परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, "वर्ल्ड में कोई भी मनुष्य क्रोध को नहीं जीत सकता।"
क्रोध दो प्रकार से होता है। एक बाहर देख सकें ऐसा कढ़ापारूपी (कुढ़न वाला) क्रोध और दूसरा ना देख सकें ऐसा अजंपारूपी (बेचैनी वाला) क्रोध। लोग क्रोध को जीत लिया कहें तो वह कढ़ापारूपी (कुढ़न वाला) क्रोध को जीत लिया कहा जाएगा। सिर्फ़ बाहर दिखे ऐसा, दृश्यमान क्रोध को जीत लिया कहा जाएगा। लेकिन वास्तव में क्रोध जड़ मूल से पूर्णतया नहीं जीता गया है। अगर कोई ऐसा कहे कि "मैंने क्रोध को जीत लिया," तो फिर उनका मान बढ़ेगा। फिर मान को चोट पहुँचे, थोड़ा अपमान हो तो उसका रक्षण करने के लिए क्रोध खड़ा हो ही जाएगा। क्रोध बाहर नहीं निकले तो अंदर भयंकर अजंपा (बेचैनी) होता ही है। इसलिए एक को दबाँए तो दूसरा बढ़ जाता है।
परम पूज्य दादाश्री वैज्ञानिक दृष्टि से समाधान देते हुए कहते हैं, कि क्रोध वह परिणाम है। इसके कारणों को बदलने से क्रोध को बंद किया जा सकता है। ये कारण कौन-कौन से हैं और इन कारणों को खत्म करने के क्या उपाय हैं, उसकी भी विस्तृत समझ परम पूज्य दादाश्री हमें देते हैं।
परिणाम तो, कॉज़ेज़ बदलने से ही बदलेंगे!!
दादाश्री: एक भाई ने मुझ से कहा कि, ‘अनंत जन्मों से इस क्रोध को निकाल रहे हैं, फिर भी यह क्रोध जाता क्यों नहीं?’ तब मैंने कहा कि, ‘आप क्रोध निकालने के उपाय नहीं जानते हो।’ तब उसने कहा कि, ‘क्रोध निकालने के तो जो उपाय शास्त्र में लिखे हैं, वे सभी करते हैं, फिर भी क्रोध नहीं जाता।’ तब मैंने कहा कि, ‘सम्यक् उपाय होना चाहिए।’ तब कहा कि, ‘बहुत सम्यक् उपाय पढ़े हैं लेकिन उनमें से कुछ भी काम में नहीं आया।’ फिर मैंने कहा कि, ‘क्रोध को बंद करने का उपाय ढूँढना मूर्खता है क्योंकि क्रोध तो परिणाम है। जैसे कि आपने परीक्षा दी और रिज़ल्ट आया और मैं रिज़ल्ट को नाश करने का उपाय करूँ, उसके जैसी बात हुई। यह जो रिज़ल्ट आया, वह किसका परिणाम है, हमें उसे बदलने की ज़रूरत है।’
लोगों ने क्या कहा है कि, ‘क्रोध को दबाओ, क्रोध को निकालो।’ अरे, ऐसा क्यों करते हो? बिना बात के दिमाग़ बिगाड़ रहे हो! इसके बावजूद भी क्रोध निकलता तो है नहीं। फिर भी लोग कहेंगे कि, ‘नहीं साहब, थोड़ा-बहुत क्रोध दब गया है।’ अरे, जब तक वह अंदर है तब तक वह दबा हुआ नहीं कहा जा सकता। तब उन भाई ने कहा कि, ‘तो आपके पास और कोई उपाय है?’ मैंने कहा, ‘हाँ, उपाय है। आप करोगे?’ तब उन्होंने कहा, ‘हाँ’। तब मैंने कहा कि, ‘एक बार तो नोट करो कि इस जगत् में खास तौर पर किस पर अधिक क्रोध आता है?’ जहाँ-जहाँ क्रोध आता है, उसे ‘नोट’ कर लो और जहाँ क्रोध नहीं आता, उसे भी जान लो। एक बार लिस्ट में डाल दो कि इस व्यक्ति पर क्रोध नहीं आता। कुछ लोग उल्टा करते हैं फिर भी उन पर क्रोध नहीं आता और कुछ तो बेचारे सीधा कर रहे हों फिर भी उन पर क्रोध आ जाता है तो फिर कोई कारण तो होगा न?
प्रश्नकर्ता: उसके लिए मन के अंदर ग्रंथि बन गई होगी?
