पति-पत्नी में क्रोध से दुःख देने के सबसे बड़े कारणो में, एक-दूसरे के प्रति अपेक्षाएँ, अभिप्राय, नासमझी और उसके परिणामस्वरूप होने वाले टकराव, आते हैं। कई बार व्यक्ति अपनी मनमानी सामनेवाले के ऊपर करने जाता है और जब सामनेवाला नहीं मानता तब क्रोध का हथियार उठा लिया जाता है। फिर कुदरत का नियम है कि, एक-दूसरे से विपरीत प्रकृति एक ही घर में इकट्ठा होती है। जैसे कि, एक को ठंडी अच्छी लगती है तो दूसरे को गर्मी। एक को बाहर घूमने का शौक होता है तो दूसरे को घर में रहने का। छोटी या बड़ी बातों में हसबैंड-वाइफ के बीच मतभेद खड़े हो जाते हैं और उनका समाधान लाना दोनों को अनुकूल नहीं आता, इसलिए व्यवहार और ज़्यादा उलझने लगता है। पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के साथ एडजस्टमेंट नहीं ले पाते, इसलिए एक-दूसरे प्रति अकुलाहट, द्वेष और क्रोध हो जाता है।
पति-पत्नी के बीच क्रोध हो जाने के पीछे कौन से कारण काम करते हैं और उसमें किस समझदारी से काम लें जिससे वैवाहिक संबंधों में क्रोध की समस्या का निवारण किया जा सके, उसके अनेक उपाय परम पूज्य दादा भगवान हमें बताते हैं।
हर एक समस्या के पीछे कोई न कोई मान्यता काम करती रहती है। जब तक वह मान्यता खत्म नहीं होती तब तक समस्या खड़ी की खड़ी ही रहती है।
ऐसी ही एक मान्यता होती है कि, "पति-पत्नी में झगड़े तो होते ही हैं, तभी प्रेम बढ़ता है!" इस मान्यता पर परम पूज्य दादा भगवान की वाणी से स्पष्टीकरण दिया है।
प्रश्नकर्ता: पति-पत्नी के बीच थोड़ा-बहुत क्रोध तो होना ही चाहिए न?
दादाश्री: नहीं। ऐसा कोई नियम नहीं है। पति-पत्नी के बीच में तो बहुत शांति रहनी चाहिए। यदि दु:ख रहे तो वे पति-पत्नी कहे ही नहीं जाएँगे। सच्ची फ्रेन्डशिप में दु:ख नहीं होता जबकि यह तो सब से बड़ी फ्रेन्डशिप है! यहाँ क्रोध नहीं होना चाहिए। यह तो लोगों ने ज़बरदस्ती दिमाग़ में डाल दिया है, खुद को होता है इसलिए कह दिया कि नियम ऐसा ही है, कहते हैं! पति-पत्नी के बीच तो बिल्कुल दु:ख नहीं होना चाहिए, भले ही बाकी सभी जगहों पर हो जाए।
हम सभी अक्सर यह भी सुनते हैं कि "घर में बर्तन होंगे तो खड़केंगे ही!" लेकिन परम पूज्य दादा भगवान इस लौकिक मान्यता के विपरीत एक नई ही दृष्टि देते हैं।
दादाश्री: रोज़-रोज़ बर्तन खड़केंगे तो कैसे अच्छा लगेगा? यह तो समझता नहीं है, इसलिए चलता है। जाग्रत हो उसे तो, एक ही मतभेद पड़े तो रातभर नींद नहीं आए! इन बर्तनों (मनुष्यों) के तो स्पंदन हैं, इसलिए रात को सोते-सोते भी स्पंदन करते रहते हैं कि ‘ये तो ऐसे हैं, टेढ़े हैं, उल्टे हैं, नालायक हैं, निकाल देने जैसे हैं।’ और उन बर्तनों के कोई स्पंदन हैं? हमारे लोग बिना समझे ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाते हैं कि दो बर्तन साथ में होंगे तो खड़केंगे! अरे, हम क्या बर्तन हैं कि हम खड़कें?
