
लोग लक्ष्मी पाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। पर क्या किसी को आयुष्य का एक्सटेंशन मिलता है? यदि मिलता, तो खूब पैसे कमा लेते, बड़े-बड़े आलीशान मकान बनवाएँ, गाड़ी-मोटर खरीदें, बैंक बैलेंस बढ़ाएँ पर अंत में इनमें से कुछ भी साथ नहीं ले जाते। एक दिन सब कुछ छोड़कर चले जाना है। तो फिर लक्ष्मी के पीछे अंधी दौड़ क्यों?
क्या कभी पशुओं को जीवन निर्वाह के लिए चिंता करते या गाँव छोड़कर शहर में जाते देखा है? कुदरती रूप से उनका सब कुछ चलता ही रहता है। लेकिन मनुष्य पैसे कमाने के लिए इतनी दूर समुद्र पार जाते हैं। वे सचमुच जीवन निर्वाह के लिए जाते हैं या लोभ के लिए?
लक्ष्मी ‘लिमिटेड’ है और लोगों की माँग ‘अनलिमिटेड’ है! हर किसी को बैंक में धन जमा हो तो आनंद होता है और जाए तो दुःख होता है। इस जगत् में किसी भी चीज़ का आनंद लेने जैसा नहीं है, क्योंकि सब कुछ ‘टेम्पररी’ है। उसमें भी धन आज है और कल नहीं। इसलिए इसका बोझ रखने जैसा नहीं है।
जैसे नियम से सूर्योदय के साथ सूर्यास्त होता ही है, वैसे ही जीवन में पैसे बढ़ते-घटते रहते हैं। बंगले, गाड़ियाँ, सुख-सुविधाएँ बढ़ती हैं और फिर बिखर जाती हैं। जब वे बिखरती हैं, तब जीवन में शांति बनाए रखना ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। सगा भाई पैसा ले जाए और ऊपर से अपशब्द कहे, वहाँ जीवन कैसे जीना वह पुरुषार्थ है। कोई नौकर ऑफिस से कीमती माल चुरा ले, वहाँ कैसे व्यवहार करें वह पुरुषार्थ है। सही समझ नहीं होने से, ऐसे समय पर लोग कषाय करके अवतार बिगाड़ देते हैं।
आज की सलामती के लिए हम हर प्रकार की विचारणा करते हैं, पर अगले जन्म की सलामती के लिए सोचा है? पैसे कमाने के लिए धंधा-रोजगार करना वह जीवन की मुख्य चीज़ नहीं है, वह तो बाय प्रोडक्ट है। मुख्य उद्देश्य मनुष्य जीवन को सार्थक करना है।

जब कठिन आर्थिक संयोग आएँ तब समझना चाहिए कि जैसे दिन के बाद रात आती है, वैसे ही ये संयोग भी बदल जाएँगे। आज नौकरी नहीं है तो कल नई मिल जाएगी। आज धंधे में नुकसान हुआ है तो कल फ़ायदा होगा। एक साल बारिश न हो तो किसान निराश हो जाते हैं कि आर्थिक स्थिति समाप्त हो गई। लेकिन फिर अगले साल बारिश होती है और स्थिति सुधर जाती है। इसलिए जब आर्थिक स्थिति कमजोर हो, तब हाय-हाय किए बगैर धीरज रखें। खर्च कम कर दें और जो भी रास्ता मिले, उस पर मेहनत करें, प्रयत्न अधिक करें पर चिंता न करें।
कई बार आर्थिक मुश्किलें होती ही नहीं, पर लोभ के कारण मनुष्य चिंता करता है। रहने, खाने-पीने और पहनने-ओढ़ने के लिए पैसे हैं या नहीं, बस इतना देख लें। इसके आगे न सोचें।
मनुष्य के जन्म के समय जितना वैभव होता है, उसी के अनुसार पूरा ज़िंदगी का स्टैन्डर्ड होना चाहिए। बाकी सब एक्सेस है, जो ज़हर के समान है। आजकल लोग पड़ोसी का देखकर चिंता करते हैं। पड़ोसी के घर गाड़ी है और हमारे घर नहीं है। तब सोचना चाहिए कि जीवन निर्वाह के लिए कितना चाहिए? एक बार तय कर लें कि मेरी इतनी-इतनी ज़रूरतें हैं। जैसे कि घर में खाने-पीने के लिए पर्याप्त चाहिए, रहने के लिए घर चाहिए, घर चलाने के लिए पर्याप्त लक्ष्मी चाहिए। फिर उतना हमें मिल ही जाएगा।
