
लोग हमेशा लक्ष्मी के पीछे भागते हैं। लेकिन ज्यादा लक्ष्मी पाने की दौड़ मनुष्य को मज़दूर बना देती है। उसमें जितने लोग पैसे कमाकर दान में देते हैं, उतना पुण्य कमाते हैं। बाकी ज़्यादातर लोग पूरा दिन पैसे कमाने के लिए कड़ी मेहनत करते रहते हैं। उन्हें पत्नी या बच्चों की मानो परवाह ही नहीं रहती। सिर्फ़ पैसे कमाने की ही पड़ी रहती है। घर में देने के लिए उनके पास समय ही नहीं होता। लक्ष्मी की दौड़ तो मनुष्य को पागल सा बना देती है। खुद के हित-अहित का भान नहीं रहता।
लोग रेसकोर्स में पड़े हुए हैं। जैसे रेसकोर्स में सभी घोड़े दौड़ते रहैं, लेकिन पहला नंबर तो एक का ही आता है, बाकी हाँफ-हाँफकर मर जाते हैं। वैसे ही दुनिया के लोग पैसे कमाने के रेसकोर्स में दौड़-दौड़कर, हाँफ-हाँफकर थक जाते हैं, लेकिन सुख हाथ में नहीं आता। इसलिए, हमसे जितना दौड़ा जाए उतना ही दौड़ना चाहिए, सारी ज़िम्मेदारियाँ शांतिपूर्वक निभाना, लेकिन स्पर्धा में पड़ने जैसा नहीं है। पूरी दुनिया रात को ग्यारह बजे सो जाती हो तो हमें भी निश्चिंत होकर सो जाना चाहिए। पैसे कमाने की जलन में पूरी रात बिना काम की माथापच्ची करके अकेले नहीं दौड़ना चाहिए।
विचार करें तो जब आय कम होती है तब जीवन में बिल्कुल शांति रहती है। घर के व्यक्तियों के साथ समय बिताने का, बच्चों को संस्कार देने का, मंदिर में भगवान के दर्शन करने का, धर्म करने का समय मिल जाता है। जैसे-जैसे कमाई बढ़ती है, वैसे-वैसे काम का स्ट्रेस बढ़ता है और शांति कम होती जाती है। सिर्फ़ लक्ष्मी के पीछे पड़ने से घर के संस्कार लुट जाते हैं, खुद का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, ब्लड प्रेशर बढ़ता है और हार्ट फेल होने की तैयारियाँ चलती रहती हैं।
पैसा हो वहाँ अंतरशांति हो ही, ऐसा ज़रूरी नहीं है। धनवान व्यक्तियों के बाहर के ठाठ-बाट देखकर हम प्रभावित हो जाते हैं। लेकिन पता करें तो सब अंदर से किसी न किसी कारण से चिंता में या दुःख में होते हैं। बड़ा करोड़ों का फ्लैट हो, लेकिन उसमें दो ही व्यक्ति रहते हों, तो घर श्मशान जैसा लगता है। फिर उस बंगले में भी सुख नहीं लगता। बड़े घर में अंतर शांति तो वास्तव में रसोइए और नौकरों को होती है, जो घर के मालिक से भी अधिक समय उसमें रहते हैं और सुख-सुविधा भुगतते हो। पैसों का बिस्तर लगाकर सो जाने से ज़्यादा अच्छी नींद आती है, ऐसा नहीं होता है।
पूरा दिन पैसे के लिए मेहनत करने वाले मनुष्य लोगों को दुःख देकर या ठगकर जाने-अंजाने अधोगति के कर्म बाँधते हैं। पुण्य के हिसाब से आज लक्ष्मी कमाते हैं, लेकिन नया पापकर्म बाँधते हैं। जबकि कुछ लोगों का पुण्य ऐसा होता है कि उन्हें दिन में आधा घंटा ही मेहनत करनी पड़ती है और सब काम सरलता से होता रहता है। उसमें भी दान-धर्म में लक्ष्मी देते हैं, इसलिए नया पुण्यकर्म बँधता है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, जो पूरा दिन मेहनत-मज़दूरी करके पैसे कमाता है वह तो मज़दूर कहलाता है, जबकि जो लक्ष्मी भोगता है वह पुण्यशाली कहलाता है।
जगत् के लोग पैसे के पीछे पड़े हैं! लेकिन कोई पैसों से तृप्त हुआ हो ऐसा देखने को नहीं मिलता है। क्योंकि जिनके पास पैसे हैं वे भी दुःखी हैं और नहीं हैं वे भी दुःखी हैं। बड़े प्रधान हों या भिखारी, बड़े सेठ हों या नौकर, सबको पूरा दिन दुःख, दुःख और दुःख ही है। दो मिलों का बड़ा मालिक भी लक्ष्मी के पीछे दौड़ता है, एक मिल का मालिक भी लक्ष्मी के पीछे दौड़ता है, मिल का सेक्रेटरी भी लक्ष्मी के पीछे पड़ा है और मिल के मज़दूर को भी लक्ष्मी चाहिए। तो इन सबमें सुखी कौन है? इसलिए पैसों से हमेशा का सुख नहीं मिलता, लेकिन इसमें लक्ष्मी का दोष नहीं है, खुद की मान्यता का दोष है।
ज्यादातर लोग व्यर्थ दुःखी होते हैं। बैंक में पैसे कम हो गए हों तो कहते हैं कंगाल हो गए। अरे! बैंक में थोड़े रुपये पड़े हैं। दो वक्त का खाने को मिले इतने पैसे हैं। कोई कर्ज़ नहीं हुआ। घर के व्यक्ति सेहतमंद हैं। इतना ही नहीं, अरबों की कीमत के हमारे हाथ-पाँव और आँखें सलामत हैं! अब, इतनी सारी सम्पत्ति होने पर भी बेकार की पैसों की चिंता क्यों करें?