उदाहरण के तौर पर, पति के ऑफिस जाने का समय हुआ हो और चाय बनने में देर हो गई हो, तो वह सुबह-सुबह उठकर गुस्सा करता है कि “मेरी चाय कहाँ है? क्यों देर हुई?” और टेबल के ऊपर तीन बार हाथ ठोकें तो जिम्मेदारी किसकी? पत्नी उस समय तो नहीं बोलती, लेकिन अंदर उसके मन में स्पंदन खड़े हो जाते हैं कि, “उस दिन मुझे ऐसा कहा था, मैं देख लूँगी!” और समय आने पर इसका बदला लेती है। आजकल पत्नियाँ भी नौकरी करती हैं, खुद भी पैसे कमाती हैं। कई बार पत्नी भी पति के ऊपर रौब मारते हुए कहती है कि, “आपके पास तो अक्कल ही नहीं है! आपको कुछ समझ में ही नहीं आता!” इसलिए फिर पति का भी अहंकार भड़क उठता है। इस तरह आमने-सामने स्पंदनों का प्रवाह चलता ही रहता है और दोनों के बीच मतभेद की दीवार खड़ी होती जाती है।
इसलिए सबसे पहले तो हमारी मान्यता में यह नहीं होना चाहिए कि पति-पत्नी के बीच क्रोध करना ज़रुरी है।
सामान्यतौर पर पत्नियों की शिकायत होती है कि पति को व्यवसाय में नुकसान हो गया हो या नौकरी में बॉस गुस्सा हुए हों तब घर में सारा गुस्सा पत्नी के ऊपर ही निकालते हैं। पति भी शिकायत करते हैं कि पत्नि की घर में सास-ससुर के साथ कुछ खिट-पिट हो गई हो या बच्चे बात न मानते हों, तो पति के घर में कदम रखते ही पत्नी सारा गुस्सा उसके ऊपर निकालती है। जिस प्रकार प्रेशर कुकर में भाप का दबाव बढ़ जाने से वह फट जाता है उसी प्रकार प्रेशर के समय दूसरे व्यक्तियों के ऊपर क्रोध हो जाता है।
तब अगर यह ध्यान में रहे कि दुनिया में सबसे कीमती में कीमती कोई चीज़ है तो वह है अपने मन की शांति। छोटी-छोटी बातों में अशांति हो, आर्तध्यान, रौद्रध्यान हो तो घर की शांति भंग हो जाती है। इसलिए, बाहर की किसी चीज़ को इतनी वैल्यू नहीं देनी चाहिए जिससे हमारे घर में अशांति हो।
दूसरा, हमारे कषाय ही हमें क्रोध करवाते हैं। व्यवसाय में लाभ पाने का लोभ था, इसलिए, नुकसान होने पर क्रोध आया। नौकरी में मान मिलने की आशा थी, इसलिए बॉस ने अपमान किया तो क्रोध आया। क्रोध के कारणों पर अगर हमारी जागृति हो तो निमित्त निर्दोष दिखता है, बुद्धि शांत पड़ती है और दूसरे व्यक्तियों पर गुस्सा नहीं निकलता है।
पति-पत्नी में कई बार बच्चों को लेकर भी क्रोध हो जाता है। बेटे पर राग हो, इसलिए उसे दुःख देने वाले के प्रति द्वेष हो जाता है। जैसे कि, पति अपने बच्चे पर गुस्सा करे तो पत्नी को पति के प्रति द्वेष होता है और यदि पत्नी बच्चों के साथ किच-किच करे तो पति को पत्नी के प्रति द्वेष होता है। परिणामस्वरूप बच्चों की उपस्थिति में ही पति-पत्नी एक-दूसरे पर चिढ़ जाते हैं।