देखा-देखी से ही दुःख उत्पन्न होते हैं। पड़ोसी ने बैंक में दस लाख रखे हों तो भीतर चुभन होती रहती है, फिर खुद भी पैसे कमाने की होड़ में पड़ जाते हैं। इस प्रकार लोग खुद ही दुःख को आमंत्रण देते हैं।
ज़्यादातर लोगों को पैसे बचाने हैं, क्यों? आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ छोड़कर जाएँ। फिर आवश्यक खर्च के लिए पैसा खर्च करते समय उनका जी जलता है। इसके बजाय आने वाली पीढ़ी के लिए एक निर्धारित रकम रख दें, फिर भविष्य की चिंता में आज दुःखी न हों।
पैसा पूरण होता है और गलन होता है, इकट्ठा होता है और बिखर जाता है उसमें गंभीरता रखें, शांति धारण करें। पर लोग भागदौड़ करके, क्लेश करके जन्मों को बिगाड़ लेते हैं। ऊपर से बैंक बैलेंस में कोई परिवर्तन नहीं होता। लोग लाख निश्चय कर लें कि इस बार बैंक में इतने रुपए जमा किए हैं, निकालने नहीं हैं। पर कभी न कभी निकालने का समय आता ही है। नहीं तो अंत में सब कुछ छोड़कर जाने का समय आता ही है। इसलिए यह सब कुदरती रूप से चलता ही रहता है, उसमें चिंता नहीं करनी चाहिए। फिर भी लोग रात में पलंग में विकल्प करते रहते हैं कि यह एक मिल बन गई, अब दूसरी फैक्टरी बनाएँ। घर के लोग कहें कि शांति से सो जाओ, फिर भी ओढ़कर योजना बनाते रहते हैं। इसके बजाय आराम से सो न जाएँ?
ग्यारह लाख कमाए हों और उसमें से पचास हज़ार का नुकसान हो जाए तो लोग जी जलाते रहते हैं। अरे! तब ग्यारह लाख में से पचास हज़ार घटा लेने चाहिए और साढ़े दस लाख का फ़ायदा कर लेना चाहिए। ऐसा करें तो शांति रहेगी न!
लक्ष्मी जी तो जैसे हाथ में मैल आता है वैसे ही सबके हाथ में हिसाब के अनुसार आती ही रहती हैं। लेकिन जो लोभ से अंधा हो जाए उसकी सभी दिशाएँ बंद हो जाती हैं। उसे कुछ और दिखाई ही नहीं देता। जिनका सारा दिन चित्त धंधे में और पैसे कमाने में रहता है, उनके घर के लड़के-लड़कियाँ कॉलेज की जगह कहीं और गलत रास्ते पर चले जाते हैं। एक ओर खुद कमाते रहते हैं लेकिन दूसरी ओर घर बिगड़ता रहता है, ऐसे पैसे किस काम के?
संपत्ति, वह तो उपाधि है। संपत्ति यदि धर्म की ओर लग गई हो तो हर्ज नहीं। वर्ना वह बोझ बन जाती है। किसे दें? अब कहाँ रखें? इसका दुःख बढ़ जाता है। उससे अच्छा कम कमाएँ वह अच्छा।
आर्थिक प्रतिकूलता आए तब मन को सरप्लस समय में धर्म और भक्ति में लगा देना चाहिए। क्योंकि अनुकूलता शरीर की खुराक है और प्रतिकूलता आत्मा का विटामिन है। कठिन संयोगों में ही अधिकांश लोग धर्म और अध्यात्म की ओर मुड़ते हैं। उससे जीवन में क्लेश घटता है और शांति प्राप्त होती है।
व्यवहार का सार यदि कुछ है तो वह है नीति। जीवन में नीति होगी तो फिर पैसे कम हों तब भी भीतर शांति रहेगी; और नीति न हो और पैसे बहुत हों, तब भी अशांति रहेगी। करोड़ों रुपए हों, पर भीतर मानो जलती भट्ठी ही हो ऐसी अकुलाहट बनी रहे तो वह किस काम की?
