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लक्ष्मी के नियम क्या हैं?

लोग ऐसा मानते हैं कि लक्ष्मी मेहनत करने से, उनके पीछे पड़ने से या बुद्धि का उपयोग करने से मिलती है। लेकिन यदि मेहनत से लक्ष्मी मिलती हो, तो मजदूरों के पास सबसे ज़्यादा लक्ष्मी होनी चाहिए। क्योंकि वे लक्ष्मी के लिए बारह-बारह घंटे मेहनत करते हैं, फिर भी वे दो वक्त के खाने की व्यवस्था मुश्किल से कर पाते हैं। जबकि सेठ कुछ किए बगैर बैठे-बैठे कमाते हैं। यदि लक्ष्मी बुद्धि से प्राप्त होती, तो सभी पंडितों के पास बहुत लक्ष्मी होती, लेकिन उनकी चप्पलें भी आधी घिसी हुई होती हैं। बड़े मिल मालिक और सेठ ज़रा-सी भी बुद्धि का प्रयोग नहीं करते, फिर भी ढेर सारे पैसे कमाते हैं। जबकि हिसाब-किताब रखने वाले मैनेजर या चार्टर्ड अकाउंटेंट पूरा दिन बुद्धि का प्रयोग करते रहते हैं फिर, भी सेठ जितना नहीं कमाते हैं। इतना ही नहीं, इनकम टैक्स ऑफिस में साहबों का सामना भी वही लोग करते हैं और सेठ आराम से सोते रहते हैं।

बहुत मेहनत या बुद्धि से डाले हुए पासे हमेशा सीधे नहीं पड़ते हैं। उसी तरह, लक्ष्मी मिलना या न मिलना अपनी सत्ता की बात नहीं है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, पैसे कमाना बुद्धि का खेल नहीं है और न ही मेहनत का फल है। वह तो आपने पूर्व जन्म में जो पुण्य किए थे, उसके फलस्वरूप आपको मिलते हैं और नुकसान वह, जो पाप किए थे उसके फलस्वरूप है। लक्ष्मी पुण्य और पाप के अधीन है। इसलिए यदि लक्ष्मी चाहिए तो हमें पुण्य और पाप का ध्यान रखना चाहिए।”

पुण्य कहाँ से मिलता है? हमने किसी पर उपकार किया हो, किसी का भला किया हो, उससे पुण्य बँधता है। या भगवान को समझकर पूजा की हो, धर्म किया हो, उससे पुण्य बँधता है! पैसे कमाने के लिए ज़्यादा बुद्धि लगाकर दूसरों को धोखा देकर हड़प लें, तो उल्टा पाप बँधता है।

पुण्य बहुत कम हो, तो बहुत मेहनत करने पर भी बहुत कम लक्ष्मी प्राप्त होती है। थोड़ा अधिक पुण्य हो, तो उसे शारीरिक मेहनत ज्यादा नहीं करनी पड़ती, लेकिन वाणी की मेहनत करनी पड़ती है, जैसे, वकील का व्यवसाय। इससे भी अधिक पुण्य हो, तो शारीरिक या वाणी की मेहनत नहीं करनी पड़ती, लेकिन माथापच्ची करनी पड़ती है, तब लक्ष्मी आती है। इससे भी अधिक पुण्यशाली मनुष्यों को कम मेहनत में, सिर्फ़ संकल्प किया हो तो सब कुछ मिल जाता है। जितनी मेहनत ज़्यादा, उतना लक्ष्मी का अंतराय!

इसका अर्थ यह नहीं है कि हम पैसे कमाने का प्रयत्न किए बिना बैठे रहें। सामान्य प्रयत्न करें और फर्ज़ निभाएँ, लेकिन लक्ष्मी के बारे में दिन-रात न विचारें। यदि हम पुण्य लेकर आए हैं तो लक्ष्मी अपने-आप आ जाएगी। उसके लिए क्यों छटपटाएँ? और यदि पुण्य लेकर नहीं आए हैं, तब चाहे जितने भी प्रयत्न करेंगे, तब भी लक्ष्मी नहीं आएगी। तो फिर क्यों छटपटाएँ? यदि ऐसी सही समझ हाज़िर रहे, तो मनुष्य को हर परिस्थिति में शांति रहेगी।

