जो प्रेम बढ़े नहीं, घटे नहीं, वह प्रेम है, वे ही परमात्मा हैं!!! - परम पूज्य दादा भगवान

परम पूज्य दादा भगवान परमात्म प्रेम कैसा होता है, उसकी समझ देते हैं।
दादाश्री: सच्चा प्रेम जो चढ़े नहीं, घटे नहीं वह! हमारा ज्ञानियों का प्रेम ऐसा होता है, जो कम-ज़्यादा नहीं होता। ऐसा हमारा सच्चा प्रेम पूरे वल्र्ड पर होता है। और वह प्रेम तो परमात्मा है।
प्रश्नकर्ता: फिर भी जगत् में कहीं तो प्रेम होगा न?
दादाश्री: किसी जगह पर प्रेम ही नहीं है। प्रेम जैसी वस्तु ही इस जगत् में नहीं है। सभी आसक्ति ही है। उल्टा बोलते हैं न, तब तुरन्त पता चल जाता है।
अभी आज कोई आए थे विलायत से, तो आज तो उनके साथ ही बैठे रहने में अच्छा लगता है। उसके साथ ही खाना-घूमना अच्छा लगता है। और दूसरे दिन वह हमसे कहे, ‘नोनसेन्स जैसे हो गए हो।’ तो हो गया! और ‘ज्ञानी पुरुष’ को तो सात बार नोनसेन्स कहें तब भी कहेंगे, ‘हाँ भाई, बैठ, तू बैठ।’ क्योंकि ‘ज्ञानी’ खुद जानते हैं कि यह बोलता ही नहीं, यह रिकॉर्ड बोल रही है।
यह सच्चा प्रेम तो कैसा है कि जिसके पीछे द्वेष ही नहीं हो। जहाँ प्रेम में, प्रेम के पीछे द्वेष है, उस प्रेम को प्रेम कहा ही कैसे जाए? एकसा प्रेम होना चाहिए।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “कभी ज्ञानी पुरुष या भगवान हों तब प्रेम देखता है, प्रेम में कम-ज़्यादा नहीं होता, अनासक्त होता है, वैसा ज्ञानियों का प्रेम वही परमात्मा है।” जहाँ शुद्ध प्रेम होता है, वहाँ लोगों पर प्रभाव पड़ता है, लोगों को फ़ायदा होता है, नहीं तो फ़ायदा ही नहीं होता! जहाँ ऐसा परमात्म प्रेम प्राप्त होता है, फिर वहाँ खुदका कल्याण हो जाता है।
परमात्म प्रेम व्यवहार में कैसे देख सकते हैं, इसका सुंदर उदाहरण परम पूज्य दादा भगवान हमें यहाँ देते हैं।
दादाश्री: कोई बेटा अक्कल बगैर की बात करे कि ‘दादाजी, आपको तो मैं अब खाने पर भी नहीं बुलाऊँगा और पानी भी नहीं पिलाऊँगा’, तब भी इन ‘दादाजी’ का प्रेम उतरे नहीं और वह अच्छा भोजन खिलाया करें, तो भी ‘दादाजी’ का प्रेम चढ़े नहीं, उसे प्रेम कहा जाता है। यानी भोजन करवाए तो भी प्रेम और न करवाए तो भी प्रेम, गालियाँ दे तो भी प्रेम और गालियाँ न दे तो भी प्रेम, सब तरफ प्रेम ही दिखता है। इसलिए सच्चा प्रेम तो हमारा कहलाता है। वैसे का वैसा ही है न? पहले दिन जो था, वैसे का वैसा ही है न? अरे, आप मुझे बीस साल के बाद मिलो न तो भी प्रेम बढ़े-घटे नहीं, प्रेम वैसे का वैसा ही दिखे!