दादाश्री: हाँ, ग्रंथि बन चुकी है, उस ग्रंथि को छोड़ने के लिए अब क्या करें? परीक्षा तो दे चुके हो। जितनी बार उसके प्रति क्रोध होना है, उतनी बार हो ही जाएगा और उसके लिए ग्रंथि भी बन चुकी है लेकिन आगे से आपको क्या करना चाहिए? जिस पर क्रोध आता है उसके लिए मन नहीं बिगड़ने देना चाहिए। मन को सुधारना कि भाई, अपने प्रारब्ध के हिसाब से यह व्यक्ति ऐसा कर रहा है। वह जो कुछ कर रहा है, वह मेरे कर्म के उदय है इसलिए ऐसा कर रहा है। इस प्रकार मन को सुधार लेना। मन को सुधारते रहोगे और सामने वाले के प्रति मन सुधर जाएगा तो उसके प्रति क्रोध आना बंद हो जाएगा। कुछ समय तक, जो पिछला इफेक्ट है, पहले का इफेक्ट है, उतना इफेक्ट देकर फिर बंद हो जाएगा।
यह ज़रा सूक्ष्म बात है और सूक्ष्म है इसलिए लोगों को पता नहीं चल पाया। हर एक चीज़ का उपाय तो होता ही है न! जगत् बगैर उपाय के तो है ही नहीं न! जगत् तो परिणाम का ही नाश करना चाहता है। अत: क्रोध-माना-माया और लोभ का उपाय यह है। परिणाम को कुछ भी मत करो, उसके कॉज़ेज़ को खत्म करो तो ये सभी चले जाएँगे। यानी वह खुद विचारक होना चाहिए। वर्ना अगर अजागृत होगा तो किस प्रकार उपाय करेगा?
प्रश्नकर्ता: कॉज़ेज़ किस तरह खत्म करें, वह ज़रा फिर से समझाइए न!
दादाश्री: इस भाई पर मुझे क्रोध आ रहा हो तो फिर मैं नक्की करूँगा कि इस पर जो क्रोध आ रहा है वह, मैंने पहले जो उसके दोष देखे हैं, उसका परिणाम है। अब यह जो दोष कर रहा है, उन्हें यदि मन पर नहीं लूँगा तो फिर उसके प्रति क्रोध बंद होता जाएगा। लेकिन कुछ पूर्व के परिणाम हैं, उतने आ जाएँगे लेकिन आगे के दूसरे सब बंद हो जाएँगे।
प्रश्नकर्ता: दूसरे के दोष दिख जाते हैं, क्या उस वजह से क्रोध आता है?
दादाश्री: हाँ। वे दोष देखते हैं, उन्हें भी हमें जान लेना है कि ये भी गलत परिणाम हैं। अर्थात् जब इन गलत परिणामों को देखना बंद हो जाएगा, उसके बाद क्रोध बंद हो जाएगा। हमारा दोष देखना बंद हो गया तो फिर सबकुछ बंद हो गया।
परम पूज्य दादा भगवान क्रोध के मूल को पहचानकर वहीं से ही उसे समाप्त करने की सुंदर चाबी देते हैं। वे कहते हैं कि क्रोध को दबाने से वह खत्म नहीं होता। बल्कि क्रोध होने के पीछे कौन सा अहंकार काम कर रहा है, उसे पहचानने से क्रोध बंद हो सकता है।
“किस प्रकार के अहंकार से क्रोध होता है, इसका पता लगाना चाहिए। बेटे ने ग्लास फोड़ा तो क्रोध आ गया, वहाँ हमारा क्या अहंकार है? इस ग्लास का नुकसान होगा, ऐसा अहंकार है। नफा व नुकसान का अहंकार है हमारा! इसलिए नफा व नुकसान के अहंकार को, उस पर सोच-विचार करके, निर्मूल करो। गलत अहंकार को संभालकर रखने से क्रोध होता रहता है। क्रोध है, लोभ है, वास्तव में तो इन सभी की जड़ में अहंकार ही है।”
जैसे पहाड़ पर से पत्थर लुढ़कते-लुढ़कते सिर पर लगता है, तब कोई निमित्त नहीं दिखता इसलिए क्रोध नहीं आता। लेकिन जब वही पत्थर किसी बच्चे ने मारा हो तो हमें बच्चे के ऊपर क्रोध आता है। वास्तव में देखें तो पहाड़ पर से पत्थर का लुढ़कते-लुढ़कते आना और कोई बच्चा पत्थर मारे वह दोनों समान ही हैं। परम् पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, "यह जो आपके सामने आता है, वह तो निमित्त है और आपके ही कर्म का फल दे रहा है। वह निमित्त बन गया है। अब ऐसा समझ में आ जाए तो क्रोध कंट्रोल में आ जाएगा।"
जैसे हम रास्ते पर गाड़ी लेकर जा रहें हों और सामने से दूसरा वाहन रॉंग साइड से आ रहा हो, तो हम उसके साथ टकराते हैं? नहीं। क्योंकि, वहाँ हमें जागृति रहती है कि यहाँ टकराऊँगा तो मेरी मृत्यु होगी। क्रोध करने से भी हम सामनेवाले व्यक्ति के साथ टकराते ही हैं। कभी बोलकर या झगड़कर स्थूल टकराव करते हैं, तो कभी मन से भाव बिगाड़कर या दोषित देखकर सूक्ष्म रूप से टकराते हैं। एक्सिडेंट में तो देख सकें ऐसी मृत्यु होती है, जबकि क्रोध करने से उससे भी ज़्यादा नुकसान होता है।
