जैसे एक ट्रेन उसकी नॉर्मल गति में मोशन में चल रही हो तो दिक्कत नहीं आती, लेकिन उसकी नोर्मैलिटी चूके तब एक्सीडेंट हो जाता है। उसी तरह, मनुष्य जब इमोशनल होते हैं तब उनके अंदर कई जीव मर जाते हैं। एक तरफ़ भले ख़ुद ऐसा माने कि, "मैं तो अहिंसा धर्म पालता हूँ, जीव मारने की हिंसा तो करता ही नहीं हूँ।" लेकिन दूसरी तरफ़, क्रोध करते हैं, तब मनुष्य को यह समझ में नहीं आता कि क्रोध होता है तब और इमोशनलपना में कई छोटे-छोटे जीव मरकर खत्म हो जाते हैं!
क्रोध करने से सूक्ष्म में हिंसा तो होती ही है, साथ ही साथ शरीर और मन के ऊपर इसका बहुत बुरा असर होता है। हम क्रोधित व्यक्ति को देखें तो उनकी आँखें लाल-लाल हो जाती हैं, शरीर गर्म हो जाता है, खुद काँपने लगता है। क्रोध के उग्र परमाणु शरीर के अंदर से बाहर निकलते हैं, इसकी शरीर के ऊपर असर पड़ता है। ज़रूरत से ज़्यादा ही क्रोध हो गया हो तो कई बार हार्टफेल, ब्रेन हेमरेज या पैरालिसिस की घटनाएँ भी घटती हैं, तो कभी व्यक्ति की मृत्यु भी हो जाती है।
बार-बार इमोशनल होने से या क्रोध करने से शरीर में पाचन क्रिया में मदद करने वाले बैक्टीरिया मर जाते हैं, दूसरे कई मदद करने वाले परमाणु मर जाते हैं और इसका बुरा असर शरीर के ऊपर पड़ता है।
आयुष्य का आधार सांसों की गिनती के ऊपर होता है। क्रोध में सांस बहुत ज़्यादा खर्च हो जाती है, इसलिए आयुष्य छोटा हो जाता है।
सिर्फ़ शारीरिक ही नहीं, बल्कि क्रोध को खुद काबू में नहीं कर सका तो व्यक्ति कमजोर होता जाता है और उसकी मानसिक स्थिति भी बिगड़ती जाती है।
कोई व्यक्ति हमारी इच्छा के अनुसार ना करे, या हमारा अपमान करे, नुकसान करे तब उनके ऊपर क्रोध आ जाता है। जैसे कि, नौकर के हाथ से काँच का कप टूट गया तो हम उसके ऊपर क्रोध कर देते हैं, इसलिए "उसे सीधा कर दिया।" ऐसा मन में संतोष तो हो जाता है। कप तो वापस आने वाले नहीं। इसलिए कप गया वह एक नुकसान, क्रोध करने से क्लेश खड़ा हुआ वह दूसरा नुकसान और सामनेवाले को दुःख हो और वह हमारे साथ बैर बाँधे कि "मैं गरीब हूँ, इसलिए मुझे ऐसा कह रहे हैं ना? मैं देख लूँगा।" वह तीसरा नुकसान। इसलिए क्रोध करने से एक ही काम में तीन-तीन नुकसान होते हैं।
एक बार बैर खड़ा हो फिर उस बैर से बैर निरंतर बढ़ता ही रहता है। जन्मोंजन्म से इस संसार में भटकने का मुख्य कारण बैर है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “शायद कभी प्रेम बंधे तो बाँधना लेकिन बैर मत बाँधना क्योंकि प्रेम बंधेगा तो वह प्रेम अपने आप ही बैर को खोद डालेगा। प्रेम की कबर तो बैर को खोद डाले ऐसी है लेकिन बैर की कबर कौन खोदेगा? बैर से तो बैर बढ़ता ही रहता है। निरंतर बढ़ता ही रहता है। बैर के कारण ही तो यह भटकन है सारी!”
