कोई हमारे ऊपर गुस्सा करे तो हमसे सहन होता है? हमारे ऊपर कोई गुस्सा करे वह हमें सहन नहीं होता हो और हम पूरे दिन दूसरों पर गुस्सा करते रहते हों तो यह कहाँ का न्याय है? खुद को दूसरे की जगह पर रखकर देखना, उसी का नाम मानव धर्म है। किसी व्यक्ति के ऊपर क्रोध आए तब हमें इतना सोचना चाहिए कि, "उनकी जगह पर मैं होता तो मेरी क्या दशा होती?"
वास्तव में तो क्रोध करने से पहले ही ऐसा विचार आ जाए, कि "मेरे ऊपर कोई ऐसे क्रोध करे तो मुझे अच्छा लगेगा या नहीं लगेगा?" तो क्रोध वहीं का वहीं शांत हो जाएगा। हमें जैसा अच्छा लगे, वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ करना वही मानव धर्म की नींव है।
अधिकतर कोई व्यक्ति हमारी अपेक्षा के अनुसार ना करे, हमारी मनमानी ना हो, हमारा अपमान करे तब हमें उनके ऊपर क्रोध आ जाता है। जिस व्यक्ति के ऊपर क्रोध आता है, उनके लिए हमें मन नहीं बिगड़ने देना चाहिए। मन में नेगेटिव आएँ तो उन्हें उल्टा पॉज़िटिव करें कि "अपने प्रारब्ध के हिसाब से यह व्यक्ति ऐसा कर रहा है। वह जो कुछ कर रहा है वह मेरे ही कर्म के उदय है, वह तो सिर्फ़ निमित्त है।" इस प्रकार हमें मन को सुधारते रहना चाहिए। सामनेवाले व्यक्ति के लिए हमारा मन सुधर जाएगा तो फिर उनके ऊपर क्रोध आना बंद हो जाएगा। एकदम से बंद नहीं होगा। कुछ समय तक पिछला इफेक्ट देकर फिर धीरे-धीरे क्रोध बंद हो जाएगा।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “इस भाई पर मुझे क्रोध आ रहा हो तो फिर मैं नक्की करूँगा कि इस पर जो क्रोध आ रहा है वह, मैंने पहले जो उसके दोष देखे हैं, उसका परिणाम है। अब यह जो दोष कर रहा है, उन्हें यदि मन पर नहीं लूँगा तो फिर उसके प्रति क्रोध बंद होता जाएगा। लेकिन कुछ पूर्व के परिणाम हैं, उतने आ जाएँगे लेकिन आगे के दूसरे सब बंद हो जाएँगे।"
वे इस बात का सार निकालते हुए कहते हैं कि, "हमारा दोष देखना बंद हो गया तो फिर सबकुछ बंद हो गया।"
परम पूज्य दादा भगवान व्यवहार का एक सुंदर और तार्किक उदाहरण देकर सामनेवाले को निर्दोष देखने की दृष्टि विकसित करने की चाबी देते हैं।
प्रश्नकर्ता: मेरा कोई नज़दीकी रिश्तेदार है उस पर मैं क्रोधित हो जाता हूँ। वह उसकी दृष्टि से शायद सही भी हो लेकिन मैं अपनी दृष्टि से क्रोधित हो जाता हूँ, तो किस वजह से क्रोधित हो जाता हूँ?
दादाश्री: आप आ रहे हो और इस मकान पर से एक पत्थर सिर पर आ गिरा और खून निकला, तो क्या उस समय बहुत क्रोध करोगे?
प्रश्नकर्ता: नहीं, वह तो हैपन (हो गया) है।
दादाश्री: नहीं, लेकिन वहाँ पर क्रोध क्यों नहीं करते? यदि खुद ने किसी को देखा नहीं तो क्रोध कैसे होगा?