हमारी इच्छा के अनुसार परिणाम नहीं आता तब अंदर अकुलाहट और क्रोध हो जाता है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि सामनेवाले की इच्छा के अनुसार करें तो हमारी आड़ाइयाँ चली जाती हैं। हम खेल में सभी पासे सीधे पड़ें ऐसी आशा रखकर पासा फेंकें और उसमें कुछ पासे उल्टे पड़ें तो हम दुःखी हो जाते हैं अथवा क्रोधित होते हैं। लेकिन "सभी पासे उल्टे पड़ें" ऐसा सोचकर पासा फेंकें तो जितने सीधे पड़ें उतने सही। इस तरह समझ से एडजस्टमेंट ले लें तो हमें अकुलाहट नहीं होगी।
जब हमारे विचारों की स्पीड, सामनेवाले के विचारों की स्पीड से ज़्यादा हो, तब सामनेवाले को हमारी बात नहीं पहुँचती और हमें अंदर अकुलाहट होती है अथवा सामनेवाले व्यक्ति के ऊपर क्रोध आ जाता है।
इसका उपाय बताते हुए परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि ऐसे समय में हमें अपने रेवोल्यूशन (विचारों की स्पीड) कम कर देने चाहिए। वे उदाहरण देते हैं कि एक लाइट डिम हो और दूसरी लाइट हाई वोल्टेज की हो, तो डिम लाइट का प्रकाश बढ़ाया नहीं जा सकता, लेकिन ज़्यादा प्रकाश वाली लाइट को डिम किया जा सकता है। उसी तरह, हमारे पास ज़्यादा समझ रूपी प्रकाश हो, तो सामनेवाले व्यक्ति के साथ ऐसा एडजस्टमेंट ले सकते हैं, जिससे मतभेद ना सर्जित हों। परिणामस्वरूप अंदर अकुलाहट और बाहर क्रोध उत्पन्न नहीं होता है।
क्रोध गलत है, जानते हुए भी, क्रोध हो जाए तो क्या करें?
तब खुद जिस भगवान को मानते हों, उनको याद करके प्रार्थना करना कि, “हे दादा भगवान! मुझ से ज़बरदस्त क्रोध हुआ, सामनेवाले को भारी कष्ट हुआ! उसके लिए माफी माँगता हूँ। आपके रूबरू खूब माफी माँगता हूँ।” ऐसे मन ही मन में सामनेवाले व्यक्ति के आत्मा को याद करके माफ़ी मांगिए, फिर ऐसी भूल ना हो ऐसा तय करें और उसके लिए भगवान से शक्तियाँ माँगिये। सच्चे दिल के पछतावे से देर सवेर भी इस दोष में से मुक्त हो जाते हैं।
कोई शिक्षक अपने विद्यार्थी के ऊपर गुस्सा करते हों तब कोई कहे कि, “इसे क्यों इतना डाँट रहे हैं?” तब अगर शिक्षक कहे कि, “यह डाँटने लायक ही है!” अर्थात् क्रोध का रक्षण हो गया। बच्चे के पिता क्रोध से भरकर अपने बच्चे के ऊपर हाथ उठाते हों तब किस तरह से क्रोध को रक्षण मिलता है। यह बात परम पूज्य दादा भगवान हमें समझाते हैं।
दादाश्री: बच्चों को मारे, खूब क्रोधित होकर पीटे तब अगर बीवी कहे कि ‘बेचारे बच्चे को इतना क्यों मारा?’ तब कहता है, ‘तू नहीं समझेगी, मारने योग्य ही है।’ इससे क्रोध समझ जाता है कि, ‘अरे वाह, मुझे खुराक दी! भूल है ऐसा नहीं समझता और मारने लायक है ऐसा अभिप्राय दिया है, इसलिए यह मुझे खुराक दे रहा है।’ इसे खुराक देना कहते हैं।
हम क्रोध को एन्करेज (प्रोत्साहित) करें, उसे अच्छा समझें, तो वह क्रोध को खुराक देना कहा जाएगा। क्रोध के लिए अगर ऐसा समझें कि ‘क्रोध गलत है’ तो ऐसा कहा जाएगा कि उसे खुराक नहीं दी। क्रोध की तरफदारी की, उसका पक्ष लिया, तो उसे खुराक मिल गई। खुराक से ही तो वह जी रहा है।
क्रोध गलत है यह जानते हुए भी हम क्रोध का इस तरह से रक्षण करते हैं, इसलिए क्रोध को एक्सटेंशन मिल जाता है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, किसी भी दोष का रक्षण करने से अगले बीस वर्षों तक वह दोष जारी रहता है। रक्षण करने से बहुत प्रयासों के बावजूद भी क्रोध काबू में नहीं आता है।
क्रोध से मुक्त होने का दूसरा एक उपाय है, आत्मज्ञान की प्राप्ति। आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद तीव्र क्रोध कषाय मन्द हो जाते हैं। अक्रम विज्ञान के माध्यम से इस काल में आत्मा का ज्ञान मिलना संभव हो गया है। जिसमें ज्ञानविधि के प्रयोग के बाद कई लोगों का अनुभव है कि उनका ८०% क्रोध खत्म हो जाता है।
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