ईमानदारी वह सबसे बड़ा धर्म है। उसमें भी अपना किसी को देना वह देवधर्म है। दूसरे का अणहक्क का न लेना वह मानवधर्म है। जबकि ‘डिशऑनेस्टी इज़ द बेस्ट फूलिशनेस!’
संत कबीर ने कहा है,
“सहज मिला सो दूध बराबर, माँग लिया सो पानी,
खींच लिया सो रक्त बराबर, यही कबीर वाणी।”
यानी, जो कुछ हमें सहज प्रयत्न से प्राप्त हो, वह दूध के समान पौष्टिक है। माँगकर प्राप्त करें, वह पानी के समान साधारण है। परंतु दूसरे से खींचकर, छीन लेना वह रक्त पीने के समान है। लक्ष्मी के विषय में इस नियम का पालन करना चाहिए।
व्यापारी के रूप में हम “एकदम शुद्ध माल है” ऐसा कहकर मिलावटी माल बेचकर खुश हों, तो उस छल का फल भुगतना पड़ता है। यदि हम तय करें कि ऐसा गलत काम नहीं करना है, अपनी सौ प्रतिशत इच्छा अच्छा माल देने की ही रखें और माल खराब हो तो ईमानदारी से बता कर कम दाम में बेच दें, तो खुद की जोखिमदारी कम हो जाती है।
किसी को ठगकर पैसे कमाते समय निरंतर ध्यान में रखना चाहिए कि या तो पैसा जाएगा या हम चले जाएँगे। लेकिन पैसे कमाते समय जिन लोगों को दुःख दिया, वह पापकर्म हमारे साथ आएगा। फिर उसका फल भोगते समय कैसी दशा होगी? किसी को दुःख देकर खुद सुखी कैसे हो सकते हैं? बल्कि, सही रास्ते से प्राप्त की हुई लक्ष्मी भीतर शांति देगी। जहाँ ईमानदारी होती है, वहाँ कोई भय नहीं रहता।
दो नंबर का काला धन घर में आए तो उससे अधोगति के कर्म बँध पड़ता है, जिन्हें भोगने के लिए जानवरगति में जाना पड़ता है। लक्ष्मी जी का दुरुपयोग करना बड़ा गुनाह है। जैसे नदी में बाढ़ आ जाए और घर में पानी भर जाए, तो फिर पानी के चले जाने पर कीचड़ रह जाता है, जिसे साफ करते-करते दम निकल जाता है। काला धन बाढ़ के पानी जैसा है, जो जाते समय रोम-रोम को काटता हुआ जाएगा इसलिए संभलकर चलना चाहिए। वास्तव में ठगने वाले खुद ही ठगे जाते हैं। जबकि जो खुद ठगा जाता है, वह अनुभव प्राप्त करता है और सीखता है।
छल करके पैसा कमाना यानी मनुष्यपन में जो-जो सिद्धि लेकर आए हों, उन सिद्धियों को खोकर दिवालिया बनते जाना। यदि आज ईमानदारी से बहुत मेहनत करने पर भी लक्ष्मी न मिलती हो, तो समझना चाहिए कि पहले से ही उल्टे कार्य करके मनुष्यपन की सिद्धि खो चुके हैं; उसका यह परिणाम है। इसलिए अब सुधार लेना चाहिए।

अब तक लक्ष्मी के संबंधित जो भी चोरियाँ हुई हों, किसी को ठगा हो या किसी का छीन लिया हो ऐसी बेईमानी और अनीति का हृदय से पश्चाताप करना चाहिए और फिर ऐसा न हो इसके लिए निश्चय करना चाहिए। परिणामस्वरूप ‘चोरी करनी चाहिए’ वह अभिप्राय ही उड़ जाता है। जितनी बार अपना दोष दिखाई दें, उतनी बार फिर से पछतावा करना चाहिए, तो दोष धुल जाता है।
