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लोभ क्यों नहीं करना चाहिए

लोभ यानी अंधापन ! खुद को भी पता नहीं चलता कि लोभ हो रहा है। लोभी व्यक्ति का चित्त पूरा दिन लोभ में ही रहता है। लोभ में सिर्फ़ पैसों का ही नहीं, हर चीज़ का लोभ समा जाता है। हम यहाँ पैसों के लोभ को समझेंगे।

लोभ से हमें क्या-क्या नुकसान होते हैं, यह समझ में आ जाए तो लोभ नहीं करना चाहिए ये समझ में आ जाता है। लोभी व्यक्ति अपने नज़दीक के लोगों को भी आराम से धोखा देता है! जैसे कि, पत्नी यात्रा के लिए पच्चीस हजार मांगती है तो पति कहता है, “अभी नहीं है और बैंक में देखें तो पाँच लाख रूपये पड़े होते हैं। इसलिए पत्नी का मन दु:खी हो जाता है। लोभ मान को भी बाजू में रख देता है। यानी कि, अपमान होता हो तो वह सहन कर लेता है, पर लोभ में नुकसान नहीं होने देता।

लोभ का रक्षक कपट है। लोभ की गाँठ में अड़चन न आए, इसलिए कपट उसकी रक्षा करता है। कहीं रुपये देने हों तो टालमटोल करके वह समय टाल देता है ताकि देना न पड़े।

सामान्य चीज़ का इस्तेमाल करने में किफायत करना वह गुनाह नहीं है। किफायत तो साधन-संपत्ति कम हो तब भविष्य का विचार करके करते हैं। पर बहुत पैसे हों वहाँ पर लोभी होना वह गुनाह है।

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, लोभ से ही यह संसार खड़ा हुआ है। एक भी चीज़ का लोभ बाकी हो तब तक संसार में आना पड़ता है। लोभ है तब तक संसार में भटकना जारी रहता है। जब संपूर्ण लोभ जाएगा तब यह संसार अस्त होगा!

लोभी सबसे ज़्यादा दुःखी

लोभी व्यक्ति सबसे ज़्यादा दुःखी होता है। जो प्राप्त हुआ है उसे खुद भोग नहीं सकता, और जो नहीं है उसके पीछे दौड़ता रहता है। वह भी सिर्फ़ मन से ही दौड़ता है, हाथ में आए या न आए। लोभ मनुष्य को सुख-चैन से रहने नहीं देता। हमें हमारे आसपास या हमें खुदमें ऐसा लोभ देखने को मिल सकता है।

पानी की तृष्णा अच्छी है, पर लक्ष्मी की तृष्णा बहुत भयंकर कहलाती है! क्योंकि लक्ष्मी की तृष्णा का संतोष होता है, पर तृप्ति तो कभी होती ही नहीं। संतोष में तो फिर उसकी इच्छा उत्पन्न होती है, जबकि तृप्ति का मतलब है फिर उसकी इच्छा ही न हो, विचार ही न आए।

“आठ आना ढूँढने में आठ घंटे लगाता है”, लोभी मनुष्य की ऐसी वृत्ति के कारण पैसे के पीछे मनुष्यपन का समय और शक्तियाँ बर्बाद होती हैं। जो सिर्फ़ खुद के लिए लक्ष्मी का उपयोग करता है, उसकी दुःख राह देखता रहता है।

लोभी व्यक्ति पूरी जिंदगी कंजूसी कर-करके धन इकट्ठा करता है। लेकिन उसके यहाँ बच्चे ही ऐसे उड़ाऊ निकलते हैं कि व्यसन और जुएँ जैसे गलत रास्तों पर सारा धन बर्बाद कर देते हैं, परिणामस्वरूप पूरा घरबार बर्बाद हो जाता है। जैसे चींटी कण-कण करके मण इकट्ठा करती है और एक दिन चूहा आकर सब सफाचट कर जाता है, वैसे ही जमा किया हुआ धन कब उड़ जाए कहा नहीं जा सकता। अंत में दुःखी होने की बारी आती है।

लगातार पैसों के लिए विचार करना बुरी आदत है। जैसे यदि सर्दी और बुखार हुआ हो तो हम भाप लेते हैं। भाप लेने से पसीना होता है और बुखार उतर जाता है। लेकिन बुखार न हो तब रोज़-रोज़ भाप नहीं लेनी चाहिए। नहीं तो शरीर में से ज़रूरी पानी भी निकल जाता है और शरीर लकड़ी जैसा हो जाता है। उसी तरह लक्ष्मी का पूरा दिन चिंतन करने से खुद को ही नुकसान होता है।