लक्ष्मी तो बाय-प्रोडक्शन है अपने-आप, सहज स्वभाव से आए ऐसी है। लेकिन लोगों ने लक्ष्मी को ही मेन- प्रोडक्शन बना दिया है। हर मनुष्य को जीवन का ध्येय तय करना चाहिए। देखा-देखी में लक्ष्मी के पीछे अंधी दौड़ दौड़ने के बजाय, लोगों की मदद हो सके ऐसा ध्येय रखना चाहिए। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि"जगत् के लिए काम करो, आपका काम होता ही रहेगा। जब जगत् के लिए काम करते रहोगे, तब आपका काम यों ही होता रहेगा और तब आपको आश्चर्यहोगा!"

लक्ष्मी का स्वरूप

कहा जाता है कि, लक्ष्मी वह तो हाथ का मैल है। जैसे पसीना आए बिना नहीं रहता, वैसे लक्ष्मी आए बिना नहीं रहती। किसी को ज़्यादा पसीना आता है, किसी को कम पसीना आता है, वैसे ही किसी को ज़्यादा लक्ष्मी मिलती है और किसी को कम लक्ष्मी मिलती है। जैसे नहाने के लिए पानी की बाल्टी मिल जाती है, वैसे ही ज़रूरत भर के पैसे हर किसी को मिलते ही रहते हैं, ऐसा नियम ही है।

परम पूज्य दादा भगवान से किसी ने पूछा कि लक्ष्मी जी किसके जैसी हैं? तब उन्होंने कहा कि लक्ष्मी जी नींद के जैसी हैं। कुछ लोगों को लेटते ही नींद आ जाती है, कुछ लोगों को पूरी रात करवटें बदलने पर भी नींद नहीं आती और कुछ लोग नींद आने के लिए गोलियाँ खाते हैं। जैसे नींद हमारे वश में नहीं है, वैसे ही लक्ष्मी जी भी हमारे वश में नहीं हैं, वह परसत्ता है। तो फिर जो परसत्ता है, उसमें उपाधि करने की क्या ज़रूरत? जैसे शरीर की तंदुरुस्ती हो तब नींद आती है, वैसे मन की तंदुरुस्ती हो तो लक्ष्मी जी आती हैं।

परम पूज्य दादाश्री की एक अनोखी खोज है कि, “तंगी नहीं और भराव भी नहीं! हमारे यहाँ कभी भी लक्ष्मी की तंगी भी नहीं और भराव भी नहीं!’ तंगी वाला सूख जाता है और भराव वाले को सूजन चढ़ जाती है। जैसे सांस लेते हैं तो उसे भरकर नहीं रखते, उच्छ्वास में निकाल देते हैं। वैसे लक्ष्मी जी को भी भरकर नहीं रख सकते हैं। लक्ष्मी जी तो चलती-फिरती अच्छी, नहीं तो दुःखदायी हो जाती हैं। पैसों की बहुतायत हो तब भी दुःख, और तंगी हो तब भी दुःख।

लक्ष्मी जी तो कैसी हैं? कमाने में दुःख, संभालने में दुःख और खर्च करने में भी दुःख। घर में लाखों रुपये आएँ तो उन्हें संभालने की उपाधि शुरू हो जाती है। कौन-सी बैंक में यह सेफ रहेगी, यह ढूँढना पड़ता है। फिर रिश्तेदारों या मित्रों को पता चलता है कि कमाया है, तो वे लोग तुरंत दौड़ते हुए आते हैं। दस लाख कमाए हों तो कोई एकाध लाख माँगने वाला खड़ा हो जाता है। मना करें तो कहता है कि, “अरे यार, मुझ पर इतना भी विश्वास नहीं है? सिर्फ़ एक लाख चाहिए।” तो फिर मज़बूरी में देना पड़ता है, और न दें तो झगड़ा या मन दुःखी हो जाता है। इसके बजाय, जब पैसे नहीं होते तब घर में सब साथ बैठकर खाते-पीते हैं और मजा करते हैं। ऐसा है यह पैसों का काम!