प्रश्नकर्ता: किसी ने जान-बूझकर नहीं मारा।
दादाश्री: और अभी बाहर जाएँ और कोई लड़का यदि पत्थर मारे, वह लग जाए और खून निकलने लगे तो उस पर क्रोध करते हैं, वह क्यों? ‘उसने मुझे पत्थर मारा, और खून निकला’ इसलिए क्रोध करते हैं कि ‘तूने क्यों मारा?’ और जब पहाड़ पर से लुढ़कता-लुढ़कता पत्थर आकर लगे और माथे से खून बहने लगे, तो देखता है लेकिन क्रोध नहीं करता।
उनके मन में ऐसा लगता है कि ‘यही कर रहा है।’ कोई व्यक्ति जान-बूझकर मार ही नहीं सकता। अर्थात् पहाड़ पर से पत्थर का लुढ़कना और मनुष्य का पत्थर मारना, दोनों एक जैसा ही है। लेकिन भ्रांति से ऐसा दिखाई देता है कि यह कर रहा है। इस वर्ल्ड में किसी मनुष्य को संडास जाने की भी शक्ति नहीं है।
यदि हमें पता चले कि किसी ने जान-बूझकर नहीं मारा तो वहाँ क्रोध नहीं करते हैं। फिर कहता है, ‘मुझे क्रोध आ जाता है। मेरा स्वभाव क्रोधी है।’ अरे, स्वभाव से क्रोध नहीं आता। वहाँ पुलिस वाले के सामने क्यों नहीं आता? पुलिस वाला डाँटे उस समय क्यों क्रोध नहीं आता? उसे पत्नी पर गुस्सा आता है, बच्चों पर क्रोध आता है, पड़ौसी पर, ‘अन्डर हैन्ड’ (मातहत) पर क्रोध आता है लेकिन ‘बॉस’ पर क्यों नहीं आता? यों ही स्वभावत: मनुष्य को क्रोध नहीं आ सकता। यह तो उसे अपनी मनमानी करनी है।
प्रश्नकर्ता: कैसे कंट्रोल करें?
दादाश्री: समझ से। यह जो आपके सामने आता है, वह तो निमित्त है और आपके ही कर्म का फल दे रहा है। वह निमित्त बन गया है। अब ऐसा समझ में आ जाए तो क्रोध कंट्रोल में आ जाएगा। जब ऐसा देखते हो कि पत्थर पहाड़ पर से गिरा, तब क्रोध कंट्रोल में आ जाता है। तो इसमें भी समझ लेना है कि भाई, यह सब पहाड़ जैसा ही है।
रास्ते में कोई गाड़ी वाला गलत रास्ते से आपके सामने आ जाए, तो लड़ते नहीं हो न? क्रोध नहीं करते हो न? क्यों? आप टक्कर लगाकर तोड़ देते हो उसे? ऐसा करते हो? नहीं। तो वहाँ क्यों नहीं करते? वहाँ समझ जाता है कि मैं मर जाऊँगा। अरे भाई, उससे ज़्यादा तो यहाँ क्रोध करने में मर जाते हो लेकिन यह चित्र नज़र नहीं आता और वह खुला दिखाई देता है, इतना ही फर्क है! वहाँ रोड पर सामना नहीं करता? क्रोध नहीं करता सामने वाले की भूल हो फिर भी?
प्रश्नकर्ता: नहीं।
दादाश्री: उसी तरह जीवन में भी समझ लेने की ज़रूरत है।
नौकरी-धंधे में कोई बड़ा नुकसान हो गया हो, या घर में कोई कीमती चीज़ टूट गई हो तब नुकसान करने वाले व्यक्ति के ऊपर क्रोध आ जाता है। चीज़ तो टूटी ही साथ में क्रोध से व्यक्ति का मन भी टूट गया। उस समय बुद्धि से भी ऐसा निष्कर्ष निकाल सकते हैं, कि क्रोध करने से नुकसान की भरपाई हो जाएगी? क्या टूटी हुई चीज़ जुड़ जाएगी?