जो क्रोध खुद को और सामनेवाले दोनो को दुःख देता है, उसे रौद्रध्यान कहा है। अज्ञान दशा में क्रोध करके मनुष्य पाप कर्म बाँधता है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य में से जानवर गति का बंध पड़ जाता है। परम पूज्य दादा भगवान क्रोध के बड़े ज़ोखिमों को समझाते हैं।
दादाश्री: “एक बार क्रोध करने पर, दो साल में जो कमाया हो, वह मिट्टी में मिल जाता है। क्रोध मतलब प्रकट अग्नि। उसे खुद को पता नहीं चलता है कि मैंने मिट्टी में मिला दिया क्योंकि बाहर की चीज़ों में कोई कमी नहीं आती लेकिन भीतर सब खत्म हो जाता है। अगले जन्म की जो सभी तैयारियाँ होंगी न, उनमें से थोड़ा खर्च हो जाता है और अगर ज़्यादा खर्च हो जाए तो क्या होगा? यहाँ जब मनुष्य योनि में था, तब रोटी खाता था, फिर वहाँ चारा खाने (जानवर में) जाना पड़ेगा। रोटी छोड़कर यों चारा खाने जाना पड़ेगा। क्या वह अच्छा कहलाएगा?”
महावीर भगवान के समय में चंडकौशिक नाग की बात हमें क्रोध के भयंकर जोखिम को समझाती है।
महावीर भगवान के समय में चंडकौशिक नाम का एक भयानक नाग था। इसके पिछले जन्म में, चंडकौशिक एक ऋषि थे। ऋषि ने बहुत कठोर तपस्या की थी। जिससे उनका स्वभाव बहुत ही अहंकारी और क्रोधी था। एक दिन, तपस्या करने के बाद जंगल से वापस लौटते समय, उनके पैर के नीचे मेंढक आ गया और उसकी मृत्यु हो गई। ऋषि के साथ उनका एक शिष्य भी चल रहा था। उसने यह देखा इसलिए गुरु को सलाह दी कि, “महाराज, इस मेंढक को मारने का पाप हुआ है, इसके बदले में आपको पछतावा करना चाहिए।” लेकिन अहंकार के रौफ़ में “तू मुझे कहने वाला कौन?” ऐसा कहकर ऋषि ने क्रोध किया और शिष्य की बात पर ध्यान नहीं दिया।

साधुओं में नियम था कि रोज रात को पूरे दिन में हुए पापों को याद करके उनके पछतावा किया जाए। सभी साधु नियम के अनुसार अपनी भूलों के लिए माफी माँग रहे थे। तब फिर से उस शिष्य ने ऋषि को मेंढक को मारने के बदले पछतावा करने को कहा। इसलिए ऋषि अत्यंत क्रोध से भर गए। और हाथ में लकड़ी थी वे शिष्य को मारने उसके पीछे दौड़े। रास्ते में ही एक खंभा था। क्रोध के आवेश में ऋषि को वह खंभा नहीं दिखा। उनका सिर उसके साथ टकराया और उसी स्थान में ही क्रोध ही क्रोध में ऋषि की मृत्यु हो गई। ऋषि ने कठोर तपस्या की थी, जिसके फलस्वरूप दूसरे जन्म में उन्हें देवगति प्राप्त हुई। उसके बाद फिर उनका मनुष्य देह में एक मुनि के रूप में जन्म हुआ।

मुनि खुद की मालिकी के विशाल खेत में रहते थे। उस खेत की उन्होंने खूब जतन से देखभाल की थी। उसमें कई फल और फूल उगाए थे। मुनि को खेत के प्रति इतनी ममता थी कि कोई भी व्यक्ति उनके खेत में आकर छोटी सी डाली भी तोड़े तो वे बहुत क्रोधित हो जाते। एक बार मुनि तपस्या कर रहे थे। वहाँ कुछ छोटे बच्चे खेत में खेलने के लिए आए। वे फूलों को तोड़कर मस्ती करने लगे और पत्थर फेंककर फल तोड़ने लगे। मुनि को पता चला तो वे तुरंत ही हाथ में कुल्हाड़ी लेकर बच्चों को सज़ा देने दौड़े। लेकिन रास्ते में एक गड्ढा आने से मुनि लड़खड़ाकर जमीन के ऊपर गिर पड़े। उनके हाथ में जो कुल्हाड़ी थी, वह हवा में उछली और मुनि के सिर पर ही गिर गई। मुनि का सिर फट गया और भयंकर यातना में मृत्यु होने से उनका चंडकौशिक नाग के अवतार में जन्म हुआ। चंडकौशिक ऐसा भयंकर नाग था जो रास्ते में आने वाले किसी को भी काट लेता और उसके जहर से वहाँ के वहाँ ही मृत्यु हो जाती।