संसारिक प्रेम में तो, जहाँ से प्रेम की आशा रखते हैं, वहीं मार पड़ती है, पैसे से या अन्य तरीकों से लूटे जाते हैं। जबकि, परमात्म प्रेम में, जगत् से कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा या कामना नहीं होती।
ऐसा शुद्ध प्रेम कहाँ से प्राप्त होता है? इसका जवाब देते हुए परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "प्रेम, वह तो ‘ज्ञानी पुरुष’ से ठेठ भगवान तक होता है, उन लोगों के पास प्रेम का लाइसेंस होता है। वे प्रेम से ही लोगों को सुखी कर देते हैं। वे प्रेम से ही बांधते हैं वापिस, छूट नहीं सकते। वह ठेठ ज्ञानी पुरुष के पास, ठेठ तीर्थंकर तक सभी प्रेमवाले, अलौकिक प्रेम! जिसमें लौकिक नाम मात्र को भी नहीं होता।“
शुद्ध प्रेम में भेद नहीं होता। वह अभेद प्रेम है। वहाँ फिर बुद्धि चली जाती है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "हमेशा प्रेम पहले, बुद्धि को तोड़ डालता है या फिर बुद्धि प्रेम को आसक्त बनाती है। इसलिए बुद्धि हो वहाँ प्रेम नहीं होता और प्रेम हो वहाँ बुद्धि नहीं होती।"

जहाँ अभेद प्रेम उत्पन्न होता है, वहाँ बुद्धि और अहंकार समाप्त हो चुके होते हैं। फिर कुछ नहीं रहता। ममता नहीं होती, तभी प्रेमस्वरूप हो सकता है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, "हम तो अखंड प्रेमवाले! हमें इस देह पर ममता नहीं है। इस वाणी पर ममता नहीं और मन पर भी ममता नहीं है।"
जहाँ शुद्ध प्रेम होता है, वहाँ कोई पक्षपात नहीं होता। वहाँ संपूर्ण अभेदता होती है। शुद्ध प्रेम में आत्मीयता लगती है और तब सामने वाले का सर्वस्व रूप से कल्याण होता है। शुद्ध प्रेम में क्रोध-मान-माया-लोभ कुछ नहीं होते और ये रहते हैं, तब तक शुद्ध प्रेम नहीं होता। शुद्ध प्रेम हर एक पर एक समान और निरंतर बहता रहता है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, " अहंकार और शुद्ध प्रेम दो साथ में नहीं रह सकते। शुद्ध प्रेम कब आता है? अहंकार विलय होने लगे तब से शुद्ध प्रेम आने लगता है और अहंकार संपूर्ण विलय हो जाए, तब शुद्ध प्रेम की मूर्ति बन जाता है। शुद्ध प्रेम की मूर्ति ही परमात्मा है।"
परमात्म प्रेम किस दृष्टि से उत्पन्न होता है, उसकी चाबी परम पूज्य दादा भगवान हमें यहाँ देते हैं।
दादाश्री: यह प्रेम तो ईश्वरीय प्रेम है। ऐसा सब जगह होता नहीं न! यह तो किसी जगह पर ऐसा हो तो हो जाता है, नहीं तो होता नहीं न!
अभी शरीर से मोटा दिखे उस पर भी प्रेम, गोरा दिखे उस पर भी प्रेम, काला दिखे है उस पर भी प्रेम, लूला-लंगड़ा दिखे उस पर भी प्रेम, अच्छे अंगोवाला मनुष्य दिखे उस पर भी प्रेम। सब जगह सरीखा प्रेम दिखता है। क्योंकि उनके आत्मा को ही देखते हैं। दूसरी वस्तु देखते ही नहीं। जैसे इस संसार में लोग मनुष्य के कपड़े नहीं देखते, उसके गुण कैसे हैं वह देखते हैं, उसी तरह ‘ज्ञानी पुरुष’ इस पुद्गल को नहीं देखते। पुद्गल तो किसीका अधिक होता है किसी का कम होता है, कोई ठिकाना ही नहीं न!