अति लोभ वह पाप का मूल

लोभ वह हिंसकभाव है! लोभ का अर्थ दूसरे का छीन लेना। हर एक के पैसों के कोटे का कुदरती निर्माण हुआ है। अपने पास पैसे अच्छे प्रमाण में आते हों, फिर भी ज़्यादा पैसे कमाने की भावना करना, यानी दूसरे के कोटे में से मैं ज़्यादा खींच लूँ ऐसा भाव करना। यानी दूसरे के हिस्से में नहीं रहेंगे। दूसरे के पास से मेरे पास पैसे आ जाएँ वही हिंसकभाव!

पैसों का लोभ यह आर्तध्यान और रौद्रध्यान होने का बड़ा कारण बनता है, जिससे पाप बंधता है। मान लीजिए कि नौकर बीस कप चाय लेकर आ रहा हो और उसके हाथ से चाय की ट्रे गिर जाए, और काँच के कप-प्लेट टूट जाएँ, तो लोभी व्यक्ति का मानो आत्मा टूट जाता है। अंदर कलह शुरू हो जाती है, पर सबके सामने खराब न लगे इसलिए बोलता नहीं है, यह आर्तध्यान। नौकर भी अंदर डर से काँपता है कि सब चले जाएँगे फिर तो मेरे लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। कुछ सेठ-सेठानी तो सबके सामने नौकर को डाँटते हैं। सस्ती कीमत का मटका फूटे तो इतना कलह नहीं होता है, लेकिन काँच के महंगे कप-प्लेट की कीमत रखी है इसलिए कलह होता है। एक तरफ़ पैसों का नुकसान तो हुआ पर दूसरी तरफ़ नौकर को दुःख भी दिया। पूरा दिन पैसा कमाने के ध्यान में ही पड़े रहते हैं, ऐसे लोग घर के नज़दीक के व्यक्तियों को भी भूल जाते हैं। उस ध्यान में कोई बुलाए या खलल डाले तो मूड बदल जाता है और गुस्सा आ जाता है, यह सब रौद्रध्यान। खुद को जिस चीज़ का लोभ हो यदि वह दूसरों को ज़्यादा मिले तो अंदर जलन शुरू हो जाती है।

इतनी हद तक लोभ होता है कि पूरी ज़िंदगी धन की रक्षा की, इसलिए मृत्यु के बाद भी आत्मा धन में ही रहता है। मरने के बाद साँप या बिच्छू बनकर धन जमा किए हुए घड़े को संभालते हैं। सबका संयुक्त धन हो तो सब भँवरे बनकर घड़े में इकट्ठा होते हैं। फिर कोई हाथ डालने जाए तो उसे डंक मार देते हैं!

पैसे की कमाई पुण्य के आधार पर होती है, लेकिन उसे खर्च करते समय पुण्य या पाप बंध सकता है। इसलिए आज पुण्य के हिसाब से ढेर सारे पैसे आते हैं, पर इस्तेमाल करते समय पूरा दिन “हाय पैसा, हाय पैसा” इस तरह से आर्तध्यान होता रहता है। संक्षेप में, खुद पैसा भोग नहीं सकता और आने वाले भव के लिए पाप बंधता है।

ज़्यादा लक्ष्मी पाने के लिए या बचाने के लोभ को लेकर मनुष्य उल्टे काम करने में भी हिचकते नहीं हैं, और फँस जाते हैं। कुछ व्यापारी सरकार के कानून के विरुद्ध जाकर पैसे कमाने के लिए टैक्स की चोरियाँ करते हैं। धंधे में ग्राहकों को धोखा देकर, कम तौलकर, चीज़ में मिलावट करके पैसे कमाते हैं। और नियम यह है कि यदि गलत तरीके से घर में धन आए तो साथ में गलत विचार भी आते हैं कि कैसे करके दूसरे का ज़्यादा छीन लूँ, भोग लूँ। परिणामस्वरूप मनुष्य पाप बाँधता है और अधोगति को न्योता देता है। जिस लोभ से आचार बिगड़ें, उससे पशुगति में जाते हैं! कई जन्मों तक भटकाने वाला कोई एक दोष है तो वह है, लोभ!

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