल करता है। पान खाना हो या चाय पीनी हो, तो सबसे सस्ती कहाँ मिलेगी, वह ढूँढ निकालता है। नहाने-धोने में साबुन और पानी भी कम इस्तेमाल करता है। यदि कोई मेहमान उसके घर नहाने गया हो तो बाद में देखता है कि कितना साबुन खर्च हो गया! भगवान का दीया जलाते समय माचिस भी कारीगरी से जलाता है ताकि दूसरी माचिस खराब न हो। बाल लंबे हो गए हों तो उन्हें कटवाने में भी लोभ करता है कि अभी तो बाईस दिन ही हुए हैं, महीना पूरा हो जाए तब कटवाऊँगा। लोभी व्यक्ति के हाथ में हज़ार रुपये हों, फिर भी खर्च नहीं करता। शरीर में चलकर जाने की ताकत न हो, तब भी पचास-सौ रुपये की रिक्शा नहीं करता। उसमें भी यदि कभी पैसे देने पड़ जाएँ तो उस दिन भोजन अच्छा नहीं लगता। अपने विवाह के समय भी चित्त उसी में लगा रहता है कि कितना खर्च हो गया! कंजूस व्यक्ति को देखकर ही आसपास के लोगों को भी अच्छा नहीं लगता, उल्टा चिढ़ पैदा होती है।

जितना लोभ बढ़ता है, उतनी ही जलन बढ़ती है। इतना ही नहीं, लोभ की गाँठ इतना सताती है कि कोई व्यक्ति यदि उचित स्थान पर मर्जी से दान दे, तो उसे भी रोकता है कि, “यह लोग तो माँग नहीं रहे हैं, तो क्यों दे रहे हो?” ताकि खुद के देने की बारी न आए। इस तरह लोभी व्यक्ति चारों ओर से लोभ की रक्षा करता है। लोभी व्यक्ति के पास लाखों रुपये हों, फिर भी दान में सौ रुपये देने में तो मानो बुखार चढ़ जाता है। जेब में पैसे हों, फिर भी परिस्थिति अनुकूल न हो और मंदिर में दान देने में संकोच हो, तो वह लोभ नहीं है। परिस्थिति ठीक होगी तो दिया ही जाएगा। लेकिन लाखों रुपये कमाता हो और मन में पैसे दान में देने का भाव होता है, लेकिन सौ रुपये भी न दिए जा सकें यह लोभ की गाँठ है।

लोभी व्यक्ति का चित्त पूरा दिन लोभ में ही डूबा रहता है। अंत में जब श्मशान में जाता है, तब उसका अंत आता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि उनका चित्त पैसों में ही लगा रहता है, वे पहनने-ओढ़ने में खर्च नहीं करते। लेकिन यदि दस लाख कमाए हों, तो डेढ़ लाख धर्म के कार्यों में दान दे दें, तो पुण्य कमाते हैं और उनके पास और अधिक लक्ष्मी आती रहती है।

भारत में मनुष्य फुल डेवलप हुए हैं, इसलिए यहाँ लोभ अधिक होता है। फॉरेन के लोग ज़्यादा पैसे जमा नहीं कर पाते; आए तो खर्च कर डालते हैं। हिंदुस्तान में तो लोभ सात-सात पीढ़ियों तक का होता है, इसलिए अपनी सात पीढ़ियाँ सुखी रहें इसके लिए संपत्ति और ज़मीनें संभालकर रखते हैं। एक प्रचलित कहानी में हमने सुना है कि एक अंधे वणिक ने भगवान से वरदान माँगा कि, “मेरी सातवीं पीढ़ी के बेटे की बहू महल के सातवीं मंजिल पर सोने की मटकी में छाछ मथे वह मैं यहाँ रहकर देख सकूँ!” ऐसा लोभ होता है।

चींटियों में बहुत लोभ होता है। सुबह चार बजे देखें तो भी शक्कर का एक दाना लेकर दौड़ती रहती हैं। फिर शक्कर खुद खातीं नहीं हैं, उसे स्टोर में रख आती हैं। चावल, बाजरा, शक्कर, कीड़ों के पंख इस तरह पंद्रह साल का स्टॉक भरकर रखती हैं। इकट्ठा करने में ही उनकी तन्मयता होती है। रास्ते में कोई आ जाए तो डंक भी मार देती हैं। फिर दो बड़े चूहे घुसकर एक मिनट में सब साफ कर जाते हैं। जैसे लोभी व्यक्ति रात-दिन इकट्ठा करता रहता है और फिर एक बड़ा नुकसान हो जाए तो सब साफ हो जाता है।