और ऐसा प्रेम हो वहाँ बालक भी बैठे रहते हैं। अनपढ़ बैठे रहते हैं, पढ़े-लिखे बैठे रहते हैं, बुद्धिशाली बैठे रहते हैं, सभी लोग समा जाते हैं। बालक तो उठते नहीं। क्योंकि वातावरण इतना अधिक सुंदर होता है।
प्रेम के हथियार से सभी सरल हो जाते हैं। किसी को डाँटना नहीं पड़ता। परम पूज्य दादाश्री हमेशा कहते थे कि “मैं, लड़ना किसीसे नहीं चाहता, मेरे पास तो एक ही प्रेम का हथियार है, मैं प्रेम से जगत् को जीतना चाहता हूँ।” जहाँ पूरा संसार क्रोध-मान-माया-लोभ रूपी हथियार उठाकर सामने खड़ा हो जाता है, वहाँ परम पूज्य दादाश्री ने उन हथियारों को नीचे रख दिया है। जिनका शुद्ध प्रेम होता है, उनके शब्दों में वचन सिद्धि उत्पन्न हो जाती है। फिर वे सहज ही कह दें, तो शब्द तुरंत फल देने लगते हैं, फलीभूत हो जाते हैं।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “सच्चा प्रेम सब जगह सारे जगत् को पकड़ सकता है।” वे यह भी कहते हैं कि, “प्रेम में अभेदता होती है। प्रेमस्वरूप हो जाए तो सारे जगत् के साथ अभेदता कहलाती है।”
इस काल में हजारों लोगों को, ऐसे प्रेम के दर्शन परमात्म प्रेमस्वरूप दादा भगवान में हुए हैं। एक बार भी जिसने उनकी अभेदता चखी, उन्हें संसार की सभी जंजालों में जकड़े होने के बावजूद भी, परम पूज्य दादाश्री निरंतर निदिध्यासन या याद में रहते हैं।
परम पूज्य दादा भगवान हजारों लोगों को वर्षों से एक क्षण भी भूले नहीं जाते हैं, यह इस काल का महान आश्चर्य है!! हजारों लोग उनके संपर्क में आए, लेकिन उनकी करुणा और उनका प्रेम हर एक पर बरसता था, सभी ने अनुभव किया है। हर एक को ऐसा ही लगता था कि मुझ पर सबसे अधिक कृपा है, राजीपा है!
जिसने परमात्म प्रेम को चख़ लिया, उसके संसार के सभी घाव भर जाते हैं। परम पूज्य दादा भगवान परमात्म प्रेम के बारे में कहते हैं, "प्रेम को तो विटामिन कहा जाता है। प्रेम तो विटामिन कहलाता है। ऐसा प्रेम देखे न तब उसमें विटामिन उत्पन्न हो जाता है, आत्मविटामिन। देह के विटामिन तो बहुत दिन खाए हैं, पर आत्मा का विटामिन चखा नहीं न?! उसमें आत्मवीर्य प्रकट होता है। ऐश्वर्यपन प्रकट होता है।“ ऐसा आत्म ऐश्वर्य प्रकट होता है कि, खुद उस प्रेम ही प्रेम में सभी कचरा फेंकने के लिए तैयार हो जाता है। जब खुद के दोष उत्त्पन्न हों, तब उनका निपटारा कैसे करें? इसकी शक्तियाँ उनमें सहज रूप से प्रकट हो जाती हैं।
सामने वाला व्यक्ति कैसे आत्यांतिक कल्याण को प्राप्त करें, इसी निरंतर लक्ष के कारण, यह प्रेम और यह करुणा फलित होती दिखाई देती है। इस प्रेम का शब्दों में वर्णन करना मुश्किल है।
ज्ञानी पुरुष का प्रेम कैसा होता है, इसकी एक झलक हमें परम पूज्य दादा भगवान से मिलता है।
दादाश्री: यानी प्रेम तो 'ज्ञानी पुरुष' का ही देखने जैसा है! आज पचास हजार लोग बैठे हैं, पर कोई भी व्यक्ति थोड़ा भी प्रेम रहित हुआ नहीं होग। उस प्रेम से जी रहे हैं सभी।
प्रश्नकर्ता: वह तो बहुत मुश्किल है।
दादाश्री: पर हममें वैसा प्रेम प्रकट हुआ है तो कितने ही लोग हमारे प्रेम से ही जीते हैं। निरंतर दादा, दादा, दादा! खाने का नहीं मिले तो कोई हर्ज नहीं। यानी प्रेम ऐसी वस्तु है यह।
अब इस प्रेम से ही सब पाप उसके भस्मीभूत हो जाते हैं। नहीं तो कलियुग के पाप क्या धोनेवाले थे वे?