एक बार चंडकौशिक नाग जहाँ रहता था, उसी घने जंगल में से भगवान महावीर विहार करने निकले। रास्ते में गाँव के लोगों ने भगवान से उस जंगल में ना जाने की खूब विनती की, क्योंकि नाग उसके रास्ते में आने वाले किसी को भी छोड़ता नहीं था। लेकिन भगवान ने उसी रास्ते से विहार करना शुरू किया। जब वे नाग के नज़दीक आए तब वह बहुत क्रोधित था। वह फन मारकर बार-बार भगवान को डरा रहा था, लेकिन महावीर भगवान अडिग रहे इसलिए नाग को ज़्यादा क्रोध आया और उसने प्रभु के पैर के अंगूठे में डंक मारा। महावीर भगवान तो तीर्थंकर थे, इसलिए उनके पैर से लाल के बदले सफेद खून बहने लगा। चंडकौशिक के मुहँ में थोड़ा सा खून गया। भगवान के परमाणु उसके अंदर जाते ही चंडकौशिक की परिणति बदल गई। महावीर भगवान पर जहर का कोई असर नहीं हुआ, उल्टा वे किसी भी हलचल के बिना शांत और स्थिर खड़े रहे। यह देखकर नाग को बहुत आश्चर्य हुआ। वह स्तब्ध होकर भगवान को देखता रहा, तब आँखों में अत्यंत करुणा और प्रेम से महावीर भगवान ने उनसे कहा, “जाग, जाग चंडकौशिक!! तू क्या कर रहा है उसके बारे में सोच!” इन शब्दों को सुनकर, चंडकौशिक नाग को तुरंत ही अपने पिछले दो जन्म याद आ गए और उसे ध्यान आया कि पिछले जन्म में अत्यंत क्रोध करने के परिणामस्वरूप उसकी क्या दशा हुई। वह तुरंत ही शांत हो गया। उसने भगवान के चरणों में सिर झुकाया और अपने दोषों के लिए खूब पश्चाताप किया। तभी से, चंडकौशिक नाग ने दृढ़ निश्चय किया कि, “मैं किसी भी जीव को किंचित् मात्र भी दुःख नहीं पहुँचाऊँगा।” और ज़हरीले मुँह को बिल में डाल कर जमीन पर पड़ा रहा।
जंगल में लोग आते, उनमें से कुछ लोग "इस नाग ने हमारे परिवारजनों की जान ली है", ऐसी घृणा से उसके ऊपर पत्थर फेंकते या लकड़ी से मारते लेकिन नाग किसी को भी डसता नहीं था। दूसरी तरफ़ नाग को मृत समझकर कुछ लोग उसकी पूजा करते और उसके पीने के लिए दूध रख जाते। नाग के ऊपर खून, दूध, घी वगैरह के कारण बहुत सारी चीटियाँ वहाँ आकर शरीर को काटने लगीं। नाग ने धीरज और शांति से समता रखी। नाग के सभी पाप कर्मों का क्षय हुआ और उसकी मृत्यु के बाद उसे देवगति प्राप्त हुई।
यह प्रसंग हमें क्रोध के परिणामस्वरूप होने वाली अधोगति के भयंकर जोख़िमों को समझाता है। चंडकौशिक नाग को तो महावीर भगवान की करुणा से खुद की यह भूल समझ में आ गई और उसकी मुक्ति का मार्ग खुल गया। इसी काल में ज्ञानी पुरुष परम पूज्य दादा भगवान भी हमें क्रोध हो जाने के बाद ह्रदय पूर्वक पश्चाताप करके वापस लौटने का मार्ग दिखाते हैं।
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