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "बुद्धि यदि विकसित हो, समझ वाली हो तो कहीं भी कोई झगड़ा होगा ही नहीं।"
इसलिए यदि क्रोध करने से नुकसान को फ़ायदे में बदला जा सकता हो, तो समझ सकते हैं कि क्रोध करना चाहिए। लेकिन अगर फ़ायदा नहीं हो रहा हो तो उसे क्रोध किए वगैर वैसे ही चला लेना चाहिए।
हरएक व्यक्ति को अपनी धारणा के अनुसार काम करना होता है और जब सामनेवाला हमारी धारणा के अनुसार नहीं करता, तब क्रोध आ जाता है। हमारी धारणा के अनुसार ना हो पाए तब हमें विचार आना चाहिए कि, यदि सभी अपनी-अपनी धारणा के अनुसार करने जाएँगे, तो आमने-सामने बर्तन टकराएँगे और किसी के हिस्से में कुछ नहीं आएगा।
इसके बजाय, हमें कोई धारणा बनानी ही नहीं है, इसलिए इसके विरुद्ध में कुछ होगा ही नहीं। और यदि धारणा बनानी ही हो तो उल्टी धारणा बनाना। जैसे कि, खेल में सभी पासे सीधे पड़ें, ऐसी धारणा बनाई हो वहाँ सभी पासे उल्टे पड़ें ऐसी धारणा बनाना क्योंकि एक पासा उल्टा पड़ जाए तो भी दुःख नहीं होगा और क्रोध नहीं आएगा।
जब हमारे विचारों की स्पीड सामनेवाले के विचारों की स्पीड से ज़्यादा हो, तब सामनेवाले तक हमारी बात नहीं पहुँचती और तालमेल टूट जाता है। विचारों की स्पीड को परम पूज्य दादा भगवान रिवोल्यूशन कहते हैं। यदि हमारे विचारों का रिवोल्यूशन ५००० हो और सामने वाले का रिवोल्यूशन ५०० हो तब हमें सामनेवाले के लेवल पर जाकर उन्हें समझाना नहीं आता और धीरज की कमी हो जाती है। परिणामस्वरूप हम क्रोध कर देते हैं।
इसका उपाय बताते हुए वे कहते हैं कि ऐसे समय में हमें अपने रिवोल्यूशन कम कर देने चाहिए और सामनेवाले के लेवल पर जाकर बात करनी चाहिए। यानी कि, सामनेवाले को समझ में आए उस स्पीड में, उन शब्दों में अपनी बात कहनी चाहिए और बीच-बीच में पूछना चाहिए कि “आपको समझ में आया?” यदि सामनेवाले को समझ में न आए तो तरीका बदलकर फिर से बात करनी चाहिए। ऐसे एडजस्टमेंट लेकर बात करने से हमारा क्रोध के ऊपर काबू रहेगा और सामनेवाले का मन भी नहीं टूटेगा।
बाहर उपदेश सुनने जाते हैं तो वहाँ कहते हैं कि क्रोध के सामने दया रखो, शांति रखो, समता रखो, क्षमा रखो। तब हमारे मन में आता है कि "अरे! मुझे क्रोध आता रहता है और तुम कहते हो कि क्षमा रखो, लेकिन मुझे किस तरह क्षमा रखनी चाहिए?" इसलिए उपदेश बेकार चला जाता है।
परम पूज्य दादा भगवान बहुत सरल और सटीक उपाय बताते हैं।
दादाश्री: आपको क्रोध आ जाए तो आप इस प्रकार मन में पछतावा करना कि ‘मेरी कौन सी कमज़ोरी कि वजह से ऐसा क्रोध हो जाता है? यह मुझ से गलत हो गया।’ ऐसे पछतावा करना और यदि कोई गुरु हों तो उनकी मदद लेना और ऐसा निश्चय करना कि फिर से ऐसी कमज़ोरी खड़ी न हो। आप अब क्रोध का बचाव मत करना बल्कि उसका प्रतिक्रमण करना।
यानी दिन में कितने अतिक्रमण होते हैं और किसके साथ हुए, उन्हें नोट करते रहना और उसी समय प्रतिक्रमण कर लेना।
प्रतिक्रमण में क्या करना होगा? आपको क्रोध हुआ और सामने वाली व्यक्ति को दु:ख हुआ तो उसके आत्मा को याद करके उससे क्षमा माँग लेना। अर्थात् जो हुआ उसकी क्षमा माँग लेना और फिर से नहीं करूँगा ऐसी प्रतिज्ञा करना। और आलोचना अर्थात् क्या कि हमारे पास दोष ज़ाहिर कर देना कि मुझ से यह दोष हो गया है।
यह सभी उपाय हमें अलग-अलग संबंधों में और अलग-अलग परिस्थितियों में व्यक्तियों के ऊपर क्रोध करने से रोकते हैं। फिर भी कुछ नज़दीकी संबंधों में क्रोध आए बिना नहीं रहता। जैसे कि, पति-पत्नी, सहाध्यायी, बॉस-नौकर, माता पिता-बच्चे आदि। ऐसे समय में संबंधों के स्वरूप को नज़दीक से पहचानकर, सामनेवाले की प्रकृति के साथ एडजस्ट होकर उसी के अनुसार सामनेवाले के साथ व्यवहार करने से क्रोध का निवारण किया जा सकता है। हमें इस लेख में हरएक संबंधों में समाधान की सुंदर चाबियाँ मिलती हैं।
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