किसी का एक भी पैसा गलत नहीं लेना चाहिए। मानवता उसे कहते हैं कि सामने वाले को दुःख हो, तब हमें विचार आना चाहिए कि कोई मेरे साथ ऐसा करे तो? इस दुनिया में सुख दें तो सुख मिलता है और दुःख दें तो दुःख मिलता है। हम सच्चे रास्ते पर चलेंगे तो बाहर भले पैसा न हो, पर भीतर शांति और आनंद रहेगा। गलत तरीके से कमाया हुआ पैसा टिकेगा भी नहीं और दुःखी भी कर देगा।
हमें तो एक ही भाव रखना चाहिए कि किसी भी जीव को किंचित्मात्र भी दुःख न हो और किसी की लक्ष्मी हमारे पास न रहे। क्योंकि, लक्ष्मी वह ग्यारहवाँ प्राण है। मनुष्य के दस प्राण होते हैं। फिर लक्ष्मी को ग्यारहवाँ प्राण कहा गया है। हमारी लक्ष्मी किसी के पास रहे उसमें हर्ज नहीं है, पर हमारे पास किसी की लक्ष्मी न रह जाए यह ध्येय निरंतर रखना चाहिए।
किसी से पैसा उधार लेते समय जिसका दृढ़ निश्चय हो कि मुझे वापस दे ही देना है, उसका व्यवहार कुछ और ही दिखता है। जबकि कोई व्यक्ति हमसे पैसे की वसूली करे, तब यदि हमारे पास पैसे न हों तो विनयपूर्वक, सामने वाले को दुःख न हो इस तरह से बात करनी चाहिए। हमारे बहीखाते में जिसकी-जिसकी रकम जमा हो उन सबको चुका देने की भावना रखनी चाहिए।
यदि किसी को ऊँचे ब्याज पर पैसा उधार दें और वह चुका न सके, तो उसे दुःख होता है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि जो ब्याज खाता है वह मनुष्य कसाई जैसा निर्दयी हो जाता है, इसलिए ब्याज नहीं लेना चाहिए।
बेचारे मजदूर दिन भर मजदूरी करते हैं तब दो वक्त के भोजन की व्यवस्था करते हैं। उसमें हम उन्हें “छुट्टे पैसे नहीं हैं” कहकर खाली हाथ लौटा दें, तो वे रात में क्या खाएँगे, यह विचार करना चाहिए। किसी के दुःख में वृद्धि नहीं करनी चाहिए।
यदि कोई हट्टा-कट्टा भिखारी भीख माँगे तब उसे दान न दें तो हर्ज नहीं, पर ताने मारकर उसे दुःख हो ऐसा नहीं बोलना चाहिए। किसी के भी संयोग विपरीत हो सकते हैं; उसमें व्यक्ति का क्या दोष? इसी प्रकार सब्ज़ी बेचने वाले फेरीवालों के साथ किचकिच नहीं करनी चाहिए। थोड़ा ज्यादा पैसा दे दें, पर किचकिच करके दुःख नहीं देना चाहिए। नौकर से प्याला फूटे तब उसके साथ, रिक्शावाले के साथ, सामान उठाने वाले मजदूर से हर जगह पैसे के कारण कलह करेंगे तो उल्टा झगड़ा बढ़ेगा। काम में नुकसान हुआ हो और हमारे अधीन काम करने वाले अंडरहैंड को डाँटते हैं तो उसे भी दुःख होता है। किसी को दुःख हो ऐसा व्यवहार हो जाने पर उसका पछतावा करना चाहिए।
यदि लक्ष्मी का कैफ न चढ़ता हो तो ज़्यादा कमाने में हर्ज नहीं है। पर लक्ष्मी का कैफ शराब के कैफ जैसा है। पैसे की खुमारी में मनुष्य खुद घूमता रहता है और लोगों का तिरस्कार करता है।
चाहे जितना भी कमाया हो, लेकिन मरते समय कर्मों का सार आएगा, इसलिए सचेत रहना!