ऐसे समय में, पति-पत्नी को एक-दूसरे की गलतियाँ नहीं निकालनी चाहिए। उल्टा शांति से समझाना चाहिए कि "बच्चे अपनी समझ के अनुसार करते हैं। हमें उन्हें समझाकर काम लेना चाहिए। अगर घर में ही उन्हें डाँटेंगे तो वे लोग कहाँ जाएँगे?" इस प्रकार प्रेम से काम लेना चाहिए। पति-पत्नी को बच्चों की उपस्थिति में कभी भी एक-दूसरे पर गुस्सा नहीं करना चाहिए।
औरंगाबाद में एक मुस्लिम लड़की परम् पूज्य दादा भगवान के पास आई थी। उसकी सगाई तय हो गई थी। परम पूज्य दादाश्री ने उससे पूछा कि शादी के बाद पति के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए? उसके साथ तालमेल बैठेगा या नहीं ? यह सोचकर रखा है? शादी के बाद की कोई तैयारियाँ आपने करके रखी हैं ? तब लड़की ने जवाब दिया कि, “मैंने सभी तैयारियाँ करके रखी हैं। वह ज़रा भी ऐसे बोलेगा तो मैं सामने से वैसा ही जवाब दूँगी। वह ऐसा कहेगा, तो मैं ऐसा कहूँगी, वह ऐसा कहेगा तो... एक–एक बात के सभी जवाब मेरे पास तैयार हैं !” परम् पूज्य दादाश्री कहते हैं, जैसे युद्ध में आमने-सामने तैयारियाँ करते हैं, वैसे ही उसने मतभेद खड़ा करने की तैयारियाँ करके रखी थीं। वह (पति) झगड़ा करे उसके पहले ही (पत्नी) पलटवार करती है! सामनेवाला ऐसे भड़काए, तो हमें भी वैसे ही जवाब देना है, वह उस ओर तीर छोड़े, तो हमें इस ओर छोड़ना है। यह तो घर में ही शीत युद्ध शुरू कर दिया, यह शांत होगा? इस तरह तो छह महीने में ही तलाक हो जाएगा और यदि तलाक नहीं चाहिए तो उसके लिए यह तरीका गलत है।
फिर उन्होंने लड़की को समझाया कि, ”उसका मूड देखकर चलना, माने उसका मूड देखना और जब मूड नहीं हो, तो अंदर अल्लाह का नाम लिया करना। मूड बदलने पर हम उसके साथ बातचीत चालू करें। वह मूड में नहीं हो और तू परेशान करेगी तो आग लग जायेगी। तू उसे निर्दोष देखना। वह तुझे खरी-खोटी सुनायें तो भी तू शांति रखना, प्रेम सच्चा होना चाहिए। आसक्ति होने पर तो छह-बारह महीनों में फिर टूट ही जाता है। प्रेम सहनशीलता वाला होना चाहिए, एडजस्टेबल होना चाहिए।”
हम शांत रहें और सामनेवाला लड़ने आए, तब क्या करना चाहिए? इस सवाल के जवाब में परम् पूज्य दादा भगवान ने कहा कि, "तू कुछ भी मत करना, जब वह इस ओर तीर चलाए तब अपनी स्थिरता रखकर ‘दादा, दादा’ (या जिस भी भगवान में श्रद्धा हो उन भगवान का) करती रहना। फिर उस ओर तीर चलाए तब स्थिरता रखकर ‘दादा, दादा’ करना। तू एक भी तीर मत चलाना’।" ऐसी अलौकिक समझ एक ज्ञानी पुरुष के सिवाय इस दुनिया में कौन दे सकता है?