जब तंगी आती है तब लोग सोचते हैं कि इस साल एक साथ ज़्यादा कमाई हो जाए तो अच्छा। अब, एक साल एक साथ सारी बारिश हो जाए और फिर पाँच साल अकाल पड़ जाए, तो चलेगा? नहीं। वैसे ही, किस्तों में लक्ष्मी जी आती हैं तो वही ठीक है। सारी पूँजी एक साथ हाथ में आएगी तो सब खर्च हो जाएगी। आधी पतीली दूध को गैस पर गरम करने रखा हो और उफनकर पूरी पतीली भर जाती है, लेकिन वह उफान टिकता नहीं है। उसी तरह लक्ष्मी का उफान टिकता नहीं है, जितना हिसाब होता है उतनी ही लक्ष्मी टिकती है।

जैसे नर्मदा नदी में पानी नदी की सीमा के अनुसार आए तो अच्छा। अगर ज़्यादा पानी आ जाए तो आसपास के गाँव पानी में बह जाएँगे। वैसे ही लक्ष्मी का आवश्यकता से अधिक जमा हो जाना भी उपाधि है। इसलिए तंगी न हो तो बहुत हो गया! लक्ष्मी जी नॉर्मल आएँ वहाँ तक अच्छा। लक्ष्मी जी बिलो नॉर्मल आएँ तो भी फीवर और अबव नॉर्मल भी फीवर है।

परम पूज्य दादाश्री लक्ष्मी का एक गूढ़ नियम समझाते हैं कि जैसे अनाज दो-तीन साल बाद नहीं उगता, जैसे दवा कुछ वर्षों बाद काम नहीं करती, वैसे ही लक्ष्मी की भी ‘एक्सपायरी डेट’ होती है ग्यारह साल की! यानी हर ग्यारह साल में पैसा बदलता रहता है। आज हमारे पास ग्यारह साल पहले की लक्ष्मी नहीं होगी। वह नफे के रूप में, नुकसान के रूप में या ब्याज के रूप में लेकिन पैसा घूमता रहता है। पच्चीस करोड़ का आसामी होता है, लेकिन यदि ग्यारह साल तक उसका एक भी रुपया न बदले, तो वह पैसा खत्म हो जाएगा।

इस काल में लक्ष्मी बहुत है फिर भी शांति नहीं है, उसका क्या कारण है? कलियुग में पैसा पुण्य से ही आता है, लेकिन पाप के बंध डालता जाता है, यानी पापानुबंधी पुण्य! जो पैसे गलत रास्ते से इकट्ठे होते हैं, वे हमारे पास नहीं टिकते हैं। वे न हों तो ही अच्छा, क्योंकि वे सिर्फ़ पाप ही बंधवाते हैं! जहाँ-जहाँ गलत तरीके से कमाई हुई लक्ष्मी आती है, वहाँ क्लेश का वातावरण बन जाता है। जहाँ ईमानदारी से, प्योर नीयत से प्राप्त की हुई सच्ची लक्ष्मी आती है, वहाँ एक-एक रुपया बहुत सुख देकर जाता है! घर में सबको निरंतर अंतर शांति के साथ समृद्धि रहती है और वहाँ धर्म रहता है।

लक्ष्मी के अंतराय

लक्ष्मी का स्वभाव चंचल है। जो मनुष्य लक्ष्मी के ध्यान में रहेंगे वे खुद चंचल हो जाएँगे। घर में खाने-पीने की या अन्य सभी सुविधाएँ हों, फिर भी और ज्यादातर लक्ष्मी की आशा रखना, यानी दूसरों के यहाँ कमी पड़े ऐसा प्रमाण भंग होने का, गुनाह लगता है। वह बड़ा रौद्रध्यान है। मनुष्य लक्ष्मी बढ़ाने के लिए आर्तध्यान और रौद्रध्यान करता है। लेकिन आर्तध्यान और रौद्रध्यान से तो उल्टा लक्ष्मी कम आती है। इसलिए लक्ष्मी का ध्यान नहीं करना चाहिए और जितनी लक्ष्मी आए उसे रोककर भी नहीं रखना चाहिए।