ज्ञानी पुरुष ऐसे बेजोड़ प्रेमावतार होते हैं कि, जगत में उनका कोई जोड़ नहीं मिलता। जिनका सम्पूर्ण अहंकार समाप्त हो चुका है, ऐसे संपूर्ण प्रेमावतार के पास खुदका सारा काम हो सकता है! एक बार वीतराग के, उनकी वीतरागता के दर्शन हो जाए, तो वहाँ खुद पूरी ज़िंदगी समर्पण हो जाता है। उस प्रेम को एक क्षण के लिए भी भूल नहीं पाता!
ऐसे प्रेमावतार ज्ञानी पुरुष का प्रेम जब हम चखते हैं, तब हमें भी उनके प्रति प्रेम ही छलकता है। अनंत अवतार से जिसकी खोज थी, ऐसा ज्ञान जिनसे मिला, जिनके आधार से भवसागर का किनारा दिखाई दिया, ऐसे ज्ञानी पुरुष के प्रति का प्रेम ही प्रशस्त राग कहलाता है, जिसकी समझ परम पूज्य दादा भगवान हमें देते हैं।
प्रश्नकर्ता: इस ज्ञान के बाद हमें जो अनुभव होता है, उसमें कुछ प्रेम, प्रेम, प्रेम छलकता है, वह क्या है?
दादाश्री: वह प्रशस्त राग है। जिस राग से संसार के राग सारे छूट जाते हैं। ऐसा राग उत्पन्न हो तब संसार में जो भी दूसरे राग सभी जगह लगे हुए हों, वे सब वापिस आ जाते हैं। इसे प्रशस्त राग कहा है भगवान ने। प्रशस्त राग, वह प्रत्यक्ष मोक्ष का कारण है। वह राग बांधता नहीं है। क्योंकि उस राग में संसारी हेतु नहीं है। उपकारी के प्रति राग उत्पन्न होता है, वह प्रशस्त राग। वह सभी रागों को छुड़वाता है।
ज्ञानी पुरुष ऐसे ही होते हैं कि, उनके प्रति सहज प्रेम छलकता है। लेकिन, हमारा प्रेम जितना संसार के प्रति बढ़ता है, उतना ही ज्ञानी पुरुष के प्रति प्रेम घटता जाता है। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “हम प्रेम से बंधे हुए हैं। तो आप जब तक प्रेम रखोगे तब तक बंधे हुए हैं। आपका प्रेम छूटा कि हम छूटे। हम प्रेम से बंधे हुए हैं। आपका संसार के प्रति प्रेम झुक गया तो अलग हो जाओगे और आत्मा के प्रति प्रेम रहा तो बंधे हुए हैं।”
वे यह भी कहते हैं, “अहंकारी को खुश करने में कुछ समय लगे ऐसा नहीं है, मीठी-मीठी बातें करो तो ही खुश हो जाता है और ज्ञानी तो मीठी बातें करो तब भी खुश नहीं होते। कोई भी साधन, जगत् में ऐसी कोई चीज़ नहीं कि जिससे ‘ज्ञानी’ खुश हों। मात्र अपने प्रेम से ही खुश होते हैं। क्योंकि वे सिर्फ प्रेमवाले हैं। उनके पास प्रेम के अलावा कुछ है ही नहीं। पूरे जगत् के साथ उनका प्रेम है।”
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