पति या पत्नी में से कोई एक गरम हो जाए तो दूसरे को नरम हो जाना चाहिए। नरम किस तरह से हों? पति गरम होकर आए तब उन्हें गर्मागर्म चाय हाथ में दें, तो ठंडे हो जाएँगे। हमें सामने कोई भी शिकायत या रिएक्शन दिए बगैर पॉज़िटिव करके प्रेम से वातावरण बदल देना। पति रौबदार थे तभी तो आपने उन्हें पसंद किया, तो अब निभा लेना।
पत्नी क्रोध करे, तब पति को क्या करना चाहिए, उसकी समझ देते हुए परम पूज्य दादा भगवान एक सुंदर प्रसंग का वर्णन करते हैं। वे एक भाई के घर गए थे। जो राजमिस्त्री का काम करते थे और उनके घर में दो ही रूम थे। दादाश्री ने उनसे पूछा, "क्या बीवी तुझे परेशान नहीं करती?’ तब कहने लगा, ‘बीवी को क्रोध आ जाता है लेकिन मैं क्रोध नहीं करता हूँ’ मैंने पूछा, ‘ऐसा क्यों?’ उसने कहा, ‘यदि वह क्रोध करे और मैं भी क्रोध करूँ, तब तो फिर इन दो रूमों में, मैं कहाँ सोऊँ और वह कहाँ सोए?!’ वह उस ओर मुँह करके सो जाए और मैं भी इस ओर मुँह करके सो जाऊँ, ऐसी हालत में तो मुझे सुबह चाय भी अच्छी नहीं मिलेगी! वही मुझे सुख देती है। उसी की वजह से मेरा सुख है। मैंने पूछा, ‘बीवी कभी क्रोध करे तो?’ उसने कहा, ‘‘उसे मना लेता हूँ। ‘यार, जाने दे न, मेरी हालत मैं ही जानता हूँ’, ऐसा-वैसा करके मना लेता हूँ लेकिन उसे खुश रखता हूँ। बाहर मारपीट करके आ जाता हूँ लेकिन घर में उससे मारपीट नहीं करता।"
सामान्य तौर पर, जब खाना अच्छा नहीं बना हो तब पति, पत्नी के ऊपर गुस्सा हो जाता है। परम पूज्य दादा भगवान के खुद के वैवाहिक जीवन में भी ऐसे बहुत से प्रसंग हुए थे। लेकिन वे उनकी पत्नी हीराबा के ऊपर कभी गुस्सा नहीं होते थे और फिर भी उनका प्रभाव पड़ता था! ज्ञानी पुरुष का जीवन व्यवहार और उसके पीछे उनकी समझ हमें बहुत उपयोगी साबित होती है। ऐसी ही एक समझ यहाँ उजागर होती है।
प्रश्नकर्ता: हीराबा से रसोई ठीक से नहीं बनी हो क्या तब भी आप नहीं लड़ते ?
दादाश्री: रसोई ठीक से नहीं बनी हो, इस पर तो नहीं, पर यदि वे अंगारे लेकर यहाँ से गुजरतीं हों और मुझ पर पड़ें, तब भी नहीं लड़ता।
प्रश्नकर्ता: तब फिर वे आप से घबरातीं क्यों है?
दादाश्री: वही, मैं नहीं लडूं इसलिए घबराहट होने लगे। लड़ने से मनुष्य का वजन (मान-मर्यादा) नहीं रहता। जैसे कुत्ते के भौंकने पर हम समझ जायें कि ये तो व्यर्थ ही भौंका करे। नहीं बोलने से प्रभाव पड़ता है क्यों कि 'बुड्ढा मर्यादा में तो बहू घुंघटे में', बात समझ में आये ऐसी है न?
प्रश्नकर्ता: बराबर समझ गया।
परम पूज्य दादा भगवान सिखाते हैं कि अगर घर में शांति चाहिए, तो तय करना कि मन से, वचन से या वर्तन से किसी को दुःख नहीं देना है। कोई दुःख दे जाए, तो नया दिए बगैर जमा कर लेना चाहिए। क्योंकि हमें वैर भाव नहीं बढ़ाना है। जैसे सफेद कुर्ते पर चाय का दाग पड़ा हो और हम दूसरे दिन पानी, साबुन, ब्लीच डालें तो भी दाग साफ नहीं होता। लेकिन यदि दाग लगते ही तुरंत पानी से ही धो लें तो दाग चला जाता है। उसी प्रकार, रोज रात में 10-15 मिनट बैठकर पूरे दिन में हमसे किसी को दुःख दिया गया हो उसकी दिल से माफी माँग लें तो हमारा गुनाह धुल जाता है।
हमें क्रोध ना करना हो फिर भी हो जाए और बोलने के बाद हमारा जी ज़्यादा जलता रहे कि "बेकार गुस्सा हो गया" तो दो-तीन बार सच्चे दिल से, सही ढंग से प्रतिक्रमण करें कि, "हे दादा भगवान! मुझ से ज़बरदस्त क्रोध हुआ, सामने वाले को भारी कष्ट हुआ! उसके लिए माफी माँगता हूँ। आपके रूबरू खूब माफी माँगता हूँ। " और फिर ऐसा क्रोध नहीं करूँगा ऐसा तय करें।
परम पूज्य दादा भगवान नज़दीक की फाईलों में, जहाँ राग-द्वेष की चिकनाहट ज़्यादा होती है, उनके लिए प्रतिक्रमण की विधि समझाते हैं।
प्रश्नकर्ता: अतिक्रमण से जो उत्तेजना होती है, वह प्रतिक्रमण से शांत हो जाती है?