लक्ष्मी जी का स्वभाव कैसा है? जो आनंदी हो, उसके वहाँ लक्ष्मी जी मुकाम करती हैं। बाकी चिंता करने वालों के यहाँ मुकाम करती ही नहीं। जो आनंदी हों, जो भगवान को याद करते हों, उनके यहाँ लक्ष्मी जी जाती हैं।

लक्ष्मी का अंतराय चोरी से है। ट्रिक और लक्ष्मी में वैर है। जहाँ मन-वचन-काया से चोरी नहीं होती, वहाँ लक्ष्मी जी मेहर करती हैं! बुद्धि का ज्यादा लाभ उठाकर कम बुद्धि वालों को ठगना, वह सूक्ष्म चोरी यानी कि ट्रिकें करना, उसे हार्ड रौद्रध्यान कहा जाता है। लक्ष्मी जी का नियम ऐसा कहता है कि, हक्क की लक्ष्मी मिले तो लेना, लेकिन गलत तरीके से किसी की लक्ष्मी को छीनकर या ठगकर नहीं लेना चाहिए। इन नियमों को तोड़ें तो लक्ष्मी जी कभी भी राजी नहीं होतीं। जितना गलत पैसा होगा, उतना ही जाएगा है और जितना सच्चा धन होता है, उसका सदुपयोग होता है!

लक्ष्मी कब नहीं मिलती? जब लोग लोगों की निंदा-चुगली में पड़ते हैं तब! जहाँ मन की स्वच्छता, देह की स्वच्छता और वाणी की स्वच्छता होती है, वहाँ लक्ष्मी मिलती है। तिरस्कार और निंदा हो, वहाँ लक्ष्मी नहीं रहती। वाणी को तो सरस्वती देवी कहा जाता है। यदि निंदा-चुगली में वाणी का दुरुपयोग करें, तो लक्ष्मी जी भी रूठ जाती हैं।

मुझे पैसे नहीं चाहिए” इस तरह से लक्ष्मी का तिरस्कार करना भी गुनाह है। लक्ष्मी जी का तिरस्कार करने से इतने बड़े अंतराय पड़ते हैं कि अगले जन्म में लक्ष्मी के दर्शन भी नहीं मिलते।

लक्ष्मी जी तो नारायण भगवान की पत्नी कहलाती हैं। लक्ष्मी जी को पूरे दिन याद करते रहें तो नारायण नाराज हो जाते हैं। लक्ष्मी जी को नमस्कार करना चाहिए और उनका विनय रखना चाहिए कि, “यह घर आपका है, जब अनुकूल हो तब आइएगा।”

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, पैसों का अंतराय कब तक होता है? जब तक कमाने की इच्छा हो तब तक। पैसों की ओर लक्ष्य हटे तो वह ढेर सारा आएगा।”  उन्हें एक भाई मिले थे। उन्हें धंधे में महीने के बीस हजार रुपये का नुकसान हो जाता था, इसलिए वे पैसों की हाय-हाय करते रहते थे। परम पूज्य दादाश्री ने उन्हें कहा कि पैसों को याद करना बंद कर दीजिए। तब से उनके पैसे बढ़ने लगे और उल्टा हर महीने तीस हजार का फ़ायदा होने लगा। लक्ष्मी पाने के लिए मन-वचन-काया से प्रयत्न तो करें, लेकिन इच्छा न करें। जो इच्छा नहीं करते, उनके यहाँ लक्ष्मी जी समय पर ब्याज सहित पहुँच जाती हैं।

क्या किया हो तो अमीरी आती है? लोगों की बहुत मदद की हो, तब लक्ष्मी हमारे यहाँ आती है! नहीं तो लक्ष्मी नहीं आती। लक्ष्मी तो देने की इच्छा वालों के यहाँ ही आती हैं। जो औरों के लिए काम करे, धोखा खाए, नॉबिलिटी दिखाए, उसके यहाँ लक्ष्मी आती है। ऐसा लगता ज़रूर है कि चली गई लेकिन लौट कर वापस वहीं आ जाती है।

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