Related Questions

क्या अहंकार का टकराव कैसे दूर हो सकता है?

प्रश्नकर्ता : दादाजी, यह अहंकार की बात घर में भी कई बार लागू होती है, संस्था में लागू होती है, दादाजी का काम कर रहे हों, उसमें भी कहीं अहंकार का टकराव हो, वहाँ भी लागू होती है। वहाँ पर भी समाधान चाहिए॒न?

दादाश्री : हाँ, समाधान चाहिए न! अपने यहाँ 'ज्ञानवाला' समाधान लेता है, लेकिन 'ज्ञान' नहीं हो वहाँ क्या समाधान ले? वहाँ फिर अलगाव होता जाएगा, मन उससे अलग होता जाएगा। अपने यहाँ अलगाव नहीं होता।

प्रश्नकर्ता : लेकिन दादाजी, टकराना नहीं चाहिए न?

दादाश्री : टकराते हैं, वह तो स्वभाव है। ऐसा 'माल' भरकर लाया है, इसलिए ऐसा होता है। यदि ऐसा माल नहीं लाया होता तो ऐसा नहीं होता, अतः हमें समझ लेना चाहिए कि भाई की आदत ही ऐसी है। ऐसा हम समझें। इससे फिर हम पर असर नहीं होगा। क्योंकि आदत आदतवाले की (पूर्वसंचित संस्कारवाले जीव की) और 'हम' अपनेवाले (शुद्धात्मा)! और फिर उसकानिकालहो जाता है। आप अटके रहो तो झंझट है। बाकी टकराव तो होता है। टकराव नहीं हो, ऐसा तो होता ही नहीं। पर उस टकराव की वज़ह से हम एक दूसरे से अलग नहीं हो जाएँ, केवल यही देखना है। वह तो पति-पत्नी में भी होता है। लेकिन वे फिर एक ही रहते हैं न वापस?! वह तो होता है। इसमें किसी पर कोई दबाव नहीं डाला है कि, 'तुम मत टकराना।'

×
Share on
Copy