दादाश्री: हाँ, शांत हो जाती है। चिकणी फाइल (गाढ़ ऋणानुबंध का हिसाब) हो, वहाँ पर तो पाँच-पाँच हज़ार प्रतिक्रमण करने पड़ते हैं, तब शांत होता है। गुस्सा बाहर नहीं आए पर व्याकुलता हो जाए, तो भी यदि हम उसके लिए प्रतिक्रमण नहीं करें तो उतना दाग़ हम पर रह जाएगा। प्रतिक्रमण करने से साफ हो जाता है। अतिक्रमण किया, इसलिए प्रतिक्रमण करो।
Q. रिश्तों में क्रोध पर काबू कैसे पाएँ?
A. कोई हमारे ऊपर गुस्सा करे तो हमसे सहन होता है? हमारे ऊपर कोई गुस्सा करे वह हमें सहन नहीं होता हो और... Read More
Q. रिश्तेदारी में क्रोध की समस्याओं को कैसे निबटाएँ?
A. क्रोध खुद ही अहंकार है। अब इसका पता लगाना चाहिए कि, किस तरह से वह अहंकार है। वह पता लगाएँ तब उसे... Read More
Q. मुझे ऑफिस में गुस्सा क्यों आता हैं?
A. क्रोध और माया, वे तो रक्षक हैं। वे तो लोभ और मान के रक्षक हैं। लोभ की यथार्थ रक्षक माया और मान का... Read More
Q. क्रोधी लोगों के साथ कैसे व्यवहार करें?
A. प्रश्नकर्ता : लेकिन दादाजी, यदि कोई व्यक्ति कभी अपने सामने गरम हो जाए, तब क्या करना... Read More
Q. बच्चे अपने पिता की बजाय माता की तरफदारी क्यों करते हैं?
A. प्रश्नकर्ता : सात्विक चिढ़ या सात्विक क्रोध अच्छा है या नहीं? दादाश्री : लोग उसे क्या कहेंगे? ये... Read More
Q. बच्चे को कैसे अनुशासन में रखें?
A. प्रश्नकर्ता : कई लोगों की ऐसी बिलीफ होती है कि 'बच्चों को मारें तो ही वे सीधे होते हैं, वर्ना बिगड... Read More
Q. ज़रूरत पड़ने पर क्रोध करें, लेकिन ड्रामेटिक।
A. एक बैंक का मेनेजर कहने लगा, 'दादाजी मैंने तो कभी भी वाइफ को या बेटे को या बेटी को एक शब्द भी नहीं... Read More
Q. गुस्सा क्या है? खीज क्या है?
A. प्रश्नकर्ता : दादाजी, गुस्से और क्रोध में क्या फर्क है? दादाश्री : क्रोध उसे कहेंगे, जो अहंकार... Read More
Q. क्रोध से कैसे छुटकारा पाएँ?
A. पहले तो दया रखो, शांति रखो, समता रखो, क्षमा रखो, ऐसा उपदेश सिखाते हैं। तब ये लोग क्या कहते हैं... Read More
subscribe your email for our latest news and events