पूंजी का पूरा निवेश किसी एक ही जगह पर न करके उसे अचल और चल संपत्ति में बाँटकर करना चाहिए। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि दो सौ वर्ष पहले के व्यापारी पूंजी का निवेश इस प्रकार करते थे कि व्यापार में कभी भी दिवालियापन न आए। मान लीजिए कि, उनके पास एक लाख रुपए हों तो पच्चीस हज़ार की अचल संपत्ति ले लेते, पच्चीस हजार का सोना और जेवरात ले लेते थे, पच्चीस हज़ार किसी महाजन के यहाँ ब्याज पर रख देते थे और पच्चीस हज़ार व्यापार में लगाते। व्यापार में ज़रूरत पड़े तो पाँच हज़ार ब्याज पर लेते। इस प्रकार की पद्धति से पूँजी का निवेश करते थे, फिर किसी भी तरह के नुकसान में दिवालियापन से बच सकते थे।
लक्ष्मी जी चल संपत्ति कहलाती हैं। चल संपत्ति यानी नकद रुपए चंचल स्वभाव के होते हैं, वे स्थिर नहीं रहते। चौथे भाग को चल, यानी बैंक में नकद रखना जिससे दैनिक जीवन-व्यवहार चल सके। सोना वह चल-अचल संपत्ति कहलाता है। सोना चालीस-पचास वर्ष टिकता है। यदि चौथाई भाग की पूंजी उसमें लगाई हो तो ज़रूरत पड़ने पर कभी भी नकद मिल सकता है। पर लोगों को यह विचार आ सकता है कि सोने में निवेश करेंगे तो ब्याज नहीं मिलेगा, इसलिए फिर बैंक में जमा कर देते हैं। इसके बाद चौथा भाग अचल संपत्ति में और चौथा भाग व्यापार में निवेश करना चाहिए। अचल संपत्ति यानी मकान में निवेश वह सौ वर्ष तक टिकता है।
परम पूज्य दादाश्री विशेष रूप से यह भी कहते हैं कि शेयर बाजार में तो पड़ना ही नहीं चाहिए। क्योंकि उस खेल में पाँच-सात खिलाड़ी खेलते हैं और बीच वाले मारे जाते हैं! लेकिन हर किसी को ऐसे सलाहकार मिल जाते हैं जो कहते हैं कि, अभी शेयर बाजार में भाव अच्छे हैं, पैसा लगा दीजिए। खुद उस लालच में आ गए तो समझो फँस गए।
अंत में, आय का कुछ भाग धर्म में दान देना चाहिए। पैसा अच्छे रास्ते में, यानी दुसरो के लिए खर्च हो वैसा करना चाहिए। किसी को परेशानी हो, कोई दुःखी हो उन्हें देना चाहिए। या ज्ञानदान के मार्ग में अच्छी पुस्तकें छपवाकर देनी चाहिए, जो लोगों के लिए हितकारी हो। पहले दूसरों को दिया होगा तो आज लक्ष्मी आएगी।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि व्यापार में धर्म होना चाहिए लेकिन धर्म में व्यापार नहीं होना चाहिए! यदि धर्म में व्यापार प्रवेश कर जाए तो उच्छेदन हो जाएगा। लाखों वर्षों तक पहाड़ का पत्थर बनकर बैठे रहना पड़ता है, ऐसा अवतार प्राप्त होता है।
लोग शांति के लिए धर्म की ओर मुड़ते हैं। लेकिन जहाँ धर्म के नाम पर व्यापार चलता है, वहाँ गुरु लोगों द्वारा भक्तों से पैसे और गहने निकलवा लेते हैं और इससे उल्टा उनका दुःख बढ़ जाता है। यदि धर्म में महँगी फीस ली जाए तो गरीब लोग धर्म का पालन कैसे कर पाएँगे? गुरु तो शुद्ध चरित्र वाले होने चाहिए। जहाँ लक्ष्मी और विषय-विकार प्रवेश करें, वहाँ सच्चे गुरु नहीं होते।
धर्म के नाम पर यदि लोगों से गलत तरीके से पैसे लिए हों, व्यभिचार किया हो, दृष्टि बिगाड़ी हो, तो उन सभी को याद करके सच्चे हृदय से बहुत पछतावा करें और फिर वह दोष न हो ऐसा दृढ़ निश्चय करें, तो वे दोष कम हो सकते हैं।
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