वास्तविकता में जो लोग बहुत अधिक पैसे कमाकर बहुत ऊँचे चढ़े हों, उन्हें बहुत ज़ोखिमदारी होती है। उन्हें पूरा दिन कैसे इनकम टैक्स बचाएं, उसी का ध्यान रहता है। बड़े-बड़े व्यापारी पूरा दिन मानो अरंडी का तेल पी लिया हो ऐसा मुँह लेकर फिरते रहते हैं। जीवन में पूरा दिन पैसे कमाने का ही हेतु होता है और उसी में ध्यान रहता है, परिणामस्वरूप अधोगति के कर्म बँधते हैं।
ज़्यादा रुपये आएँ तब और ज़्यादा अकुलाहट होती है, पैसे की गिनतियाँ करके-करके दिमाग शुष्क हो जाता है, कुछ याद नहीं रहता और पूरा दिन अजंपा, अजंपा, अजंपा ही रहता है। मनुष्य देह प्राप्त करके लोग सिर्फ़ पैसे पाने की दौड़ में पशुओं की मौत मरते हैं। पैसों का लोभ करके, आर्तध्यान-रौद्रध्यान करके मनुष्य का अवतार बिगाड़ते हैं।
यह दुषमकाल जो दुःख-प्रधान काल है, उसमें मनुष्यों को पूरा दिन कलह और जलन चालू ही रहती है। रोज़ सुबह नाश्ते की टेबल पर क्लेश परोसा जाता है। किसी को अंतरशांति नहीं मिलती। किसी भी तरह सूझ नहीं पड़ती इसलिए लोग मान लेते हैं कि पैसों से सुख मिलेगा और यह मान्यता धीरे-धीरे दृढ़ हो जाती है। लेकिन फिर उसमें भी जलन पैदा होती है।
पूरे जगत्ने लक्ष्मी को ही मुख्य माना है! हर काम में लक्ष्मी ही मुख्य है, इसलिए लक्ष्मी पर ही मनुष्य की ज़्यादा प्रीति है। नियम ऐसा है कि जब तक लक्ष्मी पर ज़्यादा प्रीति होगी, तब तक भगवान पर प्रीति नहीं बैठेगी और अगर भगवान पर प्रीति हो जाए तो फिर लक्ष्मी की प्रीति उड़ जाएगी। दोनों में से एक पर प्रीति बैठती है, या तो लक्ष्मी पर और या तो नारायण पर। कहाँ रहना है, यह हमें तय करना है। लक्ष्मी पर प्रीति रखेंगे तो लक्ष्मी आज है और कल नहीं होगी तब रोने का वक्त आएगा। लेकिन अगर नारायण पर प्रीति रखेंगे तो हमें निरंतर आनंद और मुक्तभाव रहेगा। लक्ष्मी सहजभाव से आती हो तो आने देना, लेकिन उसका आधार मत लेना। आधार लेकर ‘खुश’ हो जाएँ लेकिन वह आधार कब हट जाएगा, वह कहा नहीं जा सकता।
जो पैसा कमाने में और पैसों की गिनती में पूरा जीवन निकाला, वो सभी पैसे यहीं के यहीं रह जाते हैं, और गिनने वाले निकल जाते हैं! जीवन में बुद्धिजीवी भी इस बात को स्वीकार करते हैं। यदि इतना समझ लें तो चिंता का कोई कारण नहीं रहता!
एक लक्ष्मी और एक विषय-विकार मनुष्य को सब भुलवा देते हैं, भगवान को याद ही नहीं आने देते। इस दुनिया में दूसरी किसी चीज़ का इतना प्रभाव नहीं होता कि सब कुछ भुलवा सके। नियम ऐसा है कि जहाँ रुचि होती है, वहाँ एकाग्रता होती है। लोगों को भगवान की तुलना में पैसों में ज़्यादा रुचि है, इसलिए वहाँ एकाग्रता होती है। पैसों की प्रीति कम करने के लिए जीवन में किसकी कीमत ज़्यादा है वह तय करें। यदि जीवन में सुख-शांति ज़्यादा कीमती हो तो भगवान पर प्रीति रहेगी और यदि पैसों की कीमत अधिक मानी हो तो वहाँ प्रीति रहेगी।
दुनिया में लोग दो हेतु के लिए जीते हैं: एक आत्मार्थ के लिए और दूसरा लक्ष्मी के लिए। बहुत ही कम लोग आत्मार्थ के लिए जीते हैं, बाकी सब लक्ष्मी के लिए जीते हैं। पूरा दिन लक्ष्मी, लक्ष्मी और लक्ष्मी ही करते रहते हैं! लोगों ने मान लिया कि पैसों में सुख है, इसलिए हमने भी मान लिया। इस तरह लोकसंज्ञा से यह रोग लग गया है। इस भौतिक सुख की बजाय अलौकिक सुख होना चाहिए, जिस सुख में हमें तृप्ति मिले। यह लौकिक सुख से तो उल्टा अजंपा बढ़ाता है। ज्ञानी से आत्मज्ञान प्राप्त होने पर, सही समझ मिलती है, तब आत्मा का वास्तविक सुख प्राप्त होता है और फिर यह रोग निकल जाता है।
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