सामान्य तौर पर लोभी व्यक्ति क्रोधी नहीं होता, लेकिन यदि वह क्रोध करे तो समझ जाना चाहिए कि उसके लोभ में कुछ अड़चन आई है। किसी को ठगकर पैसे हड़प ले और सामने वाला उसे गालियाँ देता हो, तो लोभी व्यक्ति के मन में ऐसा होता है कि, “हमें तो पैसा मिल गया न, भले ही क्यों न शोर मचाता रहे!” इस तरह कपट लोभ की रक्षा करता है। जहाँ फ़ायदा होता हो, वहाँ उसे मान-तान की परवाह नहीं रहती। इसलिए लोग लोभी व्यक्ति को नफ़्फ़ट कहते हैं।

लोभी व्यक्ति किसी भी रंग में नहीं रंगता। धर्म या सत्संग में जाना हो, तब भी भीतर गिनती ही चलती रहती है कि यदि किसी की गाड़ी में जाने का मौका मिले तो पाँच रुपये रिक्शा के बच जाएँ! सत्संग में हो या परिवारजनों के साथ, पर पैसे भूले ही नहीं जाते, किसी के रंग में रंगे नहीं, उसका नाम लोभी!

पूरी दुनिया ने पैसों में ही सुख है ऐसा माना है। लेकिन वास्तविकता में यदि पैसों में ही सुख होता तो सभी धनवान लोग सुखी होने चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता है। इसलिए पैसों में सुख है यह सिर्फ़ लौकिक मान्यता ही है कि, इकट्ठा किया हुआ काम आएगा, किसी के पास उधार लेने नहीं जाना पड़ेगा। या फिर दूसरे अमीर लोगों को देखकर यह मान्यता बन गई होती है कि पैसे जमा करके रखूँगा तो मुझे कभी भी दुःख नहीं आएगा। इसलिए लोग बचा-बचाकर पैसा इकट्ठा करते हैं, जिससे लोभ की गाँठ बढ़ती जाती है। मूल तो खुद को संतोष नहीं है इसलिए लोकसंज्ञा असर करती है, जिसे संतोष होता है, उसे लौकिक मान्यता नहीं छूती है।

किफायत और लोभ में अंतर

किफायत यानी यदि एक लाख रुपये कमाए तो अस्सी हज़ार में निर्वाह करे और पचास हज़ार कमाए तो चालीस हज़ार में निर्वाह करे, लेकिन कर्ज़ करके पैसे खर्च नहीं करता। जबकि पैसों का लोभी तो एक लाख कमाए या दो लाख, तब भी चालीस हज़ार ही खर्च करता है। जिन लोगों ने गरीबी के दिन देखे होते हैं, उन्हें कंजूसी करने की आदत पड़ जाती है, फिर पैसे आ जाएँ, तब भी कंजूसी करते हैं।

बहुत पैसे खर्च न हों इस तरह अच्छी सब्ज़ी लेना वह किफायत है, लेकिन सस्ता लेने के चक्कर में सड़ी सब्ज़ी ले आना, वह लोभ है। दूध मँगवाकर चाय बनाएँ बाद में बचा हुआ दूध फेंकते नहीं हैं, बल्कि फ्रिज में रखते हैं या किसी को पिला देते हैं, वह किफायत कहलाती है। किसी भी चीज़ में किफ़ायत करके बचत करें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर अपने लिए या दूसरों के लिए उपयोग कर सकें, तो वह लोभ नहीं है। पैसों का संग्रह करना, सेविंग्स करना इसमें हर्ज़ नहीं है। वह हमारी मदद करेगा। लेकिन पूरे दिन कितनी सेविंग्स हैं, इसे याद कर-करके चिकना न करें।

पैसे में किफायत (इकोनॉमी) करनी है, लेकिन लोभ नहीं करना है। किफायत यह तो अच्छा गुण है, बड़ा आधार है। घर के हर मामले में किफायत स्वीकार्य है, सिर्फ़ रसोईघर को मुक्त रखना! क्योंकि, उससे मन बिगड़ता है। शरीर को कष्ट देकर किफायत न करें।

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